लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहल्-सन्धि-प्रकरणम् १०१
१. कृष्णश्चपलः। २. यज्ञः। ३. अग्निचित्छिनत्ति। ४. नारदशशाप।
५. भृज्जी। ६. सच्छात्रः। ७. अश्नाति। ८. श्रीमञ्झटिति।
६. उच्छेदः। १०. राज्ञः।
(३) श्चुत्व-विधि में कहां यथासङ्ख्य होता है और कहां नहीं? स्पष्ट करें।
(४) स्तोः श्चुना श्चुः (८.४.३६) सूत्र की दृष्टि में शात् (८.४.४३) सूत्र
असिद्ध है। तो भला असिद्ध कैसे सिद्ध का निषेध कर सकता है?
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[लघु०] विधि-सूत्रम्-(६४) ष्टुना ष्टुः ।८।४।४०॥
स्तोः ष्टुना योगे ष्टुः स्यात्। रामष्षष्ठः। रामष्टीकते। पेष्टा।
तट्टीका। चक्रिण्ढौकसे॥
अर्थः- सकार तवर्ग के स्थान पर, षकार टवर्ग के साथ योग होने पर षकार
टवर्ग हो जाता है।
व्याख्या- स्तोः ।६।१। (स्तोः श्चुना श्चुः से)। ष्टुना ।३।१। ष्टुः ।१।१।
समासः- ष् च टुश्च = ष्टुः, तेन = ष्टुना, समाहारद्वन्द्वः। सौत्रम् पुंस्त्वम्। अर्थः-
(स्तोः) सकार तवर्ग के स्थान पर (ष्टुना) षकार टवर्ग के साथ (ष्टुः) षकार टवर्ग
हो जाता है। भाव- 'स्, त्, थ्, द्, ध्, न्' इन छः वर्गों के स्थान पर 'ष्, ट्, ठ्, ड्,
ढ्, ण्' ये छः वर्ण हो जाते हैं, यदि 'ष्, ट्, ठ्, ड्, ढ्, ण्' इन छः वर्णों का योग अर्थात्
मेल हो तो। यहां भी पूर्ववत् स्थानी और आदेश के विषय में यथासङ्ख्य है योग के
विषय में नहीं। यदि योग के विषय में भी यथासङ्ख्य होता तो षकार से परे तवर्ग
को टवर्ग प्राप्त ही न हो सकता, पुनः उस के निषेध के लिये तोः षि (६६) सूत्र क्यों
बनाते? उदाहरण यथा-
(१) रामष्षष्ठः (राम छठा है)। 'रामस् + षष्ठः' ['राम' प्रातिपदिक से
सुँ प्रत्यय लाने पर रुँत्व-विसर्ग हो वा शरि (१०४) द्वारा विकल्प कर के विसर्ग होने
पर तदभावपक्ष में सकार आदेश हो जाता है। उसी पक्ष का यहां ग्रहण किया गया
है।] यहां षकार के साथ योग होने से सकार को षकार हो 'रामष्षष्ठः' प्रयोग सिद्ध
होता है।
(२) रामष्टीकते (राम जाता है)। 'रामस् + टीकते' [यहां राम शब्द से
'सुँ' प्रत्यय ला कर रुँत्व-विसर्ग हो, विसर्जनीयस्य सः (१०३) से पुनः सकारादेश हो
जाता है] यहां टकार के साथ सकार का योग है। अतः सकार को षकार आदेश हो
'रामष्टीकते' प्रयोग सिद्ध होता है। सकार का यह दूसरा उदाहरण यह जतलाने के
लिये दिया गया है कि योग के विषय में यथासङ्ख्य नहीं होता।
(३) पेष्टा (पीसने वाला; पीसेगा)। 'पेष् + तृ' [पिषॢँ सञ्चूर्णने (रुधा०)
धातु से तृच् प्रत्यय या लुट् के प्रथमपुरुष का एकवचन करने पर पुगन्तलघूपधस्य च
(४५१) सूत्र से इकार को एकार गुण हो जाता है।] यहां षकार के साथ योग होने
से तकार को टकार हो कर- 'पेष्टा' प्रयोग सिद्ध होता है।