कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 24, कुल 228 में से
संदर्भ में पढ़ें२१ अयोध्याकाण्ड
अयोध्याको सहर्ष त्याग दिया और रास्तेके संगी-साथियोंको त्यागनेमें
जैसे मोह नहीं सताता वैसे ही पुरवासी नर-नारियोंको त्यागनेमें
उन्हें कोई हिचकिचाहट नहीं हुई। तात्पर्य यह कि जैसे बटोही
मार्गकी सब वस्तुओंको बिना खेद त्याग कर चला जाता है वैसे ही
श्रीरामचन्द्रजी अपने पिताके राज्यादिको किसी अन्य पुरुषके समान
त्याग कर चल दिये। ]
कागर कीर ज्यों भूषन-चीर सरीरु लस्यो तजि नीरु ज्यों काई।
मातु-पिता प्रिय लोग सबै सनमानि सुभायँ सनेह सगाई॥
संग सुभामिनि, भाइ भलो, दिन द्वै जनु औध हुते पहुनाई।
राजिवलोचन रामु चले तजि बापको राजु बटाउ कीं नाईं॥
भगवान्के लिये वस्त्र और आभूषण तोतेके पंखके समान थे।
उन्हें त्याग देनेपर उनका शरीर ऐसा सुशोभित हुआ जैसे
काईको हटानेपर जल। माता-पिता और प्रिय लोगोंको स्वभावसे
ही उनके स्नेह और सम्बन्धानुसार सम्मानित कर कमलनयन
भगवान् राम साथमें सुन्दर स्त्री और भले भाईको ले अपने पिताका
राज्य अन्य पुरुषकी भाँति छोड़कर चल दिये, मानो वे अयोध्यामें
दो ही दिनकी मेहमानीपर थे।
सिथिल सनेहँ कहैं कौसिला सुमित्राजू सों,
मैं न लखी सौति, सखी! भगिनी ज्यों सेई है।
कहै मोहि मैया, कहौं मैं न मैया, भरतकी,
बलैया लेहौं भैया, तेरी मैया कैकेई है॥
तुलसी सरल भायँ रघुरायँ माय मानी,
काय-मन-बानीहूँ न जानी कै मतेई है।