लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
अच्-सन्धि-प्रकरणम् ६३
[लघु०] विधि-सूत्रम्- (५८) मय उञो वो वा ।८।३।३३॥
मयः परस्य उञो वो वा स्यादचि । किम्वुक्तम् । किमु उक्तम् ॥
अर्थः- मय् प्रत्याहार से परे उञ् निपात को विकल्प कर के 'व्' आदेश हो
जाता है अच् परे हो तो ।
व्याख्या- मयः ।५।१। उञः ।६।१। वः ।१।१। वकारादकार उच्चारणार्थः ।
वा इत्यव्ययपदम् । अचि ।७।१। (ङमो ह्रस्वादचि ङमुण्नित्यम् से) । अर्थः-- (मयः)
मय् प्रत्याहार से परे (उञः) उञ् के स्थान पर (वा) विकल्प कर के (वः) व् आदेश
होता है (अचि) अच् परे हो तो । मय् प्रत्याहार में लकार को छोड़ कर अन्य सब
वर्गस्य वर्ण आ जाते हैं । उदाहरण यथा-
किम् उ उक्तम् (क्या कहा ?) । यहां उञ् के एक अच् रूप निपात होने से
निपात एकाजनाङ् (५५) सूत्र प्राप्त होता है । इस का बाध कर इस सूत्र से वैकल्पिक
वकार हो जाता है । जहां वकार आदेश होता है वहां- 'किम्वुक्तम्' प्रयोग सिद्ध होता
है । वकारादेश के अभाव में यथाप्राप्त प्रगृह्य-सञ्ज्ञा हो कर प्रकृतिभाव के कारण
सवर्णदीर्घ नहीं होता- किम् उ उक्तम् । इस प्रकार दो रूप सिद्ध होते हैं ।
नोट-यह सूत्र मोऽनुस्वारः (८.३.२३) सूत्र की दृष्टि में पर त्रिपादी होने से
असिद्ध है; अतः 'किम्वुक्तम्' यहां हल् = वकार परे होने पर भी मोऽनुस्वारः (७७)
से मकार को अनुस्वार नहीं होता । तथा हि- त्रैपादीये वकारे तु नानुस्वारः प्रवर्त्तते ।
ध्यान रहे कि उञ् का ञकार हलन्त्यम् (१) से इत्सञ्ज्ञक हो कर तस्य लोपः
(३) से लुप्त हो जाता है । इस प्रकार 'उ' मात्र शेष रहता है ।
अभ्यास (१३)
(१) अधोलिखित प्रयोगों में ससूत्र सन्धि या सन्ध्यभाव दर्शाएं-
१. भानविति । २. शम्बोस्तु वेदिः । ३. वाय इति । ४. अहो आश्चर्यम् ।
५. तद्द्यस्य परेः । ६ शम्भो इति । ७. अथो इति । ८. उ उत्तिष्ठ ।
६. नो इदानीम् । १०. ओदकान्तात् प्रियो जनोऽनुगन्तव्यः । ११. अहो
अद्य महोष्णता । १२. इ इन्द्रं पश्य । १३. किमिदं सत्यम् उताहो
असत्यम् । १४. किमु आवपन्तम् ।
(२) कहां २ 'आ' ङित् और कहां २ अङित् होता है ? सोदाहरण स्पष्ट करें ।
पदपाठकारों ने भी शाकल्य के इस नियम का अनुसरण किया । शाकल्यग्रहण को
काशिकाकार ने विभाषार्थ माना है। इस विभाषा को व्यवस्थितविभाषा ही
समझना चाहिये । तैत्तिरीयपदपाठ को छोड़ अन्य पदपाठों में प्रगृह्यसंज्ञा नित्य
होती है । तैत्तिरीयपदपाठ में सन्धि उपलब्ध होती है । अत एव हरदत्तमिश्र ने
यहां पदमञ्जरी में लिखा है-
तत्र बह्वृचाः प्रगृह्यमेवाधीयते, तैत्तिरीयास्त्वप्रगृह्यम् ।
६४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
(३) प्रादय उपसर्गाः क्रियायोगे सूत्र का योगविभाग क्यों किया जाता है ?
(४) 'किम्बुक्तम्' यहां मोऽनुस्वार (७७) सूत्र क्यों प्रवृत्त नहीं होता ?
(५) निपात एकाजनाङ् के 'एकाच्' पद में क्यों बहुव्रीहिसमास नहीं मानते ?
(६) 'वस्तुत विष्ण इति' रूप नहीं बनता—इस कथन की व्याख्या करें।
(७) उदाहरणप्रदर्शनपूर्वक मर्यादा और अभिविधि का परस्पर भेद बताए।
(८) पदपाठ की दृष्टि से सम्बुद्धौ शाकल्यस्येता० सूत्र की व्याख्या करें।
०
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(५६) इकोऽसवर्णे शाकल्यस्य ह्रस्वश्च ।६।१।१२३।।
पदान्ता इको ह्रस्वा वा स्युरसवर्णेऽचि । ह्रस्वविधिसामर्थ्यान्न स्वर-
सन्धि । चक्रि अत्र । चक्र्यत्र । पदान्ता इति किम् ? गौर्यौ ॥
अर्थ —असवर्ण अच् परे होने पर पदान्त इक् विकल्प कर के ह्रस्व हो जाते
हैं। ह्रस्वविधि०—ह्रस्वविधान करने के सामर्थ्य से स्वर सन्धि नहीं होनी ।
व्याख्या—पदान्तस्य ।६।१। (एङः पदान्तादति में विभक्तिविपरिणाम करके)।
इक् ।६।१। असवर्णे ।७।१। अचि ।७।१। (इको यणचि से)। ह्रस्व ।१।१। शाकल्यस्य
।६।१। च इत्यव्ययपदम्। अर्थ —(असवर्णे) असवर्ण (अचि) अच् परे होने पर
(पदान्तस्य) पदान्त (इक्) इक् के स्थान पर (ह्रस्व ) ह्रस्व हो जाता है (शाकल्यस्य)
शाकल्य आचार्य के मत में। अन्य आचार्यों के मत में नहीं होता, हमें सब आचार्य
प्रमाण हैं अतः ह्रस्व विकल्प से होगा। उदाहरण यथा—
चक्री +अत्र (विष्णु यहां हैं) यहां पदान्त इक् ईकार है, इस से परे 'अ'
यह असवर्ण अच् वर्त्तमान है अतः इक् को विकल्प करके ह्रस्व हो गया। जहां ह्रस्व
हुआ वहां—'चक्रि अत्र'। जहां ह्रस्व न हुआ वहां इको यणचि (१५) से यण् होकर
'चक्यत्र' इस प्रकार दो रूप सिद्ध होते हैं।
इस के अन्य उदाहरण यथा—१ मधु¹ अस्ति, मध्वस्ति। २ दधि अस्ति,
दध्यस्ति। ३ वस्तु आनय, वस्त्वानय। ४ वारि अत्र, वार्यत्र। ५ योगि आग-
च्छति, योग्यागच्छति। ६ घनि अवोचत्, घन्यवोचत्। ७ नदि एधते, नद्येधते। ८
जाह्नवि अवतरति, जाह्नव्यवतति। ९ बलि ऋक्ष , बल्यृक्ष । १० भवति एव,
भवत्येव। ११ धातृ अत्र, धात्रत्र।
अब जहां ह्रस्व करते हैं वहां यह शङ्का उत्पन्न होती है कि यहां इको यणचि
(१५) सूत्र से यण् क्या न किया जाए ? इसका उत्तर यह है कि यदि वहां भी यण्
हो जाए तो पुनः इस सूत्र से ह्रस्व करना व्यर्थ हो जायेगा, क्योंकि तब दोनों पक्षों
में 'चक्यत्र' रूप समान हो जायेगा जो इस सूत्र के बिना भी इको यणचि (१५) सूत्र
से सिद्ध हो सकता है। अतः इस सूत्र द्वारा ह्रस्व करने के सामर्थ्य से यहां सन्धि न
१ यहां यह ध्यातव्य है कि ह्रस्वों को भी पर्जन्यवल्लक्षणप्रवृत्ति न्याय से ह्रस्व हो
जाया करता है। इस का फल सन्ध्यभाव स्पष्ट ही है। यह विषय इस सूत्र के
भाष्य में अत्यन्त स्पष्ट है।
अच्-सन्धि-प्रकरणम् ६५
होगी। ध्यान रहे कि मूल में 'स्वरसन्धि' कथन इस लिये किया गया है कि यहां स्वर-
सन्धि के अतिरिक्त अन्य कोई सन्धि प्राप्त ही नहीं हो सकती।
इस सूत्र में 'असवर्ण' ग्रहण का यह प्रयोजन है कि 'योगी + इच्छति =
योगीच्छति' 'कुमारी + ईहते = कुमारीहते' इत्यादियों में सवर्ण अच् परे होने पर ह्रस्व
न हो।
'पदान्त' ग्रहण इस लिये किया गया है कि—'गौरी + औ' यहां अपदान्त इक्
को ह्रस्व न हो जाए। इको यणचि (१५) से यण् हो कर 'गौर्यौ' बन जाए।
ध्यान रहे कि प्लुतप्रगृह्या अचि नित्यम् (५०) में 'नित्यम्' ग्रहण के कारण
उस के विषय में इस सूत्र की प्रवृत्ति नहीं होती। यथा—हरी एतौ, शिशू आक्रन्दतः।
इन में प्रकृत ह्रस्वसमुच्चित प्रकृतिभाव न हो कर उस के द्वारा नित्य प्रकृतिभाव
होता है।
अब प्रसङ्गवश 'गौर्यौ' में द्वित्व करने वाला सूत्र लिखते हैं—
[लघु०] विधि-सूत्रम्— (६०) अचो रहाभ्यां द्वे ।८।४।४५॥
अचः पराभ्यां रेफहकाराभ्यां परस्य यरो द्वे वा स्तः। गौर्य्यौ॥
अर्थः—अच् से परे जो रेफ या हकार उस से परे यर् को विकल्प से द्वित्व हो।
व्याख्या—अचः ।५।१। रहाभ्याम् ।५।२। द्वे ।१।२। यरः ।६।१। वा इत्यव्यय-
पदम्। (यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा से)। अर्थः—(अचः) अच् से परे (रहाभ्याम्)
जो रेफ या हकार उस से परे (यरः) यर् के (द्वे) दो शब्दस्वरूप (वा) विकल्प कर
के हो जाते हैं। उदाहरण यथा—'गौर् यौ' यहां अच् = 'औ' से परे रेफ है अतः उस
से परे यर् यकार को विकल्प करके द्वित्व होकर द्वित्वपक्ष में 'गौर्य्यौ' तथा द्वित्वाभाव-
पक्ष में 'गौर्यौ' इस प्रकार दो रूप बन जाते हैं।
इस सूत्र के कुछ अन्य उदाहरण यथा—
१. आर्य्यः, आर्यः। २. अर्क्कः, अर्कः। ३. कार्य्यम्, कार्यम्। ४. हर्य्यनुभवः,
हर्य्नुभवः। ५. उर्व्वी, उर्वी। ६. आह्लादः, आह्लादः। ७. अर्ज्जुनः, अर्जुनः। ८.
आर्त्तः, आर्तः। ६. आह्वयः, आह्वयः। १०. आर्द्रकम् आर्द्रकम्। ११. ब्रह्मा,
ब्रह्मा। १२. अर्त्यः, अर्थः। १३. न ह्य्यस्ति, न ह्यस्ति। १४. गर्मः, गर्मः। १५.
ऊर्द्धवम्, ऊर्ध्वम्। १६. दुर्गः, दुर्गः। १७. अर्घ्यः, अर्घ्यः। १८. मूर्च्छना, मूर्छना।
१६. अपह्नुते, अपह्नुते। २०. मूर्खः, मूर्खः। २१. शर्म्या, शर्मा। २२. विसर्गः,
विसर्गः। २३. प्राण्र्णम्, प्राण्र्णम्। २४. कर्म्म, कर्म। २५. निर्झरः, निर्भरः। १
१. गर्मः, निर्झरः, अर्घ्यः, ऊर्द्धवम् आदि में द्वित्व के बाद झलां जश्झशि (१६)
से जश्त्व हो जाता है तथा 'मूर्खः, अर्त्यः, मूर्च्छना आदि में खरि च (७४) से
चर्त्व। आर्पम्, अर्शः आदि में प्रकृतसूत्र के प्राप्त द्वित्व का शरोऽचि (२६६) से
निषेध हो जाता है। 'मूर्च्छना' में तुक् आगम समझने की भूल से बचें।
६६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
अब प्रसङ्गतः प्राप्त हुए द्वित्व को कह कर पुनः इकोऽसवर्णे शाकल्यस्य ह्रस्वश्च
(५६) सूत्र पर निषेधक वार्त्तिक लिखते हैं—
[लघु०] वा०—(६) न समासे ॥
वाप्यश्व ॥
अर्थ —समास में असवर्ण अच् परे होने पर पदान्त इक् को ह्रस्व नहीं होता ।
व्याख्या—वापी+अश्व [वावडी में घोडा । वाप्यामश्व =वाप्यश्व, सह
सुपा (६०६) इति समास ।] यहां समास में विभक्तियों का लुक् होने पर प्रत्यय-
लोपे प्रत्यय-लक्षणम् (१६०) सूत्र द्वारा ईकार पदान्त हो जाता है, इसे असवर्ण अच्
(अ) परे होने पर पूर्वसूत्र (५६) से ह्रस्व प्राप्त था जो अब इस वार्त्तिक के निषेध
के कारण नहीं होता । इको यणचि (१५) से यण् हो कर विभक्ति लाने से—'वाप्यश्व'
सिद्ध हो जाता है। इसी प्रकार— सुध्युपास्य मध्वरि गौर्यात्मज नद्युदय चार्वङ्गी,
मात्राज्ञा वध्वागमनम्, लाकृति' प्रभृति समास में भी समझ लेना चाहिये ।
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(६१) ऋत्यकः ।६।१।१२४॥
ऋति परे पदान्ता अकः प्राग्वद् वा । ब्रह्म ऋषि । ब्रह्मर्षि । पदान्ता
त्किम् ? आर्च्छत् ॥
अर्थ —ऋत् (ह्रस्व ऋकार) परे होने पर पदान्त अक् विकल्प से ह्रस्व हो ।
व्याख्या—ऋति ।७।१। पदान्तस्य ।६।१। (एङः पदान्तादति से विभक्ति-
विपरिणाम द्वारा)। अकः ।६।१। ह्रस्वः ।१।१। शाकल्यस्य ।६।१। (इकोऽसवर्णे शाकल्यस्य
ह्रस्वश्च से )। अर्थ —(ऋति) ह्रस्व ऋवर्ण परे होने पर (पदान्तस्य) पदान्त (अकः)
अक् के स्थान पर (ह्रस्व ) ह्रस्व हो जाता है (शाकल्यस्य) शाकल्य आचार्य के मत
में । अन्य आचार्यों के मत में न होने से विकल्प हो जायेगा । उदाहरण यथा—
'ब्रह्मा+ऋषि' यहां 'ऋषि' शब्द का आदि ऋत् परे है, अतः मकारोत्तर
पदान्त आकार को विकल्प करके ह्रस्व होकर—'ब्रह्म ऋषि' तथा ह्रस्वाभावपक्ष में
आद् गुणः (२७) से गुण, रपर होकर— ब्रह्मर्षि' बना । [अथवा 'ब्रह्म+ऋषि' ऐसे
छेद में ह्रस्व को ह्रस्व होगा । ब्रह्मणः =वेदस्य ऋषिः —ब्रह्मर्षिरित्यादिविग्रह ] ।
पूर्व (५६) सूत्र सवर्ण परे होने पर प्रवृत्त नहीं होता था तथा अकार को
ह्रस्व भी नहीं करता था, इन दोनों आवश्यकताओं के लिये यह सूत्र बनाया गया
है । जैसा कि महाभाष्य में कहा है—सवर्णार्थम् अनिगन्तार्थञ्च । सवर्ण परे होने पर
यथा— होतृ ऋद्धय, होतॄद्धय । यहां पूर्व-सूत्र प्रवृत्त नहीं हो सकता था । अकार का
उदाहरण—ब्रह्मऋषि, ब्रह्मर्षि । ध्यान रहे कि जहां २ ह्रस्व करेंगे वहां २ पूर्ववत्
ह्रस्वविधान के सामर्थ्य से स्वर-सन्धि नहीं होगी ।
इस सूत्र में भी पूर्ववत् 'पदान्त' का ग्रहण होता है, अतः अपदान्त अक् को
ह्रस्व नहीं होता । उदाहरण यथा—'आ+ऋच्छत्' [यह तौदादिक 'ऋच्छ' अथवा
भौवादिक 'ऋ' धातु के लङ् लकार के प्रथम-पुरुष का एकवचन है । 'आ' यह यहां
'आट्' आगम समझना चाहिये]। यहां 'आ' (आट्) पदान्त नहीं अतः ऋत् परे होने
पर भी इसे ह्रस्व नहीं होता। आठश्च (१६७) से पूर्व+पर के स्थान पर 'आर्'
वृद्धि होकर - 'आर्च्छत्' बन जाता है।
इकोऽसवर्णे० (५६) सूत्र समास में प्रवृत्त नहीं होता है; यह सूत्र समास में भी
प्रवृत्त हो जाता है। यथा - सप्तऋषीणाम्, सप्तर्षीणाम्। परन्तु उपसर्गादृति धातौ
(३७) के विषय में इस की प्रवृत्ति नहीं होती - प्रार्च्छति। इस की स्पष्टता सिद्धान्त-
कौमुदी में देखें।
इस सूत्र के कुछ अन्य उदाहरण यथा -
१. कन्य ऋज्वी, कन्यर्ज्वी। २. कुमारि ऋतुमती, कुमार्युतुमती। ३. प्रज्ञ
ऋतम्भरा, प्रज्ञर्तम्भरा। ४. पुरुपऋषभः, पुरुपर्षभः। ५. महऋषिः, महर्षिः। ६.
शङ्खधमऋद्धिः, शङ्खधमर्द्धिः। ७. कर्तृ ऋणि, कर्तृ णि। ८. पञ्च ऋतवः, पञ्चर्तवः।
९. कण्वऋषिः, कण्वर्षिः। १०. ऋपिऋणम्, ऋष्य्णम्।
[लघु०] इत्यच्सन्धि-प्रकरणम् ॥
अर्थः- यहां अचों की सन्धि का प्रकरण समाप्त होता है।
व्याख्या - अच्सन्धि शब्द पर विशेष टिप्पण पृष्ठ (६६) पर देखें।
अभ्यास (१४)
(१) इकोऽसवर्णे० तथा ऋत्यकः में 'पदान्त' की अनुवृत्ति क्यों लाते हैं ?
(२) क्या समास में भी ऋत्यकः की प्रवृत्ति हो सकती है ?
(३) 'प्रार्च्छति' में ह्रस्वसमुच्चित प्रकृतिभाव क्यों नहीं होता ?
(४) 'सुध्युपास्यः' आदि में इकोऽसवर्णे० क्यों नहीं लगता ?
(५) 'साधू इमौ' में इकोऽसवर्णे० की प्रवृत्ति होगी या नहीं ? स्पष्ट करें।
(६) सवर्णार्थसनिगन्तार्थञ्च - इस वचन की व्याख्या करें।
(७) ह्रस्वविधि में ऐसा कौन सा सामर्थ्य है जो स्वरसन्धि को रोकता है ?
(८) निम्नस्थ प्रयोगों में सोपपत्तिक सन्धि दर्शाएं -
१. नदि एति। २. अर्व्मकः। ३. देवऋषयः। ४. पितृऋणम्। ५.
अर्ज्यति। ६. कर्तृ इदम्। ७. नद्यात्मा। ८. नमः परम-ऋषिभ्यः।
९. साक्षि आत्मनः। १०. वर्द्धते।
-::o::-
इति भैमीव्याख्योपेतायां लघु-
सिद्धान्तकौमुद्यामच्सन्धि-
प्रकरणं समाप्तम् ॥
ल० प्र० (७)
अथ हल्-सन्धि-प्रकरणम्
अब हलों अर्थात् व्यञ्जनों का व्यञ्जनों के साथ मेल दिखाया जायेगा।
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(६२) स्तोः श्चुना श्चुः ।८।४।४०॥
सकारतवर्गयोः शकारचवर्गाभ्यां योगे शकारचवर्गौ स्तः। रामश्शेते।
रामश्चिनोति। सच्चित्। शार्ङ्गिञ्जय॥
अर्थ.—सकार तवर्ग के स्थान पर, शकार चवर्ग के साथ योग होने पर शकार
चवर्ग हो जाता है।
व्याख्या—स्तोः ।६।१। श्चुना ।३।१। श्चुः ।१।१। समास — स् च तुश्च =
स्तु, तस्य = स्तोः, समाहार-द्वन्द्व। यद्यपि समाहार-द्वन्द्व में नपुंसकलिंग होता है,
तथापि यहां सौत्र पुंस्त्व जानना चाहिए। श् च चुश्च = श्चुः तेन = श्चुना, समाहार-
द्वन्द्व। अत्र सहयोगे तृतीया बोध्या। सकार और तवर्ग को 'स्तु' तथा शकार और
चवर्ग को 'श्चु' कहा गया है। अर्थ — (स्तोः) सकार तवर्ग के स्थान पर (श्चुना)
शकार चवर्ग के साथ (श्चुः) शकार चवर्ग हो जाता है। तात्पर्य यह है कि शकार-
चवर्ग के साथ यदि सकार-तवर्ग का आगे या पीछे कहीं योग (मेल) हो तो सकार-तवर्ग
के स्थान पर भी शकार-चवर्ग हो जाता है।
यहां स्थानी—स्, त्, थ्, द्, ध्, न् ये ६ वर्ण और इन के स्थान पर होने
वाले आदेश—श्, च्, छ्, ज्, झ्, ञ् ये भी ६ वर्ण हैं। अतः दोनों ओर समान संख्या
होने से ये आदेश यथासंख्यमनुदेशः० (२३) परिभाषा के अनुसार क्रमशः होंगे,
अर्थात् स् को श्, त् को च्, थ् को छ्, द् को ज्, ध् को झ् तथा न् को ञ् ही आदेश
होगा।
ध्यान रहे कि यहां स्थानी और आदेश के विषय में तो यथासंख्य होता है
परन्तु योग के विषय में यथासंख्य नहीं होता, अर्थात् यहां यह नहीं समझना चाहिये
कि सकार को शकार—शकार के योग में, तकार को चकार—चकार के योग में,
थकार को छकार—छकार के योग में, दकार को जकार—जकार के योग में, धकार
को झकार—झकार के योग में तथा नकार को ञकार—ञकार के योग में ही होता
है। किन्तु योग चाहे किसी 'श्चु' का हो—सकार को शकार, तकार को चकार, थकार
को छकार, दकार को जकार, धकार को झकार तथा नकार को ञकार ही होगा।
यदि योग के विषय में भी यथासंख्य होता तो शात् (६३) सूत्र से निषेध करने की
कुछ आवश्यकता न होती, क्योंकि शकार से परे तो तब तवर्ग को चवर्ग प्राप्त ही
नहीं हो सकता था। अतः निषेध करने से ज्ञात होता है कि योग के विषय में आचार्य
यथासंख्य नहीं चाहते। उदाहरण यथा—
(१) रामश्शेते (राम सोता है)। 'रामस् + शेते' [राम शब्द से सुं प्रत्यय
करने पर ससजुषो रुः (१०५) से रुँ तथा खरवसानयोर्विसर्जनीयः (६३) से विसर्ग
हल्-सन्धि-प्रकरणम् ६६
हो पुनः वा शरि (१०४) से विकल्प कर के विसर्ग होने और तदभावपक्ष में सकार
करने पर—'रामस् शेते, रामः शेते' ये दो रूप बनते हैं। यहां विसर्गाभावपक्ष में सत्व
वाले रूप का ग्रहण किया गया है।] यहां सकार का शकार के साथ योग होने से उस
के स्थान पर क्रमानुसार शकार आदेश हो 'रामश्शेते' प्रयोग सिद्ध होता है।
अब ग्रन्थकार यह जतलाने के लिये कि योग के विषय में यथासंख्य नहीं होता;
सकार का एक अन्य उदाहरण देते हैं—
(२) रामश्चिनोति (राम चुनता है)। 'रामस् + चिनोति' [राम शब्द से
सुँ प्रत्यय करने पर ससजुषो रुः (१०५) से उसे रुँ तथा खरवसानयोर्विसर्जनीयः (६३)
से विसर्ग हो पुनः विसर्जनीयस्य सः (१०३) से सकार हो जाता है।] यहां सकार
का चकार के साथ योग होने से उस के स्थान पर क्रमानुसार शकार हो 'रामश्चिनोति'
प्रयोग सिद्ध होता है।
(३) सच्चित् (सत् और ज्ञान)। 'सत् + चित्' यहां तकार का चकार के
साथ योग है अतः उस के स्थान पर क्रमानुसार चकार हो 'सच्चित्' प्रयोग सिद्ध होता
है। [वस्तुतः यहां स्तोः श्चुना श्चुः (८.४.३६) के असिद्ध होने से प्रथम झलां जशो-
ऽन्ते (८.२.३६) से तकार को दकार हो पुनः खरि च (८.४.५४) के असिद्ध होने
से स्तोः श्चुना श्चुः (८.४.३६) से दकार को जकार हो कर अन्त में खरि च (७४)
से जकार को चकार हो जाता है]।
(४) शार्ङ्गिञ्जय (हे विष्णो ! तुम्हारी जय हो)। 'शार्ङ्गिन् + जय' यहां
नकार का जकार के साथ योग है अतः प्रकृतसूत्र से नकार के स्थान पर क्रमानुसार
ञकार हो कर 'शार्ङ्गिञ्जय' प्रयोग सिद्ध होता है।
योग वर्ण के आगे या पीछे दोनों अवस्थाओं में हो सकता है; किसी को यह
न समझ लेना चाहिये कि यदि श्चु आगे आएंगे तो स्तु को श्चु होगा। चाहे श्चु—
स्तु से आगे आए या पीछे, स्तु को श्चु हो जायेगा। यथा—'यज् + न' यहां नकार
का पूर्व जकार के साथ योग होने पर उस के स्थान पर ञकार हो 'यज्ञः' प्रयोग सिद्ध
हो जाता है। इसी प्रकार राज्ञः, याच्ञा आदि में समझना चाहिये।
शङ्का—यदि योग में आगे पीछे का नियम नहीं; तो 'अच्सन्धि' में स् को श्
हो जावे, शात् (६३) सूत्र निषेध नहीं कर सकता। 'अच्त्वम्' में तकार को चकार
हो जावे।
समाधान - अल्पाच्तरम् (६८६) इस सूत्र के निर्देश से, सिद्धमनच्त्वात् इस
वार्त्तिक के प्रयोग से तथा अकत्स्वरौ तु कर्त्तव्यौ प्रत्यङ्गं मुक्तसंशयौ इस भाष्य के
प्रामाण्य से यह प्रमाणित होता है कि क्वचित् प्रत्याहार आदि के सान्निध्य में असन्देहार्थ
श्चुत्व आदि संहितार्य नहीं होते। अत एव 'अच्त्वम्' में कुत्व, 'जश्त्वम्' में व्रश्चा-
दिषत्व तथा 'खर्परे, शर्परे' में रेफ को विसर्ग आदि कार्य नहीं देखा जाता।
[लघु०] निषेध-सूत्रम्—(६३) शात् ।८।४।४३॥
शात्परस्य तवर्गस्य चुत्वं न स्यात् । विश्नः । प्रश्नः ॥
१०० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां -
अर्थः—शकार से परे तवर्ग के स्थान पर चवर्ग नही होता ।
व्याख्या—शात् ।५।१। तो ।६।१। (तो. षि से) । न इत्यव्ययपदम् (न पदान्ता-
ट्टोरनाम् से) । क्या नही होता ? इस जिज्ञासा के उत्पन्न होने पर सुतरा यही आयेगा
कि जो प्राप्त होता है वह नही होता । शकार से परे तवर्ग के स्थान पर स्तोः श्चुना
श्चुः (६२) से चवर्ग ही प्राप्त हो सकता है, अन्य कोई प्राप्त नही हो सकता' अत
यहा उसी का निषेध समझना चाहिये । अर्थ —(शात्) शकार से परे (तो.) तवर्ग
के स्थान पर चवर्ग (न) नही होता । उदाहरण यथा—
(१) 'विश् + न' [यहा विच्छँ गतौ (तुदा०) धातु से यजयाचयतविच्छ-
प्रच्छरक्षो नङ् (८६०) द्वारा नङ् प्रत्यय तथा च्छ्वोः शूडनुनासिके च (८४३) द्वारा
छकार को शकार हो गया है।] यहा स्तो. श्चुना श्चुः (६२) द्वारा नकार को ञकार
प्राप्त था जो अब इस सूत्र के निषेध के कारण नही होता—विश्न (गति वा प्रवेश)।
(२) 'प्रश् + न' [यहा प्रच्छँ ज्ञीप्सायाम् (तुदा०) धातु से पूर्ववत् नङ् प्रत्यय
तथा छकार को शकार आदेश हुआ है।] यहा स्तोः श्चुना श्चुः द्वारा नकार को ञकार
प्राप्त था जो अब इस सूत्र के निषेध के कारण नही होता— प्रश्न २। इसी तरह
'क्लिश्नाति'।
स्मरण रहे कि यह सूत्र (८.४.४३) स्तो श्चुना श्चुः (८.४ ३६) से परे
होने के कारण पूर्वत्रासिद्धम् (३१) द्वारा उस की दृष्टि मे असिद्ध होने पर भी वचन-
सामर्थ्य से असिद्ध नही होता, उस का अपवाद हो जाता है। अपवादो वचनप्रामाण्याद्
इति भाष्यम् ।
इस सूत्र से विधान किया निषेध नकार के सिवाय तवर्गस्थ अन्य वर्णों से प्राय
सम्भव नही हो सकता, क्योकि 'श्' से परे 'त्, थ्, द्, ध्' होने पर व्रश्चभ्रस्ज० (३०७)
द्वारा षत्व हो जाया करता है।
अभ्यास (१५)
(१) निम्नस्थ प्रयोगो मे सूत्रनिर्देशपूर्वक सन्धिकार्य दर्शाइए—
१. ग्रामात् + चलित । २ हरिस् + छत्रधर । ३ ईश्वरात् + जगत् +
जायते । ४ सोमसुत् + झन्कार । ५ तद् + चैतन्यम् । ६ याच् + ना।
७ शङ् + नाय । ८ अश् + नित्यम् । ६. जन् + त्वम् । १०. दु +
तिप् । ११. उद् + ज्वल ।
(२) निम्नलिखित रूपो मे सूत्रसमन्वयपूर्वक सन्धिच्छेद करें—
१. यहा अनन्तरस्य विधिर्वा भवति प्रतिषेधो वा इस परिभाषा को भी ध्यान मे
रखना चाहिये ।
२. यहा ग्रहिज्या० (६३४) सूत्र द्वारा सम्प्रसारण नही होता, क्योकि प्रश्ने चासन्न-
काले (३ २ ११७) सूत्र मे महामुनि ने स्वय सम्प्रसारण नही किया ।
हल्-सन्धि-प्रकरणम् १०१
१. कृष्णश्चपलः। २. यज्ञः। ३. अग्निचित्छिनत्ति। ४. नारदशशाप।
५. भृज्जी। ६. सच्छात्रः। ७. अश्नाति। ८. श्रीमञ्झटिति।
६. उच्छेदः। १०. राज्ञः।
(३) श्चुत्व-विधि में कहां यथासङ्ख्य होता है और कहां नहीं? स्पष्ट करें।
(४) स्तोः श्चुना श्चुः (८.४.३६) सूत्र की दृष्टि में शात् (८.४.४३) सूत्र
असिद्ध है। तो भला असिद्ध कैसे सिद्ध का निषेध कर सकता है?
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[लघु०] विधि-सूत्रम्-(६४) ष्टुना ष्टुः ।८।४।४०॥
स्तोः ष्टुना योगे ष्टुः स्यात्। रामष्षष्ठः। रामष्टीकते। पेष्टा।
तट्टीका। चक्रिण्ढौकसे॥
अर्थः- सकार तवर्ग के स्थान पर, षकार टवर्ग के साथ योग होने पर षकार
टवर्ग हो जाता है।
व्याख्या- स्तोः ।६।१। (स्तोः श्चुना श्चुः से)। ष्टुना ।३।१। ष्टुः ।१।१।
समासः- ष् च टुश्च = ष्टुः, तेन = ष्टुना, समाहारद्वन्द्वः। सौत्रम् पुंस्त्वम्। अर्थः-
(स्तोः) सकार तवर्ग के स्थान पर (ष्टुना) षकार टवर्ग के साथ (ष्टुः) षकार टवर्ग
हो जाता है। भाव- 'स्, त्, थ्, द्, ध्, न्' इन छः वर्गों के स्थान पर 'ष्, ट्, ठ्, ड्,
ढ्, ण्' ये छः वर्ण हो जाते हैं, यदि 'ष्, ट्, ठ्, ड्, ढ्, ण्' इन छः वर्णों का योग अर्थात्
मेल हो तो। यहां भी पूर्ववत् स्थानी और आदेश के विषय में यथासङ्ख्य है योग के
विषय में नहीं। यदि योग के विषय में भी यथासङ्ख्य होता तो षकार से परे तवर्ग
को टवर्ग प्राप्त ही न हो सकता, पुनः उस के निषेध के लिये तोः षि (६६) सूत्र क्यों
बनाते? उदाहरण यथा-
(१) रामष्षष्ठः (राम छठा है)। 'रामस् + षष्ठः' ['राम' प्रातिपदिक से
सुँ प्रत्यय लाने पर रुँत्व-विसर्ग हो वा शरि (१०४) द्वारा विकल्प कर के विसर्ग होने
पर तदभावपक्ष में सकार आदेश हो जाता है। उसी पक्ष का यहां ग्रहण किया गया
है।] यहां षकार के साथ योग होने से सकार को षकार हो 'रामष्षष्ठः' प्रयोग सिद्ध
होता है।
(२) रामष्टीकते (राम जाता है)। 'रामस् + टीकते' [यहां राम शब्द से
'सुँ' प्रत्यय ला कर रुँत्व-विसर्ग हो, विसर्जनीयस्य सः (१०३) से पुनः सकारादेश हो
जाता है] यहां टकार के साथ सकार का योग है। अतः सकार को षकार आदेश हो
'रामष्टीकते' प्रयोग सिद्ध होता है। सकार का यह दूसरा उदाहरण यह जतलाने के
लिये दिया गया है कि योग के विषय में यथासङ्ख्य नहीं होता।
(३) पेष्टा (पीसने वाला; पीसेगा)। 'पेष् + तृ' [पिषॢँ सञ्चूर्णने (रुधा०)
धातु से तृच् प्रत्यय या लुट् के प्रथमपुरुष का एकवचन करने पर पुगन्तलघूपधस्य च
(४५१) सूत्र से इकार को एकार गुण हो जाता है।] यहां षकार के साथ योग होने
से तकार को टकार हो कर- 'पेष्टा' प्रयोग सिद्ध होता है।
१०२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
नोट—‘ष्टु परे होने पर’ ऐसा न कह कर ‘ष्टु के साथ योग होने पर’ ऐसा
इस लिये कहा है कि ‘पेष्टा’ आदि में ‘ष्टु’ का पूर्वयोग होने पर भी ‘स्तु’ को ‘ष्टु’
हो जाए। सूत्रे ‘ष्टुना’ इत्यत्र सहयोगे तृतीया बोध्या।
(४) तट्टीका (उस की टीका, अथवा वह टीका)। ‘तद्+टीका’ [यहां
‘तस्य टीका’ ऐसा षष्ठी-तत्पुरुष अथवा कर्मधारयसमास हो सर्वनाम्नो वृत्तिमात्रे पुंव-
द्भावः वार्त्तिक से पुंवद्भाव समझना चाहिये।] यहां टकार के योग में दकार को
डकार हो कर खरि च (७४) सूत्र से डकार को टकार करने से ‘तट्टीका’ प्रयोग
सिद्ध होता है। ग्रन्थकार को यहां पर बल्कि ‘सच्चित्’ प्रयोग पर ही खरि च (७४)
सूत्र दर्शाना उचित था।
नोट—यहां पर कुछ लोग ‘तत् + टीका’ ऐसा छेद करके सीधा ष्टुत्व कर
दिया करते हैं, यह नितान्त अशुद्ध है, क्योंकि ष्टुना ष्टुः (८.४.४०) सूत्र की दृष्टि में
खरि च (८.४.५४) सूत्र असिद्ध है अतः ष्टुत्व से पूर्व चर्व नहीं हो सकता, और
यदि ‘तद्’ शब्द को दकारान्त न मान कर तकारान्त मानते हैं तो ‘अतितद्, अतितदौ,
अतितदः’ इत्यादि प्रयोग उपपन्न नहीं हो सकते।
(५) चक्रिण्ढौकसे (हे चक्रधारिन् ! तुम जाते हो)। ‘चक्रिन्+ढौकसे’ यहां
ढकार का योग होने से नकार को णकार हो कर ‘चक्रिण्ढौकसे’ प्रयोग सिद्ध होता है।
[लघु०] निषेध-सूत्रम्—(६५) न पदान्ताट्टोरनाम् ।८।४।४१॥
पदान्तात् टवर्गात् परस्याऽनामः स्तोः ष्टुर्न स्यात्। षट् सन्तः। षट्
ते। पदान्तात् किम् ? ईट्टे। टोः किम् ? सर्पिष्टमम्॥
अर्थः—पदान्त टवर्ग से परे ‘नाम्’ के नकार को छोड़ कर अन्य सकार तवर्ग
को षकार टवर्ग नहीं होता।
व्याख्या—न इत्यव्ययपदम्। पदान्तात् ।५।१। टोः ।५।१। अनाम् ।६।१।
(यहां षष्ठी के एकवचन ‘ङस्’ का लुक् हुआ है)। स्तोः ।६।१। (स्तोः श्चुना श्चुः से)।
ष्टुः ।१।१। (ष्टुना ष्टुः से)। अर्थ —(पदान्तात्) पदान्त (टोः) टवर्ग से परे (अनाम्)
नाम्शब्द के अवयव से भिन्न (स्तोः) सकार तवर्ग के स्थान पर (ष्टुः) षकार टवर्ग
(न) नहीं होता। यह सूत्र ष्टुना ष्टुः (६४) सूत्र का अपवाद है। उदाहरण यथा—
(१) षट् सन्तः (छः सज्जन)। ‘षड्+सन्तः’ [यहां ‘षड्’ सुबन्त होने से
पदसंज्ञक है। इस रूप में प्रथम ङः सि धुँट् (८४) द्वारा वैकल्पिक ‘धुट्’ होता है।
जहां ‘धुट्’ नहीं होता, उस पक्ष का यहां ग्रहण समझना चाहिये] यहां खरि च
(८.४.५४) के असिद्ध होने से ष्टुना ष्टुः (८.४.४०) द्वारा सकार को षकार प्राप्त
होता है। पुन इस सूत्र से उस का निषेध हो जाता है क्योंकि यहां पदान्त टवर्ग
(डकार) से परे स्तु (सकार) को ष्टुत्व (षकार) करना है। अब खरि च (७४)
से डकार को टकार हो कर—‘षट् सन्तः’ प्रयोग सिद्ध होता है।
(२) षट् ते (वे छः)। ‘षड्+ते’ यहां खरि च (८.४.५४) के असिद्ध होने
से ष्टना ष्टुः (८.४.४०) द्वारा ष्टुत्व अर्थात् तकार को टकार प्राप्त होता है, इस
हल्-सन्धि-प्रकरणम् १०३
पर इस सूत्र से निषेध हो कर पुनः खरि च (७४) से चर्त्व टकार करने से 'षट् ते'
प्रयोग सिद्ध होता है। इसी प्रकार—लिण्निमित्तः, इण्, लिट्सु आदि प्रयोगों में भी
ष्टुत्व का निषेध समझ लेना चाहिये ।
पदान्तात् किम् ? ईट्टे ।
अब यहां यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि पदान्त टवर्ग क्यों कहा ? केवल टवर्ग
ही कह देते तो क्या हानि थी ? इस का उत्तर यह है कि यदि 'पदान्त' न कहते तो
'ईट्टे' (वह स्तुति करता है) यह प्रयोग अशुद्ध हो जाता। तथाहि—'ईड् + ते' [ईड्
स्तुतौ (अदा०) धातु से लँट्, उसे 'त' आदेश, शप्, उस का लुक् तथा 'त' की टि=
अकार को एकार हो यह रूप निष्पन्न होता है] यहां खरि च (८.४.५४) के असिद्ध
होने से प्रथम ष्टुना ष्टुः (८.४.४०) से तकार को टकार तदनन्तर खरि च (८.४.५४)
से डकार को टकार हो कर 'ईट्टे' प्रयोग सिद्ध होता है। अब यदि न पदान्ताट्टोर-
नाम् (६५) सूत्र में 'टोः' पद का विशेषण 'पदान्तात्' नहीं बनाते तो यहां अपदान्त
डकार से परे भी तवर्ग को टवर्ग करने का निषेध हो जाता; जो अनिष्ट था। अब
'पदान्तात्' कहने से कुछ भी दोष नहीं आता ।
टोः किम् ? सर्पिष्टमम् ।
प्रश्न—इस सूत्र में 'टवर्ग' का ग्रहण क्यों किया है ? केवल न पदान्तादनाम्
इतना ही कह देते; अर्थात् 'पदान्त वर्ण से परे नाम् के नकार को छोड़ अन्य सकार
तवर्ग को षकार टवर्ग नहीं होता' इतने मात्र के कथन से क्या हानि हो सकती थी ?
उत्तर—यदि 'टवर्ग' का ग्रहण न करते तो पदान्त षकार से परे भी 'स्तु' को
'ष्टु' होने का निषेध हो जाता; इस से 'सर्पिष्टमम्' आदि प्रयोगों में ष्टुत्व न हो सकने
से अनिष्ट हो जाता। तथाहि—'सर्पिस्' शब्द से 'तमप्' प्रत्यय करने पर ह्रस्वात्तादौ
तद्धिते (८.३.१०१) सूत्र से सकार को षकार हो 'सर्पिष् + तम'। अब ष्टुना ष्टुः (६४)
से ष्टुत्व अर्थात् तकार को टकार करने से 'सर्पिष्टमम्' (उत्तम घृत) प्रयोग निष्पन्न
होता है। यहां स्वादिष्वसर्वनामस्थाने (१६४) सूत्र से 'सर्पिष्' की पद सञ्ज्ञा होने के
कारण षकार पदान्त हो जाता है¹। अब यदि न पदान्ताट्टोरनाम् (६५) सूत्र में 'टोः'
का ग्रहण न करते तो यहां पदान्त षकार से परे तकार को टकार होने का निषेध हो
अनिष्ट रूप हो जाता; अतः सूत्र में 'टोः' का ग्रहण परमावश्यक है।
[लघु०] वा०—(१०) अनाम्नवति-नगरीणामिति वाच्यम् ॥
षण्णाम् । षण्णवतिः । षण्णगर्यः ॥
अर्थ:—पदान्त टवर्ग से परे नाम्, नवति तथा नगरी शब्दों के नकार को छोड़
अन्य सकार तवर्ग को षकार टवर्ग न हो—ऐसा कहना चाहिये ।
१. यहां यह शङ्का नहीं करनी चाहिये कि झलाञ्जशोऽन्ते (६७) से षकार को डकार
हो टवर्ग हो जाने से न पदान्ताट्टोरनाम् (६५) द्वारा ष्टुत्व का निषेध क्यों न हो
जाये ? स्मरण रहे कि ह्रस्वात्तादौ तद्धिते (८.३.१०१) द्वारा किया गया षत्व
झलाञ्जशोऽन्ते (८.२.३६) की दृष्टि में असिद्ध है। अतः डकारादेश नहीं होता।
१०४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
व्याख्या = सूत्रकार [भगवान् पाणिनि] ने न पदान्ताट्टोरनाम् (६५) में
केवल नाम् के नकार को ही ष्टुत्वनिषेध से मुक्त किया था, अतः नवति तथा नगरी
शब्दों में ष्टुत्व-निषेध प्राप्त होने से दोष उत्पन्न होता था। यह देख कर वार्त्तिककार
कात्यायन ने वार्त्तिक बनाया कि केवल 'नाम्' के नकार को ही ष्टुत्वनिषेध से मुक्त नहीं
करना चाहिये, अपितु 'नवति' और 'नगरी' शब्दों को भी ष्टुत्वनिषेध से मुक्त कर
देना चाहिये। वार्त्तिक में पुनः 'नाम्' का ग्रहण अनुवादार्थ है। उस के ग्रहण न करने में
उस का बाध हो जाता, क्योंकि वार्त्तिक सूत्र का बाधक होता है।
इन के उदाहरण यथा—
(१) षण्णाम् (छः का)। षड्+नाम्' ['षष्' शब्द से षष्ठी का बहुवचन
'आम्' प्रत्यय करने पर 'षष्+आम्'। ष्णान्ता षट् (२६७) से 'षष्' की षट्-सञ्ज्ञा
हो कर षट्चतुर्भ्यश्च (२६६) से 'आम्' को नुट्कागम कर 'षष्+नाम्'। अब स्वादि-
ष्वसर्वनामस्थाने (१६४) से पद-सञ्ज्ञा हो झलाञ्जशोऽन्ते (६७) से षकार को
डकार करने से 'षड्+नाम्' रूप बनता है] यहां न पदान्ताट्टोरनाम् (६५) सूत्र में
ष्टुत्व-निषेध से 'नाम्' को मुक्त कर देने के कारण पदान्त टवर्ग=डकार से परे नकार
को ष्टुना ष्टुः (६४) से ष्टुत्व=णकार हो, प्रत्यये भाषायां नित्यम् (वा० ११)
'वार्त्तिक द्वारा डकार को भी नित्य णकार करने से 'षण्णाम्' प्रयोग सिद्ध होता है।
(२) षण्णवतिः (छियानवे)। 'षड्+नवति' ('षडधिका नवति' या 'षट्
च नवतिश्च' इस विग्रह में क्रमशः तत्पुरुष और द्वन्द्व करने पर विभक्तियों का लुक् हो
'षड्+नवति' होता है। यहां उसी का ग्रहण है।) यहां अनाम्नवति० (वा० १०) इस
प्रकृत वार्त्तिक में ष्टुत्वनिषेध से 'नवति' के मुक्त हो जाने के कारण पदान्त टवर्ग=
डकार से परे नकार को ष्टुना ष्टुः (६४) से ष्टुत्व=णकार हो कर यरोऽनुनासिकेऽनु-
नासिको वा (६८) सूत्र द्वारा डकार को भी विकल्प कर के णकार करने पर विभक्ति
लाने से 'षण्णवति' तथा 'षड्णवति' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं।
(३) षण्णगर्यं (छः नगरियां हैं)। 'षड्+नगर्यं' यहां अनाम्नवति० (वा०
१०) इस प्रकृत वार्त्तिक में ष्टुत्व-निषेध से 'नगरी' के भी मुक्त हो जाने के कारण
पदान्त टवर्ग=डकार से परे नकार को ष्टुना ष्टुः (६४) से ष्टुत्व=णकार हो,
यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा (६८) सूत्र द्वारा डकार को भी विकल्प करके णकार
करने से 'षण्णगर्यं' तथा 'षड् णगर्यं' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं। ध्यान रहे कि यहां
समास नहीं है।
[लघु०] निषेध-सूत्रम्—(६६) तोः षि ।८।४।४२॥
(तवर्गस्य षकारे परे) न ष्टुत्वम्। सन्षष्ठः॥
अर्थः—षकार परे होने पर तवर्ग के स्थान पर षकार टवर्ग नहीं होता।
व्याख्या—तो ।६।१। षि ।७।१। न इत्यव्ययपदम् (न पदान्ताट्टोरनाम् में)।
ष्टु ।१।१। (ष्टुना ष्टुः से)। अर्थ—(षि) षकार परे होने पर (तो ) तवर्ग के
हल्-सन्धि-प्रकरणम् १०५
स्थान पर (ष्टुः) षकार टवर्ग (न) नहीं होता। यह सूत्र ष्टुना ष्टुः (६४) का अप-
वाद है। उदाहरण यथा—
'सन् + षष्ठः' यहां षकार के योग में ष्टुना ष्टुः (६४) से नकार को णकार
प्राप्त होता है, जो अब इस सूत्र से निषेध कर देने के कारण नहीं होता—सन्षष्ठः
(छठा श्रेष्ठ है)।
स्मरण रहे कि यद्यपि यहां 'ष्टु' की अनुवृत्ति आती है तथापि तवर्ग के स्थान
पर प्राप्त टवर्ग का ही इस सूत्र से निषेध होता है, क्योंकि षकार तो तवर्ग के स्थान
पर प्राप्त ही नहीं, जो प्राप्त नही उस का पुनः निषेध कैसा ?
यद्यपि यह तोः षि (८.४.४२) सूत्र ष्टुना ष्टुः (८.४.४०) सूत्र की दृष्टि में
असिद्ध है, तथापि वचनसामर्थ्य से यह उस का अपवाद है। अपवादो वचनप्रामाण्याद्
इति भाष्यम्।
अभ्यास (१६)
(१) अधोलिखित रूपों में सन्धिविच्छेद कर सन्धि-विधायक सूत्र लिखें—
१. न पदान्ताट्टोरनाम्। २. कृपीट्। ३. गरुत्माण्डयते। ४. टिड्ढा-
णञ्०। ५. पेष्टुम्। ६. सोमसुड्डौकसे। ७. ष्टष्टः। ८. स्याण्णी।
(२) निम्नलिखित रूपों में सूत्र-निर्देश-पूर्वक सन्धि करें—
१. भवान् + षण्डः। २. हरिस् + षडङ्गमधीते। ३. परिव्राट् + साधुः।
४. सोमसुत् + षडङ्गमधीते। ५. अग्निचित् + ठकार। ६. राट् +
नगरी। ७. इट् + न। ८. हेतुमत् + णी।
(३) ष्टुना ष्टुः (८.४.४०) की दृष्टि में तोः षि (८.४.४२) सूत्र त्रिपादी
पर होने से असिद्ध है; तो पुनः किस प्रकार यह उस का अपवाद हो
सकता है ?
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[लघु०] विधि-सूत्रम्—(६७) झलां जशोऽन्ते ॥८।२।३६॥
पदान्ते झलां जशः स्युः। वागीशः॥
अर्थः—पद के अन्त में झलों के स्थान पर जश् हों।
व्याख्या—पदस्य ।८।१। (यह अधिकृत है)। अन्ते ।७।१। झलाम् ।६।३।
जशः ।१।३। अर्थः—(पदस्य) पद के (अन्ते) अन्त में (झलाम्) झलों के स्थान पर
(जशः) जश् हो जाते हैं। भाव—झल् प्रत्याहार में वर्गों के चौथे, तीसरे, दूसरे, पहले
तथा ऊष्म वर्ण आते हैं। ये वर्ण यदि पद के अन्त में स्थित होंगे तो इन के स्थान पर
'जश्', अर्थात् वर्गों के तीसरे वर्ण हो जाएंगे। स्थानेऽन्तरतमः (१७) से जिस का
जिस के साथ स्थान तुल्य होगा; उस के स्थान पर वही आदेश होगा। यहां हम संपूर्ण
स्थानी और आदेश वर्णों की तालिका नीचे दे रहे हैं—
१०६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
झल् वर्ण | साम्य (स्थान) | जश् वर्ण (जो आदेश होते हैं)
(जिन के स्थान पर 'जश्' होता है) | |
झ् ज् छ् च् श् | तालु | ज्
भ् ब् फ् प् | ओष्ठ | ब्
घ् ग् ख् क् ह्¹ | कण्ठ | ग्
ढ् ड् ठ् ट् ष् | मूर्धा | ड्
ध् द् थ् त् स्² | दन्त | द्
उदाहरण यथा- वागीश (वाणी का पति-बृहस्पति) । 'वाक्+ईश'
[वाचामीश = वागीश । षष्ठीतत्पुरुष । यहां समास म विभक्तियों का लुक् होने पर
चोः कुः (३०६) से पदान्त चकार को ककार हो जाता है ।] यहां इस सूत्र से पदान्त
झल् = ककार के स्थान पर जश् = गकार हो कर विभक्ति लाने से 'वागीश' प्रयोग
सिद्ध होता है । इस सूत्र के कुछ अन्य उदाहरण यथा-
१ सुप्+अन्त = सुबन्त (सुप् अन्ते यस्य स सुबन्त) । २ तिप्+अन्त =
तिबन्त (तिप् अन्ते यस्य स तिबन्त) । ३ समिध्+अत्र = समिदत्र । ४ समिध्+
आधानम् = समिदाधानम् । ५ सम्राट्+इच्छति = सम्राडिच्छति । ६ विद्युत्+
गच्छति = विद्युद् गच्छति । ७ त्रिष्टुभ्+आदि = त्रिष्टुब्वादि । ८ अनुष्टुभ्+एव
= अनुष्टुब्वेव । ९ वाक्+अत्र = वागत्र । १० जगत्+ईश = जगदीश (जगत ईश
= जगदीश ) । ११ अग्निमथ्+भ्याम् = अग्निमद्भ्याम् । १२ पद्+आगच्छन्ति
= पदागच्छन्ति । १३ अप्+ज = अब्जम् (अद्भ्यो जायत इत्यब्जम्) । १४ त्विष्+
भ्याम् = त्विड्भ्याम् । १५ अच्+अन्त = अजन्त ।
इस सूत्र का फल प्रायः तभी दिखाई देता है जब झलों से परे 'खर्' न हो ।
खर् परे होने पर इस के किये कार्य को खरि च (७४) नष्ट कर देता है । यथा-
'जगत्+तिष्ठति' यहां झलां जशोऽन्ते (६७) से त् को द् हो खरि च (७४) से पुनः
दकार को 'त्' हो गया है । इस लिये इस का फल अश् प्रत्याहार परे होने पर ही प्रतीत
होता है ।
ध्यान रहे कि इस सूत्र की दृष्टि में खरि च (८.४.५५) तथा स्तोः श्चुना
श्चुः (८.४.४०) आदि सूत्र असिद्ध हैं, परन्तु उन की दृष्टि में यह असिद्ध नहीं ।
१ हो ढः (२५१) आदि सूत्र 'ह्' के जश्त्व का बाध कर लेते हैं ।
२ ससजुषो रुः (१०५) सूत्र पदान्त में 'स्' के जश्त्व का बाध कर लेता है ।
हल्-सन्धि-प्रकरणम् १०७
[लघु०] विधि-सूत्रम् - (६८) यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा ।८।४।४५॥
यरः पदान्तस्यानुनासिके परेऽनुनासिको वा स्यात् । एतन्मुरारिः,
एतद्मुरारिः ॥
अर्थः—अनुनासिक परे होने पर पदान्त यर् के स्थान पर विकल्प कर के अनु-
नासिक हो जाता है।
व्याख्या—पदान्तस्य ।६।१। (न पदान्ताट्टोरनाम् से विभक्तिविपरिणाम
द्वारा)। यरः ।६।१। अनुनासिके ।७।१। अनुनासिकः ।१।१। वा इत्यव्ययपदम् । अर्थः—
(अनुनासिके) अनुनासिक परे होने पर (पदान्तस्य) पदान्त (यरः) यर् के स्थान
पर (वा) विकल्प कर के (अनुनासिकः) अनुनासिक आदेश हो जाता है। जो वर्ण
मुख और नासिका दोनों से बोला जाये उसे 'अनुनासिक' कहते हैं [मुखनासिकावचनो-
ऽनुनासिकः (६)]। अनुनासिक अच् और हल् दोनों प्रकार के होते हैं। पदान्त यर्
से परे अनुनासिक अच् कहीं नहीं देखा जाता; अतः यहां हल् अनुनासिकों का ही ग्रहण
होगा। हल् अनुनासिक पांच हैं—१. ङ्, २. ञ्, ३. ण्, ४. न्, ५. म् । इन पांच वर्णों
में से किसी वर्ण के परे होने पर पदान्त यर् को विकल्प कर के अनुनासिक होगा।
स्थानेऽन्तरतमः (१७) से वही अनुनासिक होगा; जिस का यर् के साथ स्थान तुल्य
होगा। यथा—कवर्ग को ङ्, चवर्ग को ञ्, टवर्ग को ण्, तवर्ग को न्, पवर्ग को म्।
उदाहरण यथा—
'एतद् + मुरारि' (एतस्य मुरारिः—एतद्मुरारिः, षष्ठीतत्पुरुषः, एष मुरारिः
—एतद्मुरारिः, कर्मधारयसमासो वा) यहां समास में विभक्तियों का लुक् हो चुकने
पर प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम् (१६०) की सहायता से सुप्तिङन्तम्पदम् (१४) द्वारा
एतद् की पद-सञ्ज्ञा हो जाती है; इस प्रकार दकार पद का अन्त ठहरता है। इस से
परे मकार मुखनासिकावचनोऽनुनासिकः (६) के अनुसार अनुनासिक है। इस के परे
होने पर अब दकार = यर् को अनुनासिक करना है। स्थानेऽन्तरतमः (१७) से दकार
को नकार ही अनुनासिक होगा (लृतुलसानां दन्ताः) । तो इस प्रकार दकार को
विकल्प कर के अनुनासिक नकार हो कर विभक्ति लाने से 'एतन्मुरारिः, एतद्मुरारिः'
ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं। इस सूत्र के कुछ उदाहरण यथा—
१. अग्निचित् + नयति = अग्निचिद् + नयति (झलां जशोऽन्ते) = अग्नि-
चिन्नयति । २. तद् + न = तन्न । ३. दिग् + नाग = दिङ्नागः । इसी प्रकार—षत्रेमंम्
नित्यम्, नद्याम्नीभ्यः, आङ् नद्याः । अन्य उदाहरण अभ्यास में देखें।
यर् प्रत्याहार में यद्यपि ह् को छोड़ सब व्यञ्जन आ जाते हैं तथापि यहां
यर् से केवल स्पर्श (वर्गगत) वर्णों का ही ग्रहण अभीष्ट है—स्पर्शस्यैवेष्यते। अत
एव चतुर्मुखः, प्रातर्नयति, स्वनर्म आदि में पदान्त भी रेफ को अनुनासिक = णकार
नहीं होता। इस का स्पष्टीकरण सिद्धान्तकौमुदी में देखें। यहां पर यर्ग्रहण अचो
रहाभ्यां द्वे (६०) आदि उत्तरसूत्रों में अनुवृत्ति के लिये है।
१०८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
पदान्त ग्रहण का यह प्रयोजन है कि—'शङ्खध्मा' आदि में अपदान्त यर् को
अनुनासिक न हो।
[लघु०] वा०—(११) प्रत्यये भाषायां नित्यम्॥
तन्मात्रम्। चिन्मयम्॥
अर्थ—लोक में अनुनासिकादि प्रत्यय परे होने पर पदान्त यर् को नित्य अनु-
नासिक हो जाता है। -
व्याख्या—प्रत्यये ।७।१। भाषायाम् ।७।१। नित्यम् ।२।१। (क्रियाविशेषणम्)।
यह वार्त्तिक यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा (६८) सूत्र पर भाष्य में पढ़ा गया है, अतः
तद्विषयक ही समझना चाहिये। अतः इस का अर्थ होगा—(भाषायाम्) लोक में
(अनुनासिके) अनुनासिकादि (प्रत्यये) प्रत्यय परे होने पर (पदान्तस्य) पदान्त (यर्)
यर् के स्थान पर (नित्यम्) नित्य (अनुनासिक) अनुनासिक हो। पूर्वसूत्र से विकल्प
प्राप्त होने पर इस से नित्य अनुनासिक होता है। उदाहरण यथा—
(१) तन्मात्रम् (उतना ही)। 'तद्+मात्र' [तत् प्रमाणमस्येति तन्मात्रम्,
प्रमाणे द्वयसज्दघ्नञ्मात्रच (११६४) इति मात्रच्-प्रत्यय।] यहां 'मात्रच्' प्रत्यय
हो कर तद्धितान्त की प्रातिपदिक-संज्ञा होने से सुपो धातु-प्रातिपदिकयो (७२१)
द्वारा तद् शब्द से परे सुं प्रत्यय का लुक् हो जाता है, अतः 'एतद्मुरारि' प्रयोग-
गत 'एतद्' शब्द की तरह यहां भी दकार पदान्त है। इस पदान्त दकार=यर् से परे
'मात्रच्' यह अनुनासिकादि प्रत्यय किया गया है, अतः दकार को तत्सदृश नकार नित्य
अनुनासिक हो कर विभक्ति लाने से 'तन्मात्रम्' प्रयोग सिद्ध हो जाता है¹।
(२) चिन्मयम् (चेतनस्वरूप)। 'चित्+मय' [चिदेव चिन्मयम्, नित्यं
वृद्धशरादिभ्य (१११०) इत्यत्र 'नित्यम्' इति योग-विभागात् स्वार्थे मयट्] यहां
'मयट्' प्रत्यय हो कर तद्धितान्त की प्रातिपदिक-संज्ञा होने से सुपो धातु-प्रातिपदिकयो
(७२१) द्वारा सुं प्रत्यय का लुक् हो जाता है, अतः तकार पदान्त है। इस पदान्त
तकार को प्रथम झलां जशोऽन्ते (६७) सूत्र से दकार हो कर पुनः इस वार्त्तिक से
नित्य अनुनासिक नकार हो जाता है, तब विभक्ति लाने से 'चिन्मयम्' प्रयोग सिद्ध
होता है।
ध्यान रहे कि इस वार्त्तिक से भी पूर्ववत् पदान्त यर् को ही अनुनासिक विधान
किया जाता है, अपदान्त यर् को नहीं। अतः एव—'स्वप्न, यत्न, क्षुभ्नाति, मथ्नाति,
बध्नाति, मृद्नाति, वेद्मि' आदि प्रयोगों में अनुनासिकादि प्रत्यय परे होने पर भी
अपदान्त यर् को अनुनासिक नहीं होता।
नोट—यहां यह विशेष ज्ञातव्य है कि झलां जशोऽन्ते (८।२।३६) की दृष्टि
में यह सूत्र (८।४।४४) असिद्ध है, अतः जहां झलां जशोऽन्ते (६७) सूत्र का विषय
होगा वहां प्रथम जश्त्व हो कर पश्चात् अनुनासिक होगाँ।
१ यहां नकार के असिद्ध होने से न लोप प्रातिपदिकान्तस्य द्वारा नलोप नहीं होता।
हल्-सन्धि-प्रकरणम् १०६
अभ्यास (१७)
(१) निम्नलिखित रूपों में सूत्र-समन्वय करते हुए सन्धिच्छेद करें—
१. षण्मासाः। २. एतन्मनोहरः। ३. इणिन्पेघः। ४. तण्णकारः¹। ५.
त्रिष्टुम्नाम। ६. तन्न। ७. सन्मार्गः। ८. मृन्मयम्²। ९. क्षुद्भिः।
१०. सोमसुन्नयति। ११. त्वङ्मनसी। १२. ककुबीशः। १३. ककु-
म्नायकः। १४. वाङ्मयम्। १५. अम्मयम्। १६. कियन्मात्रम्।
(२) निम्न-लिखित प्रयोगों में सूत्रोपन्यासपूर्वक सन्धि करें—
१. विपद् + मय। २. यद् + नैति। ३. तद् + लकार³। ४. मनाक् +
हसति। ५. अप् + माय। ६. अग्निचित् + लकार। ७. कतिचित् +
दिनानि। ८. मद् + नीतिः। ९. धिक् + मूर्खम्। १०. सत् + आचार।
११. वाक् + मलम्। १२. जगत् + नाथ। १३. ऋक् + मन्त्र।
(३) निम्न-लिखित रूपों में सन्धि न करने का कारण बताओ।
१. वेद् + मि। २. गरुत् + मत्⁴। ३. गृभ् + णाति। ४. प्रश् + न।
५. चतुर् + मुख। ६. प्रातर् + नमामि।
(४) (क) खर् परे होने पर झलां जशोऽन्ते का फल क्यों प्रतीत नहीं होता?
(ख) 'शङ्खध्माः' में धकार को अनुनासिक क्यों नहीं होता ?
• (ग) सुँप् परे न होने पर भी 'एतन्मुरारिः' में दकार कैसे पदान्त है ?
――:०:――
[लघु०] विधि-सूत्रम्—(६६) तोर्लि ।८।४।६०॥
तवर्गस्य लकारे परे परसवर्णः। तल्लयः। विद्वाँल्लिखति। नस्या-
ऽनुनासिको लः॥
अर्थः—लकार परे होने पर तवर्ग के स्थान पर पर-सवर्ण आदेश होता है।
व्याख्या—तोः ।६।१। लि ।७।१। पर-सवर्णः ।१।१। (अनुस्वारस्य ययि पर-
सवर्णः से)। समासः—परस्य सवर्णः=परसवर्णः, षष्ठी-तत्पुरुषः। अर्थः—(लि)
लकार परे होने पर (तोः) तवर्ग के स्थान पर (पर-सवर्णः) पर-सवर्ण आदेश होता
है। भाव यह है कि तवर्ग से जब लकार परे होगा तो तवर्ग के स्थान पर—पर अर्थात्
लकार का सवर्ण आदेश किया जायेगा। लकार का लकार के सिवाय अन्य कोई सवर्ण
नहीं, अतः तवर्ग के स्थान पर लकार ही आदेश होगा।
लकार दो प्रकार का होता है; एक अनुनासिक (लँ) और दूसरा अननुना-
१. यहां अनुनासिक-विधायक सूत्र के असिद्ध होने से प्रथम ष्टुत्व कर लेना चाहिये।
२. यहां पर पदान्त होने से न् को ण् नहीं होता— पदान्तस्य (१३६)।
३. यहां पर प्रथम श्चुत्व कर लेना चाहिये।
४. यहां पर तसौ मत्वर्थे (११८२) सूत्र से भ सञ्ज्ञा होती है। पदान्त न होने से
अनुनासिक नहीं होता।
भिन्न (ल्) । स्थानेऽन्तरतम (१७) के अनुसार तवर्गस्थ अनुनासिक वर्ण के स्थान
पर अनुनासिक लकार तथा अननुनासिक वर्ण के स्थान पर अननुनासिक लकार होगा ।
तवर्गो में नकार के सिवाय अन्य कोई अनुनासिक नहीं, अतः केवल नकार के स्थान
पर ही अनुनासिक लकार तथा शेष तवर्गीय वर्णों के स्थान पर अननुनासिक लकार
होगा । उदाहरण यथा-
तल्लय (उस में नाश या उस का नाश) । 'तद् + लय' (तस्मिंस्तस्य वा
लय - तल्लय, सप्तमीतत्पुरुष, षष्ठी-तत्पुरुषो वा) यहां तवर्ग = दकार से परे लकार
विद्यमान है, अतः तोर्लि (६६) सूत्र से दकार के स्थान पर पर-सवर्ण = लकार कर
के विभक्ति लाने से 'तल्लय' प्रयोग सिद्ध होता है ।
विद्वाँल् लिखति (विद्वान् लिखता है) । 'विद्वान् + लिखति' इस दशा में तोर्लि
(६६) सूत्र से नकार को पर-सवर्ण लकार आदेश होता है, परन्तु नकार के अनुना-
सिक होने से लकार भी अनुनासिक आदेश हो कर 'विद्वाँल् लिखति' प्रयोग सिद्ध
होता है।
इस के कुछ अन्य उदाहरण यथा -१ विपद् + लीन = विपल्लीन् । २
कश्चिद् + लभते = कश्चिल्लभते । ३ कुशान् + लुनाति = कुशाँल् लुनाति । ४ महान्
- लाभ = महाँल् लाभ । ५ उद् + लेख = उल्लेख । ६ धनवान् + लुनीते = धन-
वाँल् लुनीते । ७ हनुमान् + लङ्का दहति = हनुमाँल् लङ्का दहति । ८ हसन् + लेढि
= हसँल् लेढि । ६ जगद् + लीयते = जगल्लीयते । १०. तद् + लीला = तल्लीला ।
११ तद् + लीन = तल्लीन । १२ यद् + लक्षणम् = यल्लक्षणम् । १३ चिद् + लय
= चिल्लय । १४ विद्युद् + लेखा = विद्युल्लेखा ।
'तस्मात् + लुवारात्' इत्यादि में तोर्लि (६६) प्रवृत्त नहीं होगा, क्योंकि इस
में 'ल' -सदृश है, 'ल' नहीं। केवल जश्त्व ही होगा 'तस्माद् लुवारात्' ।
ध्यान रहे कि यह सूत्र झलां जशोऽन्ते (६७) की दृष्टि में असिद्ध है, अतः
जहां उस का विषय होगा वहां प्रथम जश्त्व हो कर पश्चात् तोर्लि (६६) सूत्र प्रवृत्त
होगा । यथा - जगत् + लीयते = जगद् + लीयते = जगल्लीयते ।
[लघु०] विधि-सूत्रम् - (७०) उदः स्था-स्तम्भोः पूर्वस्य ।८।४।६०॥
उद परयोः स्था-स्तम्भोः पूर्व-सवर्णः ॥
अर्थ - 'उद्' से (परे) स्था और स्तम्भ् को पूर्वसवर्ण हो ।
व्याख्या - उद ५।१। स्था-स्तम्भोः ६।२। पूर्वस्य ।६।१। सवर्ण १।१।
(अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः म०) । अर्थ -(उद ) 'उद्' उपसर्ग से (स्था-स्तम्भो )
स्था और स्तम्भ् के स्थान पर (पूर्वस्य) पूर्व का (सवर्ण) सवर्ण आदेश होता है ।
१ यद्यपि अनुस्वारस्य ययि पर-सवर्ण (७६) सूत्र में 'पर सवर्ण' है, तथापि अनु-
वृत्ति केवल 'सवर्ण' की ही आनी है। इस का कारण यह है कि अनुवृत्ति अधि-
कृत पदों की ही आया करती है और अधिकृति स्वरितेनाधिकारः (१।३।११)
इस सूत्र में स्वरित-स्वर के बल से होती है। पूर्व समय में उक्त सूत्र में स्वरित-
हल्-सन्धि-प्रकरणम् १११
'उदः' यहां दिग्योग में पञ्चमी है; अर्थात् 'उद्' से किसी दिशा में स्थित
स्था और स्तम्भ् को पूर्वसवर्ण होगा। वर्णों में दो ही दिशा सम्भव हो सकती हैं, एक
पर और दूसरी पूर्व। अब यहां यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या 'उद्' से पूर्वस्थित
स्था और स्तम्भ् को पूर्व-सवर्ण हो या परस्थित स्था और स्तम्भ् को पूर्वसवर्ण हो ?
किञ्च—यह भी प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या व्यवधान से रहित पूर्व या पर-स्थित स्था
और स्तम्भ् को पूर्व-सवर्ण हो या व्यवहित पूर्व या पर स्थित स्था और स्तम्भ् को भी
पूर्वसवर्ण हो ? इन शङ्काओं की निवृत्ति के लिये अग्रिम परिभाषा-सूत्र लिखते हैं।
[लघु०] परिभाषा-सूत्रम्—(७१) तस्मादित्युत्तरस्य ।१।१।६६॥
पञ्चमी-निर्देशेन क्रियमाणं कार्यं वर्णान्तरेणाऽव्यवहितस्य परस्य
ज्ञेयम् ॥
अर्थः—पञ्चम्यन्त के निर्देश से क्रियमाण कार्य अन्य वर्णों के व्यवधान से
रहित पर के स्थान पर जानना चाहिये।
व्याख्या - तस्माद् इति पञ्चम्यन्तानुकरणं लुप्तपञ्चम्येकवचनान्तम् [उदः
स्था-स्तम्भोः आदि सूत्रों में स्थित 'उदः' आदि पञ्चम्यन्त पदों का अनुकरण यहां
'तस्मात्' शब्द से किया गया है, इस के आगे पञ्चमी के एकवचन का सुपां सुलुक्०
(७.१.३६) सूत्र से लुक् हुआ समझना चाहिये]। इति इत्यव्ययपदम्। निर्द्दिष्टात्
।५।१। (तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य सूत्र से विभक्ति-विपरिणाम द्वारा) । उत्तरस्य
।६।१। अर्थः—(तस्माद् इति निर्द्दिष्टात्) उदः स्था-स्तम्भोः पूर्वस्य आदि सूत्रों में
स्थित 'उदः' आदि पञ्चम्यन्त पदों के निरन्तर उच्चारण किये गये अर्थों से (उत्तरस्य)
परले के स्थान पर कार्य होता है।
पञ्चम्यन्त पदों के अर्थों का निरन्तर उच्चारण तभी हो सकता है जब उन से
अव्यवहित [व्यवधान-रहित] उत्तर को कार्य्य हो; अतः यह सुतराम् आ जाता है कि
सूत्रों में स्थित पञ्चम्यन्त पदों के अर्थों से अव्यवहित पर को कार्य हो। इस सूत्र की
विशेष व्याख्या तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य (१६) सूत्र के समान समझ लेनी चाहिये।
हम यहां पिष्ट-पेषण करना नहीं चाहते।
इस सूत्र से अन्ततोगत्वा यह ज्ञात होता है कि उदाहरणों में पञ्चम्यन्त पद
के अर्थ से अव्यवहित पर को ही कार्य हो, पूर्व को अथवा व्यवहित पर को कार्य न
हो। यथा—'उद्+प्रस्थानम्' यहां यद्यपि 'उद्' से 'स्था' परे है, तथापि 'प्र' शब्द का
मध्य में व्यवधान होने से उदः स्थास्तम्भोः० (७०) सूत्र द्वारा पूर्व-सवर्ण नहीं होता।
इसी प्रकार तिङ्ङतिङः (८.१.२८) [अतिङन्त से तिङन्त को निघात अर्थात् सर्वानु-
स्वर केवल 'सवर्णः' पर था, 'पर' पर नहीं। यद्यपि अब स्वरितादि-स्वर-चिह्न
नहीं रहे; तथापि प्रतिज्ञाऽनुनासिक्याः पाणिनीयाः की तरह प्रतिज्ञास्वरिताः पाणि-
नीयाः भी जानना चाहिये। अथवा 'पर' में षष्ठी का लोप समझना चाहिये।
११२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
दात्तस्वर हो] सूत्र 'ईडे अग्निम्' में प्रवृत्त नहीं होता, क्योंकि 'अग्निम्' इस अतिङन्त
पद में 'ईडे' यह तिङन्त पद परे नहीं, पूर्व में वर्त्तमान है।
यह परिभाषा-सूत्र है। परिभाषाएं प्रयोगसिद्धि में स्वतन्त्रतया कुछ कार्य नहीं
किया करतीं, अपितु सूत्रों के अर्थों में मिश्रित हो कर प्रयोगसिद्धि किया करती हैं,
यह हम पीछे लिख चुके हैं। इस के अनुसार यह परिभाषा भी उदः स्था-स्तम्भोः पूर्वस्य
(७०)आदि सूत्रों के साथ मिल कर एकार्थ उत्पन्न करेगी। तो अब उदः स्थास्तम्भोः
पूर्वस्य (७०) सूत्र का यह अर्थ हो जायेगा—'उद्' से अव्यवहित पर स्था और स्तम्भ्
को पूर्व-सवर्ण आदेश हो। इसी प्रकार तिङ्ङतिङ (८।१।२८) सूत्र का यह अर्थ होगा
—अतिङन्त पद से अव्यवहित पर तिङन्त के स्थान पर निघात अर्थात् सर्वानुदात्त-
स्वर हो।
'उद्+स्थान' 'उद्+स्तम्भन' इन दोनों स्थानों पर 'उद्' से परे अव्यवहित
स्था और स्तम्भ् विद्यमान हैं, अतः इन के स्थान पर पूर्व-सवर्ण करना है। अब 'स्था-
स्तम्भो' के षष्ठ्यन्त होने से अलोऽन्त्यस्य (२१) सूत्र से इन के अन्त्य अल् के स्थान
पर पूर्व-सवर्ण प्राप्त होता है, इस पर अलोऽन्त्यस्य (२१) की अपवाद परिभाषा
लिखते हैं—
[लघु०] परिभाषा-सूत्रम्—(७२) आदेः परस्य ।१।१।५३॥
परस्य यद् विहितं तत् तस्यादेर्बोध्यम् । इति सस्य थः ॥
अर्थः—पर के स्थान पर जो कार्य विधान किया जाता है, वह कार्य उस (पर)
के आदि वर्ण के स्थान पर समझना चाहिये।
व्याख्या—आदे ।६।१। अल् ।६।१। (अलोऽन्त्यस्य से)। परस्य ।६।१। अर्थ --
(परस्य) पर के स्थान पर विधान किया कार्य (आदे) उस के आदि (अल्) अल्
के स्थान पर होता है। यहां सूत्रार्थ, अनुकूल पदों का अध्याहार कर के ही किया
जाता है।
'उद्+स्थान' 'उद्+स्तम्भन' यहां तस्मादित्युत्तरस्य (७१) परिभाषा की
सहायता से उदः स्था-स्तम्भोः पूर्वस्य (७०) सूत्र द्वारा परले स्था और स्तम्भ् को पूर्व-
सवर्ण होना था, अब वह इस परिभाषा द्वारा पर के आदि अर्थात् सकार को होगा।
अब यहां यह विचार प्रस्तुत होता है कि स् को पूर्व (दकार) का कौन सा
सवर्ण हो ? क्योंकि पूर्व (दकार) का एक सवर्ण नहीं किन्तु पांच सवर्ण हैं—त्, थ्,
द्, ध्, न्। इस शङ्का की निवृत्ति के लिये स्थानेऽन्तरतमः (१७) सूत्र उपस्थित हो
कर कहता है कि 'प्राप्त हुए आदेशों में अत्यन्त सदृश आदेश हो'। इस के अनुसार
अब हमें 'त्, थ्, द्, ध्, न्' इन पांच वर्णों में से सकार के अत्यन्त सदृश वर्ण ढूंढना है।
यदि यहां स्थानकृत आन्तर्य (सादृश्य) देखते हैं तो वह लृतुलसानां दन्ताः के अनुसार
सब में समान है; अतः इस आन्तर्य से काम नहीं चल सकता। अर्थकृत और प्रमाण-
कृत सादृश्य तो इन में हो ही नहीं सकता। अतः अब शेष बचे गुणकृत आन्तर्य अर्थात् यत्नों