कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Kularnava Tantra with Hindi Commentary
भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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कारिणी है। ऐन्दवी विद्याप्रदा, द्राक्षा राज्यदायिनी है। तालजा
स्तम्भन में प्रशस्त है और खार्जूरी शत्रुनाशिनी है। नारिकेल
की बनी लक्ष्मीदायिनी और पानसी शुभकारिणी है। मधु की
बनी ज्ञानदायिनी और दारिद्र्य तथा शत्रुनाशिनी है। मैरेय
सदा पापहारिणी होती है।
मदिरा ब्रह्मगा और चित्त का शोधन करनेवाली कही गई
है। अतः उपर्युक्त में से एक को लेकर पूजाकर्म का प्रारम्भ
करना चाहिये। मद्य, मांस और विजया को अष्टगन्ध के साथ
मर्दित कर साधक वटिका बना ले और मद्य के अभाव में इसी
वटिका को जल में मिलाकर उससे तर्पण किया करे। अथवा
गुड़ मिले दही से अथवा मधुयुक्त सौवीर से कर्म करे। किन्तु
क्रिया का लोप कदापि न करे।
मांस तीन प्रकार का कहा गया है--खेचर का, भूचर का
और जलचर का। तर्पण के लिए इन्हीं की यथा सम्भव कल्पना
करे। गन्ध-पुष्पाक्षत से पशु की पूजा कर निम्न मन्त्र से उसे
अभिमन्त्रित कर उसकी बलि दे--
शिवोत्कृत्तमिदं चाशु अतस्तां शिवतां व्रजेत्।
तद्बुद्ध्वाशु पशो ! त्वं हि माशिवस्त्वं शिवोसि हि ॥
उसके जल में ब्रह्मा, गन्ध में विष्णु, रस में रुद्र और
आनन्द में परमात्मा का वास है। अतः वह सेवनीय है। मांस
का अभाव होने पर लहसुन और अदरक से देवी की पूजा करे,
अन्यथा पूजा निष्फल होती है।
मत्स्य, मांस और मद्य से रहित तर्पण नहीं करना चाहिये।
तिल मात्र ही मांस और केवल आधे तिल मात्र मद्यबिन्दु से
एक बार भी तर्पण करने से समस्त यज्ञों का फल प्राप्त होता
है। कुलपूजा के समान तीनों जगत् में कोई पुण्य नहीं है।
अतएव जो भक्तिपूर्वक पूजा करता है, वह भुक्ति और मुक्ति-