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सर्वकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

पृष्ठ 209, कुल 361 में से

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पृष्ठ 209

पराह्णे व्रतमुपैति याज्ञिकम् ॥ ९ ॥ अनशनं ब्रह्मचर्यं
च भूमौ शुचिरग्निमुपशेते सुगन्धिः ॥१०॥ अग्नीषोमा-
भ्यां दर्शने इन्द्राग्निभ्यामदर्शने ॥ आग्नेयं तु पूर्वं नित्य-
मन्वाहार्यं प्रजापतेः ॥११॥ अर्धाहूतिस्तु सौविष्टकृती
सर्वेषां हविषां स्मृता ॥ आनुमती वा भवति स्थाली-
पाकेष्वथर्वणाम् ॥१२॥ उभौ च संधिसौ यौ वैश्वदेवौ
यथाऋत्विजौ । वर्जयित्वा सबर्हिषः साज्या यज्ञाः सदक्षिणाः
॥१३॥ यथाशक्ति यथाबलं हुतादोऽन्ये अहुतादोऽन्ये ॥
वैश्वदेवं हविरुभये संचरन्ति ॥१४॥ ते सम्यञ्च इह माद-
यन्तामिषमूर्जं यजमाना यमिच्छत । विश्वे देवा इदं
हविरादित्यासः सपर्यत ॥ अस्मिन्यज्ञे मा व्यथिष्य-
मृताय हविष्कृतम् ॥१५॥ वैश्वदेवस्य हविषः सायम्प्रात-
र्जुहोति । सायमाशप्रातराशौ यज्ञावेतौ स्मृतावुभौ
॥१६॥ अप्रतिभुक्तौ शुचिकार्यौ च नित्यं वैश्वदेवौ
जानता यज्ञश्रेष्ठौ । नाश्रोत्रियो नानवनिक्तपाणिर्ना-


उपवास रहना और ब्रह्मचर्य से रहना पवित्र होकर, अग्नि के पास
सोवे और सुगन्ध युक्त रहे ॥१०॥ दर्शन में अग्नीषोमों से, अदर्शन में
इन्द्राग्नी से ॥ आग्नेय को पहिले नित्य और उसके पश्चात् प्रजापति की
॥११॥ सौविष्ट कृत की आधी आहुति यह नियम सब ही होमों का है ॥
या अथर्ववेदियों का होम आनुमती स्थालीपाक से होता है ॥१२॥ और
जो दोनों सन्धि समय बलि, वैश्वदेव यथा ऋत्विज । सबर्हिष को छोड़
कर आज्य के साथ होता है और दक्षिणा के साथ सब यज्ञ होते हैं
॥१३॥ शक्ति एवं बल के अनुसार हुताद, अन्य अहुताद, अन्य वैश्वदेव
हवि दोनों समय करते हैं ॥१४॥ “ते सम्यञ्च” इत्यादि को पढ़े ॥१५॥
वैश्वदेव की हवि को सायं प्रातःकाल आहुतियाँ करे और सायंकाल
एवं प्रातःकाल का भोजन पवित्र बनावे ये दोनों यज्ञ हैं—यह धर्मशास्त्र
में कहा है ॥१६॥ दोनों यज्ञों को श्रेष्ठ जानकर बिना भोजन किये
पवित्रता से नित्य भोजन बनावे ॥ न अवैदिक, न जल से साफ किये
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