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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

पृष्ठ 25, कुल 228 में से

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पृष्ठ 25

बाम बिधि मेरो सुखु सिरिस-सुमन-सम,
ताको छल-छुरी कोह-कुलिस लै टेई है ॥ ३॥
कौसल्याजी प्रेमसे विह्वल होकर सुमित्राजीसे कहती हैं-
"हे सखि ! मैंने कैकेयीको कभी सौत नहीं समझा, सदा
अपनी बहिनके समान उसका पालन किया । जब रामचन्द्र
मुझको मैया कहते थे तो मैं यही कहती थी, 'मैं तेरी नहीं,
भरतकी माता हूँ ! मैया ! मैं तेरी बलैया लेती हूँ-तेरी माता तो
कैकेयी है ।' [ गोसाईंजी कहते हैं ] रामचन्द्रने भी सरल भावसे
मन-वचन-कर्मसे कैकेयीको माता ही माना, कभी विमाता नहीं
समझा । परन्तु वाम विधाताने हमारे सिरस-सुमनसदृश सुकुमार
सुख (को काटने) के लिये छलरूपी छुरीको वज्रपर पैनाया है।"
कीजै कहा, जीजी ! जू सुमित्रा परि पायँ कहै,
तुलसी सहावै बिधि, सोई सहियतु है।
रावरो सुभाउ राम-जन्म ही तें जानियत,
भरतकी मातु को की ऐसो चहियतु है ॥
जाई राजघर, ब्याहि आई राजघर माहँ,
राज-पूतं पाएहूँ न सुखु लहियतु है।
देह सुधागेह, ताहि मृगहूँ मलीन कियो,
ताहू पर बाहु बिनु राहु गहियतु है ॥ ४ ॥
सुमित्राजी कौसल्याजीके पैरोंपर पड़कर कहती हैं-
'बहिनजी ! क्या किया जाय ? विधाता जो कुछ सहाता है
वह सहना ही पड़ता है। आपका स्वभाव तो रामजीके जन्महीसे