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सर्वकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 134, कुल 610 में से

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पृष्ठ 134

परिच्छेद ] स्मृतिभिन्नत्वका खण्डन ११८
प्रत्यासत्त्या व्याप्तिग्रहणकाल इव व्याप्यव्यापकव्यक्तय इति दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकयो-
र्दोषग्रस्तत्वात् । तथा सति ह्येकं प्रमेयं प्रत्यक्षतः प्रमेयत्वसामान्यप्रत्यासत्त्या
विश्वमेव प्रत्यक्षं स्यात् । एवमभ्युपगच्छतश्च श्रद्दधीमहि ते सार्वज्ञ्यमिदम्, यदि
जानासि किमस्मच्चेतसि विपरिवर्तत इति ।
नापि तृतीयः; स्मृतित्वरहितत्वं हि स्मृतित्वाभाववत्त्वं वा स्यात्, स्मृतित्व-
प्रतियोगिकमाश्रयस्य स्वरूपं वा, तज्ज्ञानं वा ?
न तावदाद्यः । तथा हि—स्मृतित्वान्योन्याभावोऽपि स्मृतित्वाभावो भवत्येव।
तद्वत्त्वञ्च स्मृतिष्वप्यस्ति । [ न हि स्मृतित्वमेव स्मृतिः । ] ततश्च स्मृतेरपि प्रमात्वा-
पातः । तदव्यवच्छेदाद्विशेषणवैयर्थ्यञ्च, विना विशेष्यमिच्छादावतिप्रसङ्गात् ।
ग्रहकाल में सामान्यलक्षणा के बल से सकल व्याप्य-व्यापक व्यक्तियों का ज्ञान हो जाता
है । खण्डन—दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिक दोनों स्थलों में सम्पूर्ण व्यक्तियों का ज्ञान
सामान्य-लक्षणा से हो नहीं सकता, क्योंकि सामान्यलक्षणा में दोष होने से वह
प्रत्यासत्ति ही नहीं है । अन्यथा यदि सामान्यलक्षणा को प्रत्यासत्ति मानें, तो एक प्रमेय
के प्रत्यक्षकाल में प्रमेयत्व रूप से सकल प्रमेयों का प्रत्यक्ष होने लगेगा ।
समर्थन—प्रमेयत्व रूप से सकल प्रमेयों का प्रत्यक्ष होता हैं, ऐसा ही क्यों न मान
लिया जाय ? खण्डन—ऐसा मानने पर तो सभी मनुष्य सर्वज्ञ हो जायेंगे । यदि आप
कहें कि सब मनुष्य सर्वज्ञ हो ही जाते हैं, तो आपके इस वाक्य को हम तभी मान
सकते हैं, जब आप यह जान लें कि इस समय हमारे चित्त में क्या है ।
यदि कहें कि स्मृतित्वरहितत्व ही स्मृति से अन्यत्व है, तो यह तीसरा पक्ष
भी उचित नहीं; क्योंकि स्मृतित्व-रहितत्व क्या वस्तु है—क्या स्मृतित्व का अभाव
है, स्मृतित्वप्रतियोगिक अधिकरणस्वरूप है ( स्मृतित्व है प्रतियोगी जिसका ऐसा जो
अधिकरण, उसका स्वरूप है ) या स्मृतित्वप्रतियोगिक अधिकरण का ज्ञान है ?
इनमें 'स्मृतित्व का अभाव स्मृतित्वरहितत्व है' यह प्रथम पक्ष उचित नहीं है;
क्योंकि स्मृतित्व का अन्योन्याभाव भी स्मृतित्वाभाव ही है और वह स्मृति में भी है।
फलतः स्मृति भी अनुभूति हो जायगी । अतः अनुभूति पद से स्मृति का व्यवच्छेद
न होने से वह व्यर्थ ही हो जायगा। यदि अनुभूति पद का निवेश न करें, तो इच्छादि
में अतिव्याप्ति हो जायगी।