कुमारसम्भवम् (महाकवि कालिदास - संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kumarasambhavam of Kalidasa with Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / पं. सीताराम चतुर्वेदी द्वारा
( २४४ )
(b) अथ अनन्तरम् यदा पार्वत्या महत् तपः कृतं तदेत्यर्थः
अजिनाषाढधरः अजिनं कृष्णमृगत्वक् आषाढः
प्रयोजनमस्येत्याषाढः पालाशदण्डः तयोर्धरः कृष्ण-
मृगत्वग्धारा तथा पालाश दण्डधारी प्रगल्भवाक्
प्रगल्भावाक् यस्य सः प्रौढवचनः ब्रह्ममयेन वैदिकेन
तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेत्यर्थ ज्वलन् इव स्थितः कश्चिद्
अनिर्दिष्टः रटिन् जटावान् ब्रह्मचारीविशेषः शरीरबद्धः
शरीरवान् इत्यर्थ प्रथमाश्रमः यथा ब्रह्मचर्याश्रम इव
पार्वत्याः तपोवनम् विवेश प्रविष्टवान् इत्यर्थः ।
II. (a) O, Gauri, how long wilt thou torture your
self ? I too have religious merit accumulated
in my first stage of life. Do thou get thy
desired husband by (the grant of) a half of
it, him, however, I desire to know well
(fully)"
(b) And him she thus addressed :—" Indeed,
thou dost not know Shiva aright, since thou
talkest thus to me The dull-witted find fault
with the course of life of the magnanimous
which is not in common with that of other
people, and the motive of which is difficult
to divine
III. (a) जब पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी ने
उनको साक्षात दर्शन दिया और कहा कि हे पार्वती
आज से मैं तुम्हारा दास हो गया हूँ उस समय पार्वती
( २४५ )
बड़ी प्रसन्न हुईं और उनका सारा कष्ट दूर हो गया ।
क्योंकि फल मिल जाने पर ( मनोरथ सफल हो जाने
पर ) सब कष्ट भूल जाता है । उसी बात को कवि ने
यहां बतलाया है ।
(b) पार्वती जी की तपस्या से प्रसन्न होकर शङ्कर जी
ब्रह्मचारी का वेष धारण कर उनके पास गये थे और
उनसे सत्कार पाकर पूछने लगे कि हे पार्वती सब
कुशल तो है क्योकि शरीर ही सब धर्मों का साधन
है। यही बात कवि ने अर्थान्तरन्यास से कहा है। यदि
शरीर कुशल रहेगा तो सभी धर्मकृत्य ठीक से हो
सकेंगे।
IV (a) For the formation of वार्धक see note श्लोक 44.
(b) अरुणाय—'क्लृपिसंपद्यमाने च' से इसमें चतुर्थी हुई
है। अर्थात् जहां पर कोई वस्तु किसी वस्तु के वास्ते
पर्याप्त दिखाई जाती है वहां चतुर्थी होती है।
QUESTIONS 1940.
I. Explain the following in Sanskrit in tika
form :—
(a) शुचौ चतुर्णां ज्वलतां हविर्भुजाम्
शुचिस्मिता मध्यगता सुमध्यमा
विजित्य नेत्रप्रतिघातिनीं प्रभा
मनन्यदृष्टि सवितारमैक्षत
( २४६ )
(b) अकिञ्चनः सन्प्रभवः स सम्पदां
त्रिलोकनाथः पितृसद्मगोचरः
स भीमरूपः शिव इत्युदीर्यते
न सन्ति याथार्थ्यविद् पिनाकिनः
II. Translate the following into English or Hindi.
अद्य प्रभृत्यवनताङ्गि तवास्मि दासः
क्रीतस्तपोभिरिति वादिनि चन्द्रमौलौ
अह्नाय सा नियमजं क्लममुत्ससर्ज
क्लेशः फलेन हि पुनर्नवतां विधत्ते ।
III. Explain the following in Hindi or English.
(a) मनोरथानामगतिर्न विद्यते
(b) द्विषन्तिमन्दाश्चरितं महात्मनाम्
(c) कः करं प्रसारयेत्पन्नगरत्न सूचये ।
IV. Account for the case ending in चन्द्रमौलौ II
(a)
Ans. 1940
I (a) अस्मिन् श्लोके कविः पार्वत्याः तपस्यां वर्णयति ।
शुचौ ग्रीष्मर्तौ शुभिस्मिता विशदमन्दहासा सुमध्यमा
शोभनकटीयुक्ता पार्वती ज्वलतां दीप्तिमतां चतुर्णाम्
हविर्भुजाम् अग्नीनामूमध्यगता सती नेत्रप्रतिघातिनीं
नेत्रे प्रतिहन्तीति तां नेत्रप्रतिघातिनीं प्रभां सौर्यं तेज-
विजित्य अनन्यदृष्टिः न विद्यते अन्यत्रदृष्टिः यस्या सा
अनन्यदृष्टि सती एकाग्रदृष्टिः सवितारम् सूर्यम् ऐक्षत
ददर्श ।
( २४७ )
(b) ब्रह्मचारिमुखात् शिवस्यनिन्दां श्रुत्वा पार्वती कथयति
हे वटु—सः हरः अकिञ्चन सन् निर्धनोऽपिसन्
सम्पदां ऐश्वर्यस्य प्रभव कारणं पितृसद्मगोचरःसन्
श्मशानाश्रयः सन् त्रिलोकनाथः त्रयाणाम् लोकानां
नाथः स भीमरुपः भयङ्करकारः सन् शिवः सौम्यरुप
इति उदीर्यते कथ्यने अतः पिनाकिनः हरस्य याथार्थ्य
विदः यथाभूतोऽर्थो यथार्थस्तस्य भावो याथार्थ्यम्
तत्वतस्य विदः न सन्ति। लोकोत्तरमहिम्ना निर्लेपस्य
यथाकथंचिदवस्थानं न दोषाये तिभावः।
II. " O thou of stooping limbs, hence forth I am
thy Slave, bought by thy austerities "—as
the Moon crested God said these words, she
immediately forgot ( all ) her exhaustion
caused by the austerities , for, fatigue gives
fresh vigour again by the fruition ( i e. the
achievement of the desired object ).
III. (a) जब ब्रह्मचारी का रूप धारण कर शंकरजी पार्वती से
उनकी तपस्या का कारण पूछने लगे तो पार्वती ने
उनको उत्तर दिया कि हे ब्रह्मचारी मैं बड़े भारी पद
को पाने की (अर्थात् शङ्कर को पाने की) इच्छा से
यह तप कर रही हूँ। क्योंकि मनुष्य की इच्छायें कहाँ
नहीं जा सकतीं अर्थात् मनुष्य हर एक वस्तु की इच्छा
कर सकता है। पार्वती के कहने का भाव यही है कि
चूंकि मनुष्य के इच्छाओं का अन्त नहीं है अतएव मैं
भी शंकर जी को पति पाने की इच्छा से तपस्या कर
रही हूँ।
( २४८ )
(b) जब ब्रह्मचारी शङ्कर जी की निन्दा करने लगा तो उस
समय पार्वती ने कहा कि तुम शङ्कर जी को ठीक से
नहीं समझते हो जो ऐसा कहते हो। क्योकि मन्द
पुरुष महात्माओं के चरित्र की निंदा करते ही हैं।
(c) पार्वती से तप करने का कारण पूछते हुए ब्रह्मचारी
शङ्कर जी ने कहा हे पार्वती यह तो हो नहीं सकता
कि किसी अपमान के कारण से तुम तपस्या कर रही
हो कारण कि पिता के घर में अपमान कैसे हो सकता
है। इसी बात को पुष्ट करते हुए कवि कहता है कि
सर्प की मणि को कोन छू सकता है। भाव यह कि
तुम्हारा अपमान करना सर्प की मणि को छूने के
समान है।
IV. चन्द्रमौलौ—में ‘ यस्यच भावेनभावलक्षणं से सप्तमी
हुई है।
QUESTIONS 1941.
I Explain the following in tika form
(a) विपत्प्रतीकारपरेण मङ्गलं
निषेव्यते भूतिसमुत्सुकेन वा
जगच्छरण्यस्य निराशिषः सतः
किमेभिराशोपहतात्मवृत्तिभिः
(b) अवस्तुनिर्बन्धपरे कथं नु ते
करोऽयमामुक्तविवाहकौतुकः
( २४६ )
करेण शमोर्धतयीकृताहिना
सहिष्यते तत्प्रथमावलम्बनम्
II Translate the following into English or
Hindi.
(a) मुखेन सा पद्मसुगन्धिना निशि
प्रवेपमानाधरपत्रशोभिना
तुषारवृष्टिक्षतपद्मसम्पदाम्
सराजसंधानमिवा करोदपाम्
(b) अद्य प्रभृत्यवनताङ्गि तवास्मिदासः
क्रीतस्तपोभिरिति वादिनिचन्द्रमौलौ
अह्नाय सा नियमजं क्लममुत्ससर्ज
क्लेशः फलेन हि पुनर्नवतां विधत्ते
III. Explain in Hindi or English
(a) भवन्तिसाम्येऽपि निविष्टचेतसाम्
वपुर्विशेषेष्वतिगौरवाः क्रिया
(b) अपेक्ष्यते साधुजनेन वैदिकी
श्मशानशूलस्य न यूपसक्रिया
IV. (a) Expound the समास in तुषारवृष्टिक्षत
पद्म संपदाम्
(b) Explain the formation of.
शरशय, सुगन्धि,
Ans. 1941
(a) यदा ब्रह्मवारी “शिवः अमङ्गलाभ्यासरतिः” इति
पार्वतीमकथयत तदा सा तं ब्रह्मचारिणमकथयत—
( २५० )
विपत्प्रतीकारपरेण अनर्थपरिहारार्थिना इत्यर्थ.
भूतिममुत्सुकेन वा ऐश्वर्यकामेन वा मङ्गन्नं निषेव्यते
गन्धमाल्यादिकं निषेव्यते अर्थात् ये जनाः भूतिमिच्छन्ति
ते मङ्गलवस्तूनि सेवन्ते किंतु जगच्छ्र रणयस्य संसार-
˙स्य यः शरणभूतोऽस्ति तस्य तथा निराशिष निरभि-
लापस्य सतः शिवस्य आशोपहतात्मवृत्तिभिः आशया
तृष्णया उपहता दूषितात्मवृत्तिः अन्त करणवृत्तिः
येषां तेः एभिः मङ्गलैः किम् अर्थात् शिवस्तु कस्यापि
वस्तुनः आशां न करोति स तु स्वयं लोकाय शरणं
दातु समर्थः अतएव तस्य मङ्गलवस्तुभिः किम् ।
(b) पार्वतींप्रतिशिवस्य एतद्वच —
अवस्तुनिर्वंधपरे अवस्तुनि तुच्छवस्तुनि निर्वेधोऽभि
निवेशः पर प्रधानं यस्याः तस्याः संबुद्धि तुच्छवस्तुनि
अभिलापवति आमुक्ताविवाहकौतुकः आमुक्तम् आ
सञ्जितम् विवाहे यत्कौतुकं हस्तसुत्रं तद्यस्य सः ते अय
करः वलयीकृतनाहिना भूषणीकृतसर्पेण शंभोः महादेवस्य
करेण करणभूतेन तत्प्रथमावलम्बनं तदेव प्रथमं तत्प्रथमम्
अपरिचितत्वादति भयंकरमि'तभावः तद्घलम्बन ग्रहणं
चेति कथं नु सहिष्यते । कथमपिनेत्यर्थः ।
II. (a) By her face, which was as fragrant as the
lotus ( itself ) and which shone, with the
quivering leaf of the nether lip, she at night
restored the ( beauty of ) lotuses to the
waters ( of the stream ) the wealth of which
was destroyed by the showers of snow.
( २५१ )
(b) “O thou of stooping limbs, henceforth I am
thy slave, bought by the austerities”—as the
Moon-crested God said these words, she
immediately forgot ( all ) her exhaustion
caused by the austerities : for, fatigue gives
fresh vigour again by the fruition ( i. e. the
achievement of the desired object )
III. (a) जब शंकर जी ब्रह्मचारी का रूपधारण कर पार्वती के
पास आये तब पार्वती ने उठकर उनका खूब सत्कार
किया इसी विषय पर कवि कहता है कि विशेष
व्यक्तियो में लोगो का कृत्य भी आदर पूर्ण होता है
अर्थात् यद्यपि कोई बराबर वाला भी हो तो भी स्थिर
चित्त लोग विशेष व्यक्तियो में विशेष प्रकार का व्यवहार
करते हैं ।
(b) शङ्कर को अपना पति न बनाने के लिये मना करते
हुये ब्रह्मचारी ने पार्वती से कहा तुम शिव के योग्य
नहीं हो । उसी बात को कवि समझाता है कि
यज्ञस्तम्भ के लिये जो वेद की क्रिया प्रयुक्त की जाती
है वह क्रिया श्मशान के खम्भे के लिये नहीं की जा
सकती । अर्थात् पार्वती के योग्य शिव नहीं हैं ।
IV. तुषारवृष्टिक्षतपद्मसम्पदाम्—तुषार वृष्ट्या क्षता
पद्मसंपदो यासां तासां तुषारवृष्टिक्षतपद्मसम्पदाम्
(b) शरव्य—शरगोसाधुः शरणा+शयत् सुगंधि—सुगंधोऽ
स्यास्तीति—सुगंध+इतच् ।