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सर्वकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 28, कुल 610 में से

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पृष्ठ 28

परिच्छेद ] प्रमाणादि-स्वीकार का कथाङ्गत्त्व-खण्डन ६

स च 'प्रमाणेन तर्केण च व्यवहर्तव्यं वादिना । प्रतिवादिनाऽपि कथाङ्गतत्त्व-
ज्ञानविपर्ययलिङ्गप्रतिज्ञाहान्याद्यन्यतम निग्रहस्थानं तस्य दर्शनीयम् । तद्व्युत्पादने
प्रथमस्य भङ्गो व्यवहर्त्तव्यः । अन्यथा तु द्वितीयस्यैव । तादृशेतरौ जेतृतया
व्यवहर्त्तव्यौ । प्रामाणिकः पक्षस्तात्त्विकतया व्यवहर्त्तव्यः' इत्यादिरूपः ।
अत एव व्यवहारनियमसमयबन्धेऽपि हेतुर्वक्तव्यः । तथा च सोऽपि कथायां
प्रवृत्तायामभिधातुं युक्त इति प्रमाणसत्त्वहेत्वभिधानवत् प्रत्यवस्थानमनवकाशम् ।
द्वाभ्यामपि वादिभ्यां विचारप्रवृत्त्या अभिलष्यमाणतत्त्वव्यवस्थाजयमूलत्वेन
व्यवहारनियमस्य स्वेच्छयैव परिगृहीतत्वात् ।
न चैवं प्रमाणानुपज्ञस्वेच्छामात्रपरिगृहीतमूलत्वात् मूलापरिशुद्धिसम्भवेन
सर्वविचारविचार्यफलविप्लुवापत्तिः स्यात् , १अविद्याविद्यमानाऽनादिपारम्पर्या-
यातस्य लोकव्युत्पत्तिगृहीतसंवादस्य च तस्य अन्यथाभावासम्भाव्यतालक्षणस्वतः-
सिद्धपरिशुद्धित्वात् ।
वह समय-बन्ध निम्नलिखित रूप है—वादी को प्रमाण तथा तर्क से स्वपक्ष की
सिद्धि करनी चाहिए और प्रतिवादी को कथाङ्ग तत्त्वज्ञान के विपर्यय ( अज्ञान वा
अतत्त्वज्ञान ) के हेतुभूत प्रतिज्ञाहानि आदि निग्रहस्थान दिखलाने चाहिए । यदि
प्रतिवादी निग्रह-स्थान का समर्थन कर सके, तो वादी की पराजय होगी और यदि न कर
सके, तो उसकी पराजय होगी । पराजित से अन्य जेता कहलायेगा । प्रमाण-
युक्त पक्ष यथार्थ माना जायगा ।
शंका—व्यवहार-नियम शास्त्रार्थ का कारण है, इसका साधन भी शास्त्रार्थ में
ही होगा । तब तो जिस शास्त्रार्थ में उसकी सिद्धि होगी, उसीमें व्यभिचार होने
तथा उसीके तुल्य अन्य शास्त्रार्थ का भी निर्वाह होने से व्यवहार-नियम भी शास्त्रार्थ
का अङ्ग सिद्ध नहीं होगा । खंडन—विचार ( शास्त्रार्थ ) की प्रवृत्ति से अभिलषित
तत्त्वज्ञान और विजयरूप फल का कारण होने से वादी और प्रतिवादी दोनों अपनी
इच्छा से समय-बन्ध को कारण मान लेते हैं ।
शंका—जब आप समय-बन्ध को प्रमाण के बिना स्वेच्छामात्र से ही विचार या
शास्त्रार्थ का कारण मान लेते हैं, तो उसका मूल परिशुद्ध ( प्रमाणसिद्ध ) नहीं रहा ।
फलतः शास्त्रार्थ, उससे विचारणीय तत्त्व और. फल ( विजयादि ) सिद्ध नहीं होंगे । तब
तो वादी भी स्वेच्छा से यह नियम बना सकता है कि ' 'हुँ फट्' का उच्चारण भी
१ अविद्यमानानादिपारम्पर्यायातस्येति विद्यासागरीसम्मतः पाठः । स एवानुसृतः ।