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सर्वकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

पृष्ठ 210, कुल 361 में से

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पृष्ठ 210

१७८ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
मन्त्रविज्जुहुयान्नाविपश्चित् ॥१७॥ बीभत्सवः शुचि-
कामा हि देवा नाश्रद्दधानस्य हविर्जुषन्ते । ब्राह्मणेन
ब्रह्मविदा तु हावयेन्न स्त्रीहुतं शूद्रहुतं च देवगम् ॥१८॥
यस्तु विद्यादाज्यभागौ यज्ञान्मन्त्रपरिक्रमान् । देवता-
ज्ञानमावृत आशिषश्च कर्म स्त्रिया अप्रतिषिद्धमाहुः
॥१९॥५॥७३॥
तयोर्बलिहरणम् ॥१॥ अग्नय इन्द्राग्निभ्यां वास्तोष्प-
तये प्रजापतयेऽनुमतय इति हुत्वा ॥२॥ निष्क्रम्य बहिः
प्रचीनं ब्रह्मणे वैश्रवणाय विश्वेभ्यो देवेभ्यः सर्वेभ्यो देवे-
भ्यो विश्वेभ्यो भूतेभ्यः सर्वेभ्यो भूतेभ्य इति बहुशो बलिं
हरेत् ॥३॥ द्विः प्रोक्षन्प्रदक्षिणमावृत्यान्तरुपातीह्य
द्वारे ॥४॥ द्वार्ययोर्मृत्यवे धर्माधर्माभ्याम् ॥५॥ उदधाने
धन्वन्तरये समुद्राद्यौषधिवनस्पतिभ्यो द्यावापृथिवीभ्या-
हाथ, न विना मंत्रजाने और न अपण्डित आहुतियाँ करे ॥ १७ ॥ देव-
गण बिभत्सु, और शुचि की कामना वाले होते हैं इसलिये श्रद्धाहीन
व्यक्ति की आहुति नहीं ग्रहण करते हैं । ब्राह्मण और ब्रह्म के जानने वाले
से ही हवन करावे । स्त्री एवं शूद्र की दी आहुतियाँ देवताओं तक नहीं
पहुँचतीं ॥१८॥ जो आज्यभागों को जानता है, यज्ञों को और मंत्रपरि-
क्रमों को एवं देवताज्ञान से आवृत्त हो और आशीर्वाद देना जानता
हो ॥ इनके करने का अधिकार स्त्रियों को नहीं है ॥१९॥५॥७३॥ यह
तिहत्तरवी कण्डिका समाप्त हुई ।
स्त्री पुरुष के बलि हरण को कहते हैं । गृही के घर जो कुछ अन्न
दोनों समय खाने के लिये पकता है—उस अन्न से देवतादिकों के लिये
उपहार दिया जाता है उसको बलि कहते हैं ॥ “अग्नय०” इत्यादि से
आहुति देकर ॥२॥ घर से बाहर होकर, पूर्व दिशा में पूर्वमुख हो
“ब्रह्मणे०” इत्यादि से बहुत बलि देवे ॥३॥ दो वार प्रदक्षिण घुम २ कर
दोनों द्वार पर “धर्माधर्माभ्याम्” से बलियाँ देवे ॥४॥५॥ जलधरने के
स्थान में “धन्वन्तरये०” इत्यादि से बलियाँ देवे ॥६॥ इसी प्रकार