खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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उन्होंने किया है। इस प्रकार विज्ञानवाद लेकर और पदार्थों को अनिर्वचनीय बनाकर
जहाँ वे नैयायिकों का खण्डन कर देते हैं, वहाँ बाद में बौद्ध विज्ञानवाद का भी खण्डन
कर अपना अद्वैत सद्वाद प्रतिष्ठित करते हैं।
वे कहते हैं कि मिथ्याभूत जगत् का आश्रय सत् मानना ही पड़ेगा। सत् के
बिना मिथ्यात्व की उपपत्ति ही नहीं हो सकती। किन्तु उस मिथ्या का आश्रय ज्ञान
सर्वथा निरपेक्ष है। ज्ञान से भिन्न उसका आश्रय कोई पदार्थ नहीं है। नैयायिकी उन्हें
ज्ञान और विषय के सहभाव की जो अनुपपत्ति देते हैं, उस विषय में खण्डनकार कहते
हैं कि ज्ञान और विषय का सहभाव नियत ही नहीं है, कारण अतीत के ज्ञान में व्यभिचार
हो जाता है। वे ज्ञान और विषय का तादात्म्य भी नहीं मानते। कारण विषय नानारूप
होते हैं, जब कि ज्ञान का प्रकाश एकरूप होता है। फिर प्रकाश आन्तर वस्तु है, जब कि
विषय बाह्य। इस तरह ज्ञान और विषय का तादात्म्य कथमपि नहीं माना जा सकता।
फलतः यही कहना होगा कि सद्रूप ज्ञान में ही सारे पदार्थ कल्पित या मिथ्या हैं। उनका
सद्रूप, असद्रूप या सदसद्रूप से निर्वचन न हो सकने से वे अनिर्वचनीय हैं। 'अनिर्वचनी-
यतासर्वस्व' या खण्डन के निर्माण में श्रीहर्ष यही अभिप्राय रखते और सिद्ध करते हैं।
खण्डनकार ने इस ग्रन्थ में व्यावहारिक जगत् को अत्यन्त सत्य माननेवाले नैया-
यिकों के १६ पदार्थों या ७ पदार्थों (न्याय-वैशेषिक भेद से) का खण्डन किया है। सात
पदार्थों का प्रसङ्गानुसार यत्र-तत्र खण्डन हुआ है। मुख्यतः गौतम के प्रमाण, प्रमेय आदि
१६ पदार्थों का ही खण्डन है। आरंभ में ही उन्होंने प्रमाणादि-स्वीकार को कथा (वाद)
का अंग मानने की बात का खण्डनकर 'लक्षण-प्रमाणाभ्यां वस्तुसिद्धिः' उनके इस
सिद्धान्त पर पहला और जोरदार प्रहार किया है। फिर लक्षणों की बात आगे कर बताया
कि आप जितने सारे पदार्थ मानते हैं, उनके कोई निर्दुष्ट लक्षण ही नहीं बन पाते।
स्वयं प्रमाण और उनके अवान्तर भेदों का तथा लक्षण का ही जब लक्षण नहीं बन
पाता, तो औरों की बात ही क्या ?
खण्डनोक्त विषयों के वर्गीकरण पर ध्यान देने से यह बात स्पष्ट हो जाती है।
ग्रन्थ की भूमिका में श्रीहर्ष ने सर्वप्रथम प्रमाणादि-स्वीकार के शास्त्रार्थहेतुकत्व का खण्डन
किया है, यह हम ऊपर कह ही आये हैं। उसके बाद उन्होंने संक्षेप
खण्डन के प्रतिपाद्य विषय में शून्यवाद और अद्वैत (स्वप्रकाश) वाद का प्रतिपादन कर
दोनों में परस्पर भेद दिखलाया है। पश्चात् अद्वैत का साधन
और भेद का खण्डन किया गया है। इसी प्रसंग में ग्रन्थ-निर्माण का प्रयोजन तत्त्व-
निर्णय और विजय बतलाते हुए वाद, जल्प और वितण्डा—शास्त्रार्थके तीनों प्रकारों
तथा शून्यवाद, अद्वैतवाद या भेदवाद सभीमें खण्डनोक्त युक्तियों का एक-सा उपयोग है,
यह बतलाया। इस तरह ग्रन्थ की भूमिका समाप्त कर ग्रन्थ का मुख्य प्रतिपाद्य विषय
शुरू होता है। फिर प्रथम परिच्छेद में—लक्षणसामान्य का और क्रमशः प्रमा,
प्रमाण एवं उसके प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, अर्थापत्ति और अनुपलब्धिरूप
छः प्रकारों के लक्षणों का खण्डन किया गया। फिर असिद्ध, विरुद्ध, सव्यभिचार,