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सर्वकोश
कुमारसम्भवम् (महाकवि कालिदास - संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कुमारसम्भवम् (महाकवि कालिदास - संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kumarasambhavam of Kalidasa with Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / पं. सीताराम चतुर्वेदी द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

पृष्ठ 244, कुल 268 में से

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पृष्ठ 244

( २२७ )
was thus saying. स्तनभिन्नवल्कला-स्तनाभ्यां ( पञ्चमी )
भिन्नं ( स्रस्तं ) वल्कलं यस्याः सा with the bark-garment
slipping from her breasts ( because of their being
elevated or her being in haste ) Or स्तनाभ्यां ( तृतीया )
भिन्नं ( त्रुटितं ) वल्कलं यस्याः सा whose bark-garment
was being torn by her breasts ( because of their
being elevated ). For the second interpretation
which does not suit the context so much as the
first one, Cf. ' बबन्ध बालारुणबभ्रु वल्कलं पयोधरोत्सेध-
विशीर्णसंहति ' । verse 8 above चचाल-( √ चल्-लिट् )
गन्तुमारेभे started वृषराजकेतनः-वृषे ( वृषभो ) राजा वृष-
राजः, वृषराज केतन ( ध्वजा ) यस्य स वृषराजकेतनः or
वृषराजः केतने यस्य स वृषराजकेतनः one who-e emblem is
a bull In वृषराजः, राजन् is made राज by the addition
of टच् by ' राजाऽहःसखिभ्यष्टच् ' पा० ५.४.६१ । केतन-केत्यते
( ज्ञायते ) अनेन इति केतनं an emblem ; a banner. स्वरूपं
आस्थाय-assuming his own form कृतस्मितः-कृतं स्मितं
येन सः who was smiling समाललम्बे-( आ +√ लम्ब् +
लिट् ) जग्राह held ( her ) 84.
Change of Voice :-अथवा ( मया ) इतः गमिष्यते
इति वादिन्या बालया स्तनभिन्नवल्कलया चेले, वृषराजकेतनेन च
स्वरूपं आस्थाय कृतस्मितेन सा समाललम्बे ॥ ८४ ॥
Hindi Translation :-या ( मैं ) यहाँ से चली जाऊँगी
इस प्रकार कहने वाली वह कुमारी, जिसके स्तनों पर से वल्कल
वस्त्र खिसक गया था, चलने लगी ; ( तब ) बैल जिसका ध्वजा-