क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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करते हैं, तथा घृत में डुबोकर (अवगाह्य) पकाते (घृते पाच्या) हैं। यह अन्य प्रकार
(घृतपूरोऽपरः) का घेवर (घृतपूर) कहा जाता है॥९१॥
अथ दुग्धजघेवरनिर्माणविधिः
पाकपिण्डीकृतं क्षीरं शर्कराचूर्णमिश्रितम्।
घृतपूरविनिर्माणं कार्येत्स्वल्पसर्पिषि ॥९२॥
दुग्धजघेवर (घृतपूर)
दुग्ध का खोया (विनष्टक्षीर) पाक पिण्डीकृत क्षीरम्), शर्करा चूर्ण मिश्रित- को
मर्दन करके, अल्प घी (स्वल्पसर्पिषि) में पाक कर लेते हैं- इसरीति घृतपूर या घेवर
का निर्माण कर लेते हैं॥९२॥
अथ शालिपिष्टभवघेवरनिर्माणविधिः
सुशालिपिष्टं दुग्धे तु क्वथितं वस्त्रगालितम्।
खण्डयुक्तं घृते पक्वं घृतपूरो भवेदयम् ॥ ९३ ॥
शालिपिष्टभव घेवर (घृतपूर)
सुशालिपिष्ट (उत्तम कोटि के चावलों की पिट्ठी) का दुग्ध में क्वथित करके
(उबालकर), वस्त्रमालिक (कपड़े से छानकर) करने के बाद खण्डयुक्त (शर्करा मिश्रण)
करें- इस द्रव्य को घृत में पाक (पक्व) कर लेते हैं- इस पदार्थ को 'शालिघृतपूर' मान
दिया गया है॥९३॥
अथ कसेरुजघेवरनिर्माणविधिः
कसेरुचूर्णं निक्षिप्य पाकपिण्डीकृतं पयः।
निर्माणं घृतपूराणां शर्करासहितं भवेत् ॥९४॥
कसेरुक घेवर (घृतपूर)
कसेरुक कन्द चूर्ण को दुग्ध में निक्षेप करके पाक द्वारा पिण्डीकृत प्रक्रिया पूर्ण
करें, फिर शर्करा का सम्मिश्रण करके, घृत में पाक करते हैं- यह कसेरुक घृतपूर
(घेवर) की निर्माण विधि है॥९४॥
अथास्ररसभवघेवरनिर्माणविधिः
पक्वाम्रस्य घृते तप्ते रसस्तलनपिण्डितः।
शुद्धशर्करया योज्यो घृतपूरो यदृच्छया ॥ ९५ ॥
दशमोत्सवः २११
क्षीरमात्मानुरूपं हि खण्डचूर्णं ततः स्मृतम्।
योजितो यो विशेषोऽत्र तदाख्यापूर्णसंज्ञितः ॥ ९६॥
आम्ररसघृतपूर
आम्र रस को तप्त घृत में पाक करके (तलन), पिण्डीकृत हो जाने पर,
शुद्धशर्करा मिलाकर तथा घृतमें पक्व (पकाकर) घृतपूर का निर्माण करते हैं।
विनष्ट दुग्ध (खोया) में दुग्ध के (क्षीरमात्मानुरूपम्) प्रमाणानुसार शर्करा (खण्डचूर्ण)
का सामिलन उपयुक्त है। इस प्रसंग में जो विशेष भोजनानुसार पदार्थ (योग) निर्मित
होता है, उसे उसी नाम (तदाख्यापूर्ण संज्ञितः) की संज्ञा दी जाती है॥९५-९६॥
अथ विविधघृतपूरस्य गुणाः
घृतपूरो गुरुर्वृष्यो हृद्यः पित्तानिलापहः।
सद्यः प्राणप्रदो बल्यः सुरुच्योऽग्निप्रदीपनः ॥ ९७॥
विविधघृतपूर व्यंजन
सामान्य गुण-कर्म
१. गुरु २. वृष्य ३. हृद्य
४. पित्तावह ५. अनिलापह ६. सद्यःप्राणप्रद
७. बल्य ८. सुरुच्य ९. अग्निप्रदीपन
शृङ्गाटकमखाणानामप्येवं घृतपूरकाः।
विचार्य वस्तुसंयोगं तद्गुणानपि चावदेत् ॥ ९८ ॥
विभिन्नप्रकार के घृतपूर
१. शृंगारक (सिंघाड़ा) २. सरवाण (मखाना/ मरवाना)
इन पदार्थों घृतपूर का उपयुक्त विचारपूर्वक संयोग करके (विचार्य वस्तुसंयोनम्)
निर्माण किया जा सकता है, तथा इनके गुण-कर्मों का निर्देशन भी करना चाहिए
(तद्गुणानपि चावदेत)॥९८॥
अथ गुह्या-संयावकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
समितां सर्पिषा भृष्टां सिताद्राक्षादिसंभृताम्।
एलालवङ्गकर्पूरमरीचैः परिवासिताम् ॥ ९९ ॥