कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३ अयोध्याकाण्ड
जाना जाता है, परन्तु भरतकी माताको क्या ऐसा करना उचित था ?
तुमने राजाके घरमें जन्म लिया, राजाके घर ही ब्याही गयीं,
राज्याधिकारी ( सर्वज्येष्ठ ) पुत्र भी पाया; पर तो भी तुम सुखलाभ
न कर सकीं । देखो, चन्द्रमाका शरीर अमृतका आश्रय है; किन्तु
उसे मृगने कलंकित कर दिया और ऊपरसे बाहुरहित राहु भी
उसे ग्रस लेता है ।'
गुहका पादप्रक्षालन
नाम अजामिल-से खल कोटि अपार नदीं भव बूड़त काढ़े ।
जो सुमिरें गिरि मेरु सिलाकन होत, अजाखुर वारिधि बाढ़े ॥
तुलसी जेहि के पदपंकज तें प्रगटी तटिनी, जो हरै अघ गाढ़े ।
ते प्रभु या सरिता तरिवे कहूँ मागत नाव करारें ह्वै ठाढ़े ॥
जिसके नामने संसाररूपी अपार नदीमें डूबते हुए अजामिल-
जैसे करोड़ों पापियोंका उद्धार कर दिया और जिसके स्मरणमात्रसे
सुमेरुके समान पर्वत पत्थरके कणके बराबर और बढ़ा हुआ समुद्र
भी बकरीके खुरके समान हो जाता है; गोसाईंजी कहते हैं—
जिनके चरणकमलसे ( श्रीगङ्गा ) नदी प्रकट हुई हैं, जो बड़े-बड़े
पापोंका नाश करनेवाली हैं, वे समर्थ श्रीरामचन्द्रजी इस नदीको
पार करनेके लिये किनारेपर खड़े होकर नाव माँग रहे हैं ।
एहि घाटतें थोरिक दूरि अहै कटि लौं जलु, थाह देखाइहौं जू ।
परसें पगधूरि तरै तरनी, घरनी घर क्यों समुझाइहौं जू ॥
तुलसी अवलंबु न और कछू, लरिका केहि भाँति जियाइहौं जू ।
बरु मारिए मोहि, बिना पग धोएँ हौं नाथ न नाव चढ़ाइहौं जू॥