सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

पृष्ठ 27, कुल 228 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 27

कवितावली २४
[ केवट कहता है—] इस घाटसे थोड़ी ही दूरपर केवल
कमरभर जल है । चलिये, मैं थाह दिखला दूँगा । [ मैं नावपर
तो आपको ले नहीं जाऊँगा, क्योंकि यदि अहल्याके समान ]
आपकी चरण-रजका स्पर्शकर मेरी नावका भी उद्धार हो गया तो
मैं घरकी स्त्रीको कैसे समझाऊँगा ? मुझको [ जीविकाके लिये ]
और कुछ अवलम्ब नहीं है । अतः फिर अपने बाल-बच्चोंका पालन
मैं किस प्रकार करूँगा ? हे नाथ ! बिना आपके चरण धोये मैं
नावपर नहीं चढ़ाऊँगा, चाहे आप मुझे मार डालिये ।
रावरे दोषु न पायनको, पगधूरिको भूरि प्रभाउ महा है ।
पाहन तें बन-बाहनु काठको कोमल है, जलु खाइ रहा है ॥
पावन पाय पखारि कै नाव चढ़ाइहौं, आयसु होत कहा है ।
तुलसी सुनि केवटके बर वैन हँसे प्रभु जानकी ओर हहा है ॥
इसमें आपके चरणोंका कोई दोष नहीं है । आपके चरणकी
धूलिका प्रभाव ही बहुत बड़ा है [ जिसके स्पर्शसे अहल्या पत्थरसे
सुन्दरी स्त्री हो गयी, उससे इस नौकाका उद्धार हो जाना कौन
बड़ी बात है ? [क्योंकि] पत्थरकी अपेक्षा तो यह काठका जलयान
कोमल है और तिसपर यह पानी खाये हुए है अर्थात् पानीमें
रहनेसे और भी अधिक कोमल हो गया है । अतः मैं तो आपके
पवित्र चरणकमलको धोकर ही नावपर चढ़ाऊँगा; कहिये, क्या
आज्ञा है ? गोसाईंजी कहते हैं कि केवटके ये श्रेष्ठ [ चतुरताके ]
वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजी जानकीजीकी ओर देखकर ठहाका
मारकर हँसे ।