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सर्वकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 139, कुल 610 में से

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पृष्ठ 139

१२२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य
इति मैवम्; विशेषोपसङ्ग्राहकासिद्धौ तस्याप्यनुपपत्तेः । उपसङ्ग्राहकान्तरोक्तौ
तत्सम्बन्धेऽपि प्रसङ्गेन अपरापरोपसङ्ग्राहकगवेषणायामनवस्थापातात् ।
तावताऽपि चानुभूतिस्वरूपे कस्य निषेधो वर्णितः स्यात् ?
स्मृतित्वसंसर्गानुभूती सम्बद्धे इत्येवंरूपबुद्धिजनकत्वस्येति चेन्न । भ्रान्त्या-
त्मिकाया ईदृशबुद्धेर्जनकत्वस्य वारयितुमशक्यत्वात् ।
यथार्थाया इति चेत्, ईदृशबुद्धेर्यथार्थ्याया यदि सत्त्वमभ्युपैषि, तदाऽनुभूतौ
स्मृतित्वप्रसङ्गः । अथ नाभ्युपैषि, किं प्रति तस्या जनकत्वाभावो निरूप्यः ।
अथात्यन्तासतीमेव तादृशबुद्धिं प्रति जनकत्वाभावावधारणमनुभूतेरभ्युपैषि,
खण्डन — स्मृतियों में स्मृतित्व-संसर्ग तथा स्मृति दोनों की परस्परसंसर्गबुद्धिजनकता
तबतक नहीं रह सकती, जबतक कि जनकता का कोई अवच्छेदक न माना जाय । यदि
कहें कि स्मृतित्व ही जनकतावच्छेदक है, तो अद्यावधि वह सिद्ध ही नहीं हुआ है ।
किंच — स्मृतित्व या अन्य किसी धर्म को जनकतावच्छेदक मान लें, तो भी 'स्मृतित्व
का सम्बन्ध स्मृति में ही है, अन्यत्र नहीं' इसमें भी कोई नियामक अवश्य मानना
होगा । इस तरह नियामक में भी नियामकान्तर मानने पर अनवस्था दोष हो जायगा ।
किंच—'परस्परसम्बन्ध-बुद्धि-जनकत्व-स्वरूप ही संसर्ग है' यह कहने पर भी
अनुभूति में किस वस्तु का निषेध होगा ? अनुभूति तथा स्मृतित्व-संसर्ग के स्वरूप का
निषेध तो हो नहीं सकता, क्योंकि वह सत् है । स्वरूपरूप संसर्ग का निषेध भी नहीं
हो सकता; क्योंकि अनुभूति तथा स्मृतित्व-संसर्ग के स्वरूप में परस्परसम्बन्ध-बुद्धिजनकत्व
न होने से वह संसर्ग ही नहीं है।
समर्थन — अनुभूति में ही 'स्मृतित्व-संसर्ग तथा अनुभूति दोनों परस्पर संबद्ध हैं'
इत्याकारक बुद्धि की जनकता का निषेध होगा। खण्डन — भ्रमारूप निरुक्त बुद्धि की
जनकता का निषेध नहीं हो सकता, क्योंकि अनुभूति में उसकी सत्ता है ही ।
प्रथम तो विषय न होने से निरुक्त बुद्धि प्रमारूप ही नहीं होगी । फिर, उक्त बुद्धि
के असत् होने से उसकी जनकता भी असत् ही होगी । तब शशशृंग के तुल्य उक्त
असत् जनकत्व का निषेध हो - ही नहीं सकता । कथंचित् मान भी लें कि उक्त बुद्धि
प्रमारूप होती है, तो उक्त प्रमा के करण ( प्रमाण ) से ही अनुभूति में स्मृतित्व का
प्रसङ्ग हो जायगा ।
समर्थन — अत्यन्त असत् उक्त यथार्थबुद्धि की जनकता का निषेध ही अनुभूति में
क्यों न माना जाय, क्योंकि 'शशशृङ्गं नास्ति' या अलीकप्रतियोगिक अभाव के तुल्य