कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Kularnava Tantra with Hindi Commentary
भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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को प्राप्त करता है। हे देवि ! जो भक्ति के साथ हम दोनों को
मांस और आसव अर्पित कर अन्तर्याग में तत्पर होकर आनन्द
का उद्भाव करते हैं, वे कौलिक हम दोनों ही के सच्चिदानन्द
लक्षण से युक्त स्वरसवाले होते हैं। अन्तःस्थित उल्लास का
अनुभव मन और वाणी के परे है। वह कुलद्रव्य के उपभोग
से ही परिस्फुरित होता है, किसी अन्य उपाय से नहीं। अतः
कुलद्रव्य का सेवन करने से कुलतत्त्व का अर्थ ज्ञात होता है और
भैरवावेश का उद्रेक होकर साधक सर्वत्र समदर्शी होता है।
मन्त्र-संस्कार से शोधित अमृत-पान के द्वारा हे पार्वति !
संसार बन्धन से छुड़ानेवाला देवता भाव जाग्रत् होता है।
ब्राह्मण के लिए यह अमृत सदा पेय है, क्षत्रिय के लिए युद्ध
के आसन्न होने पर, वैश्य के लिए यज्ञ के अवसर पर और
शूद्र के लिए श्रमसाध्य कार्य होने पर यह पेय है। देवताओं
और पितरों की पूजा कर गुरुदेव का स्मरण करते हुए शास्त्रोक्त
विधि से मद्यपान और मांस-भोजन करने से कोई दोष नहीं
होता। मन्त्रार्थ के स्मरण और मन की स्थिरता के लिए तथा
संसार बन्धन से मुक्ति पाने के लिए ज्ञानपूर्वक पान करना
चाहिए। अन्यथा जो केवल सुख के लिए इसका सेवन करता
है, वह पापी होता है।
कौलोपदेश से हीन व्यक्ति यदि मद्य, स्त्री आदि में आसक्त
होता है, तो वह अक्षय नरक को प्राप्त होता है। हे कुलेशि !
ब्रह्मनिष्ठ योगी भी निन्दनीय होता है। अतः लिङ्गत्रय का
जाननेवाला और षट्चक्रों का भेदक योगी पीठस्थानों में आकर
महापद्मवन में स्थित हो। मूलाधार से ब्रह्मरन्ध्र तक बारम्बार
जाकर चिच्चन्द्रकुण्डलीशक्ति रूपी आसव के सुख का अनुभव
करे। व्योमपङ्कज से निकलते हुए अमृतपान में संलग्न योगी
ही मधुपान करता है। अन्य लोग तो मद्यप हैं। पुण्य और