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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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२५ अयोध्याकाण्ड
पात भरी सहरी, सकल सुत वारे-बारे,
केवटकी जाति, कछु वेद न पढ़ाइहौं।
सबु परिवारु मेरो याहि लागि, राजा जू,
हौं दीन बित्तहीन, कैसें दूसरी गढ़ाइहौं ॥
गौतमकी घरनी ज्यों तरनी तरेगी मेरी,
प्रभुसों निषादु ह्वै कै बादु ना बढ़ाइहौं।
तुलसीके ईस राम, रावरे सों साँची कहौं,
बिना पग धोएँ नाथ, नाव ना चढ़ाइहौं ॥ ८ ॥
घरमें पत्तलभर मछलीके सिवा और कुछ नहीं है और बच्चे
सब छोटे-छोटे हैं [ अभी कमाने योग्य नहीं हैं ] । जातिका मैं
केवट हूँ, उन्हें कुछ वेद तो पढ़ाऊँगा नहीं । राजाजी ! मेरा तो
सारा परिवार इसीके आश्रय है, तथा मैं धनहीन और दरिद्र हूँ,
दूसरी नौका भी कहाँसे बनवाऊँगा । यदि गौतमकी स्त्रीके समान
मेरी यह नाव भी तर गयी तो हे प्रभो ! जातिका निषाद होकर मैं
आपसे बात भी नहीं बढ़ा सकूँगा ( झगड़ नहीं सकूँगा ) । हे
नाथ ! हे तुलसीश राम ! आपसे मैं सच कहता हूँ, बिना पैर
धोये आपको नावपर नहीं चढ़ाऊँगा ।
जिन्हको पुनीत बारि धारैं सिरपै पुरारि,
त्रिपथगामिनि-जसु वेद कहैं गाइकै।
जिन्हको जोगींद्र मुनि बृंद देव देह दमि,
करत बिबिध जोग-जप मनु लाइकै॥
तुलसी जिन्हकी धूरि परसि अहल्या तरी,
गौतम सिधारे गृह गौनो-सो लेवाइकै।