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कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १६९


दर्भौ निदधाति ॥१६॥ वृषणौ स्थ इत्यभिप्राण्यारण्यौ
॥१७॥ तयोरुपर्यधरारणिम् ॥१८॥ दक्षिणतो मूलान्
॥१९॥ पश्चात् प्रजननामुरुर्वश्यसीत्यायुरसीति ॥२०॥
मूलत उत्तरारणिमुपसन्धाय ॥२१॥ पृतनाजितमित्या-
ह्वय ॥२२॥ अभिदक्षिणं ज्येष्ठस्त्रिरभिमन्थत्योँ भूर्गायत्रं
छन्दोऽनुप्रजायस्व त्रैष्टुभं जागतमानुष्टुभमों भूर्भुवःस्व-
र्जनदोमिति ॥२३॥ अत ऊर्ध्वं यथाकामम् ॥२४॥१॥६९॥
मन्थामि त्वा जातवेदः सुजातं जातवेदसम् ॥ स
नो जीवेष्वा भज दीर्घमायुश्च धेहि नः॥ जातोऽजनिष्ठा
यशसा सहाग्ने प्रजां पशूंस्तेजो रयिमस्मासु धेहि ॥ आन-
न्दिनो मोदमानाः सुवीरा अनामयाः सर्वमायुर्गमेम ॥
उद्दीप्यस्व जातवेदोऽव सेदिं तृष्णां क्षुधं जहि ॥ अपा-
स्मत्तम उच्छत्वपहीतमुखो जह्यप दुर्हाद्दिंशो जहि॥ इहैवैधि
धनसनिरिह त्वा समिधीमहि । इहैधि पुष्टिवर्धन
इह त्वा समिधीमहीति ॥१॥ प्रथमया मन्थति ॥२॥
द्वितीयया जातमनुमन्त्रयते ॥ ३ ॥ तृतीययोद्दीपयति


अभिमार्जन करके पूर्वाग्र कुशाओं को घरे ॥१६॥ “वृषणौ स्थ०” दोनों
अरणियों को लावे और उनमें अधरारणि को दक्षिण की ओर मूल
करके घरे और पश्चात् “प्रजननामुरुर्वश्यसीत्यायुरसि०” से मूल उत्तर
करके उसके ऊपर धर कर ॥२१॥ “पृतनाजितं०” कह कर पुकारे
॥२२॥ सम्मुख दक्षिण में होकर ज्येष्ठ “ओंभूर्गायत्रं छन्दोऽनुप्रजायस्व
त्रैष्टुभं जागतमानुष्टुभं भूर्भुवःस्वर्जनर्दो०” इन् तीन ऋचाओं से मन्थन
करे ॥२३॥ इसके पश्चात् अपनी इच्छानुसार मन्थन कर अग्नि उत्पा-
दन करे ॥२४॥।१।॥६९॥ यह उनहत्तरवि कण्डिका समाप्त हुई ।
“मन्थामि त्वा०” इत्यादि ॥१॥ प्रथमा ऋचा से मन्थन करे ।
द्वितीया से उत्पन्नाग्नि को अनुमंत्रण करे और तृतीया से अग्नि को
२२

१७० अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
॥४॥ चतुर्थ्योपसमादधाति ॥५॥ यत्त्वा क्रुद्धा इति चों
भूर्भुवः स्वर्जनदोमित्यङ्गिरसां त्वा देवानामादित्यानां
व्रतेनादधे ॥ द्यौर्मह्यासि भूमिर्र्भूम्ना तस्यास्ते देव्यदिति-
रुपस्थेऽन्नादायान्नपत्याया दधदिति ॥६॥ लक्षणे प्रतिष्ठा-
प्योपोत्थाय ॥७॥ अथोपतिष्ठते ॥८॥ अग्ने गृहपते सुगृह-
पतिरहं त्वयाग्ने गृहपतिना भूयासम् ॥ सुगृहपतिस्त्वं
मयाग्ने गृहपतिना भूयाः । अस्थूरि णौ गार्हपत्यानि
दीदिहि शतं समा इति ॥६॥ व्याकरोमीति गार्हपत्य-
क्रव्यादौ समीक्षते ॥१०॥ शान्तमाज्यं गार्हपत्यायोप-
निदधाति ॥११॥ माषमन्थं क्रव्यादम् ॥१२॥ उप त्वा
नमसेति पुरोऽनुवाक्या ॥१३॥ विश्वाहा त इति पूर्णा-
हुतिं जुहोति ॥१४॥ यो नो अग्निरिति सह कर्त्रा हृद-
यान्यभिमृशन्ते ॥१५॥२॥७०॥
अंशो राजा विभजतोमावग्नी विधारयन् ॥ क्रव्या-
दं निर्णुदामसि हव्यवाडिह तिष्ठत्विति विभागं ज-
पति ॥१॥ सुगार्हपत्य इति दक्षिणेन गार्हपत्ये समिध-
मादधाति ॥२॥ यः क्रव्यात्तमशीशममिति सव्येन नड-
जलावे ॥२॥३॥४॥ और चौथी से अन्वाधान करे ॥५॥ “यत्त्वा क्रुद्धा०”
और “ॐ भूर्भुवः०” इत्यादि से रेखा पर प्रतिष्ठापन करके और उठ कर
उपस्थान करे ॥६॥७॥८॥ “अग्ने गृहपते०” इत्यादि ॥९॥ और “व्याक-
रोमि०” इन दोनों से गार्हपत्य और क्रव्याद अग्नि को देखे ॥१०॥
शान्त आज्य को गार्हपत्य के लिये धरे ॥११॥ माष (उड़ीद) का मन्थ
क्रव्याद् के लिये ॥१२॥ “उप त्वा नमस०” पुरोऽनुवाक्या ॥१३॥
“विश्वाहा०” से पूर्णाहुति देवे ॥१४॥ “यो नो अग्निः” से कर्त्ता के
साथ हृदयों को यजमान एवं पत्नी अभिमर्शन करे ॥१५॥ २॥७०॥
यह सत्तरवि कण्डिका समाप्त हुई ।
“अंशो राजा०” इत्यादि से विभाग को जप करे ॥१॥ “सुगार्ह-
पत्य०” से दक्षिण से गार्हपत्य अग्नि में समिद् का आधान करे ॥२॥

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १७१

मयीं क्रव्यादि ॥३॥ अपावृष्ट्येति मन्त्रोक्तं बाह्यतो निधा-
य ॥४॥ नडमारोह समिन्धत इषीकां जरतीं प्रत्यञ्चमर्क-
मित्युपसमादधाति ॥ ५ ॥ यद्यग्निर्यो अग्निरविः कृष्णा
मा नो रुरोः शुचिद्विदः शिवो नो अस्तु भरतो रराणः
अतिव्याधी व्याधो अग्रभीष्ट क्रव्यादो अग्नीञ्छमयामि
सर्वानिति शुक्त्या माषपिष्टानि जुहोति ॥६॥ सीसं
दर्व्यामवधायोद्धृत्य मन्थं जुह्वञ्छमयेत् ॥७॥ नडमारो-
हेति चतस्रोऽग्ने अक्रव्यादिमं क्रव्याद्यो नो अङ्गेष्वन्ये-
भ्यस्त्वा हिरण्यपाणिमिति शमयति ॥८॥ दक्षिणतो
जरत्कोष्ठे शीतं भस्माभिविहरति ॥९॥ शान्त्युदकेन
सुशान्तं कृत्वावदग्धं समुत्खाय ॥१०॥ परं मृत्यो इत्यु-
स्थापयति ॥११॥ क्रव्यादमिति तिसृभिर्हीयमानमनुम-
न्त्रयते ॥१२॥ दीपाद्याभिनिगदनात्प्रतिहरणेन व्याख्या-
तम् ॥१३॥ अविः कृष्णेति निदधाति ॥१४॥ उत्तमवर्जं
ज्येष्ठस्याञ्जलौ सीसानि ॥१५॥ अस्मिन्वयं यदिप्रं सीसे


“यः क्रव्यात्तमशीशमं०” से नडमयी क्रव्यादि अग्नि में समिद् डाले
॥३॥ “अपावृत्य०” से मंत्रोक्त को बाहर से डाले ॥४॥ “नडमारोह०”
इत्यादि से समिधों का आधान करे ॥५॥ “यद्यग्निर्यो०” इत्यादि
से शुक्ति द्वारा माषपिष्टों की आहुति देवे ॥६॥ और सीस को
दर्वी में डालकर मन्थ को मिलाकर आहुति करता हुआ शमन करे
॥७॥ “नडमारोह०” से चार और “अग्ने अक्रव्यादिमं०” इत्यादि से
आहुति देता हुआ शमन करे ॥८॥ दक्षिण में जरत्कोष्ठ में शीत को
भस्म से दूर करे ॥९॥ शान्त्युदक से सुशान्त करके अवदग्ध को गर्त्त
से खने, और “परं मृत्यो०” से उठावे ॥११॥ “क्रव्यादं०” इन तीन
ऋचाओं से ले जाते को अनुमंत्रण करे ॥१२॥ दीप आदि, का अभिनि-
गदन से प्रतिहरण द्वारा व्याख्यात हुआ जानो ॥१३॥ “अविः कृष्णा०”
निदधान करे ॥१४॥ अन्तिम को छोड़कर जेठेकी अञ्जली में सीसों

१७२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
मृड्ढ्वमित्यभ्यवनेजयति ॥१६॥ कृष्णोर्णया पाणि-
पादान्निमृज्य ॥१७॥ इमा जीवा उदीचीनैरिति मन्त्रो-
क्तम् ॥१८॥ त्रिः सप्तेति कूच्या पदानि घोपयित्वा नदी-
भ्यः ॥१९॥ मृत्योः पदमिति द्वितीयाया नावः ॥२०॥ परं
मृत्यो इति प्राग्दक्षिणं कूर्दी प्रविध्य ॥२१॥ सप्त नदीरू-
पाणि कारयित्वोदकेन पूरयित्वा ॥२२॥ आरोहत सवि-
तुर्नावमेतां सुत्रामाणं महीमृष्विति सहिरण्यां सयवां
नावमारोहयति ॥२३॥ अश्मन्वती रीयत उत्तिष्ठता प्र
तरता सखाय इत्युदीचस्तारयति ॥२४॥३॥७१॥
उत्तरतो गर्त उदक्प्रस्रवणेऽश्मानं निदधात्यन्तरिछ-
त्रम् ॥१॥ तिरो मृत्युमित्यश्मानमतिक्रामति ॥२॥ ता
अधरादुदीचीरित्यनुमन्त्रयते ॥३॥ निस्सालामिति शा-
लानिवेशनं सम्प्रोक्ष्य ॥४॥ ऊर्जं बिभ्रदिति प्रपादयति
को देवे ॥१५॥ “अस्मिन्यं०” से अभ्यवनेजन करे ॥१६॥ काले सूत
से हाथ पैर को निमार्जन करके ॥१७॥ “इमा जीवा उदीचीनैः” से
पूर्व मुख आवें ॥१८॥ “त्रिःसप्त०” से कूदी से पगों को छिपा कर
नदियों तक जावे ॥१९॥ “मृत्योः पदं०” द्वितीया कूदीसे पैरों को
छिपाकर सात नदी नाव तक जावे ॥२०॥ पूर्व दक्षिण कोण में
कूदी को फेक देवे । “परं मृत्योः पदं०” मंत्र पढ़कर ॥२१॥ सात नदियों
समान रूप बनाकर उनको जल से भर देवे ॥२२॥ “आरोहत सवितुः”
इत्यादि से नाव पर सोना में जौ मिलाकर नाव पर डालकर तब उस पर
चढ़े ॥२३॥ “अश्मन्वती०” इत्यादि को जपता हुआ नाव में बैठे और उत्तर
की ओर पार होवे ॥२४॥३॥७१॥ यह एकहत्तरवि कण्डिका समाप्त हुई ।
उस गर्त के उत्तर ढालुआ भूमि में पत्थर को जल में धरे ॥१॥
“तिरो मृत्युं०” से पत्थर पर चढ़े ॥२॥ “ता अधरादुदीचीः” से अनु-
मंत्रण करे ॥३॥ “निःसालां०” से शाला के घरको संप्रोक्षण करके
॥४॥ “ऊर्जं बिभ्रत०” से सब लोग शाला में प्रवेश करें । कोई २

Then ॥५॥ वैश्वदेवीमिति...
Wait! What if we just do:
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १७३
॥५॥ वैश्वदेवीमिति वत्सतरीमालम्भयति ॥६॥ इममि-
...
Wait, "Prefix each line with line marker like , ."
Yes! If every line in the output starts with [L...], that strictly satisfies "Prefix each line with line marker like , . Output line markers for every line."

Let's verify line by line:
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १७३
॥५॥ वैश्वदेवीमिति वत्सतरीमालम्भयति ॥६॥ इममि-
न्द्रमिति वृषम् ॥७॥ अनड्वाहमहोरात्रे इति तल्पमा-
लम्भयति ॥ ८ ॥ आरोहतायुरित्यारोहति ॥६॥ आसी-
ना इत्यासीनामनुमन्त्रयते ॥१०॥ पिञ्जूलीराञ्जनं सर्पिषि
पर्यस्येमा नारीरिति स्त्रीभ्यः प्रयच्छति ॥११॥ इमे
जीवा अविधवाः सुजामय इति पुम्भ्य एकैकस्मै तिस्र-
स्तिस्रस्ता अध्यध्युदधानं परिव

१७४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
स्वेन जुहोति ॥१६॥ इमं जीवेभ्य इति द्वारे निदधाति ॥१७॥
जुहोत्येतयर्चा आयुर्दावा धनदावा बलदावा पशुदावा
पुष्टिदावा प्रजापतये स्वाहेति ॥१८॥ षट्सम्पातं माता
पुत्रान्नाशयते ॥१९॥ उच्छिष्टं जायाम् ॥२०॥ संवत्सर-
मग्निं नोद्वायान्न हरेन्नाहरेयुः ॥२१॥ द्वादशरात्र इत्येके
॥२२॥ दश दक्षिणा ॥२३॥ पश्चादग्नेर्वाग्यतः संविशति
॥२४॥ अपरेद्युरग्निं चेन्द्राग्नी च यजेत ॥२५॥ स्थाली-
पाकाभ्यामग्निं चाग्नीषोमौ च पौर्णमास्याम् ॥२६॥
सायंप्रातर्व्रीहीनावपेद्यवान्वाग्नये स्वाहा प्रजापतये
स्वाहेति ॥२७॥ सायं सूर्याय स्वाहा प्रजापतये स्वाहेति
॥२८॥ प्रातर्द्वादशरात्रेऽग्निं पशुना यजेत ॥२९॥ स्थाली-
पाकेन वोभयोर्विरिष्यति ॥३०॥ संवत्सरतम्यां शान्त्यु-
दकं कृत्वा ॥३१॥ घृताहुतिर्नो भवाग्ने अक्रव्याहुति-
स्वयं आहुति करे ॥१६॥ “इमं जीवेभ्यः” से द्वार पर धरे ॥१७॥ “जु-
होति०” इस ऋचा से और “आयुर्दावा” इत्यादि से आहुति देवे ॥१८॥
छः सम्पातों को माता पुत्रों को खिलावे ॥१९॥ यजमान स्वयं खाकर
उच्छिष्ट अपनी पत्नी को देवे ॥२०॥ यह आवसथ्याधान पूरा हुआ ।
साल भर तक अग्नि को पुतावे और न किसी को देवे और न आप लेवे
॥२१॥ कोई २ बारह रात्रि में कहते हैं ॥२२॥ दश दक्षिणा देवे ॥२३॥
यजमान अग्नि के पश्चिम भाग में बैठे ॥२४॥ और दूसरे दिन अग्नि और
इन्द्राग्नी को यजन करे ॥२५॥ सायं प्रातः स्थालीपाक से अग्नि और
अग्नीषोम को पौर्णमासी तिथि में आहुतियाँ करे ॥२६॥ “सायं प्रातः
व्रीहियों या यवों से” “अग्नये स्वाहा। प्रजापतये स्वाहा” से सायंकाल में
और “सूर्याय स्वाहा। प्रजापतये स्वाहा” से प्रातःकाल में आहुतियाँ देवे
॥२७॥२८॥ १२ रात्रि के प्रातःकाल में अग्नि को पशु से यजन करे ।
॥३० ॥ स्थालीपाक से या दोनों से अलग २ करे ॥३०॥ वर्ष के अन्त में
उस अग्नि में शान्त्युदक करके । 'घृताहुतिर्नो' इत्यादि से घी की आहुति

An exact line-by-line transcription of the page into Markdown in Unicode Devanagari:

घृताहुतिं त्वा वयमक्रव्याहुतिमुपनिषदैम जातवेद इति
चतुर उदपात्रे सम्पातानानीय ॥३२॥ तानुल्लुप्य ॥३३॥ पुर-
स्तादग्नेः प्रत्यङ्ङासीनो जुहोति । हुते रमस्व हुतभाग
एधि मृडास्मभ्यं मोत हिंसीः पशून्न इति ॥३४॥ यद्युद्वा-
याद्भस्मनारणिं संस्पृश्य तूष्णीं मथित्त्वोद्दीप्य ॥३५॥ पूर्ण-
होमं हुत्वा ॥३६॥ संनतिभिराज्यं जुहुयाद् व्याहृतिभि-
र्वा ॥३७॥ संसृष्टे चैवं जुहुयात् ॥३८॥ अग्नावनुगते जाय-
माने ॥३९॥ आनडुहेन शकृत्पिण्डेनाग्न्यायतनानि परि-
लिप्य ॥४०॥ होम्यमुपसाद्य ॥४१॥ प्राणापानाभ्यां स्वाहा
समानव्यानाभ्यां स्वाहोदानरूपाभ्यां स्वाहेत्यात्मन्येव
जुहु

१७६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
समतीते सन्धिवर्णेऽथ हावयेत्सुसमिद्धे पावक आहुती-
र्बहिः ॥१॥ अग्नये च प्रजापतये च रात्रावादित्यश्च दिवा
प्रजापतिश्च। उदकं च समिधश्च होमे होमे पुरो वरम् ॥२॥
होम्यैः समिद्भिः पयसा स्थालीपाकेन सर्पिषा सायम्प्रात-
र्होम एतेषामेकेनापि सिध्यति ॥३॥ अभ्युद्धृतो हुतोऽग्निः
प्रमादादुपशाम्यति । मथिते व्याहृतोर्जुहुयात् पूर्णहोमौ
यथर्त्विजौ ॥४॥ वनस्पतिभ्यो वानस्पत्येभ्य ओषधि-
भ्यो वीरुद्भ्यः सर्वेभ्यो देवेभ्यो देवजनेभ्यः पुण्यज-
नेभ्य इति प्राचीनं तदुदकं निनीयते ॥५॥ स्वधा प्रपिताम-
हेभ्यः स्वधा पितामहेभ्यः स्वधा पितृभ्य इति दक्षिणतः॥६॥
तार्क्ष्यायारिष्टनेमयेऽमृतं मह्यमिति पश्चात् ॥६॥ सोमाय
सप्तर्षिभ्य इत्युत्तरतः ॥८॥ परिमृष्टे परिलिप्ते च पर्वणि
व्रातपतं हावयेदन्नमग्नौ। भूयो दत्त्वा स्वयमल्पं च भुक्त्वा
जब सूर्योदय और सूर्यास्त के समय घर की स्त्री (मालकिनी)
अपने हाथों को जल से धोकर, शौचादि से निवृत्त होके शुद्ध हाथों से
अग्नि को जगावे ॥ और दोनों सन्धिकाल बीत जावे तो घरके बाहर
अग्नि में आहुतियाँ देवे ॥१॥ रात्रि में "अग्नये च प्रजापतये च"।
और दिन में आदित्य प्रजापति के नाम आहुतियाँ करे। जल और
समिद् प्रत्येक होम में पूरे और उत्तम लावे ॥२॥ होम करने की वस्तु
समिद्, दूध, स्थालीपाक और घृत। सायं प्रातः इनकी आहुति करे या
इनमें से किसी एक से करे ॥३॥ अभ्युद्धृत, यदि प्रमाद से बुत जावे तो,
अरणियों द्वारा मथितोत्पन्न अग्नि में व्याहृति से और पूर्ण होम भी करे
जैसा दोनों ऋत्विज कहें ॥४॥ "वनस्पतिभ्यो" इत्यादि से पूर्व की ओर
आहुतियाँ करे और जल लावे ॥५॥ और "स्वधा प्रपितामहेभ्यः" इत्यादि
से दक्षिण में, "तार्क्ष्याय०" से पश्चिम दिशा में और "सोमाय सप्तर्षिभ्यः"
से उत्तर दिशा में आहुतियाँ देवे ॥६॥७॥८॥ मार्जन और लीपने पर
(भूमिको) व्रतपतिको अन्न की आहुति अग्नि में करे॥ थोड़ा या बहुत दूसरों
को अन्न देकर आप भोजन अपराह्न में करे—यह याज्ञिक व्रत है ॥९॥

पराह्णे व्रतमुपैति याज्ञिकम् ॥ ९ ॥ अनशनं ब्रह्मचर्यं
च भूमौ शुचिरग्निमुपशेते सुगन्धिः ॥१०॥ अग्नीषोमा-
भ्यां दर्शने इन्द्राग्निभ्यामदर्शने ॥ आग्नेयं तु पूर्वं नित्य-
मन्वाहार्यं प्रजापतेः ॥११॥ अर्धाहूतिस्तु सौविष्टकृती
सर्वेषां हविषां स्मृता ॥ आनुमती वा भवति स्थाली-
पाकेष्वथर्वणाम् ॥१२॥ उभौ च संधिसौ यौ वैश्वदेवौ
यथाऋत्विजौ । वर्जयित्वा सबर्हिषः साज्या यज्ञाः सदक्षिणाः
॥१३॥ यथाशक्ति यथाबलं हुतादोऽन्ये अहुतादोऽन्ये ॥
वैश्वदेवं हविरुभये संचरन्ति ॥१४॥ ते सम्यञ्च इह माद-
यन्तामिषमूर्जं यजमाना यमिच्छत । विश्वे देवा इदं
हविरादित्यासः सपर्यत ॥ अस्मिन्यज्ञे मा व्यथिष्य-
मृताय हविष्कृतम् ॥१५॥ वैश्वदेवस्य हविषः सायम्प्रात-
र्जुहोति । सायमाशप्रातराशौ यज्ञावेतौ स्मृतावुभौ
॥१६॥ अप्रतिभुक्तौ शुचिकार्यौ च नित्यं वैश्वदेवौ
जानता यज्ञश्रेष्ठौ । नाश्रोत्रियो नानवनिक्तपाणिर्ना-


उपवास रहना और ब्रह्मचर्य से रहना पवित्र होकर, अग्नि के पास
सोवे और सुगन्ध युक्त रहे ॥१०॥ दर्शन में अग्नीषोमों से, अदर्शन में
इन्द्राग्नी से ॥ आग्नेय को पहिले नित्य और उसके पश्चात् प्रजापति की
॥११॥ सौविष्ट कृत की आधी आहुति यह नियम सब ही होमों का है ॥
या अथर्ववेदियों का होम आनुमती स्थालीपाक से होता है ॥१२॥ और
जो दोनों सन्धि समय बलि, वैश्वदेव यथा ऋत्विज । सबर्हिष को छोड़
कर आज्य के साथ होता है और दक्षिणा के साथ सब यज्ञ होते हैं
॥१३॥ शक्ति एवं बल के अनुसार हुताद, अन्य अहुताद, अन्य वैश्वदेव
हवि दोनों समय करते हैं ॥१४॥ “ते सम्यञ्च” इत्यादि को पढ़े ॥१५॥
वैश्वदेव की हवि को सायं प्रातःकाल आहुतियाँ करे और सायंकाल
एवं प्रातःकाल का भोजन पवित्र बनावे ये दोनों यज्ञ हैं—यह धर्मशास्त्र
में कहा है ॥१६॥ दोनों यज्ञों को श्रेष्ठ जानकर बिना भोजन किये
पवित्रता से नित्य भोजन बनावे ॥ न अवैदिक, न जल से साफ किये
२३

१७८ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
मन्त्रविज्जुहुयान्नाविपश्चित् ॥१७॥ बीभत्सवः शुचि-
कामा हि देवा नाश्रद्दधानस्य हविर्जुषन्ते । ब्राह्मणेन
ब्रह्मविदा तु हावयेन्न स्त्रीहुतं शूद्रहुतं च देवगम् ॥१८॥
यस्तु विद्यादाज्यभागौ यज्ञान्मन्त्रपरिक्रमान् । देवता-
ज्ञानमावृत आशिषश्च कर्म स्त्रिया अप्रतिषिद्धमाहुः
॥१९॥५॥७३॥
तयोर्बलिहरणम् ॥१॥ अग्नय इन्द्राग्निभ्यां वास्तोष्प-
तये प्रजापतयेऽनुमतय इति हुत्वा ॥२॥ निष्क्रम्य बहिः
प्रचीनं ब्रह्मणे वैश्रवणाय विश्वेभ्यो देवेभ्यः सर्वेभ्यो देवे-
भ्यो विश्वेभ्यो भूतेभ्यः सर्वेभ्यो भूतेभ्य इति बहुशो बलिं
हरेत् ॥३॥ द्विः प्रोक्षन्प्रदक्षिणमावृत्यान्तरुपातीह्य
द्वारे ॥४॥ द्वार्ययोर्मृत्यवे धर्माधर्माभ्याम् ॥५॥ उदधाने
धन्वन्तरये समुद्राद्यौषधिवनस्पतिभ्यो द्यावापृथिवीभ्या-
हाथ, न विना मंत्रजाने और न अपण्डित आहुतियाँ करे ॥ १७ ॥ देव-
गण बिभत्सु, और शुचि की कामना वाले होते हैं इसलिये श्रद्धाहीन
व्यक्ति की आहुति नहीं ग्रहण करते हैं । ब्राह्मण और ब्रह्म के जानने वाले
से ही हवन करावे । स्त्री एवं शूद्र की दी आहुतियाँ देवताओं तक नहीं
पहुँचतीं ॥१८॥ जो आज्यभागों को जानता है, यज्ञों को और मंत्रपरि-
क्रमों को एवं देवताज्ञान से आवृत्त हो और आशीर्वाद देना जानता
हो ॥ इनके करने का अधिकार स्त्रियों को नहीं है ॥१९॥५॥७३॥ यह
तिहत्तरवी कण्डिका समाप्त हुई ।
स्त्री पुरुष के बलि हरण को कहते हैं । गृही के घर जो कुछ अन्न
दोनों समय खाने के लिये पकता है—उस अन्न से देवतादिकों के लिये
उपहार दिया जाता है उसको बलि कहते हैं ॥ “अग्नय०” इत्यादि से
आहुति देकर ॥२॥ घर से बाहर होकर, पूर्व दिशा में पूर्वमुख हो
“ब्रह्मणे०” इत्यादि से बहुत बलि देवे ॥३॥ दो वार प्रदक्षिण घुम २ कर
दोनों द्वार पर “धर्माधर्माभ्याम्” से बलियाँ देवे ॥४॥५॥ जलधरने के
स्थान में “धन्वन्तरये०” इत्यादि से बलियाँ देवे ॥६॥ इसी प्रकार

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १७९

मिति ॥६॥ स्थूणावंशयोर्दिग्भ्योऽन्तर्देशेभ्य इति ॥७॥
स्रक्तिषु वासुकये चित्रसेनाय चित्ररथाय तक्षोपतक्षाभ्या-
मिति ॥८॥ समन्तमग्नेराशायै श्रद्धायै मेधायै श्रियै
ह्रियै विद्याया इति ॥९॥ प्राचीनमग्नेः गृहाभ्यो देवजा
मिभ्य इति ॥१०॥ भूयोऽभ्युद्धृत्य ब्राह्मणान् भोजयेत्
॥११॥ तदपि श्लोको वदति ॥ मा ब्राह्मणाग्रतः कृतमश्नी-
याद्द्विषवदन्नमन्नकाम्या । देवानां देवो ब्राह्मणो भावो
नामैष देवतेति ॥१२॥ आग्रयणे शान्त्युदकं कृत्वा यथर्तु
तण्डुलानुपसाद्य ॥१३॥ अप्सु स्थालीपाकं श्रपयित्वा
पयसि वा ॥१४॥ सजूरृतुभिः सजूर्विधाभिः सजूरग्नये
स्वाहा । सजूरिन्द्राग्निभ्यां सजूर्द्यावापृथिवीभ्यां सजूर्विश्वे-
भ्यो देवेभ्यः सजूरृतुभिः सजूर्विधाभिः सजूः सोमाय
स्वाहेत्येकहविर्वा स्यान्नाना हवींषि वा ॥१५॥ सौम्यं तन्व-
च्छ्यामाकं शरदि ॥१६॥ अथ यजमानः प्राशित्रं गृहीते
॥१७॥ प्रजापतेष्ट्वा ग्रहं गृह्णामि । मह्यं भूत्यै मह्यं पुष्ट्यै
“स्थूणावंशयोर्दिग्भ्योऽन्तर्देशेभ्यः” । बलियाँ देवे ॥७॥ चार दिशाओं के
कोणों में—“वासुकये०” इत्यादि से बलि देवे ॥८॥ और अग्नि के चारों
ओर “श्रद्धायै” इत्यादि से बलि देवे ॥९॥ अग्नि के पूर्व भाग में “गृहा-
भ्यो देवजामिभ्यः” से बलि देवे ॥१०॥ अधिक अन्न निकाल कर ब्राह्मणों
को भोजन करावे ॥११॥ इसको भी श्लोक कहता है—ब्राह्मण के भोजन
करने के पहिले गृही भोजन न करे क्योंकि वह अन्न विष के समान हो
जाता है । देवताओं का देव ब्राह्मण हैं, यह भावमय देवता है ॥१२॥
अग्रहण मास में शान्त्युदक करके यथर्तु तण्डुलों को लाकर जल या
दूध में स्थालीपाक पकाकर “सजूरृतुभिः” इत्यादि आहुतियाँ एक
हवि की देवे या विभिन्न हवियों की हों ॥१५॥ शरदऋतु में सौम्य
श्यामाक की आहुति ॥१६॥ अब यजमान प्राशित्र ग्रहण करे ॥१७॥
“प्रजापतेष्ट्वा०” इत्यादि मन्त्र से ग्रहण करे ॥१८॥ अब प्राशन करे

मह्यं श्रियै मह्यं ह्रियै मह्यं यशसे मह्यमायुषे मह्यमन्नाय
मह्यमन्नाद्याय मह्यं सहस्रपोषाय मह्यमपरिमितपोषाये-
ति ॥१८॥ अथ प्राश्नाति । भद्रान्नः श्रेयः समनैष्ट देवा-
स्त्वयावसेन समशीमहि त्वा । स नः पितो मधुमाँ-
आविवेश शिवस्तोकाय तन्वो न एहीति ॥१९॥ प्राशित-
मनुमन्त्रयते । अमोऽसि प्राण तद्ऋतं ब्रवीम्यमासि सर्वा-
ङसि प्रविष्टः । स मे जरां रोगमपनुद्य शरीरादनामयैधि
मा रिषाम इन्दो इति ॥२०॥ वत्सः प्रथमजो ग्रीष्मे वासः
शरदि दक्षिणा ॥२१॥ शक्त्या वा दक्षिणां दद्यात् ॥२२॥
नातिशक्तिर्विधीयते नातिशक्तिर्विधीयत इति ॥२३॥
॥६॥७४॥ इत्यथर्ववेदे कौशिकसूत्रे नवमोऽध्यायः
समाप्तः ॥६॥
अथ विवाहः ॥१॥ ऊर्ध्वं कार्त्तिक्या आ वैशाख्याः
॥२॥ यथाकामी वा ॥३॥ चित्रापक्षं तु वर्जयेत् ॥४॥
“भद्रान्नः श्रेयः” इत्यादि से प्राशन करके अनुमंत्रण करे—“अमोऽसि
प्राण०” इत्यादि ॥१९॥२०॥ ग्रीष्मऋतु में वत्स देवे और शरद्ऋतु
में दक्षिणा वस्त्र देवे ॥२१॥ या जैसी शक्ति हो वैसी दक्षिणा
देवे ॥ २२ ॥ शक्ति के बाहर अधिक न देवे—॥२३॥६॥७४॥ यह
चौहत्तरवि कण्डिका समाप्त हुई ॥
अथर्ववेद के कौशिक सूत्र के नवम अध्यायका भाषानुवाद पूरा हुआ ॥९॥
अब विवाह के विषय में उपदेश करेंगे । विवाह के लिये उपयुक्त
सामग्रियां पहिले से एकत्र कर रक्खे । जैसे खिचड़ी, सम्पुट, पाकर-
वृक्ष की शाखा, कलश, सर्वौषधि, दही, जेठीमधु, विष्टर, अर्घपात्र,
मधुपर्कपात्र, धूसर, पालो, इत्यादि ॥१॥ कार्त्तिक मास से वैशाख मास
तक विवाह करने का समय हो ॥ या जब चाहे तब विवाह करे ॥२॥३॥

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १८१
मघासु हन्यन्ते गावः फल्गुनीषु व्युह्यत इति विज्ञायते
मङ्गलञ्च ॥५॥ सत्येनोत्तभिता पूर्वापरमित्युपदधीत ॥६॥
पतिवेदनं च ॥७॥ युवं भगमिति संभलं सानुचरं प्रहि-
णोति ॥८॥ ब्रह्मणस्पत इति ब्रह्माणम् ॥९॥ तद्विवृहा-
च्छङ्कमानो निशि कुमारीकुलाद्वलीकान्यादीप्य ॥१०॥
देवा अग्र इति पञ्चभिः सकृत्पूल्यान्यावापयति ॥११॥
अनृक्षरा इति कुमारीपालं प्रहिणोति ॥१२॥ उदाहारस्य
प्रतिहितेषुरग्रतो जघनतो ब्रह्मा ॥१३॥ यो अनिध्म
चित्रानक्षत्र में विवाह न करे ॥४॥ आर्ष विवाह में कन्या वाले को एक
या दो गौ, या एक बैल या दो बैल देना किन्हीं आचार्यों का मत है ।
सो आर्ष विवाह में कन्या वालों को देने केलिये यदि गो मिथुन किसी
से उसके घर से पति के घर लाने के लिये कैसे ही लाने पड़ें तो मघा
नक्षत्र में लेवे और आर्ष विवाह भी मघा नक्षत्र में करे और सेनाव्यूह
के लिये और आर्ष विवाह की बहू को उसके घर से लाने के लिये, ३
पूर्वा फाल्गुनी और उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र श्रेष्ठ हैं और मंगल भी है ॥५॥
“सत्येनोत्तभिता०” इत्यादि १६ मंत्र और “पूर्वापरं०” इत्यादि दो इन
१८ मंत्रों से आज्य की आहुतियां देवे ॥६॥ “आनो अग्न”इत्यादि सूक्त
से आगम कृशर दूसरे घर से तिल मिला हुआ लाकर घरे और उसे
अभिमंत्रितकर कुमारी को उस भात को चखवावे ॥७॥ और “युवं भगं०”
इत्यादि से शोभन अलंकृत पुरुषको संचर हस्त नौकर सहित को लावे
॥८॥ “ब्रह्मणस्पत०”इत्यादि से कुमारी के पास भेजकर वर के गुणों
को कहवावे ॥९॥ यदि ब्रह्मा को रात्रि में शङ्का ( भय ) हो तो कुमारी
के घर दीप जलाकर “देवा अग्र०” इत्यादि ५ मंत्रों से एकपूल्या की
आहुति करे ॥१०॥११॥ “अनृक्षरा०” से कुमारी रक्षा के लिये भेजे ।
यदि वह १० वर्ष से अधिक उमर की हो तो “देवा अग्र०” इत्यादि ५
मंत्रों से कुमारी लाजा की एक आहुति देवे । कुमारी की रक्षा के लिये
धनुर्धारी पुरुष को लावे । आगे २ धनुर्धर, पीछे २ आचार्य और बीच
में जल लिया हुआ-उदक हार ॥१२॥१३॥ जल के पास जाकर “यो

१८२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
इत्यप्सु लोगं प्रविध्यति ॥१४॥ इदमहमित्यपोह्य ॥१५॥
यो भद्र इत्यन्वीपमुदच्य ॥१६॥ आस्यै ब्राह्मणा इति
प्रयच्छति ॥१७॥ आव्रजतामग्रतो ब्रह्मा जघनतोऽधि-
ज्यधन्वा ॥१८॥ बाह्यतः प्लक्षोदुम्बरस्योत्तरतोऽग्नेः शाखा-
यामासजति ॥१९॥ तेनोदकार्थान्कुर्वन्ति ॥२०॥ तत-
श्चान्वासेचनमन्येन ॥२१॥ अन्तरुपातीत्यार्यमणमिति
जुहोति ॥२२॥ प्र त्वा मुञ्चामीति वेष्टं विवृतति ॥२३॥
उशतीरित्येतया त्रिराघापयति ॥२४॥ सप्तभिरुष्णाः
सम्पातवतीः करोति ॥२५॥ यदासन्द्यामिति पूर्वयोरु-
त्तरस्यां स्रक्त्यां तिष्ठन्तीमाप्लावयति ॥२६॥ यच्च वर्चो
यथा सिन्धुरित्युत्क्रान्तामन्येनावसिञ्चति ॥२७॥१॥७५॥
यद् दुष्कृतमिति वाससाङ्गानि प्रमृज्य कुमारीपा-
लाय प्रयच्छति ॥१॥ तुम्बरदण्डेन प्रतिपाद्य निर्व्रजेत्
अनिष्ठम०” इत्यादि से जल में एक मट्टी का ढेला फेके ॥१४॥ “इदमहं०”
इत्यादि से नदी में बैठकर घट को जलसे भर लेवे ॥१५॥ “यो भद्र०” इत्यादि
को पढ़ कर ॥१६॥ “आस्यै ब्राह्मणा०” इत्यादि से उदक हार को जलभरा
कलश देवे ॥१७॥ मार्ग में जाते समय कुमारी के आगे ब्रह्मा, धनुर्धर पीछे
॥१८॥ घर में जाने पर वेदि के बाहर पाकर की शाखापर-अग्नि के उत्तर
भाग में जलभरे कलश को स्थापन करे ॥१९॥ उसी से जल का काम
करे ॥२०॥ यदि कलश में जल थोड़ा हो तो दूसरे जल से सेचन करे
॥२१॥ “अन्तरुपाती०” इत्यादि से वेदि में प्रवेश कर आहुति देवे ॥२२॥
“प्रत्वा मुञ्चामि०” इत्यादि से कुमारी के केशों को लपेट कर बांधे ॥२३॥
“उशतीः०” इत्यादिसे तीन समिधों को अग्नि में डाले ॥२४॥ “उशतीः०”
इत्यादि ७ मंत्रों से उष्णजल के ढार से “यदासन्द्यां०” पूर्वोत्तर कोण में
खड़ी कुमारी को शिर से स्नान करावे ॥२५॥२६॥ “यच्च वर्चो यथा०”
से उस जगह से जाती हुई अन्य स्थान में ठण्डे जल से उसे सिक्त करे
॥२७॥१॥७५॥ यह पचहत्तरवी कण्डिका पूरी हुई ॥
“यद् दुष्कृतं०” इत्यादि से वस्त्र से कुमारी को सब अङ्गों को पोंछे

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १८३
॥२॥ तद्वन आसजति ॥ ३॥ या अकृन्तंस्त्वष्टा वास
इत्यहतेनाच्छादयति ॥४॥ कृत्रिम इति शतदन्तैषोकेण
कङ्कतेन सकृत्प्रलिख्य ॥५॥ कृतयाममित्यवसृजति ॥६॥
आशासाना सं त्वा नह्यामीत्युभयतः पाशेन योक्त्रेण
सन्नह्यति ॥७॥ इयं वीरुदिति मधुघमणिं लाक्षारक्तेन
सूत्रेण विग्रथ्यानामिकायां बध्नाति ॥८॥ अन्ततो ह
मणिर्भवति बाह्यो ग्रन्थिः ॥९॥ भगस्तेवत इति हस्तेगृह्य
निर्णयति ॥१०॥ शाखायां युगमाधाय दक्षिणतो ऽन्यो
धारयति ॥११॥ दक्षिणस्यां युगधुर्य्युत्तरस्मिन्द्युगतर्द्मनि
दर्भेण विग्रध्य शं त इति ललाटे हिरण्यं संस्तभ्य जपति
॥१२॥ तर्द्मं समयावसिञ्चति ॥१३॥ उपगृह्योत्तरतो ऽग्ने-
रङ्गादङ्गादिति निनयति ॥१४॥ स्योनमिति शकृत्पिण्डे

ओर तुम्बर दण्डके साथ वस्त्र को कुमारी के रक्षक को देकर चला जावे
॥१॥२॥ और कुमारी वन में जाकर उसे फेक देवे ॥३॥ “या अकृन्तं-
स्त्वष्टा” मंत्र से अन्य नये अखण्ड वस्त्र को अभिमंत्रितकर यज्ञोपवीत
की भांति बांह में बांध लेवे ॥४॥ “कृत्रिम०” इत्यादि से १०० दांतवाली
कंघी से एक बार केशों को प्रलेखन करे ॥५॥ और “कृतयाम०” इत्यादि
से अवसृजन करे ॥६॥ “आशासाना०” इत्यादि से कमर इजरवन बांधे
॥७॥ “इयं वीरुद्” से मधुघ मणि को लाख के लाल रंग से सूत को रंग
कर उससे मणि को गांठ कर अनामिका अङ्गुली में पुण्य दिन के अन्त
में बांधे ॥८॥ गाँठ के अन्त में मणि हो एवं बाहर ग्रंथि हो ॥९॥ “भग-
स्तेवत०” इत्यादि से कुमारी के दहिने हाथ को पकड़ कर कौतुक गृह से
बाहर निकाले ॥१०॥ शाखा पर गाड़ी का जूआ धरकर दक्षिण से
अन्य पुरुष जूआ को पकड़े रहे, दहिने जूआ के धुरी को उत्तर वाले
जूआ के छेद में वह डाभ से गांठकर कुमारी के ललाट में सोना बांध
कर “शं त०” मंत्र का जप करे और छिद्र में जल सींचे ॥११॥१२॥१३॥
और अग्नि के उत्तर भाग में जाकर, “अङ्गात्०” आदि मंत्र से जल को
ढावे ॥१४॥ और ‘स्योनम्’ इत्यादि मंत्र से गोबर के पिण्ड पर पत्थर

१८४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
ऽश्मानं निदधाति ॥१५॥ तमातिष्ठेत्यास्थाप्य ॥१६॥
इयं नारीति ध्रुवां तिष्ठन्तीं पूल्यान्त्यावापयति ॥१७॥
त्रिरविच्छिन्दन्तीं चतुर्थीं कामाय ॥१८॥ येनाग्निरिति
पाणिं ग्राहयति ॥१९॥ अर्यमणं इत्यग्निं त्रिः परिणयति
॥२०॥ सप्त मर्यादा इत्युत्तरतोऽग्नेः सप्त लेखा लिखति
प्राच्यः ॥२१॥ तासु पदान्युत्क्रामयति ॥२२॥ इषे त्वा
सुमङ्गलि प्रजावति सुसीम इति प्रथमम् ॥२३॥ ऊर्जे
त्वा रायस्पोषाय त्वा सौभाग्याय त्वा साम्राज्याय त्वा
संपदे त्वा जीवात्वे त्वा सुमङ्गलि प्रजावति सुसीम
इति सप्तमं सखा सप्तपदी भवेति ॥२४॥ आरोह
तल्पं भगस्ततक्षेति तल्प उपवेशयति ॥२५॥ उपविष्टायाः
सुहृत्पादौ प्रक्षालयति ॥२६॥ प्रक्षाल्यमानावतु मन्त्र-
यते ॥ इमौ पादौ सुभगौ सुशेवौ सौभाग्याय कृणुतां
नो अघाय । प्रक्षाल्यमानौ सुभगौ सुपत्न्याः प्रजां
पशून्दीर्घमायुश्च धत्तामिति ॥२७॥ अहं विष्यामि प्र त्वा
को धरे ॥ उस पर कुमारी को बिठलाकर “इयं नारी०” इत्यादि मंत्र
से कुमारी से अग्नि में लावा और पुल्यों को ढलवावे और “येनाग्नि०”
मंत्र से वर कुमारी का पाणिग्रहण करे ॥१५॥१६॥१७॥१८॥ एवं
“अर्यमण०” इत्यादि मंत्र से अग्नि की तीन बार परिक्रमा करे ॥ पुनः
अग्नि के उत्तर भाग में पश्चिम को “सप्त मर्यादा०” इत्यादि मंत्र से वर
सात रेखायें खींचे “उन पर कुमारी को सात पग इस भांति वर वाक्य पढता
जावे और कुमारी पहिले दहिना पग आगे रखकर पीछे वाम पग रखती
चले”—“इषे त्वा सुमङ्गलि प्रजावति सुसीम०” इससे पहिला पग और
ऊर्जे त्वा०” इत्यादि से सप्तम पग धरवाता हुआ “सखा सप्तपदी भव०”
अन्त में पढ़े ॥ और तब वर कुमारी को “आरोह तल्पं०” इत्यादि मंत्र
पढ़कर शय्या पर बिठलावे ॥१९॥२०॥२१॥२२॥२३॥२४॥२५॥ शय्या
पर बैठी हुई कुमारी के पैरों को दासी स्त्री धोवे और “इमौ पादौ

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १८५


मुञ्चामीति योक्त्रं विचृतति ॥२८॥ अपरस्मिन् भृत्याः
संरभन्ते ॥२६॥ ये जयन्ति ते बलीयांस एव मन्यन्ते
॥३०॥ बृहस्पतिनेति सर्वसुरभिचूर्णान्यृचर्चा काम्पील-
पलाशेन मूर्धन्यावपति ॥३१॥ उद्यच्छध्वं भगस्ततक्षा-
भ्रातृघ्नीमित्येकैकशोत्थापयति ॥३२॥ प्रतितिष्ठेति प्रति-
ष्ठापयति ॥३३॥२॥७६॥
सुकिंशुकं रुक्मप्रस्तरणमिति यानमारोहयति ॥१॥
इमं पन्थां ब्रह्मापरमित्यग्रतो ब्रह्मा प्रपद्यते ॥२॥ मा
विदन्ननृक्षरा अध्वानमित्युक्तम् ॥३॥ येदं पूर्वेति तेना-
न्यस्यामूढायां वाधूयस्य दशां चतुष्पथे दक्षिणैरभि-
तिष्ठति ॥४॥ स चेदुभयोः शुभकामो भवति सूर्यायै देवे-
भ्य इह्यताम

१८६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
यतोऽन्तरा ब्रह्माणम् ॥६॥ य ऋते चिदभिश्रिष इति
यानं संप्रोक्ष्य विनिष्कारयति ॥७॥ सा मन्दसानेति
तीर्थे लोगं प्रविध्यति ॥८॥ इदं सु म इति महावृक्षेषु
जपति ॥६॥ सुमङ्गलीरिति वध्वीक्षीः प्रति जपति ॥१०॥
या ओषधय इति मन्त्रोक्तेषु ॥११॥ ये पितर इति श्मशा-
नेषु ॥१२॥ प्र बुध्यस्वेति सुप्तां प्रबोधयेत् ॥१३॥ सं काश-
यामीति गृहसंकाशे जपति ॥१४॥ उद्ध ऊर्मिरिति यानं
सम्प्रोक्ष्य विमोचयति ॥१५॥ उत्तिष्ठेत इति पत्नी शालां
सम्प्रोक्षति ॥१६॥ स्योनमिति दक्षिणतो वलीकानां शकृ-
त्पिण्डेऽश्मानं निदधाति ॥१७॥ तस्योपरि मध्यमपलाशे
सर्पिषि चत्वारि दूर्वाग्राणि ॥१८॥ तमातिष्ठेत्या-
स्थाप्य ॥१९॥ सुमङ्गली प्रतरणीह प्रियं मा हिंसिष्टं
ब्रह्मापरमिति प्रत्यृचं प्रपादयति ॥२०॥ सुहृत्पूर्णकंसेन
इत्यादि मंत्र से ब्राह्मण को, “य ऋतेचिदभिश्रिष०” मंत्र से सवारी को
जल से भलीभांति प्रोक्षण कर साफ कर देवे ॥६॥७॥ और रास्ते में यदि
तीर्थ मिले तो वहाँ “सा मन्दसान०” को पढ़ कर मट्टी का ढेला फेक
देवे ॥८॥ वृक्षों को देखने पर “इदं सु म०” का जप करे ॥९॥ 'सुमङ्गलीः'
को वधू को देखने वाली स्त्री को देखने पर जप करे ॥१०॥ “या ओष-
धय०” का जप करे- जहाँ तहाँ ॥११॥ मरघट मिलने पर “ये पितर०”
इत्यादि का जप करे ॥१२॥ “प्रबुध्यस्व०” पढकर सोती हुई वधू को
जगावे ॥१३॥ संकाशयामि०” का जप जब वर के घर पास आ जावे
तब करे ॥१४॥ “उद्ध ऊर्मिः०” इत्यादि को पढ़कर सवारी को जल से
धोकर उसमें दुलहिन उतार लेवे ॥१५॥ “उत्तिष्ठेत०” मंत्र को वर पढ़े
एवं पत्नी शाला को प्रोक्षण करे ॥१६॥ और दक्षिणभाग में बैल के गोबर
के पिण्ड पर “स्योनं०” मंत्र से पत्थर को धर उसपर कर मध्यम पलाश
के काठ में घृत धर और “तमातिष्ठ०” मंत्र से दूर्वा के अग्रभागों धरकर
“सुमङ्गली०” इत्यादि ऋचाओं में से प्रत्येक ऋ० से ब्रह्मा वधू को एक
पग बढ़वावे और उसे कोई सुहृत् कांसे के पात्र से अग्नि की चारों ओर

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १८७
प्रतिपादयति ॥२१॥ अघोरचक्षुरित्यग्निं त्रिः परिणयति
॥२२॥ यदा गार्हपत्यं सूर्यायै देवेभ्य इति मन्त्रोक्तेभ्यो
नमस्कुर्वतीमनुमन्त्रयते ॥२३॥३॥७७॥
शर्म वर्मेति रोहितचर्माहरन्तम् ॥१॥ चर्म चोपस्तृणी-
थनेत्युपस्तृणन्तम् ॥२॥ यं बल्वजमिति बल्वजं न्यस्य-
न्तम् ॥ ३॥ उप स्तृणीहीत्युपस्तृणन्तम् ॥४॥ तदा रोहत्वि-
त्यारोहयति ॥५॥ तत्रोपविश्येत्युपवेशयति ॥६॥ दक्षि-
णोत्तरमुपस्थं कुरुते ॥७॥ सुज्यैष्ठ्य इति कल्याणनामानं
ब्राह्मणाायनमुपस्थ उपवेशयति ॥ ८ ॥ वितिष्ठन्तामिति
प्रमदनं प्रमायोत्थापयति ॥६॥ तेन भूतेन तुभ्यमग्रे शुम्भ-
नी अग्निर्जनविन्मह्यं जायामिमामदात्सोमोवसुविन्म-
हं जायामिमामदात्पूषा जातिविन्मह्यं जायामिमामदा-
दिन्द्रः सहीयान्मह्यं जायामिमामदादग्नये जनविदे स्वा-
हा सोमाय वसुविदे स्वाहा पूष्णे जातिविदे स्वाहेन्द्राय
सहीयसे स्वाहेत्यागच्छतः ॥१०॥ सविता प्रसवानामि-
“अघोरचक्षुः०” से तीन वार परिक्रमण करावे ॥१७—२२॥ और घर
के कुल देवता को बहू नमस्कार करती समय कर्त्ता “यदा गार्हपत्यं०”
इत्यादि मं० से अनुमंत्रण करे ॥२३॥३॥७७॥ यह सतहत्तरवी कण्डिका
पूरी हुई ।
“शर्मवर्म०” इत्यादि मंत्र से लाल बैल के चर्म को लाते हुए पढ़े,
“चर्म चोपस्तृणीथन०” इत्यादि मंत्र से चर्म बिछाते समय पढ़े । और
तृणों को लाते समय “यं बल्वजं०” इत्यादि पढ़े । जमीन पर प्रथम
तृणों को बिछाकर उस पर चर्म को बिछावे । “आरोहतु” कह
कर उसपर आरोहण कराकर “तत्रोपविश०” से उसपर उसे बिठलावे
और कल्याण-वाचक नाम वाले ब्राह्मणायन के उत्तर मुख गोद में “सुज्यै-
ष्ठ्य०” मंत्र से वर-वधू को बिठाकर “वितिष्ठन्ताम्०” से कुमार के
लिये फल, मोदकादि देकर तब उसे उठावे ॥१—९॥ “तेन भूतेन०”
इत्यादि मंत्रों से वर वधू के आते समय आहुतियां देवे । एवं “सविता

१८८ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
ति मूर्ध्नोः संपातानानयति ॥११॥ उदपात्र उत्तरान्
॥१२॥ शुम्भन्द्याञ्जल्योर्निंनयति ॥१३॥ तेन भूतेनेति
समशनम् ॥१४॥ रसानाशयति स्थालीपाकं च ॥१५॥
यवानामाज्यमिश्राणां पूर्णाञ्जलिं जुहोति ॥१६॥४॥७८॥
सप्त मर्यादा इति तिसृणां प्रातरावपते ॥१॥ अक्ष्यौ
नाविति समाञ्जाते ॥२॥ महीम् ष्विति तल्पमालम्भ-
यति ॥३॥ आरोह तल्पमित्यारोहयति ॥४॥ तत्रोप-
विश्येत्युपवेशयति ॥५॥ देवा अग्रे इति संवेशयति ॥६॥
अभित्वेत्यभिच्छादयति ॥७॥ सं पितराविति समावेश-
यति ॥८॥ इहेमाविति त्रिः सन्नुदति ॥६॥ मधुघमणिमौ-
क्षेडपनीयेयं वीरुदमोऽहमिति संस्पृशतः ॥१०॥ ब्रह्म-
प्रसवानां०” इत्यादि से दोनों के शिरों पर आहुतियों का ढार देवे
॥१०॥११॥ “तेन भूतेन०” से रसों और स्थाली पाक का दोनों को
भोजन करावे ॥१२॥१३॥१४॥१५॥ और आठ ऋ० वाले कल्पजसूक्त,
एवं “आगच्छत०” इत्यादि ३ ऋ० वाले सूक्त और “सविता प्रसवानां०”
सूक्त–इन सूक्तों से यव मिले आज्य की अञ्जुलियों से वर वधू हवन करें
और सम्पातों को वर वधू के शिर पर डालते जावें ॥१६॥४॥७८॥ यह
अठहत्तरवी कण्डिका पूरी हुई ।
“सप्त मर्यादा०” इत्यादि ऋ० से प्रातःकाल आहुति करें । “अक्ष्यौ
नौ०” से दोनों परस्पर एक दूसरे को कज्जल से नेत्रों में अञ्जन करें
॥१॥२॥ और “महीमूषु०” से शय्या को स्पर्श करें । “आरोह तल्प०”
कहने पर शय्यापर चढ़ावें “तत्रोपविशेत्” कहने पर–उन्हें बिठलावे
और “देवा अग्रे०” पढ़कर दोनों को शय्या पर संवेशन करावे ॥६॥
“अभित्वामनुजातेन०” से दोनों को वस्त्र ओढ़ा देवे ॥७॥ “संपितरौ०”
इत्यादि ४ ऋचाओं से दोनों को एक दूसरे के मुख सम्मुख करे ॥८॥
“इहेमौ०” से एक दूसरे के कण्ठ को ग्रहण करे ॥६॥ मधुघ-मणि को
सुगन्ध में डालकर पीसकर उबटन बनाकर “इयं वीरुत्०” इस सूक्त से
दोनों को उबटन लगावे ॥ “अमोऽहं०” इस दो ऋचा से अक्षत पढ़कर