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लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 121, कुल 633 में से

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पृष्ठ 121

१०६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
झल् वर्ण | साम्य (स्थान) | जश् वर्ण (जो आदेश होते हैं)
(जिन के स्थान पर 'जश्' होता है) | |
झ् ज् छ् च् श् | तालु | ज्
भ् ब् फ् प् | ओष्ठ | ब्
घ् ग् ख् क् ह्¹ | कण्ठ | ग्
ढ् ड् ठ् ट् ष् | मूर्धा | ड्
ध् द् थ् त् स्² | दन्त | द्
उदाहरण यथा- वागीश (वाणी का पति-बृहस्पति) । 'वाक्+ईश'
[वाचामीश = वागीश । षष्ठीतत्पुरुष । यहां समास म विभक्तियों का लुक् होने पर
चोः कुः (३०६) से पदान्त चकार को ककार हो जाता है ।] यहां इस सूत्र से पदान्त
झल् = ककार के स्थान पर जश् = गकार हो कर विभक्ति लाने से 'वागीश' प्रयोग
सिद्ध होता है । इस सूत्र के कुछ अन्य उदाहरण यथा-
१ सुप्+अन्त = सुबन्त (सुप् अन्ते यस्य स सुबन्त) । २ तिप्+अन्त =
तिबन्त (तिप् अन्ते यस्य स तिबन्त) । ३ समिध्+अत्र = समिदत्र । ४ समिध्+
आधानम् = समिदाधानम् । ५ सम्राट्+इच्छति = सम्राडिच्छति । ६ विद्युत्+
गच्छति = विद्युद् गच्छति । ७ त्रिष्टुभ्+आदि = त्रिष्टुब्वादि । ८ अनुष्टुभ्+एव
= अनुष्टुब्वेव । ९ वाक्+अत्र = वागत्र । १० जगत्+ईश = जगदीश (जगत ईश
= जगदीश ) । ११ अग्निमथ्+भ्याम् = अग्निमद्भ्याम् । १२ पद्+आगच्छन्ति
= पदागच्छन्ति । १३ अप्+ज = अब्जम् (अद्भ्यो जायत इत्यब्जम्) । १४ त्विष्+
भ्याम् = त्विड्भ्याम् । १५ अच्+अन्त = अजन्त ।
इस सूत्र का फल प्रायः तभी दिखाई देता है जब झलों से परे 'खर्' न हो ।
खर् परे होने पर इस के किये कार्य को खरि च (७४) नष्ट कर देता है । यथा-
'जगत्+तिष्ठति' यहां झलां जशोऽन्ते (६७) से त् को द् हो खरि च (७४) से पुनः
दकार को 'त्' हो गया है । इस लिये इस का फल अश् प्रत्याहार परे होने पर ही प्रतीत
होता है ।
ध्यान रहे कि इस सूत्र की दृष्टि में खरि च (८.४.५५) तथा स्तोः श्चुना
श्चुः (८.४.४०) आदि सूत्र असिद्ध हैं, परन्तु उन की दृष्टि में यह असिद्ध नहीं ।
१ हो ढः (२५१) आदि सूत्र 'ह्' के जश्त्व का बाध कर लेते हैं ।
२ ससजुषो रुः (१०५) सूत्र पदान्त में 'स्' के जश्त्व का बाध कर लेता है ।