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सर्वकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 26, कुल 610 में से

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पृष्ठ 26

परिच्छेद ] प्रमाणादि-स्वीकार का कथाङ्गत्व-खण्डन ७
अथ वादीकृत्य ¹दुर्वैतण्डिकं तस्मिन्नुपाधौ बाधोऽभिधीयते इत्येव नेष्यते,
शिष्यादयस्तु तस्य कथानधिकारं ज्ञाप्यन्ते । अत एव भगवान् भाष्यकारः—'स²
प्रयोजनमनुयुक्तो यदि प्रतिपद्यते' इत्याह स्म, न तु प्रतिपद्यसे इति । मैवम्;
शिष्यादीन् प्रत्यपि चार्वाकादेर्दोषोऽयमित्यैवाभिधातव्यम् । कथं च तथा स्यात्,
तस्य कथाप्रवेशनाप्रवेशनयोः तद्वाधाऽसम्भवात् । कथायामेव हि निग्रहः ।
नापि द्वितीयः । तथाहि—स्यादप्येवं यदि कथकप्रवर्तनीयवाग्व्यवहारं
प्रति प्रमाणादीनां हेतुता तत्सत्त्वानभ्युपगमे निवर्तेत । न त्वेवं सम्भवति, तथा सति
तत्सत्त्वानभ्युपगन्तॄणां वाग्व्यवहारस्वरूपमेव न निष्पद्येत, हेत्वनुपपत्तेः ।
समर्थन—यहाँ कोई शास्त्रार्थ नहीं होता, आप हमारे ग्रन्थ को उद्धृत कर
खण्डन करते हैं। हम भी वैतण्डिक को वादी बनाकर किसी शास्त्रार्थ में प्रमाणादि
स्वीकार के शास्त्रार्थ-हेतुत्व को सिद्ध नहीं करते; किन्तु शिष्यों को 'वैतण्डिक के शास्त्रार्थ
में अनधिकार' का बोध कराते हैं। इसलिए न्यायभाष्यकार ने 'स प्रयोजनमनुयुक्तो
यदि प्रतिपद्यते' ऐसा कहा है। अर्थात् परोक्षवाची तत् शब्द से वैतण्डिक का
परामर्श किया और प्रथम पुरुष की क्रिया दी है। इससे 'कीदृशी' इत्यादि विकल्प
व्यर्थ है। खंडन—शिष्य से भी आप यही कहेंगे कि चार्वाकादि का कथा में अधिकार
नहीं है। पर यह कैसे हो सकता है; क्योंकि यदि उनका अधिकार है तो 'अधिकार नहीं
है' यह कथन व्याहत है और यदि अधिकार नहीं है तो शिष्य उनको इस दोष से
निगृहीत (विजित) कहाँ करेगा; क्योंकि कथा में ही निग्रह होता है और कथा में
उनका अधिकार ही नहीं है।
द्वितीय विकल्प-खण्डन—द्वितीय विकल्प भी ठीक नहीं है, क्योंकि शास्त्रार्थ
के प्रमाणादि तो कभी हेतु हो भी सकते हैं, परन्तु उनका स्वीकार कभी भी हेतु नहीं हो
सकता । यदि प्रमाणादि-स्वीकार भी हेतु होता, तो शास्त्रार्थ में प्रमाणादि की हेतुता
१ शास्त्रार्थ वाद, जल्प और वितण्डा तीन प्रकार के हैं। वाद और जल्प में वादी-प्रतिवादी
दोनों स्वपक्ष का साधन और परपक्ष का खण्डन करते हैं। इनमें भेद यह है कि वाद में छल-
प्रयोग नहीं होता और उसका फल तत्त्व-निर्णय है। जल्प में छल-प्रयोग भी होता है और
उसका फल विजय है। वितण्डा में वादी स्वपक्ष का साधन और प्रतिवादी उसके पक्ष का खण्डन
करता है। उसका फल विजय है। वितण्डा से विजय के लिए जो प्रवृत्त हो, उसे 'वैतण्डिक'
और दुष्टवैतण्डिक को 'दुर्वैतण्डिक' कहते हैं।
२ वह वैतण्डिक यदि शास्त्रार्थ के प्रयोजन पूछने पर मान लेगा, तो प्रमाण भी मान ही
लेगा, यह उक्त भाष्य का अर्थ है।