खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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जितेन्द्रिय बने रहे। उनका विश्वास था कि ज्ञान से निर्मल-चित्त पुरुष को विषयैकतानता
कभी आसक्त नहीं कर सकती। वे सिद्ध समाधियोगी थे। फिर भी उनका योगशुद्ध
हृदय पिशुनता को कभी सहन नहीं कर सकता था। मुनिवृत्ति उन्हें प्रिय थी और
अयाचित व्रत को वे सर्वोपरि मानते थे। फिर भी उन्होंने अनेक स्थलों पर दान की
महत्ता और आवश्यकता मानी है। कृतज्ञता और उपकारी के प्रति प्रत्युपकार पर उनका
विशेष आग्रह रहा। भगवद्भक्ति, धर्मनिष्ठा और आस्तिकता तो उनमें पदे-पदे दीखती
है। फिर भी आपद्धर्म के लिए ('निषिद्धमप्याचरणीयमापदि') भी कह के उन्होंने
अवसर का निर्वाह भी अच्छी तरह किया है। वे बौद्धमत के खण्डनकर्ता होते हुए भी
उस मत के प्रति पूरी उदारता रखते थे। स्वयं ऋजुमार्ग के समर्थक होते हुए भी कुटिल
व्यक्ति से सरलता बरतना उन्हें कभी पसन्द न था। चाटुकार तो वे थे ही नहीं। निर्भी-
कता उनकी रग-रग में भरी थी। फिर भी जनापवाद से उन्हें भय था (नैषध ३।५१),
जब कि वे उसकी विशेष परवाह नहीं करते थे। कुल मिलाकर वे सर्वाङ्गपूर्ण व्याव-
हारिक और त्रिगुणातीत पारमार्थिक दोनों कूलों को जोड़नेवाले अद्वितीय सेतु कहे
जा सकते हैं।
इतने महान् प्रतिभाशाली सर्वतन्त्र-स्वतन्त्र श्रीहर्ष ने अनेक ग्रन्थ और अनेक
काव्य लिखे होंगे। किन्तु नैषध और खण्डन के अनुसार¹ अबतक उनके १० ग्रन्थों का
पता चलता है, जिनमें आज केवल दो ही उपलब्ध हो रहे हैं। उनके
ग्रन्थ-रचना नाम निम्नलिखित हैं :
१. अर्णव-वर्णन : इसमें नामानुसार समुद्र का वर्णन बताया जाता है।
२. शिवशक्ति-सिद्धि : इसे कोई शिव नामक राजा की वीरता के वर्णनपरक बताते हैं तो
कोई गौरी-गिरीश के माहात्म्य-वर्णनपरक मानते हैं। ३. साहसाङ्कचम्पू : इसमें 'साहसाङ्क'
उपाधिधारी राजा का चरित्र वर्णित होगा, यह तो स्पष्ट ही है। किन्तु यह 'साहसाङ्क' कौन
है, यही प्रश्न है। विक्रम को यह उपाधि प्राप्त थी, अतः इसे विक्रम-चरित्र-वर्णन भी
कहा जा सकता है। किन्तु नैषध में 'नवसाहसाङ्कचरिते चम्पूकृतः' इस प्रकार ग्रन्थ-
कार द्वारा उल्लेख होने से और उसके टीकाकार नारायण के इस विवरण में कि 'नवो यः
साहसाङ्कोपनाम राजेत्यादि' नवत्व विशेषण का स्वारस्य देखते हुए इसे 'अभिनवसाहसाङ्क'
कान्यकुब्जेश्वर का ही वर्णन मानना ठीक दीखता है। ४. छन्दःप्रशस्ति : नाम से तो
मालूम पड़ता है कि यह छन्दोग्रन्थ है, किन्तु कुछ लोग इसे छन्द नामक राजा की
प्रशस्ति भी मानते हैं। ५. विजय-प्रशस्ति : यह तो प्रायः निर्विवाद है कि इस ग्रन्थ में
कान्यकुब्जाधीश्वर गोविन्दचन्द्र के पुत्र और जयचन्द्र के पिता विजयचन्द्र की प्रशस्ति
का वर्णन है। श्रीहर्ष को बंगाली बतानेवाले इस 'विजय' को विजयसेन नामक बंग-
१. खण्डन और नैषध तो उपलब्ध ही हैं। 'ईश्वराभिसन्धि' का उल्लेख खण्डन में है।
क्रमशः शेष ग्रन्थों का उल्लेख नैषध के निम्नलिखित स्थलों में है : ६।१६०; १८।१५४;
२२।१५१; १७।१२२; ५।१३८; ५।१३८; ७।११० और ४।१२३ ।
नरेश बताते हैं; पर श्रीहर्ष बंगाली नहीं, यह पीछे सिद्ध किया ही जा चुका है। ६.गौडो-
र्वीश-कुलप्रशस्ति : रघुवंश आदि की तरह इसमें भी गौडदेशीय राजवंश का वर्णन है।
७. ईश्वराभिसन्धि : यह ईश्वर की सत्ता का साधन करनेवाला ग्रन्थ होगा। फलतः अनी-
श्वरमतवादी बौद्धों के खण्डनार्थ यह बनाया गया होगा। जहाँ अन्य भी 'अभिसन्धियों'
के नाम दीख पड़ते हैं, वे कोई स्वतन्त्र ग्रन्थ नहीं, प्रत्युत इसी ईश्वराभिसन्धि के प्रकरण
हैं। ८. स्थैर्य-विचारण प्रकरण : यह बौद्धाभिमत क्षणिकत्व सिद्धान्त को खण्डन कर-
वाला ग्रन्थ दीखता है। ६. नैषधीय-चरित : यह आज उपलब्ध है। इसमें नल-दमयन्ती
की कथा वर्णित है और संस्कृत के पाँच महाकाव्यों में यह मुकुटमणि माना जाता है।
१०. खण्डन-खण्ड-खाद्य : यह तो प्रस्तुत ग्रन्थ ही है।
अब प्रश्न उठता है कि इन ग्रन्थों की रचना में पौर्वापर्य का क्रम क्या है ? शेष
आठ ग्रन्थों के अनुपलब्ध होने से इस सम्बन्ध में कुछ निश्चित नहीं कहा जा सकता। फिर
भी स्वर्गीय महामहोपाध्याय श्रीराममिश्र शास्त्री मानते हैं कि 'खण्डन-खण्ड-खाद्य'
'ईश्वराभिसन्धि' के पूर्व और शेष ग्रन्थ उसके बाद रचे गये। किन्तु खण्डन में ही
'शेषञ्च ईश्वराभिसन्धौ स्वप्रकाशवादे निर्वक्ष्यामः' और 'अवोचाम च जल्पे' (श्रीशंकर
मिश्र के अनुसार इस वाक्य में 'ईश्वराभिसन्धौ' यह अध्याहृत है) इस प्रकार वर्तमान
और अतीत दोनों कालों का 'ईश्वराभिसन्धि' के लिए खण्डन में प्रयोग मिलता है।
अतः खण्डन के भाषानुवादकार स्वर्गीय श्रीचण्डीप्रसाद सुकुलजी दोनों का समकालिक
निर्माण मानते हैं। स्वर्गीय महामहोपाध्याय श्रीभागवताचार्य लिखते हैं कि "नैषध में
'खण्डन-खण्डतोऽपि सहजात्' (षष्ठसर्गान्त) और खण्डन में 'तथाऽहमकथयं नैषध-
चरितस्य परमपुरुषस्तुतौ सर्गे' इस प्रकार दोनों का एक दूसरे में उल्लेख होने से
दोनों ग्रन्थ एक ही समय में रचे गये हों, ऐसा हमें लगता है। हमारे मित्र और खण्डन-
रूप रत्नाकर के मन्दराचल स्वर्गीय श्रीमोहनलाल उदासीन कहते हैं कि वैदुष्य की परम
परिपाकावस्था में ही खण्डन की रचना माननी चाहिए।¹
हमें यही अन्तिम मत युक्तिसंगत प्रतीत होता है। इस दृष्टि से आरंभ में 'ईश्वरा'-
भिसन्धि' को छोड़ शेष सात ग्रन्थ, फिर 'नैषध' और सबसे अन्त में 'खण्डन-खण्डखाद्य'
और 'ईश्वराभिसन्धि' का रचना-क्रम मानना अनुचित न होगा। विद्वत्ता के साथ
अवस्था के परिपाक से भी अद्वैत-भावना का चरम उत्कर्ष करनेवाले खण्डन जैसे ग्रन्थ
का ही मेल बैठता है।
खण्डन-खण्ड-खाद्य
बहिरङ्ग-परीक्षण के बाद अब प्रस्तुत ग्रन्थ का संक्षिप्त अन्तरङ्ग-परीक्षण भी कर
लेना उचित होगा। इस ग्रन्थ का 'खण्डन-खण्ड-खाद्य' नाम तो प्रसिद्ध है ही, 'अनिर्वचनी-
१. श्रीभागवताचार्य : खण्डन-भूमिका । २. वही ।
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उन्होंने किया है। इस प्रकार विज्ञानवाद लेकर और पदार्थों को अनिर्वचनीय बनाकर
जहाँ वे नैयायिकों का खण्डन कर देते हैं, वहाँ बाद में बौद्ध विज्ञानवाद का भी खण्डन
कर अपना अद्वैत सद्वाद प्रतिष्ठित करते हैं।
वे कहते हैं कि मिथ्याभूत जगत् का आश्रय सत् मानना ही पड़ेगा। सत् के
बिना मिथ्यात्व की उपपत्ति ही नहीं हो सकती। किन्तु उस मिथ्या का आश्रय ज्ञान
सर्वथा निरपेक्ष है। ज्ञान से भिन्न उसका आश्रय कोई पदार्थ नहीं है। नैयायिकी उन्हें
ज्ञान और विषय के सहभाव की जो अनुपपत्ति देते हैं, उस विषय में खण्डनकार कहते
हैं कि ज्ञान और विषय का सहभाव नियत ही नहीं है, कारण अतीत के ज्ञान में व्यभिचार
हो जाता है। वे ज्ञान और विषय का तादात्म्य भी नहीं मानते। कारण विषय नानारूप
होते हैं, जब कि ज्ञान का प्रकाश एकरूप होता है। फिर प्रकाश आन्तर वस्तु है, जब कि
विषय बाह्य। इस तरह ज्ञान और विषय का तादात्म्य कथमपि नहीं माना जा सकता।
फलतः यही कहना होगा कि सद्रूप ज्ञान में ही सारे पदार्थ कल्पित या मिथ्या हैं। उनका
सद्रूप, असद्रूप या सदसद्रूप से निर्वचन न हो सकने से वे अनिर्वचनीय हैं। 'अनिर्वचनी-
यतासर्वस्व' या खण्डन के निर्माण में श्रीहर्ष यही अभिप्राय रखते और सिद्ध करते हैं।
खण्डनकार ने इस ग्रन्थ में व्यावहारिक जगत् को अत्यन्त सत्य माननेवाले नैया-
यिकों के १६ पदार्थों या ७ पदार्थों (न्याय-वैशेषिक भेद से) का खण्डन किया है। सात
पदार्थों का प्रसङ्गानुसार यत्र-तत्र खण्डन हुआ है। मुख्यतः गौतम के प्रमाण, प्रमेय आदि
१६ पदार्थों का ही खण्डन है। आरंभ में ही उन्होंने प्रमाणादि-स्वीकार को कथा (वाद)
का अंग मानने की बात का खण्डनकर 'लक्षण-प्रमाणाभ्यां वस्तुसिद्धिः' उनके इस
सिद्धान्त पर पहला और जोरदार प्रहार किया है। फिर लक्षणों की बात आगे कर बताया
कि आप जितने सारे पदार्थ मानते हैं, उनके कोई निर्दुष्ट लक्षण ही नहीं बन पाते।
स्वयं प्रमाण और उनके अवान्तर भेदों का तथा लक्षण का ही जब लक्षण नहीं बन
पाता, तो औरों की बात ही क्या ?
खण्डनोक्त विषयों के वर्गीकरण पर ध्यान देने से यह बात स्पष्ट हो जाती है।
ग्रन्थ की भूमिका में श्रीहर्ष ने सर्वप्रथम प्रमाणादि-स्वीकार के शास्त्रार्थहेतुकत्व का खण्डन
किया है, यह हम ऊपर कह ही आये हैं। उसके बाद उन्होंने संक्षेप
खण्डन के प्रतिपाद्य विषय में शून्यवाद और अद्वैत (स्वप्रकाश) वाद का प्रतिपादन कर
दोनों में परस्पर भेद दिखलाया है। पश्चात् अद्वैत का साधन
और भेद का खण्डन किया गया है। इसी प्रसंग में ग्रन्थ-निर्माण का प्रयोजन तत्त्व-
निर्णय और विजय बतलाते हुए वाद, जल्प और वितण्डा—शास्त्रार्थके तीनों प्रकारों
तथा शून्यवाद, अद्वैतवाद या भेदवाद सभीमें खण्डनोक्त युक्तियों का एक-सा उपयोग है,
यह बतलाया। इस तरह ग्रन्थ की भूमिका समाप्त कर ग्रन्थ का मुख्य प्रतिपाद्य विषय
शुरू होता है। फिर प्रथम परिच्छेद में—लक्षणसामान्य का और क्रमशः प्रमा,
प्रमाण एवं उसके प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, अर्थापत्ति और अनुपलब्धिरूप
छः प्रकारों के लक्षणों का खण्डन किया गया। फिर असिद्ध, विरुद्ध, सव्यभिचार,
सत्प्रतिपक्ष और बाध इन पाँच हेत्वाभासों के लक्षणों का खण्डन किया गया है।
द्वितीय परिच्छेद में—प्रतिज्ञाहानि, प्रतिज्ञान्तर, प्रतिज्ञाविरोध, प्रतिबन्दी और
अपसिद्धान्त इन पाँच निग्रहस्थानों का खण्डन किया गया है। तृतीय परिच्छेद में—
केवल किंशब्दार्थ के निर्वचन का खण्डन किया गया है। चतुर्थ परिच्छेद में—भाव,
अभाव, विशिष्ट, द्रव्य, गुण, कर्म, विशेष, जाति (सामान्य), आधार, विषय-विषयी-
भाव, भेद, कारणत्व, वर्तमानादि काल, प्रागभाव, ध्वंसाभाव, संशय, भावाभाव-विरोध
और तर्क का खण्डन किया गया है। इस प्रकार कतिपय प्रमुख पदार्थों का खण्डन करने
के बाद ग्रन्थकार ने यह भी बता दिया कि जिन लक्षणों का विस्तार-भय से यहाँ खण्डन
नहीं किया गया है, उनका भी इन्हीं युक्तियों से खण्डन कर लिया जाय।
ग्रन्थकार ने खण्डन में व्यवहृत अपनी खण्डन-युक्तियों का मार्मिक वर्गीकरण भी
कर दिया है। वे कहते हैं :
'तत्तुल्योहस्तदीयं च योजनं विषयान्तरे ।
शृङ्खला तस्य शेषे न्व त्रिधा भ्रमति मत्क्रिया ॥'
अर्थात् किसीसे वाद करने का प्रसंग उपस्थित होने पर हमारे द्वारा इस ग्रन्थ में
बतायी गयी युक्तियों के समान युक्तियों की कल्पना कर वादी पर विजय पायें। अथवा
उन्हीं युक्तियों की योजना करें। यदि दैववश युक्तियों का स्फुरण न हो, तो घटक अन्य
पदार्थों के निर्वचन का प्रश्न कर वादी को परास्त करें। वादि-विजय का श्रीहर्ष का यह
शास्त्र अपने ढंग का अद्वितीय है। परवर्ती श्रीचित्सुखाचार्य, श्रीब्रह्मानन्द सरस्वती आदि ने
इन युक्तियों का उपयोग कर इसकी कार्यकारिता का प्रमाण उपस्थित कर दिया है।
इस प्रकार के वेदान्त-दर्शन के मूर्धन्य इस वादप्रधान दार्शनिक ग्रन्थ का राष्ट्र-
भाषा हिन्दी में अनुवाद सचमुच बड़ी टेढ़ीखीर है। कारण एक तो इसके कितने
ही स्थल ऐसे हैं, जिनकी ग्रन्थियाँ बड़े-बड़े शब्दज्ञानियों से भी नहीं
[आत्म-निवेदन] खुल पातीं। ग्रन्थकार स्वयं ही कहते हैं 'ग्रन्थग्रन्थिरिह क्वचित् क्वचिदपि
न्यासि प्रयत्नान्मया।' अर्थात् मैंने जान-बूझकर बड़े परिश्रम से इसमें
ऐसी ग्रन्थियाँ बाँध दी हैं, जिन्हें प्राज्ञम्मन्य आसानी से न खोल पायें। दूसरे, इन
शास्त्रार्थ-विचारों के अनुरूप शैली और शब्द संस्कृत में ही और उसमें भी तथोक्त
परिष्कृत, दार्शनिक भाषा में ही सुलभ हो सकते हैं। साधारण संस्कृत में
उन्हें रखा जाय, तो भी वे उतने परिष्कृत रूप में नहीं रह सकते । फिर प्राकृत
भाषाओं की बात ही क्या ? फिर भी स्वर्गीय पूज्य श्रीचण्डीप्रसाद सुकुलजी ने आज से
करीब ५० वर्ष पूर्व' राष्ट्रभाषा हिन्दी में इसे लाने का जो अपूर्व सत्साहस किया, तदर्थ
हिन्दी-जगत् उनका सदैव ऋणी रहेगा।
कहना होगा कि वे बहुत कुछ इसमें कृतकार्य हुए। फिर भी जैसा कि ऊपर
कहा गया है, हिन्दी में इसे लाना मूलतः स्वभाव से दुःशक है, अतः कुछ परिष्कार की
*१. इसका प्रथम संस्करण संवत् १६८५ में छपा, पर अनुवादक के कथनानुसार अनुवाद
इससे १४ वर्ष पूर्व ही हो चुका था।
( १८ )
आवश्यकता सदैव बनी ही रहेगी। हमारे अध्यक्ष आदरणीय श्री श्रीकृष्ण पन्त जी ने इस
द्वितीय संस्करण में मुझे इस सेवा का आदेश दिया, यह मैं उनकी महती कृपा मानता
हूँ। किन्तु एक तो मेरा सीमित ज्ञान और दूसरे समय के अत्यधिक संकोच से जितना
परिष्कार होना चाहिए, उतना मैं नहीं कर पाया। फिर भी इसका ध्यान रखने का प्रयत्न
अवश्य किया है कि परिष्कार के मोह में अपदार्थ न बन जाय। कहीं-कहीं आवश्यक
टिप्पणियाँ भी बढ़ा दी गयी हैं। अन्त में परिशिष्ट में खण्डन में ग्रन्थकार द्वारा प्रणीत
अकारानुक्रमसहित कारिकाएँ और ग्रन्थ में उद्धृत विभिन्न ग्रन्थों के वचनों का स्थल-
निर्देश भी जोड़ दिया गया है। तथापि जो भी इसमें ज्ञात-अज्ञात भूलें हुई हों,
ग्रन्थमर्मज्ञ विद्वान् उनको मेरी मान सुधार के सुझाव देने की कृपा करेंगे, तो उनका
स्वागत है। प्रस्तुत खण्डन-विमर्श में जिन-जिन पुस्तकों से हमें मदद मिली है, उन सबके
प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए गुणैकपक्षपाती विद्वानों से इसे अपनाने का हम अनुरोध
करते हैं।
अच्युत-ग्रन्थमाला,
ललिताघाट, वाराणसी } —गोविन्द नरहरि वैजापुरकर
वर्षप्रतिपद्, २०१८ वि०
विषयानुक्रमणिका
१. मङ्गलाचरण ... ... १
२. प्रयोजन-कथन ... ... २
प्रथम परिच्छेद
३. प्रमाणादि-स्वीकार का कथाङ्गत्त्व-खण्डन ... ... ,,
४. शून्यवाद-विचार ... ... १४
५. स्वप्रकाश-विज्ञानवाद-विचार ... ... २८
६. शून्यवाद और स्वप्रकाश-विज्ञानवाद का भेद ... ... ४२
७. अद्वैत में प्रमाण-विचार ... ... ४७
८. भेद-खण्डन ... ... ६५
६. (खण्डन के) प्रयोजन का प्रतिपादन ... ... ८२
१०. (लक्षण-) सामान्य के खण्डन की युक्तियाँ ... .... ८६
११. प्रमालक्षण-खण्डन में तत्त्वपदार्थ का खण्डन ... ... ८७
१२. ,, अनुभूतित्व-जाति का खण्डन ... ... ६१
१३. ,, स्मृतिभिन्नत्व का खण्डन ... ... ११७
१४. भेद-संसर्गाभाव के भेद का खण्डन ... ... १२५
१५. स्मृति-लक्षण का खण्डन ... ... १४१
१६ अनुभवत्व-विशेष का खण्डन ... ... १४४
१७. तत्त्वानुभवत्व-का खण्डन ... ... ,,
१८. याथार्थ्य का खण्डन ... ... १४८
१६. सम्यक्त्व का खण्डन ... ... १५४
२०. अव्यभिचारित्व का खण्डन ... ... १६०
२१ अविसंवादित्व का खण्डन ... ... १६१
२२. अबाधितत्वादि का खण्डन ... ... १६६
२३. प्रमालक्षण का सामान्य-खण्डन ... ... १६७
२३. प्रमाण के सामान्य-लक्षण का खण्डन ... ... १६६
२४. (प्रमाण-लक्षण के खण्डन में) प्रथम
करणत्व-लक्षण का खण्डन ... ... ,,
२५. ,, द्वितीय करणत्व-लक्षण का खण्डन ... ... १७३
२६. ,, व्यापार-लक्षण का खण्डन ... ... १८३
२७.,, तृतीय करणत्व-लक्षण का खण्डन ... ... १८१
२८. ,, चतुर्थ चरमव्यापारवत्त्व-लक्षण का खण्डन ... ... १६३
२६. प्रथम प्रत्यक्ष-लक्षण (इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानम्) का खण्डन ... ... १६८
( २० )
३०. द्वितीय प्रत्यक्ष-लक्षण भासमानाकारेन्द्रियसंयोगजम् ) का खण्डन ... २०४
३१. तृतीय प्रत्यक्ष-लक्षण (साक्षात्कारित्वम् ) का खण्डन ... २२०
३२. चतुर्थ प्रत्यक्ष-लक्षण ( इन्द्रियकरणकानुभूतित्वम् ) का खण्डन ... २२२
३३. पञ्चम प्रत्यक्ष-लक्षण (ज्ञानाजन्यज्ञानत्वम् ) का खण्डन ... २२७
३४. षष्ठ प्रत्यक्ष-लक्षण ( षोढासन्निकर्षेतरप्रयुक्तविषयनियमं ज्ञानम् ) का खण्डन ... २३०
३५. सप्तम प्रत्यक्ष-लक्षण ( स्वरूपधीः ) का खण्डन .... ... २३
३६. अष्टम प्रत्यक्ष-लक्षण ( ज्ञानस्य जातिभेदः कश्चित् साक्षात्त्वम् ) का खण्डन ... २३४
३७. नवम प्रत्यक्ष-लक्षण (शब्दानुमानोपमानजप्रमितिव्यतिरिक्तत्वे सति प्रमितित्वम् )
का खण्डन ... २४०
३८. अनुमान-खण्डन में अनुमिति-परामर्श का खण्डन .. ... २४८
३६. ,, व्याप्ति और व्याप्तिग्रहोपाय का खण्डन ... ... २५४
४०. ,, उपाधि-लक्षण का खण्डन ... ... २७३
४१. ,, पक्षता-लक्षण का खण्डन ... ... २८.
४२. उपमान-लक्षण का खण्डन ... ... २८७
४३. शब्द-लक्षण का खण्डन .... २६७
४४. अर्थापत्ति-लक्षण का खण्डन् ... ... ३०४
४५. अनुपलब्धि-लक्षण का खण्डन ... ३०६
४६. हेत्वाभास-खण्डन में असिद्ध-लक्षण का खण्डन ... ... ३१५
४७. ,, विरुद्ध-लक्षण का खण्डन ... ... ३२६
४८. ,, सव्यभिचार-लक्षण का खण्डन ... ... ३३३
४६. ,, सत्प्रतिपक्ष-लक्षण का खण्डन ... ... ३४७
५०. ,, बाध-लक्षण का खण्डन ... ... ३६६
द्वितीय परिच्छेद
५१. प्रतिज्ञाहानि-लक्षण का खण्डन् ... ... ३७६
५२. प्र तज्ञान्तर-लक्षण का खण्डन .. ... ३८२
५३. प्रतिज्ञा-विरोध लक्षण का खण्डन् ... ... ३८६
५४. प्रतिबन्दी-लक्षण का खण्डन ... ... ३६०
५५. अपसिद्धान्त-लक्षण का खण्डन ... ... ३६७
तृतीय परिच्छेद
५६. सर्वनामार्थ का खण्डन् ... .. ४१३
चतुर्थ परिच्छेद
५७. भावत्व लक्षण का खण्डन् ... ... ४२१
५८. अभावत्व-लक्षण का खण्डन ... ... ४२६
५६. विशिष्ट-लक्षण का खण्डन ... ... ४२६
६०. द्रव्य-लक्षण का खण्डन् ... ... ४३१
( २१ )
६१. सामान्य-लक्षण का खण्डन ... ... ४४०
६२. सम्बन्ध-लक्षण का खंडन ... ... ४४५
६३. आधार-लक्षण का खण्डन ... ... ४५०
६४. विषय-विषयिभाव-लक्षण का खण्डन ... ४५८
६५. भेद-लक्षण का खण्डन ... ... ४७२
६६. कारणत्व-लक्षण का खण्डन ... ... ५०२
६७. वर्त्तमानत्वादि-लक्षणों का खण्डन ... ... ५१६
६८. संशय-लक्षण का खण्डन ... ... ५२७
६६. भावाभाव-विरोध का खण्डन ... ... ५३५
७०. तर्क-सामान्य-लक्षण का खण्डन ... ... ५४३
७१. तर्क-विशेष-लक्षणों का खण्डन ... ... ५५५
७२. अप्रसङ्गात्मक तर्क का निरूपण ... ... ५६६
७३. तर्काभास का खण्डन ... ... ५७६
७४. सर्व-खण्डन-प्रकार का उपदेश ... ... ५७८
७५. उपसंहार ... ... ५८०
खण्डनखण्डखाद्य
भाषानुवादसहित
१अविकल्पविषय एकः स्थाणुः पुरुषः श्रुतोऽस्ति यः श्रुतिषु ।
ईश्वरमुमया • न परं वन्देऽनुमयापि तमधिगतम् ॥ १ ॥
२मानापनोदनविनोदने गिरीशे
भासेव सङ्कुचितयोरुचितं तदिन्दोः ।
भेत्तुं भवानिशितं दुरितं • भवानि !
नम्रीभवानि घनमङ्घ्रिसरोजयोस्ते ॥ २ ॥
श्रेयो दिशतु स श्रीशः सच्चिदानन्दविग्रहः ।
यज्ज्ञानाद् विरसायन्ते३ पराचां तु निरुक्तयः ॥ १ ॥
अनुमापतये तस्माय्युमापतये सदा ।
नमोऽस्तु गुरवे सर्ववेदिनेऽपि द्विवेदिने ॥ २ ॥
श्रीहर्षमिश्रकृतखण्डनखण्डखाद्यभाषानुवादकरणे कृतसाहसोऽहम् ।
यत्पादपङ्कजपरागनिषेवणेन तान् पूज्यपादगुरुदेववरान् नमामि ॥ ३ ॥
मैं केवल उमा से ही नहीं, किन्तु अनुमा से ( अनुमान से या श्रवण, मनन
आदि के पीछे मुझसे ) भी. प्राप्त उस परमेश्वर का वन्दन करता हूँ; जो श्रुतियों में
अनेक नाम-रूपों से श्रुत, एक, नित्य और निर्विकल्प-समाधि का विषय है ॥ १ ॥
हे भवानि ! मैं संसार में अनादिकाल से संचित पाप को दूर करने के लिए
आपके उन चरण-कमलों में नत होता हूँ, जो मान छुड़ाने के लिए प्रियतम के नत
१ यहाँ विरोधाभास अलङ्कार है; क्योंकि जो उमा से अधिगत है, वह ( न + उमा = )
अनुमा से अधिगत कैसे होगा ? इस तरह आपाततः विरोध प्रतीत होता है । जो स्थाणु ( शुष्क वृक्ष )
है, वह पुरुष तथा जो निर्विकल्पक ( प्रकाररहित ) ज्ञान का विषय है, वह श्रुत-ज्ञान का विषय
कैसे ? यों आपाततः विरोध का भान होता है ।
२ यहाँ श्लेष अलङ्कार है । प्रथम पक्ष में 'मानः ( ईर्ष्या ) तस्य अपनোদনं ( दूरीकरणं ) तदेव
विनोदः ( क्रीड़ा ) ऐसा समास है । द्वितीय पक्ष में 'मानं ( प्रमाणम् ) अपह्नुते अनेनेति
मानापनोदनम् अज्ञानं तस्य विनोदः ( दूरीकरणं ) तत्र नते' ऐसा समास है ।
३ पराचाम् = बाह्य पदार्थों का । निरुक्तयः = लक्षण ।
२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
'शब्दार्थनिर्वचनखण्डनया नयन्तः सर्वत्र निर्वचनभावमथर्वगर्बान् ।
धीरा यथोक्तमपि कीरवदेतदुक्त्वा लोकेषु दिग्विजयकौतुकमातनुध्वम् ॥ ३ ॥
प्रमाणादि-स्वीकार का कथाङ्गत्व-खण्डन
अथ कथायां वादिनो नियममेतादृशं मन्यन्ते - 'प्रमाणादयः
होने पर उनके शिरोभूषण चन्द्र की किरणों से औचित्यवश सङ्कुचित हैं।
अथवा अज्ञान के नाश के लिए जीवों के नत (उपासना में नम्र) होने
पर उनके उपासनारूप चन्द्र की किरणों से सङ्कुचित (साकारता को प्राप्त) हैं ॥ २ ॥
हे धीरो ! आप लोग जैसा लिखा है, वैसा ही (ऊहापोह में रहित भी) इस
ग्रन्थ को शुक के तुल्य कहकर पदार्थमात्र के लक्षणों के खण्डन द्वारा अतिगर्व
से युक्त पण्डितों को सर्व जगह चुप करते हुए लोक में दिग्विजयस्वरूप क्रीड़ा का
विस्तार करें ॥ ३ ॥
१ 'शब्दस्य अर्थः तस्य निर्वचनम्...' ऐसा समास है। विद्यासागरी और शाङ्करी में
'शब्दश्च अर्थश्च...' ऐसा लिखा है। इसमें शब्द विशेषण व्यर्थ हो जायगा, क्योंकि शब्द भी शब्द-
शब्द का अर्थ ही है, - 'अर्थनिर्वचन' कहने से ही इष्ट सिद्ध हो जायगा। सच तो
यह है कि 'इस शब्द का यह अर्थ है' इस बोध के द्वारा शब्दप्रयोगरूप व्यवहार की सिद्धि
ही लक्षण का प्रयोजन है। इससे शब्द के अर्थ का ही लक्षण होता है।
२ शास्त्रार्थ के आरम्भ से पहले वादी-प्रतिवादी दोनों मिलकर कुछ नियम मान लेते
हैं, इसलिए कि शास्त्रार्थ निर्विघ्न समाप्त हो। जैसे—सत्यनिष्ठ, दोनों से अधिक विद्वान् तथा सीमा
के लांघनेवाले को दण्ड देने में समर्थ मध्यस्थ होना चाहिए, वादी को अपना पक्ष प्रमाण-
तर्क से सिद्ध करना चाहिए एवं प्रतिवादी को वादी के पक्ष में दोष देना चाहिए, ऐसे बहुत से
नियम देश-काल के अनुसार होते हैं। नैयायिक इनसे अधिक एक और नियम सबसे मनवाना
चाहते हैं कि 'प्रमाण, प्रमेय आदि सोलह पदार्थ हैं, यह वादी-प्रतिवादी दोनों को शास्त्रार्थ से
पहले ही मान लेना चाहिए।' उनका आशय यह है कि यदि प्रतिवादी इस नियम को मान
लेगा, तो अपने सिद्धान्त शून्यवाद आदि से गिर जायगा। यदि न मानेगा, तो शास्त्रार्थ का
अनधिकारी होने से विद्वत्समाज से बहिष्कृत हो जायगा। इस ग्रन्थ में सबसे प्रथम इसी नियम
का खण्डन करते हैं।
सर्वतन्त्रसिद्धान्ततया सिद्धाः पदार्थाः सन्तीति कथकाभ्यामभ्युपेयम् ।¹
तदपरे न क्षमन्ते । तथाहि—प्रमाणादीनां सत्त्वं यदभ्युपेयं कथकेन तत्कस्य
हेतोः ? किं तदनभ्युपगच्छद्भ्यां वादिप्रतिवादिभ्यां ¹तदभ्युपगमसाहित्यनियतस्य
वाग्व्यवहारस्य प्रवर्तयितुमशक्यत्वात्, उत कथकाभ्यां प्रवर्तनीयवाग्व्यवहारं
प्रति हेतुत्वात्, उत लोकसिद्धत्वात्, अथवा तदनभ्युपगमस्य तत्त्वनिर्णयविजय-
फलातिप्रसञ्जकत्वात् ।
न तावदाद्यः, तदनभ्युपगच्छतोऽपि चार्वाक.माध्यमिकादेवाग्विस्तराणां
प्रतीयमानत्वात् । तस्यैव वाऽनिष्पत्तौ भवत्स्तन्निरासप्रयासानुपपत्तेः । सोऽयमपूर्वः
प्रमाणादिसत्त्वानभ्युपगमात्मा वाक्स्तम्भनमन्त्रो भवताऽभ्यूहितः; नूनं यस्य
कथा (शास्त्रार्थ) के आरम्भ से पहले नैयायिक आदि भेदवादी एक
ऐसा भी नियम मानते हैं कि सब (तन्त्रों) के सिद्धान्त रूप से सिद्ध 'प्रमाण,
प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा,
हेत्वाभास, छल, जाति और निग्रहस्थान ये सोलह पदार्थ हैं—वह वादी, प्रतिवादी दोनों
को अवश्य मान लेना चाहिए।'
अद्वैतवादी वेदान्ती इस नियम को नहीं मानते । वे कहते हैं कि शास्त्रार्थ
के आरम्भ से पहले शास्त्रार्थी प्रमाणादि की सत्ता क्यों मान ? क्या
इस कारण कि प्रमाणादि के स्वीकार के बिना वाग्व्यवहार (वचन)
की प्रवृत्ति नहीं कर सकते, क्योंकि वाग्व्यवहार प्रमाणादि के स्वीकार से नियत
(व्याप्य) है ! अर्थात् प्रमाणादि के स्वीकार के बिना नहीं बनता। अथवा इस
कारण कि प्रमाणादि का स्वीकार उस वाग्व्यवहार का हेतु है, जिसको वादी, प्रतिवादी
दोनों करना चाहते हैं। या इस कारण कि 'प्रमाणादि-स्वीकार शास्त्रार्थ-हेतु है' यह लोक-
सिद्ध है। या इस कारण कि शास्त्रार्थ का फल (तत्त्वनिर्णय या विजय)
प्रमाणादि-स्वीकार के बिना सिद्ध नहीं हो सकता ।
प्रथम विकल्प-खण्डन—इनमें पहला पक्ष ठीक नहीं है, क्योंकि चार्वाक,
माध्यमिक (बौद्ध) प्रभृति प्रमाणादि को नहीं मानते और उनके भी शास्त्रार्थ में
१ इस ग्रन्थ को देखने से ज्ञात होता है कि नियत व्याप्य को कहते हैं। यह ठीक है,
क्योंकि 'दण्ड-नियत घट है' ऐसा प्रयोग होता है, 'घट-नियत दण्ड है' ऐसा प्रयोग नहीं होता ।
परन्तु 'नियतोपस्थितिकः प्रातिपदिकार्थः', 'अन्यथासिद्धिशून्यस्य नियता पूर्ववर्तिता आदि
ग्रन्थों के देखने से ज्ञात होता है कि 'नियत' व्यापक को कहते हैं। वह अनुभवविरुद्ध-सा
ज्ञात होता है।
४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्ये [ प्रथम
प्रमाणाद् भगवता सुरगुरुणा लोकायतकानि सूत्राणि न प्रणीतानि, तथागतेन वा
मध्यमागमा नोपदिष्टाः, भगवत्पादेन वा बादरायणीयेषु सूत्रेषु भाष्यं नाभाषि।
प्रमाणाद्यनभ्युपगम्यापि प्रवर्तयन्तु नाम ते वाचो भङ्गीः, तास्तु साधनबाधनक्षमा
न भवन्ति तावतेति ब्रूम इति चेत्। न; प्रमाणाद्यनभ्युपगम्य प्रवर्तितत्वं तदीयसाधन-
बाधनाक्षमतायां न नियामकम्, किन्तु १सद्द्वचनाभासलक्षणयोगित्वमित्यवश्यमभ्युपेयं
भवता, येनाभ्युपगम्यापि प्रमाणादीनि प्रवर्तिता मतान्तरानुसारिभिर्व्यवहारा
अभ्युपगतप्रमाणादिसत्त्वैर्मतान्तरव्यवहारिभिरपरैस्तथाभूता इति कथ्यन्ते । यदि
त्वस्मद्वचसि सद्द्वचनाभासलक्षणं न भवान् दर्शयितुमीष्टे, तदाऽनभ्युपगम्य
वाग्व्यवहार देखे जाते हैं। यदि उनके शास्त्रार्थ में वाग्व्यवहार न हो, तो उनके मत के
खण्डन के लिए बड़ी-बड़ी पुस्तकें लिखने का आपका परिश्रम व्यर्थ हो जायगा ।
आपने यह तो विलक्षण वाक्स्तम्भनकारी एक मन्त्र कल्पित किया है, मानो जिसके
प्रभाव से भगवान् सुरगुरु (बृहस्पति) ने लोकायत-सूत्रों का प्रणयन न
किया हो, तथागत (बुद्धदेव) ने मध्यमागम (शून्यवाद) का उपदेश न
दिया हो और श्रीभगवत्पाद (शंकराचार्यजी) ने श्रीवेदव्यासजी के सूत्रों पर
भाष्य ही न रचा हो।
समर्थन—चार्वाक आदि प्रमाणादि को न मानकर भी वाग्व्यवहार में
प्रवृत्त हों। परन्तु उनका वचन प्रमाणादि न मानने के कारण स्वपक्ष के
साधन और परपक्ष के बाधन में सक्षम नहीं है। खण्डन—आप लोगों ने जो उनके
वचन के खण्डन में बड़ी-बड़ी पुस्तकें लिखी हैं, उन्हीं से यह सिद्ध होता है
कि उनके वचन साधन-बाधन में समर्थ हैं। तथ्य तो यह है कि वचन
में जो साधन तथा बाधन की अशक्ति है, उसका कारण प्रमाण आदि को न मानकर
प्रवृत्ति नहीं है, किन्तु सद्द्वचनाभासत्व है; इसको आप भी अवश्य मानेंगे। अन्यथा
यदि प्रमाणादि के अस्वीकार को साधन-बाधन की अशक्ति का कारण मानें, तो यह भी
मानना पड़ेगा कि प्रमाणादि-स्वीकार साधन-बाधन की शक्ति का कारण है। पर ऐसा
मान नहीं सकते; क्योंकि प्रमाणादि को माननेवाले नैयायिक प्रमाणादि को माननेवाले
१ सद्द्वचन = सद्धेतुप्रतिपादक वाक्य और सद्द्वचनाभास = हेत्वाभासप्रतिपादक वाक्य, उसका
लक्षण = हेत्वाभासप्रतिपादकवाक्यत्व, तद्योगित्व = उसका सम्बन्ध । विद्यासागरी और शाङ्करी
दोनों में यह अर्थ किया है—'सद्द्वचनाभासः = स्फुटाभासो व्यभिचारादिः सल्लक्षणं =
साध्याभाववत्सामानाधिकरण्यादि' । समझ में नहीं आता कि असद्धेतु में रहनेवाला यह धर्म
वचनरूप सद्द्वचनाभास में कैसे जायगा ?
परिच्छेद ] प्रमाणादि-स्वीकार का कथाङ्गत्व-खण्डन ५
प्रमाणादीनि भवता प्रवर्त्तितोऽयं व्यवहार इति शतकृत्वस्त्वंया उच्यमानेऽपि
नास्माकमादरः । अन्यथा अभ्युपगम्य प्रमाणादीनि भवता प्रवर्त्तितोऽयं व्यवहार
इत्येतावता भवदीयो व्यवहाराभास इत्यस्माभिरपि वक्तुं शक्यत एव ।
ननु यदि प्रमाणादीनि न सन्ति, तदा व्यवहार एव धर्मी कथं सिद्ध्येत,
दूषणादिव्यवस्था वा कथं स्यात् ? सर्वविधिनिषेधानां प्रमाणाधीनत्वात् । मैवम् ;
न ब्रूमो वयं न सन्ति प्रमाणादीनीति स्वीकृत्य कथाऽऽरभ्येति । किन्नाम सन्ति न
सन्ति वा प्रमाणादीनीत्यस्यां चिन्तायामुदासीनैः यथा स्वीकृत्य तानि
व्यवह्रियन्ते, तथा व्यवहारिभिरेव कथा प्रवर्त्यतामिति । अन्यथा न सन्ति
प्रमाणादीनीति मतमस्माकमारोप्य यदिदं भवता दूषणमुक्तम्, तदपि वक्तुं न
शक्यम् । कीदृशीं मर्यादामलम्ब्य प्रवृत्तायां कथायामिदं दूषणमुक्तम् ? किं
प्रमाणादीनां सत्त्वमभ्युपगम्य उभाभ्यां वादिभ्यां प्रवर्त्तितायां कथायाम्, उतासत्त्व-
मभ्युपेत्य, अथैकेन सत्त्वमपरेणासत्त्वमङ्गीकृत्य ? नाद्यः, अभ्युपगतप्रमाणादिसत्त्वं
प्रति एतादृशपर्यनुयोगानवकाशात् । द्वितीये स्वतोऽव्यापत्तेः । न तृतीयः, तथैव
कथान्तरस्यापि प्रसक्तेः ।
मीमांसकों के वचनों को साधन-बाधन में असमर्थ कहते हैं । प्रमाणादि-स्वीकार
साधन-बाधन-शक्ति का कारण न होने पर भी यदि आप हमारे वचन में आभा-
सत्व (दोष) न दिखा सकें, तो सौ बार भी कहें कि 'प्रमाणादि न मानकर प्रवृत्त होने
से आपका यह वाग्व्यवहार प्रमाणाभास (अप्रमाण) है', फिर भी आपके उस वचन में
हमें कोई आदर न होगा । फिर यदि वचन में आभासत्व न दिखाकर भी साधन में
अक्षमत्व का प्रतिपादन करते रहें, तो हम भी कह सकते हैं कि प्रमाणादि को मानकर
प्रवृत्त होने से आपका वचन भी साधन में अक्षम है ।
समर्थन — यदि प्रमाणादि नहीं हैं, तो वाग्व्यवहाररूप धर्मी (अङ्गी) कैसे सिद्ध होगा
और दूषण आदि की व्यवस्था भी कैसे होगी, क्योंकि सभी विधि-निषेध प्रमाण के ही अधीन
हैं । खण्डन — हम यह नहीं कहते कि 'प्रमाण आदि नहीं हैं' ऐसा मानकर शास्त्रार्थ का
आरम्भ करिये । किन्तु प्रमाणादि हैं या नहीं, इस चिन्ता से उदासीन होकर जैसा
आप मानते हैं, वैसा ही मानकर शास्त्रार्थ का आरम्भ करना चाहिए । अन्यथा
(प्रमाणादि-स्वीकार को यदि शास्त्रार्थ का अङ्ग मानें तो) 'प्रमाणादि नहीं हैं' ऐसा
मेरा मत मानकर जो आप दोष देते हैं कि 'यदि प्रमाणादि नहीं हैं तो व्यवहार-
६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
उभयाभ्युपगमानुरोधित्वाच्च कथानियमस्य । अन्यथा स्वाभिप्रायमालम्ब्य
तेनापि त्वद्वचसि यत्किंचिद्वागात्मनि दूषणेऽभिहिते कस्य जयो व्यवतिष्ठताम् ?
प्रमाणाभ्युपगन्तुरेव यावन्नियमसंयन्त्रणा महती स्यात् । तस्मात्
प्रमाणादिसत्त्वाभ्युपगमौदासीन्येन व्यवहारनियमेन समयं बद्ध्वा प्रवर्तितायां
कथायां भवतेदं दूषणमुक्तमित्युचितमेव तथासति स्यात् । योऽयं भवान् स्वाभि-
प्रायमपि नावधारयितुं शक्नोति, दूरतस्तस्मिन् पराभिसन्धानावधारणप्रत्याशा ।
रूप धर्मी कैसे सिद्ध होगा', वह भी नहीं बनेगा । अच्छा, किस मर्यादा
(नियम) को मानकर प्रवृत्त शास्त्रार्थ में आप यह दोष देते हैं ? क्या प्रमाणादि
के सत्त्व को मानकर वादी-प्रतिवादी दोनों से प्रवृत्त शास्त्रार्थ में, प्रमाण आदि
के असत्त्व को मानकर दोनों से प्रवृत्त शास्त्रार्थों के में या एक से सत्त्व और अन्य
से असत्त्व को मानकर प्रवृत्त शास्त्रार्थ में ? इनमें प्रथम विकल्प युक्त नहीं है, क्योंकि
जो प्रमाणादि को मानते हैं, उनके प्रति 'प्रमाण आदि को न मानने पर व्यवहाररूप
धर्मी कैसे सिद्ध होगा', यह दोष देना नहीं बनता । द्वितीय पक्ष में आप भी
प्रमाण आदि के न माननेवाले सिद्ध होंगे । तृतीय पक्ष भी ठीक नहीं है, क्योंकि
इस शास्त्रार्थ के तुल्य ही अन्य शास्त्रार्थों के भी प्रमाणादि-स्वीकार के बिना ही सिद्ध
होने से 'प्रमाणादि का स्वीकार शास्त्रार्थ-हेतु है' यह कथन असङ्गत हो जायगा ।
शास्त्रार्थ-नियम वादी-प्रतिवादी दोनों के स्वीकार पर निर्भर है । इसलिए भी केवल
आपके स्वीकार से प्रमाणादि का स्वीकार शास्त्रार्थ-हेतु नहीं हो सकता । यदि शास्त्रार्थ-
नियम को एक के स्वीकार का अनुरोधी मानें, तो इस नियम से प्रतिवादी स्वेच्छा से
स्वीकृत 'हुँ फट्' शब्दोच्चारण रूप दोष दे, तो किसकी जय होगी ? बल्कि
नियम के एकानुरोधी होने पर प्रमाणादि-स्वीकार को शास्त्रार्थ-हेतु माननेवाले को ही
उससे महान् क्लेश होगा । अतः आपने प्रमाण आदि के सत्त्व-असत्त्व में उदा-
सीनता से प्रवृत्त शास्त्रार्थ में 'यदि प्रमाणादि को न मानें, तो व्यवहाररूप धर्मी
कैसे सिद्ध होगा' यह दोष दिया है, इस बात को हम दोनों यदि मान लें तो
अच्छा ही है । जब आप अपना अभिप्राय जानने में असमर्थ हैं, तो 'प्रमाणादि-
स्वीकार शास्त्रार्थ में हेतु नहीं है—यह हम कहते हैं, प्रमाणादि ही नहीं है—यह
नहीं कहते' हमारे इस अभिप्राय के जानने की आपसे आशा तो अतिदूर है ।
परिच्छेद ] प्रमाणादि-स्वीकार का कथाङ्गत्व-खण्डन ७
अथ वादीकृत्य ¹दुर्वैतण्डिकं तस्मिन्नुपाधौ बाधोऽभिधीयते इत्येव नेष्यते,
शिष्यादयस्तु तस्य कथानधिकारं ज्ञाप्यन्ते । अत एव भगवान् भाष्यकारः—'स²
प्रयोजनमनुयुक्तो यदि प्रतिपद्यते' इत्याह स्म, न तु प्रतिपद्यसे इति । मैवम्;
शिष्यादीन् प्रत्यपि चार्वाकादेर्दोषोऽयमित्यैवाभिधातव्यम् । कथं च तथा स्यात्,
तस्य कथाप्रवेशनाप्रवेशनयोः तद्वाधाऽसम्भवात् । कथायामेव हि निग्रहः ।
नापि द्वितीयः । तथाहि—स्यादप्येवं यदि कथकप्रवर्तनीयवाग्व्यवहारं
प्रति प्रमाणादीनां हेतुता तत्सत्त्वानभ्युपगमे निवर्तेत । न त्वेवं सम्भवति, तथा सति
तत्सत्त्वानभ्युपगन्तॄणां वाग्व्यवहारस्वरूपमेव न निष्पद्येत, हेत्वनुपपत्तेः ।
समर्थन—यहाँ कोई शास्त्रार्थ नहीं होता, आप हमारे ग्रन्थ को उद्धृत कर
खण्डन करते हैं। हम भी वैतण्डिक को वादी बनाकर किसी शास्त्रार्थ में प्रमाणादि
स्वीकार के शास्त्रार्थ-हेतुत्व को सिद्ध नहीं करते; किन्तु शिष्यों को 'वैतण्डिक के शास्त्रार्थ
में अनधिकार' का बोध कराते हैं। इसलिए न्यायभाष्यकार ने 'स प्रयोजनमनुयुक्तो
यदि प्रतिपद्यते' ऐसा कहा है। अर्थात् परोक्षवाची तत् शब्द से वैतण्डिक का
परामर्श किया और प्रथम पुरुष की क्रिया दी है। इससे 'कीदृशी' इत्यादि विकल्प
व्यर्थ है। खंडन—शिष्य से भी आप यही कहेंगे कि चार्वाकादि का कथा में अधिकार
नहीं है। पर यह कैसे हो सकता है; क्योंकि यदि उनका अधिकार है तो 'अधिकार नहीं
है' यह कथन व्याहत है और यदि अधिकार नहीं है तो शिष्य उनको इस दोष से
निगृहीत (विजित) कहाँ करेगा; क्योंकि कथा में ही निग्रह होता है और कथा में
उनका अधिकार ही नहीं है।
द्वितीय विकल्प-खण्डन—द्वितीय विकल्प भी ठीक नहीं है, क्योंकि शास्त्रार्थ
के प्रमाणादि तो कभी हेतु हो भी सकते हैं, परन्तु उनका स्वीकार कभी भी हेतु नहीं हो
सकता । यदि प्रमाणादि-स्वीकार भी हेतु होता, तो शास्त्रार्थ में प्रमाणादि की हेतुता
१ शास्त्रार्थ वाद, जल्प और वितण्डा तीन प्रकार के हैं। वाद और जल्प में वादी-प्रतिवादी
दोनों स्वपक्ष का साधन और परपक्ष का खण्डन करते हैं। इनमें भेद यह है कि वाद में छल-
प्रयोग नहीं होता और उसका फल तत्त्व-निर्णय है। जल्प में छल-प्रयोग भी होता है और
उसका फल विजय है। वितण्डा में वादी स्वपक्ष का साधन और प्रतिवादी उसके पक्ष का खण्डन
करता है। उसका फल विजय है। वितण्डा से विजय के लिए जो प्रवृत्त हो, उसे 'वैतण्डिक'
और दुष्टवैतण्डिक को 'दुर्वैतण्डिक' कहते हैं।
२ वह वैतण्डिक यदि शास्त्रार्थ के प्रयोजन पूछने पर मान लेगा, तो प्रमाण भी मान ही
लेगा, यह उक्त भाष्य का अर्थ है।
८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम ·
उक्तश्चायमर्थो यन्माध्यमिकादिवाग्व्यवहाराणां स्वरूपापलापो न शक्यत इति ।
अथ मन्यसे कथकवाग्व्यवहारं प्रति हेतुत्वात् प्रमाणादीनां सत्त्वम्,
सत्त्वाच्चाभ्युपगमः, यत्सत् तदभ्युपगम्यते इति स्थितेरिति । मैवम्; कयापि
नियमस्थित्या प्रवृत्तायां कथायां कथकवाग्व्यवहारं प्रति हेतुत्वात् प्रमाणादीनां
सत्त्वं सत्त्वाच्चाभ्युपगमो भवता प्रसाध्यः । कथातः पूर्वं तत्त्वावधारणं वा
परपराजयं वाऽभिलषद्भ्यां कथकाभ्यां यावता विनाऽभिलषितं न पर्यवस्यति,
तावदनुगोढव्यम् । तच्च १व्यवहारनियमसमयबन्धादेव द्वाभ्यामपि ताभ्यां
सम्भाव्यते इति व्यवहारनियमसमयमेव बध्नीतः ।
प्रमाणादि को न मानने पर निवृत्त हो जाती। परन्तु ऐसा नहीं होता, क्योंकि ऐसा
मानें तो कारण के न होने से प्रमाणादि को न माननेवालों के वाग्व्यवहार के स्वरूप की
ही निष्पत्ति, न होगी। यह बात तो हमने कह ही दी है कि माध्यमिकादि के
वाग्व्यवहार के स्वरूप का अपलाप नहीं किया जा सकता।
समर्थन —वाग्व्यवहार के हेतु होने से प्रमाणादि सत्य हैं और सत्य होने से
स्वीकार के योग्य हैं, क्योंकि जो सत्य होते हैं वे माने जाते हैं, ऐसी लोक की स्थिति
है। खण्डन—इस युक्ति से भी प्रमाणादि-स्वीकार सिद्ध हुआ, प्रस्तुत (प्रमाणादि-
स्वीकार का शास्त्रार्थ-हेतुत्व) सिद्ध नहीं हुआ। किञ्च, आप किसी नियम से प्रवृत्त
कथा में वाग्व्यवहारके कारण होने से प्रमाणादि के सत्यत्व को और सत्यत्व होने से
प्रमाणादि के स्वीकार को साधेंगे। यदि ऐसा है तो जिस कथा में प्रमाणादि की सत्ता
को सिद्ध करेंगे, उसीमें व्यभिचार होने से अथवा उसीके तुल्य अन्य कथा के भी
निर्वाह होने से प्रमाणादि-स्वीकार कथा का हेतु सिद्ध नहीं हुआ। कथा
के आरम्भ से पूर्व जितने के बिना तत्त्व-निश्चय या वादि-पराजयस्वरूप अभिलषित
फल की सिद्धि न हो, उतना ही दोनों को मानना चाहिए। अभिलषित फल की
सिद्धि (व्यवहार-नियम से समयबन्ध=प्रतिज्ञारूप बन्धन से ही) कथाप्रवृत्ति से
हो सकती है। इससे दोनों व्यवहार-नियम से प्रतिज्ञारूप बन्धन को
स्वीकार करते हैं।
१ व्यवहारः = वाग्व्यवहारः शास्त्रार्थं इति यावत्, तस्य प्रयोजका नियमाः प्रमाणैर्व्यवहर्त-
व्यमित्यादिरूपाः, तैः समयस्य = प्रतिज्ञायाः, 'इमान् नियमान् पालयिष्यामः' इत्यादिरूपायाः,
बन्धनम् = करणम् ।
परिच्छेद ] प्रमाणादि-स्वीकार का कथाङ्गत्त्व-खण्डन ६
स च 'प्रमाणेन तर्केण च व्यवहर्तव्यं वादिना । प्रतिवादिनाऽपि कथाङ्गतत्त्व-
ज्ञानविपर्ययलिङ्गप्रतिज्ञाहान्याद्यन्यतम निग्रहस्थानं तस्य दर्शनीयम् । तद्व्युत्पादने
प्रथमस्य भङ्गो व्यवहर्त्तव्यः । अन्यथा तु द्वितीयस्यैव । तादृशेतरौ जेतृतया
व्यवहर्त्तव्यौ । प्रामाणिकः पक्षस्तात्त्विकतया व्यवहर्त्तव्यः' इत्यादिरूपः ।
अत एव व्यवहारनियमसमयबन्धेऽपि हेतुर्वक्तव्यः । तथा च सोऽपि कथायां
प्रवृत्तायामभिधातुं युक्त इति प्रमाणसत्त्वहेत्वभिधानवत् प्रत्यवस्थानमनवकाशम् ।
द्वाभ्यामपि वादिभ्यां विचारप्रवृत्त्या अभिलष्यमाणतत्त्वव्यवस्थाजयमूलत्वेन
व्यवहारनियमस्य स्वेच्छयैव परिगृहीतत्वात् ।
न चैवं प्रमाणानुपज्ञस्वेच्छामात्रपरिगृहीतमूलत्वात् मूलापरिशुद्धिसम्भवेन
सर्वविचारविचार्यफलविप्लुवापत्तिः स्यात् , १अविद्याविद्यमानाऽनादिपारम्पर्या-
यातस्य लोकव्युत्पत्तिगृहीतसंवादस्य च तस्य अन्यथाभावासम्भाव्यतालक्षणस्वतः-
सिद्धपरिशुद्धित्वात् ।
वह समय-बन्ध निम्नलिखित रूप है—वादी को प्रमाण तथा तर्क से स्वपक्ष की
सिद्धि करनी चाहिए और प्रतिवादी को कथाङ्ग तत्त्वज्ञान के विपर्यय ( अज्ञान वा
अतत्त्वज्ञान ) के हेतुभूत प्रतिज्ञाहानि आदि निग्रहस्थान दिखलाने चाहिए । यदि
प्रतिवादी निग्रह-स्थान का समर्थन कर सके, तो वादी की पराजय होगी और यदि न कर
सके, तो उसकी पराजय होगी । पराजित से अन्य जेता कहलायेगा । प्रमाण-
युक्त पक्ष यथार्थ माना जायगा ।
शंका—व्यवहार-नियम शास्त्रार्थ का कारण है, इसका साधन भी शास्त्रार्थ में
ही होगा । तब तो जिस शास्त्रार्थ में उसकी सिद्धि होगी, उसीमें व्यभिचार होने
तथा उसीके तुल्य अन्य शास्त्रार्थ का भी निर्वाह होने से व्यवहार-नियम भी शास्त्रार्थ
का अङ्ग सिद्ध नहीं होगा । खंडन—विचार ( शास्त्रार्थ ) की प्रवृत्ति से अभिलषित
तत्त्वज्ञान और विजयरूप फल का कारण होने से वादी और प्रतिवादी दोनों अपनी
इच्छा से समय-बन्ध को कारण मान लेते हैं ।
शंका—जब आप समय-बन्ध को प्रमाण के बिना स्वेच्छामात्र से ही विचार या
शास्त्रार्थ का कारण मान लेते हैं, तो उसका मूल परिशुद्ध ( प्रमाणसिद्ध ) नहीं रहा ।
फलतः शास्त्रार्थ, उससे विचारणीय तत्त्व और. फल ( विजयादि ) सिद्ध नहीं होंगे । तब
तो वादी भी स्वेच्छा से यह नियम बना सकता है कि ' 'हुँ फट्' का उच्चारण भी
१ अविद्यमानानादिपारम्पर्यायातस्येति विद्यासागरीसम्मतः पाठः । स एवानुसृतः ।
१२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
प्रमाणानामनादाय न पर्यवस्यति । दूषणानां चास्तित्वेन भङ्गावधारणनियम-
बन्धने साधनाङ्गव्याप्त्यादीनां सत्त्वेन तद्विषयस्य तत्त्वरूपताव्यवहारनियमनादौ
च कण्ठोक्तमेव तस्य तस्य सत्त्वमङ्गीकृतमिति रिक्तमिदमुच्यते प्रमाणादीनां
सत्तामनभ्युपगम्य कथारम्भः शक्यत इति ।
मैवम् ; एभिरपि बाधकैः कथायामारब्धायामेव अभिमतस्य प्रसाधनीयत्वे
पूर्वोक्तबाधायां अनिस्तारात् । न च व्यवहारनियमस्य स्वेच्छास्वीकृतस्यैव
प्रमाणादिसत्तास्वीकारपर्यवसायितया नायं दोषः स्यात् । यतः सत्ताज्ञानस्य
तत्राङ्गत्वम् , नतु सत्तायाः ।
तत्र किं सत्तावगममात्रात् सत्ताऽभ्युपगम्येति मन्यसे, अबाधितात्
तदवगमाद्वा ? न तावदाद्यः, मरुमरीचिकादौ जलरूपतासद्भावाभ्युपगमप्रसङ्गात् ।
द्वितीयेऽपि किं वादिप्रतिवादिमध्यस्थमात्रस्य तस्यापि कथाकालमात्र एव
यह नियम-बन्ध भी नहीं हो सकता । ऐसे ही दूषण के रहने पर पराजय के अवधारण
( निश्चय ) रूप नियम में और साधनाङ्ग व्याप्ति के सत्त्व से साध्यसत्यत्वा-
वधारणरूप नियम में प्रमाण-दूषण-व्याप्ति आदि के सत्त्व का साक्षात् कण्ठ से ही अङ्गीकार
किया है । अतः प्रमाण आदि को न मानकर कथारम्भ हो सकता है, यह कथन
युक्तिशून्य है ।
खंडन—इन बाधक युक्तियों से भी कथा का आरम्भ होने पर ही अभिलषित
( प्रमाणादि-स्वीकार की कथाङ्गता ) की सिद्धि हो जायगी । अतः पीछे कहे दोषों का
निवारण नहीं हुआ । अर्थात् जिस कथा में प्रमाणादि-सत्ता सिद्ध हुई है, उसीमें व्यभिचार
होने और वैसे ही अन्य कथा के भी निर्वाह होने से प्रमाणादि-स्वीकार कथाङ्ग नहीं है ।
समर्थन—हम किसी कथा में प्रमाणादि-स्वीकार की कथाङ्गता को सिद्ध नहीं
करते; किन्तु अपनी इच्छा से स्वीकृत व्यवहार-नियम ही प्रमाणादि-स्वीकार में
पर्यवसित ( प्राप्त ) हो जाता है, यह आपसे कहते हैं । खंडन—उक्त प्रकार से भी
प्रमाणादि-सत्ता का ज्ञान ही कथाङ्ग हुआ, सत्ता नहीं ।
समर्थन—यदि प्रमाणादि-ज्ञान कथाङ्ग हुआ, तो उस ज्ञान का विषय होने से
प्रमाणादि-सत्ता भी कथाङ्ग हो ही गयी । खंडन—आप प्रमाणादि-ज्ञानमात्र से प्रमाणादि
को स्वीकार करते हैं या अबाधित प्रमाणादि के ज्ञान से ? इनमें प्रथम पक्ष ठीक नहीं
है, क्योंकि मरु-मरीचिका में जल का ज्ञान होने से उसका ( जल का ) भी स्वीकार करना
परिच्छेद ] प्रमाणादि-स्वीकार का कथाङ्गत्व-खण्डन १३
बाधितावगमाभावात् अथवा कस्यचिदपि कालान्तरेऽपि च बाधितबोधविरहात् ?
नाद्यः, अतिप्रसङ्गात् । पुरुषत्रयावगतस्यापि एकक्षणावगतस्य पुरुषान्तरेण तेनापि
क्षणान्तरे बहुलं बाध्यत्वदर्शनात् । न चासौ अर्थोऽसत्योऽपि द्वित्रादिपुरुषमात्र-
पूर्वजाततत्प्रतीत्यनुरोधात् बाधदर्शने संजातेऽपि तथैव सन्नित्यभ्युपगम्यते ।
तस्माद् द्वितीयः पक्षः परिशिष्यते, यत्र सर्वप्रकारेण बाधितत्वं नास्ति
तत्सदित्यभ्युपगन्तव्यम् ।
तदित्थं यदि नाम वादिप्रतिवादिमध्यस्थमात्रस्य दूषणादिसत्तावगमः कथा-
कालमात्रे तैरबाध्यमानः कथाङ्गत्वेनाभ्युपेयते, तदा किमायातं सर्वप्रकाराबाधित-
तत्सत्त्वावगमायत्ततत्सत्ताभ्युपगमकथाङ्गतानङ्गीकारस्य १ । कतिपयप्रतिपत्तृ-कतिपय-
काल-तथात्वावगमादेव प्रायेण लौकिको व्यवहारः प्रतीयते, तादृशश्चायं सत्त्वागमः
कथाङ्गम् ।
पड़ेगा । द्वितीय पक्ष में भी कथाकाल में केवल वादी, प्रतिवादी और मध्यस्थमात्र के
अबाधित ज्ञान से या किसीके भी ( मनुष्यमात्र के ) बाधित ज्ञान के न होने से
प्रमाणादि-सत्ता का स्वीकार करते हैं ? इनमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि तीन या
चार पुरुषों द्वारा अभ्रान्त रूप से ज्ञात भी अन्य पुरुषों या दूसरे क्षण में उन्हीं द्वारा
प्रायः बाधित रूप से ज्ञात देखा जाता है । बाध-ज्ञान होने पर भी तीन-चार
पुरुषों की पहली प्रतीति के अनुरोध से असत्य वस्तु बाध-ज्ञान के पूर्वक्षण के तुल्य
सत् नहीं मान सकते । तस्मात् द्वितीय पक्ष ही ठीक रहा । अर्थात् जहाँ सब प्रकार
से बाध न हो, वह सत् है, यही स्वीकार करना चाहिए ।
तस्मात् इस रीति से यदि वादी, प्रतिवादी और मध्यस्थ के ही कथाकाल में बाध-
बुद्धिरहित प्रमाणादि-स्वीकार को कथाङ्ग मान भी लें, तब भी सब काल में सब मनुष्यों
का अबाधित ज्ञान न होने से प्रमाण, प्रमेय आदि का स्वीकार नहीं हो सकता
१ निष्कर्ष यह है कि प्रमाण-प्रमेय की सत्ता परमार्थ नहीं है । क्योंकि उनमें सब
प्रकार से अबाधितत्व-ज्ञान नहीं है। किन्तु व्यावहारिक सत्ता है। अतः वह परमार्थ में न होने
से शून्यवादी और अद्वैतवादी आदि को अपसिद्धान्त दोष नहीं है तथा व्यवहार में प्रमाणादि
के होने से शास्त्रार्थ का निर्वाह भी हो जाता है ।
प्रश्न—जो बात अन्त में कही गयी है, वह आरम्भ में ही क्यों न कही गयी ? उत्तर—ऐसा
करने से यह पुस्तक प्राथमिक कक्षा में पाठ्य होती, शास्त्री एवं आचार्य में पाठ्य नहीं होती ।
छोटी-सी बात बड़ी कैसे बनती है, वादी विकल्प-जाल में फँसाकर निष्प्रतिभ कैसे किये जाते
हैं, आदि शिक्षा देना ही इस तरह की रचना का लक्ष्य है ।
१४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
एतत्तदुच्यते—व्यावहारिकीं प्रमाणादिसत्तामादाय विचारारम्भ इति ।
तस्माद् यादृग्व्यवहारनियमः कृतः, तन्मर्यादा अनेन नोल्लंघितेति यद्वादिग्व्यवहारे
मध्यस्थावगमः स विजयते; यस्य तु वचसि नैवं तस्यावगमस्तस्य पराजयः; यत्र
वायुक्तनिग्रहसत्त्वावगमः स निगृहीतः; तदितरस्तु न तथेत्यादिनियम एव
कथारम्भाय ग्राह्यः ।
अथ शून्यवाद्-विचारः
अनेन नियमेन वक्तव्यमित्यस्य अयमर्थः—अनेन नियमेनोक्तमनेनेति
मध्यस्थावगमस्य विषयीभवितव्यमिति। न च वाच्यमन्ततस्तदवगमस्यापि मनाङ्-
भ्युपेयेति; तस्यापि सत्ताचिन्तायां तत्सत्तावगमान्तरस्यैव शरणत्वात् ।
अतः आकाश-पुष्पायमान उसको शास्त्रार्थ का हेतु न भी मानें तो हानि क्या है ?
कुछ मनुष्यों के कुछ काल में अबाधित ज्ञान से ही प्रायः सभी लौकिक व्यवहार देखे
जाते हैं । अर्थात् कुछ मनुष्यों के कुछ काल में अबाधित प्रमाणादि-ज्ञान ही कथाङ्ग हैं ।
इसलिए यह फलित हुआ कि व्यावहारिकी प्रमाणादि-सत्ता को मानकर विचार
(कथा) का आरम्भ करना चाहिए । तस्मात् 'जैसा व्यवहार-नियम किया गया है, इसने
उसकी मर्यादा (सीमा) का उल्लंघन नहीं किया, ऐसा जिस वादी के वाग्व्यवहार में
मध्यस्थ को ज्ञान हो, वही विजय पाता है; जिस वादी के वचन (वाग्व्यापार) में
मध्यस्थ को ऐसा ज्ञान न हो, वह पराजय पाता है; जिस वादी के वचन में
मध्यस्थ को प्रतिवादी द्वारा उक्त निग्रहस्थान् का ज्ञान हो, वह पराजित होता है और
जिस वादी के वचन में निग्रहस्थान का ज्ञान न हो, वह पराजित नहीं होता है-
इत्यादि नियम ही कथारम्भ के लिए ग्राह्य हैं।
शून्यवाद-विचार
ज्ञातव्य है कि जैसे वेदान्ती प्रमाण, प्रमेय आदि सभी पदार्थों की प्रातिभासिक सत्ता
मानते हैं—अर्थात् घट-पट आदि का भासना ही उनकी सत्ता है, इससे अन्य सत्य-सत्ता
नहीं है—वैसे ही शून्यवादी भी सबको प्रातिभासिक मानते हैं। भेद इतना ही है कि
वेदान्ती प्रतिभास को सत्य मानते हैं और शून्यवादी प्रतिभास की सत्ता भी प्रातिभासिक
ही मानते हैं। उनका कहना है कि जैसे घटादि की सत्ता 'घटः' इत्याकारक ज्ञान ही है,
वैसे ही 'घट:' इस ज्ञान की सत्ता भी 'ज्ञातो घट:' ज्ञान यह ही है, अन्य नहीं ।