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सर्वकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 110, कुल 633 में से

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पृष्ठ 110

अच्-सन्धि-प्रकरणम् ६५
होगी। ध्यान रहे कि मूल में 'स्वरसन्धि' कथन इस लिये किया गया है कि यहां स्वर-
सन्धि के अतिरिक्त अन्य कोई सन्धि प्राप्त ही नहीं हो सकती।
इस सूत्र में 'असवर्ण' ग्रहण का यह प्रयोजन है कि 'योगी + इच्छति =
योगीच्छति' 'कुमारी + ईहते = कुमारीहते' इत्यादियों में सवर्ण अच् परे होने पर ह्रस्व
न हो।
'पदान्त' ग्रहण इस लिये किया गया है कि—'गौरी + औ' यहां अपदान्त इक्
को ह्रस्व न हो जाए। इको यणचि (१५) से यण् हो कर 'गौर्यौ' बन जाए।
ध्यान रहे कि प्लुतप्रगृह्या अचि नित्यम् (५०) में 'नित्यम्' ग्रहण के कारण
उस के विषय में इस सूत्र की प्रवृत्ति नहीं होती। यथा—हरी एतौ, शिशू आक्रन्दतः।
इन में प्रकृत ह्रस्वसमुच्चित प्रकृतिभाव न हो कर उस के द्वारा नित्य प्रकृतिभाव
होता है।
अब प्रसङ्गवश 'गौर्यौ' में द्वित्व करने वाला सूत्र लिखते हैं—
[लघु०] विधि-सूत्रम्— (६०) अचो रहाभ्यां द्वे ।८।४।४५॥
अचः पराभ्यां रेफहकाराभ्यां परस्य यरो द्वे वा स्तः। गौर्य्यौ॥
अर्थः—अच् से परे जो रेफ या हकार उस से परे यर् को विकल्प से द्वित्व हो।
व्याख्या—अचः ।५।१। रहाभ्याम् ।५।२। द्वे ।१।२। यरः ।६।१। वा इत्यव्यय-
पदम्। (यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा से)। अर्थः—(अचः) अच् से परे (रहाभ्याम्)
जो रेफ या हकार उस से परे (यरः) यर् के (द्वे) दो शब्दस्वरूप (वा) विकल्प कर
के हो जाते हैं। उदाहरण यथा—'गौर् यौ' यहां अच् = 'औ' से परे रेफ है अतः उस
से परे यर् यकार को विकल्प करके द्वित्व होकर द्वित्वपक्ष में 'गौर्य्यौ' तथा द्वित्वाभाव-
पक्ष में 'गौर्यौ' इस प्रकार दो रूप बन जाते हैं।
इस सूत्र के कुछ अन्य उदाहरण यथा—
१. आर्य्यः, आर्यः। २. अर्क्कः, अर्कः। ३. कार्य्यम्, कार्यम्। ४. हर्य्यनुभवः,
हर्य्नुभवः। ५. उर्व्वी, उर्वी। ६. आह्लादः, आह्लादः। ७. अर्ज्जुनः, अर्जुनः। ८.
आर्त्तः, आर्तः। ६. आह्वयः, आह्वयः। १०. आर्द्रकम् आर्द्रकम्। ११. ब्रह्मा,
ब्रह्मा। १२. अर्त्यः, अर्थः। १३. न ह्य्यस्ति, न ह्यस्ति। १४. गर्मः, गर्मः। १५.
ऊर्द्धवम्, ऊर्ध्वम्। १६. दुर्गः, दुर्गः। १७. अर्घ्यः, अर्घ्यः। १८. मूर्च्छना, मूर्छना।
१६. अपह्नुते, अपह्नुते। २०. मूर्खः, मूर्खः। २१. शर्म्या, शर्मा। २२. विसर्गः,
विसर्गः। २३. प्राण्र्णम्, प्राण्र्णम्। २४. कर्म्म, कर्म। २५. निर्झरः, निर्भरः। १


१. गर्मः, निर्झरः, अर्घ्यः, ऊर्द्धवम् आदि में द्वित्व के बाद झलां जश्झशि (१६)
से जश्त्व हो जाता है तथा 'मूर्खः, अर्त्यः, मूर्च्छना आदि में खरि च (७४) से
चर्त्व। आर्पम्, अर्शः आदि में प्रकृतसूत्र के प्राप्त द्वित्व का शरोऽचि (२६६) से
निषेध हो जाता है। 'मूर्च्छना' में तुक् आगम समझने की भूल से बचें।