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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

परिच्छेद ] अनुभूतित्व-जाति का खण्डन ११३
तदेवं—
'तत्सदृक्प्रत्यभिज्ञानं यत्ते संस्कारबोधकम् ।
सहकारि तदेवास्तामक्षस्यातिप्रसक्तिनुत् ॥'
तत्सदृशप्रत्यभिज्ञानं तु स्मर्तव्यस्मरणपूर्वकमित्येतदपि सममेव ।
तथाऽप्यन्यत्र अर्थसन्निकर्षमन्तरेणेन्द्रियस्य ज्ञानकरणत्वं नोपलब्धचरमिति
चेन्न। विशिष्टरूपेण भ्रमविषये मया तदुपगमात् सहकारिभूतदोषशक्तेर्वा प्रत्या-
सत्तित्वेनेष्टत्वात् ।
रजत-संस्कार नष्ट हो गया हो, वहाँ रजत-भ्रम नहीं होता, क्योंकि काल-व्यवधानादि
का अभाव भी रजत-भ्रमका सहकारी है, और प्रकृत में इनका अभाव है।
तस्मात् आपके मत में जो सादृश्य-दर्शनादि संस्कार के उद्बोधक हैं, हमारे मत
में भी वे ही इन्द्रिय के सहकारी हैं; अतः कोई अतिप्रसङ्ग नहीं है।
जिस सादृश्य-ज्ञान को उद्बोधक संस्कार।
मानो तुम, इन्द्रियन का वह करता सहकार ॥
समर्थन—आप रजत-भ्रम में इन्द्रिय के सादृश्य-ज्ञान को सहकारी मानते हैं,
पर वह रजतरूप प्रतियोगी के स्मरण के बिना हो नहीं सकता। अतः आवश्यक
होने से रजत-स्मृति को ही भ्रम माना जाय, रजत-विषयक अन्य अनुभव को भ्रम
मानना उचित नहीं।
खंडन—आपके मत में भी संस्कार के उद्बोधक सादृश्य-ज्ञान में प्रतियो-
गित्वरूप से अपेक्षित रजत-स्मृति तो भ्रम है नहीं, किन्तु संस्कार के उद्बोधन के
अनन्तर जायमान रजत-स्मृति ही भ्रम है। अतः प्रश्न हो सकता है कि प्रथम उत्पन्न
होने से सादृश्यज्ञान में अपेक्षित रजत-स्मृति ही भ्रम क्यों न कहलाये ?
समर्थन— फिर भी इन्द्रिय अन्य स्थल में सन्निकर्ष के बिना ज्ञान के कारण नहीं
देखे गये हैं। अर्थात् अक्षज-प्रत्यक्ष-ज्ञान में सर्वत्र इन्द्रियों का अर्थ-सन्निकर्ष से अन्वय-
व्यतिरेक देखा जाता है। फिर प्रकृत में सन्निकर्ष के बिना 'रजतम्' यह भ्रम कैसे होगा ?
खंडन—प्रमास्थल में ही इन्द्रिय का सन्निकर्ष के साथ अन्वय-व्यतिरेक होने से वहीं
सन्निकर्ष अपेक्षित होता है, पर भ्रमस्थल में सन्निकर्ष अपेक्षित नहीं है, यह हम विशेष
रूपसे कह सकते हैं। अथवा जैसे आप प्रत्यभिज्ञा में संस्कार को सन्निकर्ष मानते हैं, वैसे
ही हम भी भ्रम-स्थल में दोष को ही सन्निकर्ष मान लेंगे, तो कोई हानि नहीं।
१५

११४ सानुवादखण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
किञ्च-संस्कारस्याऽपि प्रमाणान्तरासहकृतस्य नान्यत्र ज्ञानजनकत्वं
दृष्टमिति तदपि कथं कल्प्यते ।
प्रत्यभिज्ञान एव संस्कारस्य सदृशदर्शनादिसहकारित्वं कल्पितं न त्विन्द्रियेति
चेन्न । प्रत्यभिज्ञाने संस्कारेन्द्रिययोर्द्वयोरपि कारणत्वात् सदृशदर्शनादि-
सहकृतत्वदर्शनाविशेषात् ।
अत्र सदृशदर्शनसहकारित्वे संस्कारसहकारित्वस्यापि प्रसङ्गः प्रत्यभिज्ञान-
वदिति चेन्न । तथा सति तद्वदेव तचोल्लेखापत्तेः । सदृशदर्शनादिसहकृतत्वेन च
तत्तांशप्रसञ्जने संस्कारजन्यत्वस्योपाधित्वम् ।
किञ्च-संस्कार अन्यत्र कहीं भी अन्य प्रमाणों से रहित होकर ज्ञान का जनक
नहीं देखा गया। तब यहाँ केवल संस्कार रजत-स्मृति का जनक है, यह कल्पना ही
कैसे हो सकती है ?
समर्थन-प्रत्यभिज्ञा में ही संस्कार इन्द्रिय आदि ( प्रत्यक्षादि प्रमाणों ) से रहित
हो सादृश्यदर्शन के सहकार से ज्ञान का जनक देखा गया है। खंडन-प्रत्यभिज्ञा
में संस्कार और इन्द्रिय दोनों कारण हैं। सादृश्य-दर्शन दोनों का ही सहकारी
है। भेद यही है कि तत्तांश के ज्ञान में संस्कार और इदन्ता के ज्ञान में इन्द्रिय कारण
हैं। संस्कार तो अपने उद्बोधन और इन्द्रिय अभेदबोध में सादृश्य-दर्शन के सहकार
की अपेक्षा करता है।
समर्थन-यदि इन्द्रिय भी 'रजतम्' इस भ्रमज्ञान में सादृश्य-दर्शनरूप सहकारी की
अपेक्षा करता है, तो वह उससे उद्बुद्ध संस्कार की भी अवश्य अपेक्षा करेगा, जैसे कि
प्रत्यभिज्ञा में इन्द्रियाँ संस्कार की अपेक्षा करती हैं। खण्डन-यदि प्रत्यभिज्ञा के तुल्य
'रजतम्' इस भ्रम में भी संस्कार की अपेक्षा मानें, तो प्रत्यभिज्ञा के तुल्य 'रजतम्'
इस स्मृति में भी तत्ता का उल्लेख हो जायगा ।
शङ्का-सदृश-दर्शनरूप सहकारी के बल से 'रजतम्' इस भ्रम में तत्ता का
उल्लेख क्यों नहीं ? खंडन-सदृश-दर्शननिष्ठ तत्ता के उल्लेख में संस्कार निमित्त
कारण है। यहाँ संस्कार नहीं है, अतः तत्ता का उल्लेख नहीं होता ।

परिच्छेद ] अनुभूतित्व-जाति का खण्डन ११५
न च सदृशदर्शनसहकारितैव तत्ताप्रयोजिकाऽत्र त्यज्यतां न संस्कार इति
युक्तम् । सदृशदर्शनं परित्यज्य संस्कारे सत्यपि अतथाबोधात् ।
तथापि सदर्थे प्राप्यकारित्वमिन्द्रियस्य दृष्टं न हातुं शक्यमिति चेन्न । उक्तमत्र
यथेन्द्रियस्य प्राप्तिसहकृतस्य ज्ञापकत्वं दृष्टं तथैव संस्कारस्यापि प्रमाणान्तर-
सहकृतस्य ज्ञापकत्वमुपलब्धमिति तदपि हातुं न युक्तमिति, संस्कारस्यापि
चेन्द्रियप्रत्यासत्तित्वस्वीकारेण तद्विरहासिद्धेः ।
तत्तांशमोषकल्पनं च स्वतन्त्रसंस्कारजत्वपक्ष एव यावदधिकम् ।
कुतश्चायं तत्तांशमोष इति विचारमधिकरोति, पूर्वं वर्तमानादिकालविशेष-
शङ्का—सदृश-दर्शन ही तत्ता-भाग के भान का प्रयोजक है, अतः उसीके
सहकार को 'रजतम्' इस भान में छोड़ो, संस्कार के सहकार को क्यों छोड़ते हो ?
खंडन—संस्कार होने पर भी सदृश-दर्शन के अभाव में 'रजतम्' यह भ्रम
नहीं होता । अतः सदृश-दर्शन को ही चक्षुरादि का सहकारी मानते हैं, संस्कार को
नहीं । अन्यथा तत्ता का भान हो जायगा ।
समर्थन—तथापि सत्-अर्थ की प्रमा में सर्वत्र इन्द्रियाँ सम्बद्ध को ही ग्रहण
करती देखी गयी हैं, अतः उसको छोड़ना उचित नहीं है । खंडन—इस विषय में
हम कह चुके हैं कि जैसे इन्द्रिय सन्निकर्ष से विशिष्ट होकर ही ज्ञान के जनक देखे
गये हैं, वैसे ही संस्कार भी अन्य प्रमाणों से युक्त होकर ही ज्ञान का जनक देखा गया
है । अतः अन्य प्रमाण का सहकार भी संस्कार में त्यागने योग्य नहीं है ।
किञ्च—संस्कार ही प्रत्यासत्ति है, अतः रजत असन्निकृष्ट नहीं है । अर्थात् 'रजतम्'
यह ज्ञान मानस-भ्रम है और मन के साथ रजत का संस्कार ही सम्बन्ध है ।
सथ ही, जो 'रजतम्' इस ज्ञान को इन्द्रियजन्य मानते हैं, उनके मत में
तत्ता-अंश के भान का प्रसङ्ग ही नहीं है । किन्तु जो स्मृति मानते हैं, उनके मत में
तत्ता-अंश के त्याग की कल्पना में अधिक गौरव है ।
यह भी विचारणीय है कि तत्ता-अंश का त्याग कैसे होगा ? पूर्व-काल में वर्तमानता-
विशिष्ट रजतादि ही अनुभव का विषय हुआ है, अतः उससे जन्य संस्कार भी वर्तमानता-
विशिष्ट रजतादि को ही उपस्थित करेगा । अर्थात् अनुभव में विशेषणरूप से जो
वर्तमानकाल भासता है, वही स्मरण में तत्ता-रूप से भासता है । अतः जो अनुभव में

११६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
विशिष्टस्य रजतादेरेकस्मिन्ननुभवे प्रकाशिततया तज्जन्येन संस्कारेणापि तथैवोप-
नेतुमुचितत्वात्, प्रत्यभिज्ञायां तथैव फलदर्शनात् ।
दोषवशात् तत्तांशमोष इति चेन्न । विषयसम्बन्धस्य स्वभावत्वेन संस्कारे
तदलोपात् ।
दोषात् स्मृतौ तथेति चेत्, कः पुनरसौ दोषः ? यस्माद् भ्रान्त्युत्पत्तिः परेषाामिति
चेत्तर्हि तद्रजताविशिष्टमिदं रजतमित्यत्र, सैव रजतव्यक्तिरियमित्यत्र वा,
पुनस्तदेव रजतमुपस्थितमितीह वा, सामान्यत एव रजतस्य तदाऽपि परामृष्टस्य
भ्रान्तौ तत्तांशमोषः स्यात्, दोषस्य विद्यमानत्वात् । अन्यथा इदं रजतमित्यंशेऽपि
तस्मिन् ज्ञाने तत्तांशमोषो न स्यादित्यास्तामियं प्रसक्तानुप्रसक्तिः ।
विशेषण से विशिष्ट भासता हो, वह स्मरण में विशेषण-रहित कैसे भास सकता है ?
प्रत्यभिज्ञा के स्मरण-अंश में अनुभव के अनुकूल विशिष्ट का भान ही देखा भी गया है ।
समर्थन—दोषबल से 'रजतम्' इस स्मरण में तत्तांश का त्याग होगा ?
खंडन—तत्तारूप विषय के साथ संस्कार का स्वभाव ही सम्बन्ध है और दोष से
संस्कार का लोप हो नहीं सकता । अन्यथा 'रजतम्' यह स्मरण ही कैसे होगा ? अतः
दोष अकिञ्चित्कर है ।
समर्थन—दोष संस्कार का नाश नहीं करता, किन्तु तत्ता-अंश में स्मृतिरूप
कार्य का प्रतिबन्धक होता है । खंडन—दोष क्या वस्तु है । अर्थात् पूर्वोक्त युक्तियों से
खण्डित होने से दोष कोई वस्तु ही नहीं है ।
समर्थन—पर ( अन्यथाख्यातिवादी ) को जिस पित्त आदि के बल से भ्रम होता है,
वे पित्तादि ही दोष हैं। खंडन—यदि दोष से तत्तांश का त्याग होता है, तो जिस स्थल
में शुक्ति में उस रजत से अविशिष्ट ( सदृश ) 'यह रजत है' ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है,
उस भ्रम में तथा 'यह वही रजत व्यक्ति है' इस प्रत्यभिज्ञा-भ्रम में तथा 'वही रजत
फिर उपस्थित हुआ' इस प्रत्यभिज्ञारूप भ्रम में भी—जहाँ सामान्यतः तद्-शब्द से रजत
का परामर्श है, वहाँ तत्तांश का त्याग होना चाहिए, क्योंकि दोष वहाँ भी है । अन्यथा
यदि यहाँ दोष न मानें, तो इसी प्रत्यभिज्ञारूप भ्रम के 'इदं रजतम्' इस अंश
में तत्तांश का त्याग कैसे होगा—प्रमा-लक्षण के खण्डन में प्रसक्त इस प्रत्यभिज्ञा-
खण्डन में अनुप्रसक्त तत्तांश त्याग का खण्डन अनावश्यक है ।

परिच्छेद ] अनुभूति-जाति का खण्डन ११७
न च प्रत्यभिज्ञा नाम स्मरणानुभवाभ्यामन्य एव प्रकार इति वाच्यम् ;
अननुभवत्वेन अप्रमात्वापातात् । न चैवमस्त्वित्यपि वाच्यम् ; अक्षणिकत्ववादिना
स्थिरसिद्धौ प्रमाणत्वेनोपन्यस्तत्वात् । ईदृशप्रसिद्धलक्ष्यत्यागेन च लक्षणोपपादने-
ऽनियमः प्रसज्येतेति ।
तस्मात् जातिवाचिनोऽनुभवपदस्य स्मृतितो व्यवच्छेदार्थमुपादानमिति सर्वथा-
नुपपन्नमिति ।
• अथ स्मृत्यन्यत्वखण्डनम्
नापि स्मृत्यन्यत्वमनुभवार्थः, नापि स्मृतिलक्षणरहितत्वम्; उक्तक्रमेण
स्मृत्यनुभूतिसङ्करस्य दर्शितत्वेन व्यवच्छेदकत्वानुपपत्तेः ।
इतोऽपि न स्मृत्यन्यत्वमनुभवार्थः । तथा हि—स्मृत्यन्यत्वं यत्किञ्चित्स्मरणा-
न्यत्वं वा, सर्वस्मृतिव्यक्त्यन्यता वा, स्मृतित्वरहितत्वं वा अभिप्रेतम् ?
समर्थन—प्रत्यभिज्ञा स्मृति तथा अनुभव से विलक्षण प्रकार है। अतः वह प्रमा-
लक्षण में अनुभूति पद का व्यवच्छेद्य हो सकती । खण्डन---प्रत्यभिज्ञा को अनुभव
न मानें, तो वह अप्रमा हो जायगी ।
शंका—प्रत्यभिज्ञा, अप्रमा ही रहे, तो हानि क्या है ? खण्डन—यदि प्रत्यभिज्ञा को
प्रमाण न मानें, तो अक्षणिकवादी नैयायिकों ने स्थिर-सिद्धि में 'तदेवेदम्'
इस प्रत्यभिज्ञा को जो प्रमाण रूप से उपस्थित किया है, वह व्याहत हो जायगा ।
किञ्चित् प्रत्यभिज्ञा प्रमा-लक्षण का प्रसिद्ध लक्ष्य है, अतः आप द्वारा कल्पित 'तत्त्वानुभूतिः
प्रमा' इस लक्षण की अव्याप्ति के भय से यह कहना कि 'प्रत्यभिज्ञा प्रमा का लक्ष्य
नहीं है', अनुचित है; क्योंकि ऐसा करने से व्यवस्था ही न हो सकेगी ।
जब युक्ति से स्मृतिमात्र अनुभव सिद्ध हो चुका है, तब यह कहना कि
'तत्त्वानुभूतिः प्रमा' इस लक्षण में स्मृति के व्यवच्छेदार्थ जातिवाची अनुभूति पद
का निवेश है, सर्वथा अनुपपन्न है ।
स्मृति-भिन्नत्वका खण्डन
स्मृति से अन्य ज्ञान अथवा स्मृति के लक्षण (संस्कारजत्व) से रहित ज्ञान भी
अनुभव-पद का अर्थ नहीं है, क्योंकि उक्त प्रकार से स्मृति और अनुभव का साङ्कर्य होने
के कारण ज्ञानमात्र अनुभव रूप होने से वह अनुभव पद की व्यवच्छेद्य नहीं हो सकती ।
साथ ही, वक्ष्यमाण दोष अर्थात् स्मृत्यन्यत्व का निर्वचन न कर सकने के कारण भी
स्मृत्यन्यत्व अनुभव पद का अर्थ नहीं हो सकता । देखिये—'स्मृति से अन्य' इस वाक्य

प्रथमे तु स्मृत्यन्तरव्यतिरेकात् स्मृत्यन्तरमप्यनुभूतिः स्यात् । न हि यतो
व्यतिरिक्ता स्मरणव्यक्त्यन्तरादेका स्मृतिव्यक्तिस्तत् स्मरणमेव न भवति, येन
तदन्यत्वं न स्मृत्यन्यत्वं स्यात् ।
नापि द्वितीयः ; मदीयादिस्मृतिव्यक्तिभ्यो हि भवता कथङ्कारं व्यतिरिक्तत्व-
-मवधारणीयं प्रमायाः, तासां सर्वासां भवता प्रत्येतुमशक्यत्वात् । तथा
हि— न तावत्परकीयज्ञाने परस्यास्मादृशोऽध्यक्षसम्भवः । नाप्यनुमानार्थापत्ती,
लिङ्गानुपपद्यमानयोः सर्वत्रावाग्दृशा प्रत्येतुमशक्यत्वात् । नापि शब्दः ; सर्वत्र
तस्यासम्भवात् । उपमानाद्यसम्भवोऽपि स्फुट एव । ततः कथं सर्वाभ्यः स्मृति-
व्यक्तिभ्यो व्यतिरेको निरूप्यः प्रमाया इत्यनवबोधादसिद्धिर्लक्षणस्य ।
न च वाच्यं स्मृतित्वेन सर्वाः स्मृतिव्यक्तयः सर्वकालसर्वपुरुषसम्बन्धिन्यः
स्वात्मीयां स्मृतिव्यक्तिं प्रत्यक्षतः प्रत्यक्षादेवावगम्यन्ते सामान्यलक्षणया इन्द्रिय-
का अर्थ क्या एक-दो स्मृतियों से अन्य मानते हैं, सब स्मृतियों से अन्य अथवा
स्मृतित्व-रहितत्व ?
यदि एक दो स्मृतियों से अन्य अर्थ है, तो एक स्मृति से द्वितीय स्मृति के अन्य
होने से द्वितीय स्मृति भी अनुभूति हो जायगी, क्योंकि जिस स्मृति से अन्य
द्वितीय स्मृति है, वह स्मृति ही नहीं है-- यह बात नहीं है, जिससे उसे अन्यत्व स्मृत्य-
अन्यत्व न हो ।
सभी स्मृतियों से अन्यत्व ही स्मृत्यन्यत्व है, यह द्वितीय कल्प भी युक्त नहीं,
क्योंकि मेरी स्मृति से अन्यत्व प्रमा में है, इसका निश्चय आप कैसे करेंगे ? हम लोगों
के सदृश अर्थात् योगबल से रहित अन्य मनुष्यों को अन्य पुरुष के ज्ञान का प्रत्यक्ष तो
हो नहीं सकता । फिर सर्वत्र हेतु या अनुपपद्यमानता का ज्ञान न होने के कारण
अनुमान अथवा अर्थापत्ति से भी बाह्यदर्शी को सभी अन्य स्मृतियों का भेद प्रमा
में गृहीत नहीं हो सकता । सर्वत्र शब्द के न होने से शाब्द भी संभव नहीं । उपमान
आदि से भी अन्य स्मृतियों का अन्यत्व प्रमा में निश्चित नहीं हो सकता, क्योंकि उपमान
से संज्ञा-संज्ञिभाव मात्र का निश्चय होता है और यहाँ संज्ञा-संज्ञिभाव है नहीं ।
ऐसी स्थिति में प्रमा में सम्पूर्ण स्मृतियों से भेद कैसे जाना जाय ? इस तरह ज्ञान
के न होने से लक्षण ही असिद्ध है ।
समर्थन-- स्वीय स्मृति के मानस प्रत्यक्षकाल में सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति से सभी
कालों एवं सभी पुरुषों से संबद्ध सर्वस्मृतियों का ज्ञान हो सकता है, जैसे कि व्याप्ति-

परिच्छेद ] स्मृतिभिन्नत्वका खण्डन ११८
प्रत्यासत्त्या व्याप्तिग्रहणकाल इव व्याप्यव्यापकव्यक्तय इति दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकयो-
र्दोषग्रस्तत्वात् । तथा सति ह्येकं प्रमेयं प्रत्यक्षतः प्रमेयत्वसामान्यप्रत्यासत्त्या
विश्वमेव प्रत्यक्षं स्यात् । एवमभ्युपगच्छतश्च श्रद्दधीमहि ते सार्वज्ञ्यमिदम्, यदि
जानासि किमस्मच्चेतसि विपरिवर्तत इति ।
नापि तृतीयः; स्मृतित्वरहितत्वं हि स्मृतित्वाभाववत्त्वं वा स्यात्, स्मृतित्व-
प्रतियोगिकमाश्रयस्य स्वरूपं वा, तज्ज्ञानं वा ?
न तावदाद्यः । तथा हि—स्मृतित्वान्योन्याभावोऽपि स्मृतित्वाभावो भवत्येव।
तद्वत्त्वञ्च स्मृतिष्वप्यस्ति । [ न हि स्मृतित्वमेव स्मृतिः । ] ततश्च स्मृतेरपि प्रमात्वा-
पातः । तदव्यवच्छेदाद्विशेषणवैयर्थ्यञ्च, विना विशेष्यमिच्छादावतिप्रसङ्गात् ।
ग्रहकाल में सामान्यलक्षणा के बल से सकल व्याप्य-व्यापक व्यक्तियों का ज्ञान हो जाता
है । खण्डन—दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिक दोनों स्थलों में सम्पूर्ण व्यक्तियों का ज्ञान
सामान्य-लक्षणा से हो नहीं सकता, क्योंकि सामान्यलक्षणा में दोष होने से वह
प्रत्यासत्ति ही नहीं है । अन्यथा यदि सामान्यलक्षणा को प्रत्यासत्ति मानें, तो एक प्रमेय
के प्रत्यक्षकाल में प्रमेयत्व रूप से सकल प्रमेयों का प्रत्यक्ष होने लगेगा ।
समर्थन—प्रमेयत्व रूप से सकल प्रमेयों का प्रत्यक्ष होता हैं, ऐसा ही क्यों न मान
लिया जाय ? खण्डन—ऐसा मानने पर तो सभी मनुष्य सर्वज्ञ हो जायेंगे । यदि आप
कहें कि सब मनुष्य सर्वज्ञ हो ही जाते हैं, तो आपके इस वाक्य को हम तभी मान
सकते हैं, जब आप यह जान लें कि इस समय हमारे चित्त में क्या है ।
यदि कहें कि स्मृतित्वरहितत्व ही स्मृति से अन्यत्व है, तो यह तीसरा पक्ष
भी उचित नहीं; क्योंकि स्मृतित्व-रहितत्व क्या वस्तु है—क्या स्मृतित्व का अभाव
है, स्मृतित्वप्रतियोगिक अधिकरणस्वरूप है ( स्मृतित्व है प्रतियोगी जिसका ऐसा जो
अधिकरण, उसका स्वरूप है ) या स्मृतित्वप्रतियोगिक अधिकरण का ज्ञान है ?
इनमें 'स्मृतित्व का अभाव स्मृतित्वरहितत्व है' यह प्रथम पक्ष उचित नहीं है;
क्योंकि स्मृतित्व का अन्योन्याभाव भी स्मृतित्वाभाव ही है और वह स्मृति में भी है।
फलतः स्मृति भी अनुभूति हो जायगी । अतः अनुभूति पद से स्मृति का व्यवच्छेद
न होने से वह व्यर्थ ही हो जायगा। यदि अनुभूति पद का निवेश न करें, तो इच्छादि
में अतिव्याप्ति हो जायगी।

११८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम

प्रथमे तु स्मृत्यन्तरव्यतिरेकात् स्मृत्यन्तरमप्यनुभूतिः स्यात् । न हि यतो
व्यतिरिक्ता स्मरणव्यक्त्यन्तरादेका स्मृतिव्यक्तिस्तत् स्मरणमेव न भवति, येन
तदन्यत्वं न स्मृत्यन्यत्वं स्यात् ।
नापि द्वितीयः ; मदीयादिस्मृतिव्यक्तिभ्यो हि भवता कथङ्कारं व्यतिरिक्तत्व-
मवधारणीयं प्रमायाः, तासां सर्वासां भवता प्रत्येतुमशक्यत्वात् । तथा
हि—न तावत्परकीयज्ञाने परस्यास्मदादृशोऽध्यक्षसम्भवः । नाप्यनुमानार्थापत्ती,
लिङ्गानुपपद्यमानयोः सर्वत्रावार्ग्दृशा प्रत्येतुमशक्यत्वात् । नापि शब्दः; सर्वत्र
तस्यासम्भवात् । उपमानाद्यसम्भवोऽपि स्फुट एव । ततः कथं सर्वाभ्यः स्मृति-
व्यक्तिभ्यो व्यतिरेको निरूप्यः प्रमाया इत्यनवबोधादसिद्धिर्लक्षणस्य ।
न च वाच्यं स्मृतित्वेन सर्वाः स्मृतिव्यक्तयः सर्वकालसर्वपुरुषसम्बन्धिन्यः
स्वात्मीयां स्मृतिव्यक्तिं प्रत्ययतः प्रत्यक्षादेवावगम्यन्ते सामान्यलक्षणया इन्द्रिय-
का अर्थ क्या एक-दो स्मृतियों से अन्य मानते हैं, सब स्मृतियों से अन्य अथवा
स्मृतित्व-रहितत्व ?
यदि एक दो स्मृतियों से अन्य अर्थ है, तो एक स्मृति से द्वितीय स्मृति के अन्य
होने से द्वितीय स्मृति भी अनुभूति हो जायगी, क्योंकि जिस स्मृति से अन्य
द्वितीय स्मृति है, वह स्मृति ही नहीं है-- यह बात नहीं है, जिससे उसे अन्यत्व स्मृत्य
-अन्यत्व न हो ।
सभी स्मृतियों से अन्यत्व ही स्मृत्यन्यत्व है, यह द्वितीय कल्प भी युक्त नहीं,
क्योंकि मेरी स्मृति से अन्यत्व प्रमा में है, इसका निश्चय आप कैसे करेंगे ? हम लोगों
के सदृश अर्थात् योगबल से रहित अन्य मनुष्यों को अन्य पुरुष के ज्ञान का प्रत्यक्ष तो
हो नहीं सकता । फिर सर्वत्र हेतु या अनुपपद्यमानता का ज्ञान न होने के कारण
अनुमान अथवा अर्थापत्ति से भी बाह्यदर्शी को सभी अन्य स्मृतियों का भेद प्रमा
में गृहीत नहीं हो सकता । सर्वत्र शब्द के न होने से शाब्द भी संभव नहीं । उपमान
आदि से भी अन्य स्मृतियों का अन्यत्व प्रमा में निश्चित नहीं हो सकता, क्योंकि उपमान
से संज्ञा-संज्ञिभाव मात्र का निश्चय होता है और यहाँ संज्ञा-संज्ञिभाव है नहीं ।
ऐसी स्थिति में प्रमा में सम्पूर्ण स्मृतियों से भेद कैसे जाना जाय ? इस तरह ज्ञान
के न होने से लक्षण ही असिद्ध है ।
सम्भवेन— स्वीय स्मृति के मानस प्रत्यक्षकाल में सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति से सभी
कालों एवं सभी पुरुषों से संबद्ध सर्वस्मृतियों का ज्ञान हो सकता है, जैसे कि व्याप्ति-

परिच्छेद ] स्मृतिभिन्नत्वका खण्डन ११६
प्रत्यासत्त्या व्याप्तिग्रहणकाल इव व्याप्यव्यापकव्यक्तय इति दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकयो-
र्दोषग्रस्तत्वात् । तथा सति ह्येकं प्रमेयं प्रत्ययतः प्रमेयत्वसामान्यप्रत्यासत्त्या
विश्वमेव प्रत्यक्षं स्यात् । एवमभ्युपगच्छतश्च श्रद्दधीमहि ते सार्वज्ञ्यमिदम्, यदि
जानासि किमस्मच्चेतसि विपरिवर्तत इति ।
नापि तृतीयः; स्मृतित्वरहितत्वं हि स्मृतित्वाभाववत्त्वं वा स्यात्, स्मृतित्व-
प्रतियोगिकंमाश्रयस्य स्वरूपं वा, तज्ज्ञानं वा ?
न तावदाद्यः । तथा हि—स्मृतित्वान्योन्याभावोऽपि स्मृतित्वाभावो भवत्येव।
तद्वत्त्वञ्च स्मृतिष्वप्यस्ति । [ न हि स्मृतित्वमेव स्मृतिः । ] ततश्च स्मृतेरपि प्रमात्वा-
पातः । तद्व्यवच्छेदाद्विशेषणवैय्यर्थ्यञ्च, विना विशेष्यमिच्छादावतिप्रसङ्गात् ।
ग्रहकाल में सामान्यलक्षणा के बल से सकल व्याप्य-व्यापक व्यक्तियों का ज्ञान हो जाता
है । खण्डन—दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिक दोनों स्थलों में सम्पूर्ण व्यक्तियों का ज्ञान
सामान्य-लक्षणा से हो नहीं सकता, क्योंकि सामान्यलक्षणा में दोष होने से वह
प्रत्यासत्ति ही नहीं है । अन्यथा यदि सामान्यलक्षणा को प्रत्यासत्ति मानें, तो एक प्रमेय
के प्रत्यक्षकाल में प्रमेयत्व रूप से सकल प्रमेयों का प्रत्यक्ष होने लगेगा ।
समर्थन—प्रमेयत्व रूप से सकल प्रमेयों का प्रत्यक्ष होता है, ऐसा ही क्यों न मान
लिया जाय ? खण्डन—ऐसा मानने पर तो सभी मनुष्य सर्वज्ञ हो जायेंगे । यदि आप
कहें कि सब मनुष्य सर्वज्ञ हो ही जाते हैं, तो आपके इस वाक्य को हम तभी मान
सकते हैं, जब आप यह जान लें कि इस समय हमारे चित्त में क्या है ।
यदि कहें कि स्मृतित्वरहितत्व ही स्मृति से अन्यत्व है, तो यह तीसरा पक्ष
भी उचित नहीं; क्योंकि स्मृतित्व-रहितत्व क्या वस्तु है—क्या स्मृतित्व का अभाव
है, स्मृतित्वप्रतियोगिक अधिकरणस्वरूप है ( स्मृतित्व है प्रतियोगी जिसका ऐसा जो
अधिकरण, उसका स्वरूप है ) या स्मृतित्वप्रतियोगिक अधिकरण का ज्ञान है ?
इनमें 'स्मृतित्व का अभाव स्मृतित्वरहितत्व है' यह प्रथम पक्ष उचित नहीं है;
क्योंकि स्मृतित्व का अन्योन्याभाव भी स्मृतित्वाभाव ही है, और वह स्मृति में भी है ।
फलतः स्मृति भी अनुभूति हो जायगी । अतः अनुभूति पद से स्मृति का व्यवच्छेद
न होने से वह व्यर्थ ही हो जायगा । यदि अनुभूति पद का निवेश न करें, तो इच्छादि
में अतिव्याप्ति हो जायगी ।

१२० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य
स्मृतित्वस्य संसर्गाभावस्तत्र विवक्षित इति चेन्न । तथा हि—स्मृतित्वस्य
संसर्गाभाव इति किमुच्यते, किं स्मृतित्वविशिष्टस्य संसर्गस्याभावः, उत संसर्ग-
विशिष्टस्य स्मृतित्वस्य, अथान्यदेव वा किञ्चिदनया वाचोयुक्त्या विवक्षितम् ?
आद्ये स्मृतित्वसंसर्गान्योन्‍याभावः स्मृतावस्तीति स एव प्रसङ्गः । न हि स्मृतित्व-
संसर्गः स्मृतिः ।
अतएव न द्वितीयोऽपि, न हि संसर्गविशिष्टं यत्स्मृतित्वं तदेव
स्मृतिव्यक्तिः । ततश्च संसर्गविशिष्टस्मृतित्वेन सह स्मृतिव्यक्तेरन्योन्‍याभाव-
मादाय उक्तदोषानिवृत्तिः । एवं तत्र तत्रापि संसर्गविशेषणप्रक्षेपे दोषानिवृत्तिरेव,
अनवस्थायां वा पर्यवसानं विशेषणप्रक्षेपपरम्परायाः ।
न च वाच्यं स्मृतित्वसंसर्गस्य न संसर्गान्तरेण सम्बन्धित्वं किन्तु स्वभावत
एव, तत् कुतः परम्परागवेषणं कार्यमिति । स्मृतित्वसंसर्गस्यान्योन्‍याभावमादाय
समर्थन—यहाँ स्मृतित्वाभाव से स्मृतित्व के संसर्गाभाव का ग्रहण है । खंडन—
यह तुम नहीं कह सकते; क्योंकि स्मृतित्व का संसर्गाभाव क्या स्मृतित्व-
विशिष्टसंसर्गाभाव है, संसर्गविशिष्ट स्मृतित्वाभाव है या इस वाक्य-रचना से और
ही कुछ ? यदि स्मृतित्व का संसर्गाभाव अभिप्रेत हो, तो स्मृतित्व-संसर्ग का
अन्योन्याभाव भी स्मृति में है ही । अतः स्मृति में प्रमालक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी,
क्योंकि स्मृतित्वसंसर्ग स्मृति नहीं है ।
इसीलिए द्वितीयपक्ष भी युक्त नहीं है; क्योंकि संसर्गविशिष्ट स्मृतित्वव्यक्ति
भी स्मृति नहीं है । अतः संसर्गविशिष्ट स्मृतित्व के साथ स्मृति-व्यक्ति के अन्योन्याभाव
का ग्रहणकर स्मृति-व्यक्ति में पुनः अतिव्याप्ति हो जायगी ।
समर्थन—स्मृतित्व-संसर्ग का संसर्गाभाव ही स्मृतित्वरहितत्व है । स्मृतित्व-संसर्ग
का संसर्गाभाव स्मृतिव्यक्ति में नहीं है, क्योंकि स्मृति में स्मृतित्व-संसर्ग ही है ।
अतः स्मृति में अनुभूतिलक्षण की अतिव्याप्ति नहीं है । खंडन—स्मृतित्व-संसर्ग का
संसर्गाभाव इस शब्द से भी यदि संसर्ग का अभाव ही अभिप्रेत है, तो फिर भी
स्मृतित्व-संसर्ग के अन्योन्याभाव का ग्रहणकर स्मृति में अतिव्याप्ति ही है । इस तरह
अपर-अपर संसर्ग का निवेश करें, तो अनवस्था या अन्तिम संसर्ग का अन्योन्याभाव
लेकर अतिव्याप्ति हो जायगी ।
समर्थन—स्मृतित्व का संसर्ग ( समवाय ) अन्य संसर्ग से नहीं, किन्तु स्वभाव-
स्वरूप सम्बन्ध से ही संबद्ध है । अतः संसर्ग-परम्परा का गवेषण न होने से अनवस्था

परिच्छेद ] स्मृतिभिन्नत्व का खण्डन १२१
कृतस्य प्रसङ्गस्य परिहर्तुं तदानीं सुतरामशक्यत्वात् संसर्गान्तरविशेषकवचनस्य
अधिकार्थापर्यवसायित्वात् ।
किञ्च—तदुभयस्वरूपातिरेकं तत्संसर्गस्यानन्यमानेन स्मृतित्वसंसर्गः स्मृतित्व-
धर्मिस्वरूपं चेत्येतयोः संसर्गात्मकत्वे व्यवस्थाप्यमानेऽनुभूतौ कथं तादृशस्य संसर्गस्य
निषेधः । किमनुभूतेः स्वरूपं नास्ति, उत स्मृतित्वसंसर्गस्य, ततः कस्य निषेधः ?
अर्थान्तरभूतस्य च संसर्गस्य निषेधे स्मृतावपि प्रसङ्गस्तदवस्थः, स्मृतौ
तस्यार्थान्तरभूतस्य भवताऽनभ्युपगमात्, स्वरूपमेव तयोः सम्बन्ध इति तत्र
भवतोऽभ्युपगमः ।
अथोच्यते—अनुभूतिस्मृतित्वसंसर्गयोः स्वरूपसम्भवेऽपि न परस्परसम्बद्ध-
बुद्धिजनकत्वं तयोः, तादृक्त्वञ्च यत्र तयोस्तत्र सम्बन्धात्मकत्वं स्वरूपयोरुच्यत
नहीं है । खंडन--यदि स्मृतित्व-संसर्ग का स्वभाव ( स्वरूप ) ही सम्बन्ध है, तो स्मृतित्व-
संसर्ग के संसर्गाभाव शब्द का अर्थ संसर्ग का स्वरूपाभाव ही हुआ । अर्थात् संसर्गाभाव
से अधिक नहीं हुआ । अतः संसर्ग का अन्योन्याभाव लेकर जो अतिव्याप्ति दी
गयी, वह वैसी ही बनी हुई है ।
किंच—स्मृतित्व-संसर्ग (समवाय) तथा स्मृति के संसर्ग को उभयस्वरूप से
अतिरिक्त न माननेवाले आप स्मृतित्व-संसर्ग तथा स्मृति दोनों को ही संसर्गात्मक
मानेंगे, तो फिर अनुभूति में उस संसर्ग का निषेध कैसे होगा ? क्या अनुभूति का
स्वरूप नहीं है या स्मृतित्व-संसर्ग का स्वरूप नहीं है ? जब दोनों के स्वरूप हैं, तो
किसका निषेध होगा ?
समर्थन—स्मृतित्व-संसर्ग के स्वरूपसम्बन्ध का निषेध अनुभूति में नहीं है; किन्तु
स्वरूप से अन्य सम्बन्ध का निषेध अनुभूति में है । खंडन—यदि स्वरूप से अन्य
सम्बन्ध का निषेध है, तो स्मृतित्व-संसर्ग के स्वरूप से अन्य संसर्ग स्मृति में नहीं
है, क्योंकि आप स्मृतित्व-संसर्ग के स्वरूप-रूप सम्बन्ध को ही स्मृति में मानते हैं,
स्वरूप से अन्य सम्बन्ध को नहीं मानते । अतः स्वरूप से अन्य सम्बन्ध का अभाव
स्मृति में भी हो सकता है। फलतः अनुभूति-लक्षण की स्मृति में अतिव्याप्ति हो जायगी ।
समर्थन — शुद्ध स्वरूपमात्र सम्बन्ध नहीं है, किन्तु परस्परसंसृष्टत्व-बुद्धिजनकत्वरूप-
स्वरूप ही संसर्ग है। वह स्मृतित्व-संसर्ग तथा स्मृति दोनों के स्वरूपों में है, अतः इन
दोनों का स्वरूप संसर्ग है। अनुभूति तथा स्मृतित्व-संसर्ग इन दोनों के स्वरूपों में
वह नहीं है ।

१२२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य
इति मैवम्; विशेषोपसङ्ग्राहकासिद्धौ तस्याप्यनुपपत्तेः । उपसङ्ग्राहकान्तरोक्तौ
तत्सम्बन्धेऽपि प्रसङ्गेन अपरापरोपसङ्ग्राहकगवेषणायामनवस्थापातात् ।
तावताऽपि चानुभूतिस्वरूपे कस्य निषेधो वर्णितः स्यात् ?
स्मृतित्वसंसर्गानुभूती सम्बद्धे इत्येवंरूपबुद्धिजनकत्वस्येति चेन्न । भ्रान्त्या-
त्मिकाया ईदृशबुद्धेर्जनकत्वस्य वारयितुमशक्यत्वात् ।
यथार्थाया इति चेत्, ईदृशबुद्धेर्यथार्थ्याया यदि सत्त्वमभ्युपैषि, तदाऽनुभूतौ
स्मृतित्वप्रसङ्गः । अथ नाभ्युपैषि, किं प्रति तस्या जनकत्वाभावो निरूप्यः ।
अथात्यन्तासतीमेव तादृशबुद्धिं प्रति जनकत्वाभावावधारणमनुभूतेरभ्युपैषि,
खण्डन — स्मृतियों में स्मृतित्व-संसर्ग तथा स्मृति दोनों की परस्परसंसर्गबुद्धिजनकता
तबतक नहीं रह सकती, जबतक कि जनकता का कोई अवच्छेदक न माना जाय । यदि
कहें कि स्मृतित्व ही जनकतावच्छेदक है, तो अद्यावधि वह सिद्ध ही नहीं हुआ है ।
किंच — स्मृतित्व या अन्य किसी धर्म को जनकतावच्छेदक मान लें, तो भी 'स्मृतित्व
का सम्बन्ध स्मृति में ही है, अन्यत्र नहीं' इसमें भी कोई नियामक अवश्य मानना
होगा । इस तरह नियामक में भी नियामकान्तर मानने पर अनवस्था दोष हो जायगा ।
किंच—'परस्परसम्बन्ध-बुद्धि-जनकत्व-स्वरूप ही संसर्ग है' यह कहने पर भी
अनुभूति में किस वस्तु का निषेध होगा ? अनुभूति तथा स्मृतित्व-संसर्ग के स्वरूप का
निषेध तो हो नहीं सकता, क्योंकि वह सत् है । स्वरूपरूप संसर्ग का निषेध भी नहीं
हो सकता; क्योंकि अनुभूति तथा स्मृतित्व-संसर्ग के स्वरूप में परस्परसम्बन्ध-बुद्धिजनकत्व
न होने से वह संसर्ग ही नहीं है।
समर्थन — अनुभूति में ही 'स्मृतित्व-संसर्ग तथा अनुभूति दोनों परस्पर संबद्ध हैं'
इत्याकारक बुद्धि की जनकता का निषेध होगा। खण्डन — भ्रमारूप निरुक्त बुद्धि की
जनकता का निषेध नहीं हो सकता, क्योंकि अनुभूति में उसकी सत्ता है ही ।
प्रथम तो विषय न होने से निरुक्त बुद्धि प्रमारूप ही नहीं होगी । फिर, उक्त बुद्धि
के असत् होने से उसकी जनकता भी असत् ही होगी । तब शशशृंग के तुल्य उक्त
असत् जनकत्व का निषेध हो - ही नहीं सकता । कथंचित् मान भी लें कि उक्त बुद्धि
प्रमारूप होती है, तो उक्त प्रमा के करण ( प्रमाण ) से ही अनुभूति में स्मृतित्व का
प्रसङ्ग हो जायगा ।
समर्थन — अत्यन्त असत् उक्त यथार्थबुद्धि की जनकता का निषेध ही अनुभूति में
क्यों न माना जाय, क्योंकि 'शशशृङ्गं नास्ति' या अलीकप्रतियोगिक अभाव के तुल्य

परिच्छेद ] · स्मृतिभिन्नत्व का खण्डन १२३
तदा स्मृतावपि प्रसङ्गः ; यावत्यस्तद्बुद्धयस्तत्र जायन्ते, तदधिकां तादृशबुद्धि-
मत्यन्तासतीं प्रत्यजनकत्वस्य स्मृतावपि सम्भवात् ।
सर्वामेव तादृशबुद्धिं प्रत्यजनकत्वमनुभूतेः, न तु एवं स्मृतेरिति चेन्न ।
सर्वतद्व्यक्तिप्रमित्यसम्भवात् ।
किञ्च सर्वामिति कोऽर्थः—किमसतीं सर्वाम्, उत सतीम्, अथ सतीमसती-
ञ्चेत्युभयीमपि प्रत्यजनकत्वम् ? आद्ये द्वितीये च स्मृतावपि तदजनकत्वमस्त्येव ।
न हि 'स्मृतित्वसंसर्गस्मृती सम्बद्धे' इति यावत्यः स्मृतिव्यक्तिषु बुद्धय उत्पद्यन्ते,
ताः प्रति प्रत्येकं स्मृतिव्यक्तिषु जनकत्वमस्ति । काञ्चित् सतीं प्रति च तदजनकत्वं
प्रागेव दूषितम् । तृतीये नानुभूतावपि तदजनकत्वम्, सत्यासत्यतादृशबुद्धेर्भवेन
अभावेन वा सतीमसतीं प्रत्यजनकत्वस्यासम्भवादिति ।
संभावनामात्र से अलीककार्यनिरूपित जनकता का भी निषेध हो ही सकता है । खण्डन—
तब तो स्मृति में भी अनुभूति-लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी; क्योंकि स्मृति में जितनी
स्मृतित्वसंसर्गबुद्धियाँ होती हैं, उन बुद्धियों से अधिक उक्त असत्-बुद्धि की जनकता का
निषेध उसमें भी संभावनामात्र से हो सकता है ।
समर्थन—संपूर्ण स्मृतित्व-संसर्गबुद्धियों की जनकता का अभाव लक्षण में अभिप्रेत है ।
स्मृति में वह नहीं है और अनुभूति में है, अतः कोई दोष नहीं है । खंडन—सामान्य-
लक्षणा के खण्डित होने से संपूर्ण स्मृतित्व-संसर्गबुद्धियों का ज्ञान हो ही नहीं सकता ।
किंच—'सम्पूर्ण' शब्द का क्या अर्थ है ? क्या असती ( अयथार्थ ) संपूर्ण, सती
( यथार्थ ) संपूर्ण या असती और सती उभयरूप संपूर्ण अभिप्रेत है ? तीनों ही पक्षों में स्मृति
में उक्त बुद्धि की जनकता का अभाव होने से अनुभूति-लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी;
क्योंकि जितनी स्मृतित्व-संसर्गबुद्धियाँ हैं, उन सबकी जनकता का अभाव एक-एक
स्मृति में विद्यमान ही है ।
समर्थन—हमें सब स्मृतित्व-संसर्गबुद्धियों की जनकता का निषेध प्रत्येक में अभिप्रेत
नहीं, किन्तु प्रत्येक स्मृतित्वसंसर्गबुद्धि की जनकता का निषेध प्रत्येक में अभिप्रेत है और
वह स्मृति में नहीं है । खण्डन--प्रथम पक्ष में असत् ( अयथार्थ ) उक्त बुद्धि की जनकता
का अनुभूति में वारण न होने से अनुभूति में अव्याप्ति हो जायगी । द्वितीय पक्ष में सती
प्रमा के करणरूप ( प्रमाण ) होने से अनुभूति में स्मृतित्व-प्रसंग हो जायगा । तृतीय पक्ष में
प्रत्येक निवेश करने पर भी उक्त दोनों दोष बने ही रहेंगे । कारण उक्त अयथार्थ बुद्धि का
जनकता अनुभूति में है; अतः उसका निषेध उसमें हो नहीं सकता । और, यथार्थ उक्त
बुद्धि के होने से तज्जनकत्व के होने से, तदभाव अलीक होने के कारण असम्भव हो जायगा ।

१२४. सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
स्यादेतत्—स्मृतित्वस्य अन्योन्याभावमादाय याऽतिप्रसक्तिर्दर्शिता सा
नोपपद्यते, भेदाभेदवादिमते स्मृतित्वभेदाभेदस्य स्मृत्या सहाभ्युपगमात्। ययोर्भेदा-
भेदः, तयोस्तत्रान्योन्याभावानभ्युपगमात् । मैवम् ; कथं ह्यवधार्यं स्मृतित्वस्य
भेदाभेदः स्मृत्या, नानुभूत्येति ?
अनुभूत्या सह तद्विशिष्टप्रमाया अभावादिति चेन्न । किं सत्याः किमसत्या
इत्याद्युक्तविकल्पदोषात् ।
प्रागभावप्रतियोगिन्या इति चेन्न । अनुभूतौ तादृश्याः स्वीकारेण अनुभूते-
स्तथात्वापातात् ।
समर्थन—स्मृतित्व का अन्योन्याभाव ग्रहणकर स्मृति में अनुभूति-लक्षण की
जो अतिव्याप्ति दी गयी है, वह उपपन्न नहीं हो सकती; क्योंकि धर्म का धर्मी के
साथ भेदाभेद होता है । स्मृतित्व का स्मृति में भेदाभेद है। जिसमें जिसका
भेदाभेद हो, उसका उसमें अन्योन्याभाव नहीं रहता । खंडन—स्मृतित्व का स्मृति के
साथ ही भेदाभेद है, अनुभूति से नहीं, यह बात आपने कैसे जान ली ?
समर्थन—'स्मृतित्वविशिष्टा अनुभूतिः' इत्याकारक प्रमा नहीं होती, अतः जाना
जाता है कि स्मृतित्व का भेदाभेद अनुभूति में नहीं है। खंडन—क्या आप
विद्यमान स्मृतित्ववैशिष्ट्य-प्रमा के अभाव से अनुभूति में स्मृतित्व का अभाव सिद्ध करते
हैं या अविद्यमान ? यदि कहें कि विद्यमान प्रमा के अभाव से, तो विद्यमान प्रमा के
कारणरूप प्रमाण से ही अनुभूति में स्मृतित्व सिद्ध हो जायगा। यदि कहें कि उक्तकारक
प्रमा अविद्यमान है, तो प्रतियोगी के असत् होने से उसका अभाव भी असत् होगा,
अतः बाधक का अभाव होने से ही अनुभूति में स्मृतित्व सिद्ध हो जायगा ।
समर्थन—अनुभूति में स्मृतित्ववैशिष्ट्य-प्रमा प्रागभाव की प्रतियोगिनी नहीं होती
और स्मृति में होती है । अतः उक्त अभाव से अनुभूति में स्मृतित्वाभाव का निश्चय
हो जायगा । खंडन—यदि उक्त वाक्य का यह अर्थ हो कि 'प्रागभावप्रतियोगी जो
स्मृतित्व-प्रमा उसका अभाव', तो उक्त प्रमा में प्रागभाव की प्रतियोगिता सिद्ध हुई ।
फिर 'जो प्रागभाव का प्रतियोगी होता है, वह कदाचित् अवश्य उत्पन्न होता है' इस
नियम के अनुसार उक्त प्रमा में सत्त्व होगा, जिससे उसके कारणरूप प्रमाण से ही
अनुभूति में स्मृतित्व सिद्ध हो जायगा । यदि उक्त वाक्य का यह अर्थ करें कि 'अनुभूति
में स्मृतित्व-प्रमा प्रागभाव की प्रतियोगी नहीं है', तो उक्त प्रमा में प्रागभाव-

परिच्छेद ] भेद-संसर्गाभाव का भेद-खण्डन १२५
स्मृति-स्मृतित्वयोरन्योन्याभावाभावश्च अन्योन्यात्माऽनुभूतावपि तुल्यः । न
हि स्मृतित्वान्योन्याभावोऽनुभूतिरित्युक्तमावर्तते ।
भेद-संसर्गाभावयोर्भेदखण्डनम्
अथ मा भूद्भेदाभेदमादाय परिहारः ; तथापि 'इदं तन्न भवति, इह तन्नास्ती'ति
प्रतीतिसाक्षिक एवान्योन्याभावसंसर्गाभावयोर्भेद इति चेन्न । प्रतियोगिरूपोपाध्य-
प्रतियोगित्व का ही निषेध हुआ, उक्त प्रमा का निषेध तो हुआ नहीं— अनादि उक्त
प्रमा ही सिद्ध हुई । अतः उक्त प्रमा के करणरूप प्रमाण से ही अनुभूति में स्मृतित्व
सिद्ध हो जायगा ।
किंच—जैसे स्मृति में स्मृतित्व के अन्योन्याभाव का अभाव ( अन्योन्याभाव )
है और वह अन्योन्यरूप है, वैसे ही अनुभूति में भी स्मृतित्व के अन्योन्याभाव का
अभाव ( अन्योन्याभाव ) है और वह अन्योन्यरूप है । अर्थात् अनुभूति और स्मृतित्व
उभयरूप है । फिर स्मृतित्व का भेदाभेद स्मृति के तुल्य अनुभूति में क्यों न
माना जाय ?
समर्थन—स्मृतित्व के अन्योन्याभाव का अत्यन्ताभाव स्मृति में ही है, अनुभूति में
नहीं, क्योंकि धर्म का धर्मी में अभेद होने से अन्योन्याभाव नहीं है । फिर, अन्योन्याभाव
का अत्यन्ताभाव भेदाभेद का प्रयोजक है, अतः स्मृतित्व का भेदाभेद अनुभूति में नहीं
है । खंडन—जैसे स्मृतित्वात्यन्ताभाव को अन्योन्याभाव मानकर प्रथम स्मृति में अति-
व्याप्ति हम दे आये हैं, वैसे ही अब भी स्मृति के अन्योन्याभाव के अत्यन्ताभाव को
अन्योन्याभाव मानकर अनुभूति में स्मृतित्व का आपादन ( ग्रहण ) कर सकते हैं;
क्योंकि अबतक अत्यन्ताभाव और अन्योन्याभाव में परस्पर भेद सिद्ध ही नहीं हुआ है।
भेद-संसर्गाभाव का भेद-खण्डन
समर्थन—यद्यपि उक्त युक्तियों से स्मृतित्व का भेदाभेद अनुभूति में भी हो
सकता है । अतः आप यह तो कह नहीं सकते कि 'जिसका जिसमें भेदाभेद है, उसका
उसमें अन्योन्याभाव नहीं रहता।' कारण यदि यह कहें, तो अनुभूति में भी स्मृतित्व का
भेदाभेद होने से अन्योन्याभाव का प्रतिपादन नहीं कर सकेंगे । फिर भी 'स्मृतित्व का
अन्योन्याभाव भी स्मृतित्वाभाव है और वह स्मृति में है, अतः प्रमा-लक्षण की
स्मृति में अतिव्याप्ति है' यह नहीं कह सकते; क्योंकि उस ( प्रमा-लक्षण ) में

१२६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
वैचित्र्यात्, अभावे जात्यादिभेदानभ्युपगमाच्च तयोर्भेदबुद्धिरेव प्रामाण्यमनश्नुवाना
कूटसाक्षिणीति तदनादरणात् ।
न च स्वप्रतियोगिसमानकालसमानाधिकरणोऽभावोऽन्योन्याभाव , तदन्योन्या-
भाववाँश्च तदभावः संसर्गाभावः । यथासम्भवमात्माश्रवाद्यननुभवस्वभेदाननुगम-
तत्तदवगमानभ्युपगमानाममुत्तरणीयत्वप्रसङ्गात् ।
संसर्गाभाव का निवेश है। अर्थात् संसर्गाभाव शब्द 'संसर्गस्य अभावः' इस अर्थ में
यौगिक नहीं, किन्तु 'इदमिह नास्ति' इत्याकारक प्रतीति के विषय अभाव-
विशेष में रूढ़ है। इसी तरह अन्योन्याभाव शब्द भी 'अन्योन्यस्य अभावः' इस
अर्थ में यौगिक नहीं, किन्तु 'इदमिदं न भवति' इस प्रतीति से सिद्ध अभाव-
विशेष में रूढ़ है। लक्षण में संसर्गाभाव का ही निवेश है, अतः स्मृतित्व के
अन्योन्याभाव का ग्रहणकर स्मृति में दोष नहीं है। खंडन—प्रतियोगिभेद अथवा
जाति-उपाधिरूप धर्मभेद से दोनों अभावों का भेद हो सकता है, किन्तु वह यहाँ
नहीं है। अतः विषय-भेद न होने के के कारण उक्त बुद्धि मिथ्या होने से आदरणीय
नहीं। इसलिए उक्त बुद्धि से घटित लक्षण भी असंगत ही है।
समर्थन—'स्वप्रतियोगी से समान काल तथा समान अधिकरणवाला अभाव
अन्योन्याभाव है और अन्योन्याभाव से भिन्न अभाव अत्यन्ताभाव है' इस तरह
दोनों अभावों के स्वरूपों में भेद मान लेने पर भेद-बुद्धि अप्रमा नहीं होगी। खंडन—उक्त
लक्षण के घटक अभाव पद का यदि 'भावभिन्नत्व' अर्थ करें, तो अन्योन्याभाव के लक्षण
में अन्योन्याभाव का प्रवेश होने से आत्माश्रय हो जायगा। यदि अभाव पद का
'भावत्वात्यन्ताभाववत्त्व' अर्थ करें, तो अन्योन्याश्रय हो जायगा, क्योंकि अन्योन्याभाव
से भिन्न अभाव को संसर्गाभाव कहते हैं और संसर्गाभाव-विशेष ही अत्यन्ताभाव है।
अतः अत्यन्ताभाव से अन्योन्याभाव का और अन्योन्याभाव से अत्यन्ताभाव का निरूपण
करना पड़ता है। साथ ही अन्योन्याभाव का निरूपण अत्यन्ताभाव से, अत्यन्ता-
भाव का निरूपण संसर्गाभाव से और संसर्गाभाव का निरूपण अत्यन्ताभाव से होता
है, अतः चक्रक दोष भी हो जायगा। किञ्च—इन दोषों से लक्षण नहीं बनेगा
और लक्षण न बनने से तदधीन लक्ष्यभूत अन्योन्याभाव तथा अत्यन्ताभाव का
ज्ञान भी नहीं होगा। किञ्च—आप अन्योन्याभाव का अन्योन्याभाव मानते हैं या

परिच्छेद ] भेद-संसर्गाभाव का भेद-खण्डन १२७
ननु संसर्गप्रतियोगिको निषेधः संसर्गाभावः, तादात्म्यप्रतियोगिकश्च तादात्म्या-
भाव इत्युक्त एव न मिश्रता तयोः । यो हि संसर्गतादात्म्यस्य निषेधः, स संसर्ग-
निषेध एव न भवति तादात्म्यप्रतियोगिकत्वादिति ।
मैवम्; द्रव्यगुणकर्मणां समवायिकारणेषु हि तेषां प्रध्वंसा नैवं संसर्गाभावाः
स्युः । संसर्गप्रतियोगित्वे तु संसर्गस्य समवायरूपतया समवायानित्यत्वप्रसङ्गात् ।
किञ्च—तर्हि संसर्गान्योन्याभावौ द्वावपि न घटादिप्रतियोगिकाविति घटादेः
कालादिवन्निरवधित्वापातः । संसर्गतादात्म्ययोश्च अविशेषितयोर्निषेधे सामान्यत
एव तयोरुच्छेदः स्यात् ।
नहीं ? यदि नहीं, तो अन्योन्याभावका भेद कहीं भी न होने से वह सर्वात्मक हो
जायगा । यदि मानते हैं, तो उस अन्योन्याभाव का भी अन्य अन्योन्याभाव एवं
उत्तरोत्तर अन्योन्याभावों की धारा मानने पर भेद के अननुगम तथा अननुभव का
अनुसरण करना पड़ेगा ।
समर्थन—'जिस अभाव का प्रतियोगी संसर्ग हो, वह अभाव संसर्गाभाव है तथा
जिसका प्रतियोगी तादात्म्य हो, वह अभाव अन्योन्याभाव है', ऐसा लक्षण करने पर
दोनों अभावों का ऐक्य नहीं होगा; क्योंकि संसर्ग के तादात्म्य का अभाव तादात्म्य-
प्रतियोगिक होने से संसर्गाभाव ही नहीं है । अतः स्मृतित्व-संसर्गाभाव शब्द से
अन्योन्याभाव का ग्रहण न होने से स्मृति में प्रमालक्षण की अतिव्याप्ति नहीं होगी ।
खण्डन—ऐसा लक्षण करने पर द्रव्य-गुण-कर्म के प्रध्वंसाभाव में संसर्गाभाव-
लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । क्योंकि प्रध्वंसाभाव का प्रतियोगी ससर्ग नहीं होता ।
यदि संसर्ग को ध्वंस का प्रतियोगी मान लें, तो द्रव्यादि के समवायिकारण में
संसर्ग समवायरूप है । उसका ध्वंस मानने पर वह अनित्य हो जायगा । किन्तु नैयायिक
तो समवाय को अनित्य नहीं मानते ।
किञ्च—यदि संसर्ग तथा तादात्म्य को संसर्गाभाव तथा अन्योन्याभाव
का प्रतियोगी मानें, तो वे दोनों अभाव घटादि-प्रतियोगिक नहीं होंगे अतः
घटादि का किसी भी काल या देश में निषेध न होने से काल के तुल्य घटादि
भी निरवधि अर्थात् नित्य और व्यापक हो जायेंगे । किञ्च—अविशेषित संसर्ग तथा
तादात्म्य का निषेध करने पर अर्थात् प्रतियोगिताकोटि में घटादि का निवेश न करने
पर सामान्यरूप से ही संसर्ग तथा तादात्म्य का उच्छेद हो जायगा ।

५२८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
एवं यद्यदेव प्रतियोगि वाच्यं तत्तत्स्वरूपत एव न स्यात् । तस्यापि संसर्गे
प्रति धावने च तदक्षतम्, संसर्गानवस्था, शेषोच्छेदात् पूर्वपूर्वोच्छेदो वा स्यात् ।
न प्रतियोग्यनुयोगिनोस्तथात्वं विरोधः, किन्तु सहभावाभावः, अतस्तन्मात्रं न
स्यात्, न तु तन्मात्रमेव न स्यादिति चेन्न । अनुयोगिनि प्रतियोग्यापत्तेः ।
तथा प्रमाभावात् कथं तदास्तामिति चेन्न । तथाप्रमाभावमूलकस्य विरोधस्य
सहानवस्थानस्य नियमभङ्गात्, प्रतियोग्यनुयोगिभावादन्यः कस्तयोर्विरोधः स्यात् ।
इसी तरह जो-जो वस्तुएँ अविशेषित (केवल) ही निषेध की प्रतियोगी होंगी,
वे स्वरूप से ही उच्छिन्न हो जायँगी अर्थात् अलीक हो जायँगी । समर्थन—संसर्ग
या तादात्म्य के भी संसर्ग का ही निषेध होता है, अतः स्वरूपतः उन दोनों का उच्छेद
नहीं होगा । खंडन—यदि संसर्ग के भी संसर्ग का ही निषेध करें, तो अनवस्था
हो जायगी । यदि स्वरूप का निषेध करें, तो संसर्ग के संसर्ग का स्वरूप से ही
उच्छेद हो जायगा । साथ ही उत्तर संसर्ग का उच्छेद होने से पूर्व-पूर्व का भी उच्छेद
होने के कारण फिर भी संसर्ग तथा तादात्म्यमात्र का उच्छेद हो जायगा; क्योंकि संसर्ग
का उच्छेद होने पर संसर्गी की स्थिति हो ही नहीं सकती ।
समर्थन—अविशेषित संसर्ग तथा तादात्म्य का अभाव होने पर स्वरूप से उन
दोनों का उच्छेद तब होता, जब प्रतियोगी के साथ अभाव का परस्पर निषेध्य-निषेधभावरूप
(प्रतियोगी का निषेध अभावरूप और अभाव का निषेध प्रतियोगीरूप) विरोध
होता । किन्तु यहाँ तो सह-अवस्थान का अभाव ही विरोध है । अतः प्रतियोगी और
अभाव दोनों का सह-अवस्थानमात्र न होगा, प्रतियोगी के स्वरूपतः उच्छेद का तो कोई
प्रश्न ही नहीं । खंडन—यदि सह-अवस्थान का अभाव ही विरोध हो, तो जैसे
प्रतियोगी में अभाव का वैशिष्ट्य होता है, वैसे अभाव में अभाव का वैशिष्ट्य नहीं
है, क्योंकि स्व में स्व नहीं रहता । एवञ्च अभाव में प्रतियोगी का वैशिष्ट्य भी होने लगेगा,
कारण अब तो दोनों का स्वरूपतः विरोध है ही नहीं ।
समर्थन—अभाव में प्रतियोगी के वैशिष्ट्य की प्रमा नहीं होती, अतः उसमें
प्रतियोगी के वैशिष्ट्य का आपादन हो ही नहीं सकता । खंडन—तब तो प्रतियोगी
तथा अभाव दोनों के सह-अवस्थान की प्रमा तथा आधाराधेयभाव की प्रमा भी नहीं
होती । उनमें सह-अवस्थान की प्रमा का विरह तो सह-अवस्थानरूप विरोध से
उपपादित हो सकता है । किन्तु आधाराधेयभाव की प्रमा के विरह के उपपादनार्थ
एक अन्य नियम का भी स्वीकार करना पड़ेगा । अतः 'सह-अवस्थान ही विरोध है'
यह नियम भग्न हो जायगा । वह नियम प्रतियोगी-अनुयोगिभाव (परस्पर
निषेध्य-निषेधकभाव) से अन्य नहीं हो सकता ।

तथा न प्रमीयमाणत्वमेव स इति चेन्न । अतिप्रसङ्गात् । नियमेनेति चेन्न ।
व्यक्तयोरविरोधापत्तेः ।
तथा न प्रमातुमनौपाधिकी योग्यतेति चेत् ? सैव मेयगता योग्यता अनुयोगि-
प्रतियोगित्वादन्या का समर्थिता स्यात् ।
स्वरूपमेवेति चेन्न । मिथः सम्भेदाभ्युपगन्त्राऽपि तयोः स्वरूपोपगमात् ।
समर्थन—प्रतियोगी तथा अभाव का सहभाव का तथा आधाराधेयभाव से अप्रती-
यमानत्व ही विरोध है, परस्पर निषेधरूपता विरोध नहीं है । खंडन—कदाचित् पट और
महारजन के भी सहभाव या आधाराधेयभाव से अप्रतीयमान होने पर उन दोनों
में भी विरोध हो जायगा ।
समर्थन—जिस जाति से विशिष्ट पदार्थों की प्रतीति नियमतः आधारा-
धेयभाव या सहभाव से न हो, उन्हीं दोनों का विरोध होता है। पट तथा
महारजन की प्रतीति कदाचित् आधाराधेयभाव से भी होती है। अतः उनमें विरोध नहीं
है। खंडन—तब तो नित्यत्व, अनित्यत्व आदि जिन वस्तुओं में जाति नहीं है,
उनमें भी विरोध का अभाव होने लगेगा। यदि नियम को देशगर्भ मानें, तो
विरुद्ध देश-व्यक्तियों में और यदि कालगर्भ मानें, तो अतीत, अनागत कालों
में भी विरोध न होगा। कारण देश में देश नहीं रहता और न काल में काल ही रहता
है। अथवा जात्यवच्छेदेन विरोध मानेंगे, तो दो जातियों में ही विरोध होगा,
व्यक्तियों में नहीं ।
समर्थन—सहभाव या आधाराधेयभाव से होनेवाली प्रतीति की अयोग्यता ही
विरोध है। भाव और अभाव में तो सहभाव तथा आधाराधेयभाव से प्रतीति-अयोग्यता
है, किन्तु पट और महारजन में वैसी प्रतीति-अयोग्यता नहीं है; क्योंकि महारजन
में कदाचित् आधाराधेयभाव से भी पट की प्रतीति होती है। खंडन—वह अयोग्यता
या योग्यता ज्ञात या ज्ञानगत तो होगी नहीं, किन्तु प्रमेयगत ही हो सकती है और
प्रमेय में वह परस्पर निषेध्य-निषेधात्मकता से अन्य कोई नहीं है ।
समर्थन—प्रतियोगी, अभाव इन दोनों स्वरूप का ही विरोध है, प्रतियोगी-अनु-
योगिभाव नहीं। खंडन—जो पदार्थमात्र को सत् और असत् उभयरूप मानते हैं, उनके मत
में भाव और अभाव दोनों के स्वरूप होने पर भी एकत्र समावेश होने से विरोध नहीं
है। अतः व्यभिचार होने के कारण स्वरूप विरोध नहीं हो सकता ।
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१३० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
तथाभूतं स्वरूपमिति चेन्न । तस्यैव निर्वाच्यतापत्तेः ।
कथं गोत्वाश्वत्वाभ्यां भावाभावयोरेवंविधविरोधे विशेषः स्यात् । सत्याञ्च तयोः
साहित्यप्रमायां प्रकारभेदेन व्यवस्थापना किमिति कार्या, प्रमयैवाप्रमानुपगमादिति ।
अथ घटादिविशेषितयोस्तयोर्निषेधौ तौ, सविशेषणौ च विधिनिषेधौ न
कथञ्चिद्विशेषणमनुपसङ्क्रम्य स्यातामिति ब्रूषे; तदपि न । तर्हि विशिष्टस्य
निषेधो विशेषणस्यापि भवतीति संसर्गान्योन्यनिषेधोऽपि संसर्गनिषेधः स्यादेवेति
पुनः स प्रसङ्गो वज्रलेपायते ।
अन्योन्याप्रतियोगिकः संसर्गप्रतिषेधस्तथा विवक्षितः, एवमन्योन्यनिषेधोऽपि
समर्थन--जिस रूप में भाव तथा अभाव का परस्पर सह-अवस्थान या आधाराधेय-
भाव रूप संभेद (सम्बन्ध) नहीं होता, तथाभूत स्वरूप ही विरोध है । खडन---'किं रूप
भाव-अभाव का परस्पर सम्भेद नहीं होता' इसका निर्वचन ही नहीं हो सकता ।
किञ्च--यदि सह-अनवस्थान या सह-अप्रतीयमानता ही विरोध हो, तो गोत्व-
अश्वत्व के विरोध से भाव-अभाव के विरोध में भेद ही क्या रहेगा ? तार्किक परस्पर
विरुद्ध संयोग और तदभाव का एकत्र समावेश करने के लिए मूल-शाखादि को अवच्छेदक
मानते हैं । यदि सह-अनवस्थान या सह-अप्रतीयमानता ही विरोध है, तो संयोग-तदभाव
में सह-अवस्थान और सह-प्रतीयमानता होने से विरोध ही नहीं है। फिर विरोध के
परिहारार्थ अवच्छेदक-भेद क्यों माना जाय ?
समर्थन--घटादिविशेषित संसर्ग का निषेध संसर्गाभाव है और घटादिविशेषित
तदात्म्य का निषेध तादात्म्याभाव है । विशिष्ट का निषेध विशेषण के निषेध के
बिना हो नहीं सकता, अतः विशिष्ट का निषेध ही विशेषण का भी निषेध है ।
तथा च, घटादिविशिष्ट संसर्ग या तादात्म्य के निषेध से विशिष्ट संसर्ग या तादात्म्य
का ही उच्छेद होगा, सामान्यतः संसर्ग या तादात्म्य का उच्छेद नहीं होगा ।
खंडन--यदि विशिष्ट का निषेध विशेषण का भी निषेध है, तो संसर्ग के अन्योन्य
का निषेध (अन्योन्याभाव) संसर्ग का भी निषेध हो जायगा । एवञ्च स्मृतित्वसंसर्ग के
अन्योन्याभाव का ग्रहणकर स्मृति में प्रमालक्षण की जो अतिव्याप्ति दी गयी है, वह
वज्रलेप के तुल्य, अपरिहार्य हो जायगी । कारण इस तरह तो स्मृतित्वसंसर्गान्योन्याभाव
भी स्मृतित्वसंसर्गाभाव ही है ।
समर्थन-अन्योन्य है प्रतियोगी जिसका, उससे भिन्न संसर्ग-निषेध ही संसर्गाभाव
है और संसर्ग है प्रतियोगी जिसका, उससे भिन्न अन्योन्य-निषेध ही अन्योन्याभाव