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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

प्रस्तावना एवं विषय-सूची

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कवितावली

हिन्दी अनुवाद सहित
अनुवादक
इन्द्र देवनारायण

मुद्रक तथा प्रकाशक
घनश्यामदास जालान
गीताप्रेस, गोरखपुर

सं० १९९४ से २००४ तक २४,२५०
सं० २००६ सप्तम संस्करण १०,०००
सं० २००७ अष्टम संस्करण १५,०००
कुल ४९,२५०

मूल्य ॥-) नौ आना

पता—गीताप्रेस, पो० गीताप्रेस (गोरखपुर)

निवेदन
श्रीइन्द्रदेवनारायणजीद्वारा अनुवादित इस कवितावलीके
अनुवादको संशोधन करनेमें श्रीयुत मुनिलालजी एवं सम्मान्य
पं० श्रीचिम्मनलालजी गोस्वामी एम्० ए०, शास्त्री, सम्पादक
कल्याण-कल्पतरुने जो परिश्रम किया है, उसके लिये हम
उनके हृदयसे कृतज्ञ हैं।
प्रकाशक

श्रीहरिः
विषय-सूची
विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ
बालकाण्ड २१-लक्ष्मण-मूर्च्छा ... ९९
१-बालरूपकी झाँकी ... ५ २२-युद्धका अन्त ... १०२
२-बाललीला ... ७ उत्तरकाण्ड
३-धनुर्यज्ञ ... ९ २३-रामकी कृपालुता ... १०५
४-परशुराम-लक्ष्मण-संवाद १६ २४-केवल रामहीसे माँगो १२०
अयोध्याकाण्ड २५-उद्बोधन ... १२३
५-वनगमन ... २० २६-विनय ... १२५
६-गुहका पाद-प्रक्षालन ... २३ २७-रामप्रेम ही सार है ... १२६
७-वनके मार्गमें ... २७ २८-नाम-विश्वास ... १४१
८-वनमें ... ३६ २९-कलिवर्णन ... १५५
अरण्यकाण्ड ३०-रामनाममहिमा ... १५८
९-मारीचानुधावन ... ३८ ३१-रामगुणगान ... १७२
किष्किन्धाकाण्ड ३२-रामप्रेमकी प्रधानता ... १७५
१०-समुद्रोल्लङ्घन ... ३९ ३३-रामभक्तिकी याचना ... १७९
सुन्दरकाण्ड ३४-प्रभुकी महत्ता और
११-अशोकवन ... ४० दयालुता ... १८२
१२-लंकादहन ... ४१ ३५-गोपियोंका अनन्य प्रेम १८७
१३-सीताजीसे विदाई ... ५९ ३६-विनय ... १८९
१४-भगवान् रामकी उदारता ६३ ३७-सीतावट-वर्णन ... १९१
लंकाकाण्ड ३८-चित्रकूट-वर्णन ... १९३
१५-राक्षसोंकी चिन्ता ... ६५ ३९-तीर्थराजसुषमा ... १९५
१६-त्रिजटाका आश्वासन ... ६६ ४०-श्रीगङ्गा-माहात्म्य ... १९६
१७-समुद्रोत्तरण ... ६९ ४१-अन्नपूर्णामाहात्म्य ... १९८
१८-अङ्गदजीका दूतत्व ... ७१ ४२-शङ्कर-स्तवन ... १९८
१९-रावण और मन्दोदरी ... ७६ ४३-काशीमें महामारी ... २१३
२०-राक्षस-वानर-संग्राम ... ८५ ४४-विविध ... २२०

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कवितावली
श्रीसीताराम

ॐ
श्रीसीतारामभ्यां नमः
कवितावली
बालकाण्ड
रेफ आत्मचिन्मय अकल, परब्रह्म पररूप।
हरि-हर-अज-वन्दित-चरन, अगुण अनीह अनूप ॥ १ ॥
बालकेलि दशरथ-अजिर, करत सो फिरत सभाम।
पदनखेन्दु तेहि ध्यान धरि, विरचत तिलक बनाय ॥ २ ॥
अनिलसुवन पदपद्मरज, प्रेमसहित शिर धार।
इन्द्रदेव टीका रचत, कवितावली उदार ॥ ३ ॥
बन्दौं श्रीतुलसीचरन-नख अनूप दुतिमाल।
कवितावलि-टीका लसै कवितावलि-वरभाल ॥ ४ ॥
बालरूपकी झाँकी
अवधेसके द्वारें सकारें गई सुत गोद कै भूपति लै निकसे।
अवलोकि हौं सोच विमोचनको ठगि-सी रही, जे न ठगे धिक-से॥
तुलसी मन-रंजन रंजित-अंजन नैन सुखंजन-जातक-से।
सजनी ससिमें समसील उभै नवनील सरोरुह-से बिकसे ॥१॥
[ एक सखी किसी दूसरी सखीसे कहती है—] मैं सबेरे
अयोध्यापति महाराज दशरथके द्वारपर गयी थी। उसी समय
महाराज पुत्रको गोदमें लिये बाहर आये। मैं तो उस सकल-
शोकहारी बालकको देखकर ठगी-सी रह गयी; उसे देखकर जो

कवितावली ६
मोहित न हों उन्हें धिक्कार है । उस बालकके अञ्जन-रञ्जित मनोहर
नेत्र खञ्जन पक्षीके बच्चेके समान थे । हे सखि ! वे ऐसे जान
पड़ते थे मानो चन्द्रमाके भीतर दो समान रूपवाले नवीन नील-
कमल खिले हुए हों ।
पग नूपुर औ पहुँची करकंजनि मंजु बनी मनिमाल हिएँ ।
नवनील कलेवर पीत झँगा झलकै पुलकैं नृपु गोद लिएँ ॥
अरबिंदु सो आननु रूप मरंदु अनंदित लोचन-भृंग पिएँ ।
मनमो न बस्यौ अस बालकु जौं तुलसी जगमें फलु कौन जिएँ ॥२॥
उस बालकके चरणोंमें घुँघुरू, करकमलोंमें पहुँची और
गलेमें मनोहर मणियोंकी माला शोभायमान थी । उसके नवीन श्याम
शरीरपर पीला झँगुला झलकता था । महाराज उसे गोदमें लेकर
पुलकित हो रहे थे । उसका मुख कमलके समान था, जिसके रूप-
मकरन्दका पानकर [ देखनेवालोंके ] नेत्ररूप भौंरे आनन्दमग्न हो
जाते थे । श्रीगोसाईंजी कहते हैं—यदि मनमें ऐसा बालक न बसा
तो संसारमें जीवित रहनेसे क्या लाभ है ?
तनकी दुति स्याम सरोरुह लोचन कंजकी मंजुलताई हरैं ।
अति सुंदर सोहत धूरि भरे छबि भूरि अनंगकी दूरि धरैं ॥
दमकैं दँतियाँ दुति दामिनि ज्यौं किलक कल बालबिनोद करैं ।
अवधेसके बालक चारि सदा तुलसी-मन-मंदिरमें बिहरैं ॥३॥
उनके शरीरकी आभा नीलकमलके समान है तथा नेत्र कमल-
की शोभाको हरते हैं । धूलिसे भरे होनेपर भी वे बड़े सुन्दर जान
पड़ते हैं और कामदेवकी महती छबिको भी दूर कर देते हैं । उनके
नन्हे-नन्हे दाँत बिजलीकी चमकके समान चमकते हैं और वे

किलक-किलककर मनोहर बाललीलाएँ करते हैं। अयोध्यापति महाराज
दशरथके वे चारों बालक तुलसीदासके मनमन्दिरमें सदैव विहार करें।
बाललीला
कबहूँ ससि मागत आरि करैं कबहूँ प्रतिबिंब निहारि डरैं।
कबहूँ करताल बजाइकें नाचत मातु सबै मन मोद भरैं ॥
कबहूँ रिसिआइ कहैं हठिकै पुनि लेत सोई जेहि लागि अरैं।
अवधेसके बालक चारि सदा तुलसी-मन-मंदिरमें बिहरैं ॥४॥
कभी चन्द्रमाको माँगनेका हठ करते हैं, कभी अपनी परछाईं
देखकर डरते हैं, कभी हाथसे ताली बजा-बजाकर नाचते हैं जिससे
सब माताओंके हृदय आनन्दसे भर जाते हैं। कभी रूठकर
हठपूर्वक कुछ कहते ( माँगते ) हैं और जिस वस्तुके लिये अड़ते
हैं उसे लेकर ही मानते हैं। अयोध्यापति महाराज दशरथके वे चारों
बालक तुलसीदासके मन-मन्दिरमें सदैव विहार करें।
बर दंतकी पंगति कुंदकली अधराधर-पल्लव खोलनकी।
चपला चमकै घन बीच जगै छबि मोतिन माल अमोलनकी ॥
घुँघुरारि लटैं लटकैं मुख ऊपर कुंडल लोल कपोलनकी।
नेवछावरि प्रान करै तुलसी बलि जाउँ लला इन बोलनकी ॥५॥
कुन्दकलीके समान उज्ज्वलवर्ण दन्तावली, अधरपुटोंका खोलना
और अमूल्य मुक्तामालाओंकी छवि ऐसी जान पड़ती है मानो
श्याममेघके भीतर बिजली चमकती हो। मुखपर घुँघुराली अलकें
लटक रही हैं। तुलसीदासजी कहते हैं—लल्ला ! मैं कुण्डलोंकी
झलकसे सुशोभित तुम्हारे कपोलों और इन अमोल बोलोंपर अपने
प्राण न्यौछावर करता हूँ।

कवितावली ८
पद कंजनि मंजु बनीं पनहीं, धनुहीं सर पंकज-पानि लिएँ।
लरिका सँग खेलत डोलत हैं सरजू-तट चौहट हाट हिएँ॥
तुलसी अस बालक सों नहि नेहु कहा जप जोग समाधि किएँ।
नर वे खर सूकर स्वान समान कहौ जगमें फलु कौन जिएँ ॥६॥
उनके चरणकमलोंमें मनोहर जूतियाँ सुशोभित हैं, वे
करकमलोंमें छोटा-सा धनुष-बाण लिये हुए हैं, बालकोंके साथ
सरयूजीके किनारे, चौराहे और बाजारोंमें खेलते फिरते हैं।
तुलसीदासजी कहते हैं—यदि ऐसे बालकोंसे प्रेम न हुआ तो
बताइये जप, योग अथवा समाधि करनेसे क्या लाभ है? वे लोग
तो गधों, शूकरों और कुत्तोंके समान हैं, बताइये संसारमें उनके
जीनेका क्या फल है ?
सरजू बर तीरहिं तीर फिरैं रघुबीर सखा अरु बीर सबै।
धनुहीं कर तीर, निषंग कसें कटि पीत दुकूल नवीन फबै॥
तुलसी तेहि औसर लावनिता दस चारि नौ तीन इक्कीस सबै।
मति भारति पंगु भई जो निहारि बिचारि फिरी उपमा न पवै ॥७॥
श्रीरघुनाथजी, उनके सखा और सब भाई पवित्र सरयू नदीके
किनारे-किनारे घूमते फिरते हैं। उनके हाथमें छोटे-छोटे धनुष-बाण
हैं, कमरमें तरकस कसा हुआ है और शरीरपर नूतन पीताम्बर सुशोभित
है। तुलसीदासजी कहते हैं—श्रीशारदाकी मति उस समयकी सुन्दरताकी
उपमा चौदहों भुवन, नवों खण्ड, तीनों लोक और इक्कीसों ब्रह्माण्डोंमें
जब विचारपूर्वक खोजनेपर भी नहीं पा सकी तब कुण्ठित हो गयी*।

  • उस समय शोभाकी उपमा पानेके लिये शारदा दसों यामल-तन्त्र,
    चारों उपवेद, नवों व्याकरण, वेदत्रयी और इक्कीसों ब्रह्माण्डोंमें सर्वत्र फिरीं,

९ बालकाण्ड
धनुर्यज्ञ
छोनीमेंके छोनीपति छाजैं जिन्हें छत्रछाया
छोनी-छोनी छाए छिति आए निमिराजके ।
प्रबल प्रचंड बरिबंड बर वेष बपु
बरिबेकों बोले बैदेही वर काजके ॥
बोले बंदी बिरुद बजाइ बर बाजनेऊ
बाजे-बाजे बीर बाहु धुनत समाजके।
तुलसी मुदित मन पुर नर-नारि जेते
बार-बार हेरैं मुख औध-मृगराजके ॥ ८॥
जिनके ऊपर राजछत्रोंकी छाया शोभायमान है ऐसे पृथ्वीभरके
परन्तु उन सबको देख और विचारकर भी उसकी बुद्धि कुण्ठित हो गयी ।
अर्थात् उसे उस शोभाके योग्य कोई भी उपमा नहीं मिली।
काशी-नागरी-प्रचारिणी सभाकी प्रतिमें यों अर्थ है -
दस गुण माधुर्यके ( रूप, लावण्य, सौन्दर्य, माधुर्य, सौकुमार्य, यौवन,
सुगन्ध, सुवेष, स्वच्छता, उज्ज्वलता )
चार गुण प्रतापके ( ऐश्वर्य, वीर्य, तेज, बल ) ।
ऐश्वर्यके नौ गुण ( भाग्य, अदभ्रता, नियतात्मता, वशीकरण,
वाग्मित्व, सर्वज्ञता, संहनन, स्थिरता, वदान्यता ) ।
सहज या प्रकृतिके तीन गुण ( सौम्यता, रमण, व्यापकता ) ।
यशके इक्कीस गुण ( सुशीलता, वात्सल्य, सुलभता, गम्भीरता, क्षमा,
दया, करुणा, आर्द्रता, उदारता, आर्जव, शरण्यत्व, सौहार्द, चातुर्य,
प्रीतिपालकत्व, कृतज्ञता, ज्ञान, नीति, लोकप्रियता, कुलीनता, अनुराग,
निर्वहणता ) ।