कौषीतकि ब्राह्मण (शाङ्खायन ब्राह्मण - उदय प्रणीत व्याख्या सहित सटीक)
Kaushitaki Shankhayana Brahmana with Udaya Commentary
महर्षि कौषीतकि (टीकाकार: उदयसूरि) द्वारा
कौषीतकिब्राह्मणविषयसूची
I अग्न्याधेयम् ।
- अग्नेस्तिस्रस्तन्वः । .................................................... 1.
- पावकेष्टिः पवमानेष्टिश्च । ............................................... 2.
- प्रयाजानुयाजानामग्निदेवताकत्वम् । ...................................... 3 (१-१५).
- पुनराधेयकालः । ......................................................... 3 (१६-३०).
- पुनराधेयपुरोडाशः । ...................................................... 3 (३१-३३).
- प्रयाजानुयाजानां सविभक्तिकत्वम् । ....................................... 4 (१-९).
- आज्यभागौ । ............................................................. 4 (१०-२०).
- पुनराधेयेष्टिः । .......................................................... 5.
II अग्निहोत्रम् । - पयोहोमः । ............................................................... 1, 2.
- पयःप्राशनम् । ........................................................... 3.
- अग्न्युपस्थानम् । ......................................................... 4.
- वाग्ब्राह्मणम् । ........................................................... 5.
- सायमग्निहोत्रम् । ...................................................... 6.
- अग्निहोत्रविज्ञानफलम् । ................................................... 7.
- अग्निहोत्रकालमीमांसा । .................................................. 8, 9.
III दर्शपूर्णमासौ । - उपवासकालनिर्णयः । ...................................................... 1.
- सामिधेन्यः । ............................................................. 2.
- आर्षेयानुवचनम् । ........................................................ 3 (१-१९).
- देवतावाहनम् । ........................................................... 3 (२०) - 4 (८).
- स्रुगादापनम् । ............................................................ 4 (९-११).
- प्रयाजाः । ................................................................ 4 (१२) - 5 (१४).
- आज्यभागौ । ............................................................. 5 (१५) - 6 (११).
- याज्यापुरोनुवाक्यास्वरूपम् । ............................................ 6 (१२) - 7 (१३).
XII कौषीतकिब्राह्मणविषयसूची
9. प्रधानयागः । ................................................ 7 (१४) - 8 (७).
10. स्विष्टकृद्यागः । ................................................ 8 (८-१८).
11. इळोपाह्वानम् । ................................................ 8 (१९) - 9 (२७).
12. अनुयाजाः । ................................................ 10 (१-५).
13. सूक्तवाकः । ................................................ 10 (६-२८).
14. शंयोर्वाकः । ................................................ 10 (२९-३५).
15. पत्नीसंयाजाः । ................................................ 11, 12.
IV विकृतीष्टयः ।
- अनुनिर्वाप्येष्टिः । ................................................ 1.
- अभ्युदितेष्टिः । ................................................ 2.
- अभ्युद्गतेष्टिः । ................................................ 3.
- दाक्षायणयज्ञः । ................................................ 4.
- इळादधेष्टिः । ................................................ 5 (१-६).
- सार्वसेनियज्ञः । ................................................ 5 (७-११).
- शौनकयज्ञः । ................................................ 5 (१२-१६).
- वसिष्ठयज्ञः । ................................................ 6 (१-११).
- साकंप्रस्थाय्येष्टिः । ................................................ 6 (१२-१९).
- मुन्ययनेष्टिः । ................................................ 7 (१-४).
- तुरायणेष्टिः । ................................................ 7 (५-१४).
- आग्रयणेष्टिः । ................................................ 8 - 10.
V चातुर्मास्यानि । - चातुर्मास्यकालः । ................................................ 1 (१-१२).
- वैश्वदेवपर्व । ................................................ 1 (१३) - 2 (२८).
- वरुणप्रघासपर्व । ................................................ 3 - 5.
- साकमेधपर्व । ................................................ 6, 7.
- पितृयज्ञः । ................................................ 8, 9.
- शुनासीरीयपर्व । ................................................ 10.
VI शूलगवो ब्रह्मत्वं च । - शूलगवदेवताब्राह्मणम् । ................................................ 1 - 3.
- ब्रह्मात्वार्थवादः । ................................................ 4.
कौषीतकिब्राह्मणविषयसूची XIII - ब्रह्मत्वमीमांसा । ................................................ 5.
- प्रायश्चित्ताहुतयः । ................................................ 6.
- ब्रह्मणः कर्माणि । ................................................ 7 - 10.
VII सोमः । - दीक्षणीयेष्टिः । ................................................ 1 - 6.
- प्रायणीयेष्टिः । ................................................ 7 - 11 (१२).
- सोमक्रयः । ................................................ 11 (१३) - 12 (४३).
VIII सोमः । - अग्निमन्थनम् । ................................................ 1 - 2 (१०).
- आतिथ्येष्टिः । ................................................ 2 (११) - 3 (१६).
- प्रवर्ग्ये पूर्वः पटलः । ................................................ 4 - 7.
- प्रवर्ग्ये उत्तरः पटलः । ................................................ 8.
- उपसदः । ................................................ 9 - 12.
IX सोमः । - अग्निप्रणयनम् । ................................................ 1, 2.
- हविर्धानप्रवर्तनम् । ................................................ 3, 4.
- अग्नीषोमप्रणयनम् । ................................................ 5, 6.
X सोमः (अग्नीषोमीयपशुः) । - यूपमीमांसा । ................................................ 1 - 2 (१६).
- यूपसंस्कारः । ................................................ 2 (१७) - 4 (१८).
- शेषभक्षविचारः । ................................................ 5.
- पशो प्रयाजानुयाजाः । ................................................ 6.
- पर्यग्निकरणम् । ................................................ 7 (१-६).
- अध्रिगुप्रैषः । ................................................ 7 (७) - 8 (४).
- स्तोकानुवचनम् । ................................................ 8 (५-८).
- वपायागः । ................................................ 8 (९-२१).
- पशुपुरोडाशः । ................................................ 8 (२२-३२).
- मनोतानुवचनम् । ................................................ 9 (१-१६).
- पशोरवदानानि । ................................................ 9 (१७-२४).
पृष्ठम् XIV
XIV कौषीतकिब्राह्मणविषयसूची
12. वनस्पतियागः । .................................................... 9 (२५) - 10 (९).
13. प्रवृताहुती । ....................................................... 10 (१०-१९).
XI सोमः ।
- प्रातरनुवाकः । ..................................................... 1 - 9.
XII सोमः । - आपोनप्त्रीयम् । .................................................... 1 - 4.
- उपांश्वन्तर्यामग्रहौ । ................................................ 5.
- बहिष्पवमाने होतृकर्म । ............................................. 6 (१) - 7 (५).
- सवनीयः पशुः । ................................................... 7 (६) - 10 (३७).
XIII सोमः । - सदःप्रसर्पणम् । .................................................... 1 (१-८).
- हविष्पङ्क्तियागः । ................................................. 1 (९) - 3 (१९).
- सोमभेदविचारः । .................................................. 4 (१-१२).
- द्विदेवत्यग्रहाः । ................................................... 4 (१३) - 6 (१६).
- अच्छावाकप्रचारः । ................................................ 6 (१७-२४).
- ऋतुयाजाः । ........................................................ 7.
XIV सोमः (प्रातःसवनम्) । - आज्यशस्त्रम् । ..................................................... 1 - 4.
- प्रउगशस्त्रम् । ...................................................... 5 - 7.
XV सोमः (माध्यंदिनसवनम्) । - ग्रावस्तुत्कर्म । ..................................................... 1.
- मरुत्वतीयशस्त्रम् । .................................................. 2 - 4.
- निष्केवल्यशस्त्रम् .................................................... 5, 6.
XVI सोमः (तृतीयसवनम्) । - आदित्यग्रहः । ..................................................... 1.
- आर्भवपवमानस्तोत्रम् । ........................................... 2 (१-१५).
- सावित्रग्रहः । ...................................................... 2 (१६-३५).
पृष्ठम् XV
कौषीतकिब्राह्मणविषयसूची XV
4. वैश्वदेवशस्त्रम् । .................................................... 3 - 5.
5. पत्नीवतग्रहः । ..................................................... 6.
6. आग्निमारुतशस्त्रम् । ................................................. 7, 8.
7. सोमयागदेवतामीमांसा । ........................................... 9.
8. उक्थ्यम् । ........................................................... 10.
XVII सोमः ।
- षोडशी । ........................................................... 1 - 4 (१५).
- अतिरात्रप्रशंसा । ................................................. 4 (१६-२३).
- पर्यायशस्त्राणि । ................................................... 5 - 7.
XVIII सोमः । - आश्विनशस्त्रम् । ................................................... 1 - 4.
- हारियोजनग्रहः । ................................................... 5 (१-१७).
- शाकलहोमः । ...................................................... 5 (१८-२०).
- ज्योतिष्टोमसमापनम् । ............................................ 5 (२१) - 6 (४).
- अवभृथः । ......................................................... 6 (५) - 8 (८).
- अनूबन्ध्या । ...................................................... 8 (९) - 9 (२१).
- उदवसानीयेष्टिः । ................................................. 9 (२२-३६).
XIX गवामयनम् । - अग्निचयनम् । ...................................................... 1 - 4.
- चतुर्विंशमहः । .................................................... 5 - 7.
XX अभिप्लवषडहः । - अभिप्लवषडहप्रशंसा । .............................................. 1.
- ज्योतिः प्रथममहः । ............................................... 2.
- गोर्द्वितीयमहः । ................................................... 3, 4.
- आयुस्तृतीयमहः । ................................................. 5, 6.
XXI अभिप्लवषडहः । - गोश्चतुर्थमहः । ................................................... 1, 2.
- आयुः पञ्चममहः । ................................................ 3.
XVI कौषीतकिब्राह्मणविषयसूची
३. ज्योतिः षष्ठमहः । ........................................ ४, ५.
४. अभिप्लवषडहशस्त्रच्छन्दोविचारः । ............................. ६, ७.
XXII पृष्ठ्यषडहः ।
१. प्रथममहः । ............................................ १, २.
२. द्वितीयमहः । ........................................... ३, ४.
३. तृतीयमहः । ........................................... ५, ६.
XXIII पृष्ठ्यषडहः ।
१. चतुर्थमहः । ........................................... १ - ३.
२. पञ्चममहः । ........................................... ४ - ६.
३. षष्ठमहः । ............................................ ७ - ११.
XXIV अभिजित् ।
१. प्रातःसवनशस्त्रक्रमः । ................................... १, २.
२. माध्यंदिनशस्त्रक्रमः तृतीयसवनं च । ........................ ३.
३. स्वरसामानः । .......................................... ४ - ७.
४. तृतीयसवने वैश्वदेवशस्त्रे विशेषः । ....................... ८.
XXV विषुवान् विश्वजिच्च ।
१. विषुवत्कालः । ......................................... १ (१-१०).
२. प्रातःसवनशस्त्रक्रमः । ................................... १ (११) - २ (३२).
३. माध्यंदिनसवनशस्त्रक्रमः । ................................ ३ - ८ (६).
४. तृतीयसवनशस्त्रक्रमः । ................................... ८ (७) - ९ (२८).
५. विश्वजित् । ............................................ १० - १३ (१७).
६. विश्वजिदनुष्ठातृवृत्तम् । ................................ १३ (१८) - १४ (२२).
XXVI छन्दोमाः ।
१. गवामयनसत्रे अह्नां क्रमः । .............................. १, २.
२. छन्दोमानां सामान्यतो निरूपणम् । .......................... ३.
३. प्रथमच्छन्दोमशस्त्रक्रमः । ................................ ४ - ६.
४. द्वितीयच्छन्दोमशस्त्रक्रमः । ............................... ७ - ९.
५. तृतीयच्छन्दोमशस्त्रक्रमः । ................................ १० - १४.
कौषीतकिब्राह्मणविषयसूची XVII
XXVII दशममहः ।
१. दशमाहःसंबन्धिविशेषविचारः । ........................... १, २.
२. दशमाहःशस्त्रक्रमः । ................................... २ - ६.
३. मानसस्तोत्रशस्त्रकर्म । ................................. ७, ८.
४. तनूवदनप्रशंसा । ....................................... ९.
५. ऋत्विकर्म । .......................................... १० - ११ (१६).
६. दशरात्रभेदाः । ........................................ ११ (१७-२६).
७. दशरात्रस्य सर्वच्छन्दोभाक्त्वम् । ........................ १२.
XXVIII होत्रकशस्त्राणि (प्रातःसवनम्) ।
१. प्रैषनिगदार्थवादः । ..................................... १ - २ (३).
२. मैत्रावरुणकर्माणि । ..................................... २ (४) - ३ (२२).
३. प्रस्थितयाज्याः । ....................................... ३ (२३-३८).
४. अच्छावाकीयम् । ......................................... ४ - ६ (२०).
५. ऋतुप्रैषमीमांसा । ..................................... ६ (२१-२७).
६. होत्रकशस्त्रसामान्यविचारः । .............................. ६ (२८) - ८ (२०).
XXIX होत्रकशस्त्राणि (माध्यंदिनसवनम्) ।
१. ग्रावस्तुत्कर्म । ....................................... १.
२. दधिघर्मादिप्रचारः । .................................... २.
३. होत्रकशस्त्रक्रमः । .................................... ३ - ८.
XXX होत्रकशस्त्राणि (तृतीयसवनम्) ।
१. आदित्यग्रहप्रचारादि । ................................... १ (१-२१).
२. मैत्रावरुणशस्त्रक्रमः । ................................... १ (२२) - ३ (२२).
३. ब्राह्मणाच्छंसिशस्त्रक्रमः । ............................... ४, ५.
४. अच्छावाकशस्त्रक्रमः । ................................... ६, ७.
५. छन्दोमेषु विशेषः । .................................... ८.
६. अतिरात्रवाजपेयाप्तोर्यामादिषु विशेषः । .................... ९.
अथ
कौषीतकिब्राह्मणम्
अस्मिन् वै लोक उभये देवमनुष्या आसुः ।१। ते देवाः स्वर्गँल्लोकं यन्तोऽग्निमूचुः ।२।
त्वं नोऽस्य लोकस्याध्यक्ष एधीति ।३। तानग्निरुवाच ।४। अथ यद् वोऽहं घोरसंस्पर्श-
तमोऽस्मि ।५। अनपचायितारो मनुष्याः ।६। कथं वस्तद् भविष्यति यन्मनुष्येष्विति ।७।
ते देवा ऊचुः ।८। तस्य वै ते वयं घोरास्तनूर्विनिधास्यामः ।९। अथ यैव ते शिवा शग्मा¹
यज्ञिया तनूः ।१०। तयैह मनुष्येभ्यो भविष्यसीति ।११। तस्याप्सु पवमानामैदधुः ।१२।
वायौ पावकाम् ।१३। आदित्ये शुचिम् ।१४। अथ यैवास्य शिवा शग्मा¹ यज्ञिया तनूरासीत्
।१५। तयैह मनुष्येभ्योऽतपत् ।१६। एता वा अग्रेस्तन्वः ।१७। तद् यदेता देवता यजति
।१८। अनाप्रिः साङ्गः² सतन
[पृष्ठम् २]
I, 3, १-5, ३ कौषीतकिब्राह्मणे 2
देवासुरा वा एषु¹ लोकेषु संयत्ता आसुः ।१। तेभ्योऽग्निरपाक्रामत् ।२। स ऋतून प्रवि-
शत् ।३। ते देवा हत्वासुरान् विजित्याग्निमन्वैच्छन् ।४। तं यमश्च वरुणश्चान्वपश्यताम् ।५।
तमुपामन्त्रयन्त ।६। तमज्ञपयन्न् ।७। तस्मै वरमददुः ।८। स हैतं वरं वव्रे ।९। प्रयाजान् मे
अनुयाजांश्च केवलान् घृतं चापां पुरुषं चौषधीनामिति ।१०। तस्मादाहुराग्रेयाः प्रयाजा-
नुयाजा आग्रेयमाज्यमिति ।११। ततो वै देवा अभवन् ।१२। परासुराः ।१३। भवत्यात्मना
।१४। परास्य द्वेष्यो य एवं वेद² ।१५। तदाहुः कस्मिन्नृतौ पुनरादधीतेति ।१६। वर्षास्विति
हैक आहुः ।१७। वर्षासु वै सर्वे कामाः ।१८। सर्वेषामेव कामानामाप्त्यै ।१९। मध्यावर्षं
पुनर्वसू नक्षत्रमुदीक्ष्य पुनरादधीत ।२०। पुनर्मा वसु वित्तमुपनमत्विति ।२१। अथो पुनः
कामस्योपाप्त्यै ।२२। तद् वै न तस्मिन् काले पूर्वपक्षे पुनर्वसुभ्यां संपद्यते ।२३। यैवेषाषाढ्या
उपरिष्टादमावास्या भवति ।२४। तस्यां पुनरादधीत ।२५। सा पुनर्वसुभ्यां संपद्यते ।२६।
उपाप्तोऽमावास्यायां कामो भवति ।२७। उपाप्तो वर्षासु ।२८। उपाप्तः पुनर्वस्वोः ।२९।
तस्मात् तस्यां पुनरादधीत ।३०। पञ्चकपालः पुरोडाशो भवति ।३१। पञ्चपदा पङ्क्तिः
।३२। पाङ्क्तो वै यज्ञो यज्ञस्यैवाप्त्यै ।३३ ॥३॥
¹ IO. त्रिषु ² L. P. Here ends Khaṇḍa 2
विभक्तिभिः प्रयाजानुयाजान् यजति ।१। ऋतवो वै प्रयाजानुयाजाः ।२। ऋतुभ्य एनं
तत् समाहरति ।३। अग्र आ याहि वीतयेऽग्निं दूतं वृणीमहेऽग्निनाग्निः समिध्यतेऽग्निर्वृत्राणि
जङ्घनदग्नेः स्तोमं मनामहेऽग्ना यो मर्त्यो दुव इत्येतासामृचां प्रतीकानि विभक्तयः ।४। ता
वै षड् भवन्ति ।५। षड् वा ऋतवः ।६। ऋतुभ्य एवैनं तत् पुनः समाहरति¹ ।७। यथायथ-
मृत्तमौ प्रयाजानुयाजौ यजति² ।८। तथा हास्य प्रयाजानुयाजेभ्योऽनितं भवति ।९। वार्त्रघ्नः
पूर्वं आज्यभागः पाप्मन एव वधाय ।१०। अथो हास्य पौर्णमासात् तन्नादनितं भवति
।११। अग्निं स्तोमेन बोधयेत्यग्नये बुद्धिमते पूर्वं कुर्यादिति हैक आहुः ।१२। स्वपितीव वा
एतस्याग्निर्जोऽग्निमुद्वासयते ।१३। तदेवैनं तत् पुनः प्रबोधयतीति ।१४। वार्त्रघ्नस्त्वेव स्थितः
।१५। अग्न आयूंषि पवस इत्युत्तरस्य पुरोनुवाक्या ।१६। पवस इति तत् सौम्यं रूपम्
।१७। केवलाग्रेयो हि यज्ञक्रतुः ।१८। तद् यत् पवमानस्य कीर्तयति ।१९। तथा हास्य
सौम्यादाज्यभागादनितं भवति ।२० ॥४॥
¹ L. P. add इति ² L. P. omit
पञ्चसूक्त्यो याज्यापुरोनुवाक्याः ।१। पञ्चपदा पङ्क्तिः ।२। पाङ्क्तो वै यज्ञो यज्ञस्यैवाप्त्यै¹
[पृष्ठम् ३]
3 अग्न्याधानम् I, 5, ४-२६
।३। व्यतिषक्ता भवन्ति ।४। व्यतिषक्ता इव वा इमे प्राणा आत्मानं भुञ्जन्तीति ।५। सा
सर्वैव ससामिधेनीकोपांशु भवत्यापूर्वाभ्यामनुयाजाभ्याम् ।६। आ ह्यतो विभक्तयोज्नुप्रोता
भवन्ति ।७। अथो सर्वे वै कामा विभक्तिषु ।८। तस्मादुपांशु भवन्ति ।९। सर्वेषामेव
कामानामाप्त्यै ।१०। उच्चैस्त्वेवोत्तमेनानुयाजेन यजति ।११। उच्चैः सूक्तवाकशंयुवाकावाह²
।१२। तद् यथाविदमित्याविर्नष्टं कुर्यात् ।१३। एवं तदाविः कामान् करोत्यापमिति ।१४।
त्र्यमु हैक उपांशु कुर्वन्ति विभक्तीरुत्तरमाज्यभागं हविरिति ।१५। एतावद्ध्यागन्तु
भवतीति ।१६। सा वा उपांशु निरुक्ता भवति ।१७। द्वयं वा अग्रे रूपं निरुक्तं चानिरुक्तं
च ।१८। तदेवास्य तेनाप्नोति ।१९। सर्वप्रियं हैके कुर्वन्ति ।२०। न तथा कुर्यात् ।२१। तस्यै
पुनरुत्यूतो जरत्संव्यायः पुनःसंस्कृतः कद्रयोजनङ्गान हिरण्यं वा दक्षिणा ।२२। पुनः-
कर्म ह्येतत् ।२३। आदित्या द्वितीया ।२४। प्रतिष्ठा वा अदितिः ।२५। प्रतिष्ठित्यै एव
प्रतिष्ठित्या एव ।२६ ॥५॥
¹ L. P. Here ends Khaṇḍa 4 ² L. P. °शंयोर्वाका°
इति प्रथमदशके प्रथमोऽध्यायः
Look at 'उ' in L19:
It has NO top bar! The top of 'उ' is open, with a curve, like 3.
Now look at L33:
Does the first glyph have a top bar?
YES, it has a horizontal top bar!
And an i-mātrā hanging down to the left!
Wait, but look inside:
Is that 'द्वि'?
Wait, could it be 'द्विवीचीं'?
Wait, what if it's 'उ' with something? No, 'उ' never has a top bar.
Wait, let's look at the letters:
Could it be 'द्रि'?
Wait, look at 'द्' in 'द्रिविचीं':
Wait, is it 'द्' + 'र' + 'ि' = द्रि?
Wait, what is after 'द्रि'? 'वि' or 'वी'?
There is a 'व' with a mātrā. The mātrā goes to the left! So 'वि'.
Then 'चीं'.
So it is printed as: "द्रिविचीं" or "द्विविचीं"!
Wait, could it be a misprint in the book for "उदीचीं" or "उद्रीचीं"?
Wait, look at how 19th/20th century Indian editions print it:
Wait, let's search: "स्रुचमुद्यच्छति ।१। रुद्रमेव तत् स्वायां दिश
व्रतं गोपायन्त्या पुनर्होमात्³ ॥२०॥ अथो यत् प्रवत्स्यँश्च प्रोषिवाँश्चाग्नीनुपतिष्ठते ॥२१॥
अभिवादो हैष देवतायै यदुक्ताशं भवति ॥२२॥ अथो अग्निभ्य एवैतदात्मानं परिददाति
॥२३॥ ये चैनमन्वञ्चो भवन्ति⁴ ॥२४॥ अथ यदरष्योरग्नीन्समारोपयते⁵ ॥२५॥ देवरथो वा
अरणी ॥२६॥ देवरथ एवैनाँस्तत् समारोपयते ॥२७॥ स एतेन देवरथेन स्वस्ति स्वर्गं लोकं
समश्नुते ॥२८॥ यद्येव पुनः पुनर्निर्मन्थ्यते ॥२९॥ तेनो हैवास्य पुनराधेयमुपाप्तं भवति⁶ ॥३०॥
ये वै के चानन्दा अन्ने पाने मिथुने ॥३१॥ रात्र्या एव ते संतता अव्यवच्छिन्नाः क्रियन्ते
॥३२॥ तेषां रात्रिः कारोतरः ॥३३॥ य उ वै के चानन्दाः ॥३४ ॥४॥
¹ IO. सर्व ² L. P. Here ends Khaṇḍa 3 ³ L. P. Here ends Khaṇḍa 4
[
यहाँ दोनों पृष्ठों का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यन्तरण प्रस्तुत है:
[पृष्ठ ८]
II, 8, ९-९, १७ कौषीतकिब्राह्मणेऽग्निहोत्रम् 8
न्वेव वयममुंल्लोकं² परेत्य पितुभ्यः ।९। अथो एवैनं³ न⁴ श्रद्धात्तारः ।१०। यद्वैवैतदुभये-
दुरग्निहोत्रमूहूयत ।११। अन्येद्युर्वा तदेतर्हि हूयते ।१२। राज्यामेवेत्येतदेव कुमारी गन्धर्व-
गृहीतोवाच ।१३। राज्यामेवोभे आहुती जुहुतीति ।१४। राज्यां हीति⁵ सा होवाच ।१५।
संधौ जुहुयात् ।१६। समुद्रो ह वा एष सर्वहरो यदहोरात्रे ।१७। तस्य हैते गाधे तीर्थे यत्
संध्ये⁶ ।१८। तद् यथा गाधाभ्यां तीर्थाभ्यां समुद्रमतीयात् तादृक् तत् ।१९। यत् संधौ
जुहोति ।२०। अथो देवसेना ह वा एषाध्वगा हनिष्यन्ती⁷ यदहोरात्रे ।२१। तस्या हँते
पक्षसी यत् संध्ये⁶ ।२२। तद् यथा पक्षाभ्यां क्षिप्रमध्वानमन्विंयात् तादृक् तत् ।२३।
यत् संधौ जुहोति ।२४। अथो मृत्योर्ह वा एतौ विराजबाहू⁸ यदहोरात्रे ।२५। तद्
यथा विराजबाहुभ्यां⁹ परिरिप्रेहिष्यन्नन्तरेणातिमुच्येत तादृक् तत् ।२६। यत् संधौ
जुहोति ।२७ ॥४॥
¹ L. (var.) वाधावत: ² L. P. यममुं लोकं ³ L. P. एनं ⁴ L. (var.) नो, न:; P. न:
⁵ L. (var.) हैति ⁶ L. (var.) संधे ⁷ L. (var.) हनिष्यन्ति, हनिष्यति ⁸ L. P. वाजबाहू
⁹ L. P. व्राजबाहुभ्यां
तदु ह स्माह कौषीतकिः ।१। सायमस्तमिते पुरा तमसोऽस्तस्मिन् काले जुहुयात् ।२। स
देवयानः केतुः ।३। तमेवारभ्य स्वस्ति स्वर्गं¹लोकमैति² ।४। प्रातः पुरोदयादपहते तमसि
तस्मिन् काले जुहुयात् ।५। स देवयानः केतुः ।६। तमेवारभ्य स्वस्ति स्वर्गं¹लोकमैति¹
।७। अथ² योऽतोऽन्यथाग्निहोत्रं जुहोति ।८। श्यामशबलौ हास्याग्निहोत्रं विखिदतः³
।९। अहर्वै शबलः ।१०। रात्रिः श्यामः ।११। स यो महारात्रे जुहोति ।१२। श्यामो
हास्याग्निहोत्रं विखिदति⁴ ।१३। अथ यो महाह्ने जुहोति ।१४। शबलो हास्याग्निहोत्रं
विखिदति⁴ ।१५। तद् वै खलु यदैव कदाचन जुहुयात् ।१६। हुतसमृद्धिमेवोपासीतेति
हुतसमृद्धिमेवोपासीतेति ।१७ ॥५॥
¹ L. P. समश्रुते (for एति) ² L. अथो ³ L. (var.) विषिदतः, विषीदतः; P. विषीदतः
⁴ L. (var.) विषिदति, विषीदति; P. विषीदति
इति प्रथमदशके द्वितीयोऽध्यायः
[पृष्ठ ९]
9 कौषीतकिब्राह्मणे दर्शपूर्णमासौ III, 1, १-३, ५
यद् दर्शपूर्णमासयोरुपवसति ।१। न ह वा अव्रतस्य देवा हविर्भक्षन्ति ।२। तस्मादुप-
वसति ।३। उत मे देवा हविरश्नीयुरिति ।४। पूर्वां पौर्णमासीमुपवसेदिति पैङ्ग्यम् ।५।
उत्तरामिति कौषीतकम् ।६। यां पर्यस्तमयमत्संपर्देति सा स्थितिः ।७। पूर्वां¹ पौर्णमासी-
मुपवसेदनिर्ज्ञाय पुरस्तादमावास्यायां चन्द्रमसम् ।८। यदुपवसति तेन पूर्वां प्रीणाति ।९।
यद् यजते तेनोत्तराम् ।१०। उत्तरामुपवसेत् ।११। उत्तरामु ह वै समुद्रो विजते सोम-
मनु दैवतम् ।१२। एतद् वै देवसत्यं यच्चन्द्रमाः ।१३। तस्मादुत्तरामुपवसेत् ।१४ ॥१॥
¹ L. P. उत्तरां
अथ यत् पुरस्तात् सामिधेनीनां जपति ।१। स्वस्त्ययनमेव तत् कुरुते ।२। हिंकृत्य
सामिधेनीरन्वाह ।३। वज्रो वै हिंकारः ।४। वज्रेणैव तद् यजमानस्य पाप्मानं हन्ति ।५।
त्रिहिंकरोति ।६। त्रिवृद् वै वज्रः ।७। वज्रमेव तदभिसंपादयति ।८। एतेन वै देवास्त्रिवृता
वज्रेणैभ्यो लोकेभ्योऽसुरान्नुदन्त ।९। तथो एवैतद् यजमान एतेनैव त्रिवृता वज्रेणैभ्यो
लोकेभ्यो द्विषतो भ्रातृव्यान् नुदते ।१०। एकादश सामिधेनीरन्वाह ।११। एकादशाक्षरा वै
त्रिष्टुप् ।१२। त्रैष्टुभ इन्द्रः ।१३। तदुभा इन्द्राग्नी आप्नोति ।१४। त्रिः प्रथमया त्रिरुत्तमया
पञ्चदश संपद्यन्ते ।१५। पञ्चदश वै पूर्वपक्षापरपक्षयोरहानि ।१६। तत् सामिधेनीभिः
पूर्वपक्षापरपक्षावाप्नोति ।१७। अथो वज्रो वै सामिधेन्यः ।१८। पञ्चदशो वै वज्रः
।१९। वज्रेणैव तद् यजमानस्य पाप्मानं हन्ति ।२०। यद्वेव त्रिः प्रथमां त्रिरुत्तमाम्
।२१। यज्ञस्यैव तद् बर्सी¹ नह्यति स्थेम्नेऽविस्त्रंसाय ।२२। तासां वै त्रीणि षष्टिशतान्य-
क्षराणां भवन्ति ।२३। त्रीणि वै षष्टिशतानि संवत्सरस्याह्नाम् ।२४। तत् सामिधेनीभिः
संवत्सरस्याहान्याप्नोति ।२५। ता वै गायत्र्यो भवन्ति ।२६। गायत्रो वा अग्निर्मा-
यत्रच्छन्दाः ।२७। स्वेनैव तच्छन्दसाग्निं स्तौति ।२८। अभिरूपा भवन्ति ।२९। यद् यज्ञे
ऽभिरूपं तत् समृद्धं यज्ञस्यैव समृद्धयै ।३०। उत्तमायै तृतीये वचने प्रणवेन निगदमुप-
संदधाति ।३१ ॥२॥
¹ L. (var.) बहिरसौ, बहिंसौ, बर्हसौ, बर्हिरसौ; P. बर्हिरसौ
अग्ने महाँ असि ब्राह्मण भारतेति ।१। अग्निर्वै भरतः ।२। स वै देवेभ्यो हव्यं भरति
।३। अथ यद् यजमानस्यार्षेयमाह ।४। न ह वा अनार्षेयस्य देवा हविरश्नन्ति ।५।
प्रिः सर्वेषु हविःषु भागी भवति" -> wait, is that "यथाप्रिः" or "यथाग्निः"?
Look at the letter: "यथाग्निः"! It is 'ग्निः' (ग + नि).
And "एवं तदग्रेभंगि देवता भागिनीः करोति"?
Wait, look at "तदग्रे...":
त द ग्रे भं गि ? Or "तदग्रेभागि"?
Look at the matra: "तदग्रेभागि" or "तदग्रेभांगि"?
It has "तदग्रेभांगि" or "तदग्रेभागि": त, द, ग्रे, भा, गि (no, it is "तदग्रेभागि" or "तदग्रेभागी:"? wait, "देवता भागिनीः करोति" - "तदग्रेभागि" or "तदग्रेभाजीर्"?).
Wait, look at line 4:
"तद् यथाग्निः सर्वेषु हविःषु भागी भवति ॥३॥ एवं तदग्रेभागि देवता भागिनीः करोति ॥४॥"
Wait, is it "तदग्रेभागि"? Let's look at the letters: त-द-ग्रे-भा-गि (or गी). There is no anusvara. It is "तदग्रेभागि".
Line 5:
"नात्राग्निं होत्रादित्या
पृष्ठम् १२
III, 7, १–8, २४ कौषीतकिब्राह्मणे 12
बार्हतरथन्तरं वषट्कुर्यात् पुरस्ताद् दीर्घमुपरिष्टाद्ध्रस्वम् ।१। यद्ध्रस्वं तद् रथन्तरम्
।२। यद् दीर्घं तद् बृहत् ।३। अथो इयं वै रथन्तरमसौ बृहत् ।४। अनयोरेव तत् प्रति-
तिष्ठति ।५। अथो एतावान् वै वाचो विकारः ।६। सर्वेणैव तद् वाचो विकारेण देवेभ्यो
हविः प्रयच्छति ।७। भूर्भुव इति पुरस्ताद् येयजामहस्य जपति ।८। वषट्कृत्यानुजपत्योजः¹
सहः सह ओजः स्वरिति² ।९। वज्रो वै वषट्कारः ।१०। तमेवैतच्छमयति पुरस्ताच्चो-
परिष्टाच्च ।११। अथो एते एव वषट्कारस्य प्रीयतमे तनू यदोजश्च सहश्च ।१२।
ताभ्यामेवैनं शमयति³ ।१३। अथ यदग्निं प्रथमं देवतानां यजति ।१४। अग्निर्वे देवानां
[L
Here is the complete, line-by-line transcription of both pages shown in the image:
[पृष्ठम् १४]
III, 10, ३३–12, २७ कौषीतकिब्राह्मणे दर्शपूर्णमासौ 14
।३२। अथ यदप उपस्पृशति ।३३। शान्तिर्वै भेषजमापः ।३४। शान्तिरेवैषा भेषजं⁵
यज्ञे क्रियते⁶ ।३५ ॥१०॥
¹⁻¹ L. P. omit ²⁻² L. P. एवैतत्पुरस्ताद्देवता ³ P. यद्यथाचार्यः ⁴⁻⁴ L. P. वदतीडायां
⁵ L. P. add अन्ततो ⁶ L. P. Here ends Khaṇḍa 8
अथ यद् गार्हपत्ये पत्नीसंयाजैश्चरन्ति ।१। गार्हपत्यभाजो वै पत्न्यः ।२। आहवनीयभाग्
यजमानः ।३। तस्माद् गार्हपत्ये पत्नीसंयाजैश्चरन्ति ।४। ते वै चत्वारो भवन्ति ।५। आ
चतुरं वै द्वन्द्वं मिथुनं प्रजननं प्रजायते ।६। ते¹ वा उपांशु भवन्ति ।७। रे
[पृष्ठम् १६]
राजानं चन्द्रमसं भक्षयानीति³ मनसा ध्यायन्भक्षीयत् । ९ । तदसौ वै सोमो राजा विचक्षण-
श्चन्द्रमाः । १० । तमेतमपरपक्षं देवा अभिषुण्वन्ति । ११ । तद् यदपरपक्षं दाक्षायणयज्ञस्य
व्रतानि चरति । १२ । देवानामपि सोमपीथोऽसानीति । १३ । अथ यदुपवसथ्येऽग्नीषोमीयमे-
कादशकपालं पुरोळाशं निर्वपति । १४ । य एवासौ सोमस्योपवसथ्येऽग्नीषोमीयः । १५ । तमे-
वास्य⁴ तेनाप्नोति । १६ । अथ यत् प्रातरामावास्येन यजते । १७ । ऐन्द्रं वै सुत्यमहः । १८ ।
तत् सुत्यमहराप्नोति । १९ । अथ यदमावास्याया⁵ उपवसथ ऐन्द्राग्नं द्वादशकपालं पुरोळाशं
निर्वपति । २० । ऐन्द्राग्नं वै सामतस्तृतीयसवनम् । २१ । तत् तृतीयसवनमाप्नोति । २२ । अथ
यन्मैत्रावरुणी पयस्या । २३ । मैत्रावरुणी वा अनूबन्ध्या । २४ । तदनूबन्ध्यामाप्नोति । २५ । स
एष सोमो हविर्यज्ञाननुप्रविष्टः । २६ । तस्माददीक्षितो⁶ दीक्षितव्रतो भवति । २७ । । ४ । ।
¹ L. P. ०यजेनेष्यन्; IO. ०यजेन्नेषल्ल ² L. P. काममापेति; L. (var.) काममापैति ³ L. P.
भक्षयामीति ⁴ L. P. तमेव ⁵ L. P. ०वास्यायां ⁶ IO. तस्माद्दीक्षितो
अथात इळादधस्य¹ । १ । इळादधेनेष्यन्नेतस्यामेव² पौर्णमास्यां प्रयुङ्क्ते तस्या उक्तं
ब्राह्मणम् । २ । स एष पशुकामस्यान्नाद्यकामस्य यज्ञः । ३ । तेन पशुकामोऽन्नाद्यकामो
यजेत । ४ । तत्र तथैव व्रतानि चरति । ५ । दाक्षायणयज्ञस्य हि समासः³ । ६ । अथातः
सार्वसेनेनयज्ञस्य । ७ । सार्वसेनेनयज्ञेनेष्यन्नेतस्यामेव² पौर्णमास्यां प्रयुङ्क्ते तस्या उक्तं ब्राह्मणम्
। ८ । ⁴⁻स एष तुस्तूर्षमाणस्य यज्ञः । ९ । स य इच्छेद् द्विषन्तं भ्रातृव्यं स्तृण्वीयेति । १० ।
⁵⁻स एतेन⁻⁵ यजते स्तृणुते ह⁴⁻ । ११ । अथातः शौनकयज्ञस्य । १२ । शौनकयज्ञेनेष्यन्ने-
तस्यामेवं पौर्णमास्यां प्रयुङ्क्ते तस्या उक्तं ब्राह्मणम् । १३ । ⁶⁻स एष प्रजातिकामस्य
यज्ञः । १४ । तेन प्रजातिकामो यजेत । १५ । तद् यदध्वर्युर्हवींषि प्रजनयति तत् प्रजात्यै
रूपम्⁻⁶ । १६ । । ५ । ।
¹ IO. इळादतस्य ² L. P. ०नैष्य० ³ L. P. Here ends Khaṇḍa 5 ⁴⁻⁴L. P. here
read १४-१६ and Khaṇḍa 6 ends with प्रजात्यै रूपम् ⁵⁻⁵ L. P. सोऽनेन (for स एतेन);
IO. स एनेन ⁶⁻⁶ L. P. here read ९-११ and Khaṇḍa 7 ends with स्तृणुते ह
अथातो वसिष्ठयज्ञस्य । १ । वसिष्ठयज्ञेनेष्यन्¹ फाल्गुन्याममावास्यायां प्रयुङ्क्ते । २ । ब्रह्म
वै पौर्णमासी । ३ । क्षत्रममावास्या । ४ । क्षत्रमिवैव यज्ञः । ५ । क्षत्रेण शत्रून्त्सहा इति । ६ ।
वसिष्ठोऽकामयत हतपुत्रः प्रजायेय प्रजया पशुभिरभि सौदासान् भवेयमिति । ७ । स एतं
[पृष्ठम् १७]
यज्ञक्रतुमपश्यद् वसिष्ठयज्ञम्² । ८ । तेनेष्ट्वा प्राजायत³ प्रजया पशुभिरभि सौदासानभवत् । ९ ।
तथो एवैतद् यजमानो यद् वसिष्ठयज्ञेन यजते । १० । प्रजायते प्रजया पशुभिरभि द्विषतो
भ्रातृव्यान् भवति⁴ । ११ । अथातः साकंप्रस्थाय्यस्य । १२ । साकंप्रस्थाय्येनेष्यन्नेतस्यामेवा-
मावास्यायां प्रयुङ्क्ते तस्या उक्तं ब्राह्मणम् । १३ । स एष श्रैष्ठ्यकामस्य पौरुषकामस्य
यज्ञः । १४ । तेन श्रैष्ठ्यकामः पौरुषकामो यजेत । १५ । तद् यत् साकं संप्रतिष्ठन्ते । १६ ।
साकं संप्रयजन्ते । १७ । साकं संभक्षयन्ते⁵ । १८ । तस्मात् साकंप्रस्थाय्यः⁶ । १९ । । ६ । ।
¹ L. P. ०नैष्य० ² L. P. IO. add तमाहरत्तेनायजत ³ IO. प्रजायत ⁴ L. P. Here
ends Khaṇḍa 8 ⁵ L. P. भक्षयन्ते ⁶ L. P. Here ends Khaṇḍa 9
अथातो मुन्ययनस्य । १ । मुन्ययनेनेष्यन्नेतस्यामेव¹ पौर्णमास्यां प्रयुङ्क्ते तस्या उक्तं
ब्राह्मणम् । २ । स एष सर्वकामस्य यज्ञः । ३ । तेन सर्वकामो यजेत² । ४ । अथातस्तुरा-
यणस्य । ५ । तुरायणेनेष्यन्नेतस्यामेव³ पौर्णमास्यां प्रयुङ्क्ते तस्या उक्तं ब्राह्मणम् । ६ । स एष
स्वर्गकामस्य यज्ञः । ७ । तेन स्वर्गकामो यजेत । ८ । अथ यत् कृष्णाजिनं प्रतिमुञ्चते । ९ ।
ब्रह्म वै कृष्णाजिनम् । १० । ब्रह्मणैव तदात्मानं⁴ समर्धयति । ११ । तानि वै त्रीणि हवींषि
भवन्ति । १२ । त्रयो वा इमे लोकाः । १३ । इमानेव तल्लोकानाप्नोति⁵ । १४ । । ७ । ।
¹ L. P. ०नेनेष्य० ² L. P. Here ends Khaṇḍa 10 ³ L. P. ०णेनेष्य० ⁴ L. P. तद्यज्ञं
⁵ L. P. Here ends Khaṇḍa 11
अथात आग्रयणस्य । १ । आग्रयणेनान्नाद्यकामो यजेत वर्षास्वागते श्यामाकसस्ये । २ ।
श्यामाकानुद्धर्तव¹ आह । ३ । सा या तस्मिन् कालेऽमावास्योपसंपद्येत । ४ । तयैष्ट्वाथै-
तयेष्ट्या यजेत । ५ । यदि पौर्णमासी । ६ । एतयेष्ट्वाथ पौर्णमासेन यजेत । ७ । यद्यु नक्षत्रमु-
पेप्सेत्² । ८ । पूर्वपक्षे नक्षत्रमुदीक्ष्य यस्मिन् कल्याणे³ नक्षत्रे कामयेत तस्मिन् यजेत । ९ ।
तस्यै सप्तदश सामिधेन्यः सदन्तावाज्यभागौ विराजौ संयाज्ये तस्योक्तं ब्राह्मणम् । १० ।
सौम्यश्चरुः । ११ । सोमो वै राजौषधीनाम् । १२ । तदेनं स्वया दिशा प्रीणाति । १३ । अथ
यन्मधुपर्कं ददाति । १४ । एष ह्यारण्यानां रसः⁴ । १५ । । ८ । ।
¹ L. P. ०नुद्धर्तवा ² IO. ०त्रमपेप्सेत् ³ L. P. omit ⁴ L. P. Here ends Khaṇḍa 12
3
[पृष्ठम् १८]
IV, 9, १-10, १३ कौषीतकिब्राह्मणे इष्टयः 18
अथ वसन्त आगते पकेषु वेणुयवेषु । १। वेणुयवानुद्धर्तवं^1 आह । २। तस्या एतदेव पर्ववत्
तन्त्रमेषा देवतैषा दक्षिणैतद् ब्राह्मणम् । ३। तां हैक आग्नेयीं वा वारुणीं वा प्राजापत्यां
वा कुर्वन्त्येतत्तन्नामवैतद्ब्राह्मणम्^2 । ४। अथ व्रीहिसस्ये वा यवसस्ये वागते । ५। आग्रय-
णीयानुद्धर्तवं^1 आह । ६। तस्या एतदेव पर्ववत् तन्त्रम् । ७। अथ यदैन्द्राग्नो द्वादशकपालः
। ८। इन्द्राग्नी वै देवानां मुखम् । ९। मुखत एव तद् देवान् प्रीणाति । १०। अथ यद् वैश्वदे-
वश्चरुः । ११। एते वै सर्वे देवा यद् विश्वेदेवाः । १२। सर्वेषामेव देवानां प्रीत्यै । १३। अथ
यद् द्यावापृथिवीय एककपालः । १४। द्यावापृथिवी वै सस्यस्य साधयित्र्यौ । १५। प्रतिष्ठा-
पृथिव्योद्यनासावनुवेद^3 । १६। तद् यदेता देवता यजति । १७। एताभिर्देवताभिः शान्त-
मन्नमत्स्यामीति । १८ ॥ ९॥
^1 L. P. °नुद्धर्तवां ^2 L. P. Here ends Khaṇḍa 13 ^3 L. P. °सामनु°; L. (var.) °सावनु°
अथ यत् प्रथमजं गां ददाति । १। प्रथमकर्म ह्येतत् । २। यद्येतस्यै ग्लायात् । ३। पौर्णमासं
वामावास्यं वा हविष्कुर्वीत नवानामुभयस्यात्यै । ४। अपि वा पौर्णमासे वामावास्ये वा
हवींष्यनुवर्तयेद् देवतानामपरिहाणाय । ५। अपि वा यवाग्वैव सायंप्रातरग्निहोत्रं जुहुयान्न-
वानामुभयस्यात्यै । ६। अपि वा स्थालीपाकमेव गार्हपत्ये श्रपयित्वा नवानामेताभ्य आग्र-
यणदेवताभ्य आहवनीये जुहुयात् स्विष्टकृच्चतुर्थीभ्योऽमुष्यै^1 स्वाहामुष्यै स्वाहेति देवता-
नामपरिहाणाय । ७। अपि वाग्निहोत्रीमेव नवानादापयित्वा तस्यै दुग्धेन सायंप्रातरग्निहोत्रं
जुहुयादुभयस्यात्यै । ८। एत एतावन्तः पाताः । ९। तेषां येन कामयेत तेन यजेत । १०।
त्रिहविस्तु स्थिता । ११। त्रयो वा इमे लोकाः । १२। इमानेव तल्लोकानाप्नोतीमानेव
तल्लोकानाप्नोति^2 । १३ ॥ १०॥
^1 L. (var.) °कृत्तचतु° ^2 L. P. Here ends Khaṇḍa 14
इति प्रथमदशके चतुर्थोऽध्यायः
[पृष्ठम् १९]
19 कौषीतकिब्राह्मणे चातुर्मास्यानि V, 1, १-3, २
अथातश्चातुर्मास्यानाम् । १। चातुर्मास्यानि प्रयुञ्जानः फाल्गुन्यां पौर्णमास्यां प्रयुङ्क्ते । २।
मुखं वा एतत् संवत्सरस्य यत् फाल्गुनी पौर्णमासी । ३। मुखमुत्तरे फल्गू । ४। पुच्छं पूर्वे । ५।
तद् यथा प्रवृत्तस्यान्तौ समेतौ स्याताम् । ६। एवमेवैतौ संवत्सरस्यान्तौ समेतौ । ७। तद्
यत् फाल्गुन्यां पौर्णमास्यां वैश्वदेवेन यजते । ८। मुखत एव तत् संवत्सरं प्रीणाति । ९।
अथो भेषज्ययज्ञा वा एते यच्चातुर्मास्यानि । १०। तस्मादृतुसंधिषु प्रयुज्यन्ते । ११।
ऋतुसंधिषु हि व्याधिर्जायते । १२। तानि वा अष्टौ हवींषि भवन्ति । १३। अष्टौ वै
चतसृणां पौर्णमासीनां हवींषि भवन्ति । १४। चतसृणां वै पौर्णमासीनां वैश्वदेवं समासः
। १५। अथ यदग्निर्मन्ध्यते । १६। प्रजातिर्वै वैश्वदेवम् । १७। तस्मादेतं देवं गर्भं प्रजनयन्ति^1
। १८। अथ यत् सप्तदश सामिधेन्यः सद्वन्तावाज्यभागौ विराजौ संयाज्ये तस्योक्तं
ब्राह्मणम् । १९। अथ यन्नव प्रयाजा नवानुयाजा अष्टौ हवींषि वाजिनं नवमम् । २०।
तन्नक्षत्रियां विराजमाप्नोति । २१ ॥ १॥
^1 L. P. IO. प्रजनयति
अथ यदग्नीषोमौ प्रथमौ देवतानां यजति । १। दर्शपूर्णमासिके वा एते देवते । २।
तस्मादेनौ प्रथमौ यजति । ३। अथ यत् सवितारं यजति । ४। सविता वै^1 प्रसवानामीशे । ५।
सवितृप्रसूततायै । ६। अथ यत् सरस्वतीं यजति । ७। वाग् वै सरस्वती । ८। वाचमेव तत्
प्रीणाति । ९। अथ यत् पूषणं यजति । १०। असौ वै पूषा योऽसौ तपति । ११। एतमेव तत्
प्रीणाति । १२। अथ यन्मरुतः स्वतवसो यजति । १३। घोरा वै मरुतः स्वतवसः । १४।
भेषज्यमेव तत् कुरुते । १५। अथ यद् वैश्वदेवी पयस्या । १६। एते वै सर्वे देवा यद् विश्वे-
देवाः । १७। सर्वेषामेव देवानां प्रीत्यै । १८। अथ यद् द्यावापृथिवीय एककपालः । १९।
प्रतिष्ठे वै द्यावापृथिवी प्रतिष्ठित्य एव । २०। ^2-अथ यत् प्रथमजं गां ददाति । २१। प्रथमकर्म
ह्येतत्^-2 । २२। अथ यत् पुरस्ताद् वोपरिष्टाद् वा शंयोर्वाकस्यानावाहितान् वाजिनो यजति
। २३। देवाश्चा^3 वै वाजिनः । २४। तानेव तत् प्रीणाति । २५। अत्र देवाः साध्याः
प्रीता भवन्ति । २६। अथो ऋतवो वै वाजिनः । २७। ऋतूनेव तत् प्रीणाति । २८। अथ यत्
परस्तात् पौर्णमासेन यजते । २९। तथा हास्य पूर्वपक्षे वैश्वदेवेनेष्टं भवति । ३० ॥ २॥
^1 L. omits ^2-2 EM. omits ^3 L. (var.) P. देवा अश्वा
वैश्वदेवेन वै प्रजापतिः प्रजा असृजत । १। ताः सृष्टा अप्रसूता वरुणस्य ^1-यवान् जक्षुः^-1
कौषीतकिब्राह्मणम् (पृ. २०–२१)
[पृष्ठम् २०]
V, 3, ३–5, २६ \ कौषीतकिब्राह्मणे \ 20
।२। ता वरुणो वरुणपाशैः प्रत्यमुञ्चत् ।३। ताः प्रजाः प्रजापतिं पितरमेत्योपाधावन्
।४। उप तं यज्ञक्रतुं जानीहि येनेष्टा वरुणपाशेभ्यः सर्वस्माच्च पाप्मनः संप्रमुच्येमहीति
।५। तत एतं प्रजापतिर्यज्ञक्रतुमपश्यद् वरुणप्रघासान्² ।६। तमाहरत् तेनायजत ।७।
तेनेष्ट्वा वरुणमप्रीणात् ।८। स प्रीतो वरुणो वरुणपाशेभ्यः सर्वस्माच्च पाप्मनः प्रजाः
प्रामुञ्चत् ।९। प्र ह वा अस्य प्रजा वरुणपाशेभ्यः सर्वस्माच्च पाप्मनः संप्रमुच्यते³
⁴य एवं वेद⁴ ।१० ।।३।।
¹⁻¹ P. यवां चक्षुः ² P. वरुणप्रघासं ³ L. P. संप्रमुच्यन्ते; L. (var.) संप्रमुच्यत
⁴⁻⁴ L. P. य एवं विद्वान् वरुणप्रघासैर्यजते
अथ यदग्निं प्रणयन्ति ।१। यमेवामुं वैश्वदेवे मन्थन्ति ।२। तमेव तत् प्रणयन्ति ।३। अथ
यन्मन्थते¹ तस्योक्तं ब्राह्मणम् ।४। अथ यत् सप्तदश सामिधेन्यः सन्ततावाज्यभागौ विराजौ
संयाज्ये तस्योक्तं ब्राह्मणम् ।५। अथ यन्नव प्रयाजा नवानुयाजा नवैतानि हवींषि ।६।
तन्नक्षत्रीयां विराजमाप्नोति ।७। समानानि पञ्च संचराणि हवींषि भवन्ति² पौष्णान्तानि
वैश्वदेविकानि² ।८। तेषामुक्तं ब्राह्मणम्³ ।९। अथ यदिन्द्राग्नो द्वादशकपालः ।१०। प्रतिष्ठे
वा इन्द्राग्नी प्रतिष्ठित्यै एव ।११ ।।४।।
¹ L. P. यदग्निमन्ध्यते ² L. P. omit ³ L. P. Here ends Khaṇḍa 3
अथो मध्यस्थो वा इन्द्रः ।१। तस्मादेनं मध्यतो यजति ।२। अथ यद् वारुणी पयस्या
।३। इन्द्रो¹ वै वरुणः ।४। स उ वै पयोभाजनः ।५। तस्माद् वारुणी पयस्या ।६। अथ यन्मा-
रुती पयस्या ।७। अप्सु वै मरुतः श्रिताः ।८। तस्मादेनान् पयसा यजति ।९। आपो हि पयः
।१०। अथो इन्द्रस्य वै मरुतः ।११। ऐन्द्रं पयः ।१२। तस्मान्मारुती पयस्या ।१३। अथ यत्
काय एककपालः ।१४। प्रजापतिर्वै कः ।१५। तमेव तत् प्रीणाति ।१६। अथो सुखस्यैवैतन्ना-
मधेयं कमिति ।१७। सुखमेव तदात्मन् धत्ते ।१८। अथ यन्मिथुनौ गावौ ददाति ।१९।
तत् प्रजात्यै रूपम् ।२०। अथ यद् वाजिनो यजति ।२१। तेषामुक्तं ब्राह्मणम् ।२२।
अथ यदप्सु वरुणं यजति ।२३। स्व एवैनं तदायतने प्रीणाति ।२४। अथ यत् परस्तात्
पौर्णमासेन यजते ।२५। तथा हास्य पूर्वपक्षे² वरुणप्रघासैरिष्टं भवति³ ।२६ ।।५।।
¹ L. P. इन्द्र उ ² L. (var.) पूर्व पक्षे ³ L. P. Here ends Khaṇḍa 4
<br>[पृष्ठम् २१]
21 \ चातुर्मास्यानि \ V, 6, १–४, ६
ऐन्द्रो वा एष यज्ञक्रतुर्यत् साकमेधाः ।१। तद् यथा महाराजः पुरस्तात् सेनानीकानि¹
प्रत्युद्भाभयं² पन्थानमन्वियात् ।२। एवमेवैतत् पुरस्ताद् देवता यजति ।३। तद् यथावः
सोमस्य महाव्रतम् ।४। एवमेवैतदिष्टिमहाव्रतम्³ ।५। अथ यदग्निमनीकवन्तं प्रथमं देवतानां
यजति ।६। अग्निर्वै देवानां मुखम् ।७। मुखत एव तद् देवान् प्रीणाति ।८। अथ यन्मध्यंदिने
मरुतः सांतपनान् यजति ।९। मध्यंदिने वै संतपति ।१०। तस्मान्मध्यंदिने मरुतः सांतपनान्
यजति ।११। अथो इन्द्रस्य वै मरुतः ।१२। ऐन्द्रो मध्यंदिनः ।१३। तस्मान्मध्यंदिने मरुतः
सांतपनान् यजति ।१४। अथ यत् सायं गृहमेधीयेन चरन्ति ।१५। पुष्टिकर्म वा एतद् यद्
गृहमेधीयः ।१६। सायं पोषः ।१७। तस्मात् पोषवन्तावाज्यभागौ भवतः⁴ ।१८। यजमान-
मेव तत् पोषयति ।१९। अथ यत् प्रातः पूर्णदर्वेण चरन्ति ।२०। पूर्वैर्द्युःकर्मणैवैतत् प्रातः-
कर्मोपसंतनोति ।२१ ।।६।।
¹ L. P. सैनानीकानि ² L. P. प्रत्युद्गामयं ³ P. एवमेतदिष्टि° ⁴ L. P. यजति
अथ यन्मरुतः क्रीडिनो यजति ।१। इन्द्रस्य वै मरुतः क्रीडिनः ।२। तस्मादेनानिन्द्रेणो-
पसंहितान् यजति ।३। ¹अथ यन्महेन्द्रमन्ततो यजति ।४। अन्तं वै श्रेष्ठी भजते ।५। तस्मादे-
नमन्ततो यजति¹ ।६। अथ यदग्निं प्रणयन्ति यन्मन्थते तस्योक्तं ब्राह्मणम् ।७। अथ यत्
सप्तदश सामिधेन्यः सन्ततावाज्यभागौ विराजौ संयाज्ये तस्योक्तं ब्राह्मणम् ।८
"? No, where does 4-4 end?
Wait, footnote 4-4 says: "4-4 L. P. अथ यद्धर्मिणं".
If L. P. has "अथ यद्धर्मिणं", then in the main text, it must be something that corresponds to it, like "स यद्घर्म्यन्वते" or "स यद् घर्म्यन्वते"!
Wait, look at the glyph before 'र्म्यन्वते':
Is that a 'घ'?
Wait, in line 33, it ends with: "स यद्घ-"
Then line 34 starts with: wait, is that a 'घ'?
No, look at the first character of line 34:
Wait, it's NOT a line break hyphenation of one word!
Wait, look at the end of line 33: "स यद्घ-"
Wait, is that a hyphen?
No! It's a minus sign: "⁻" of "⁴⁻"!
Look at line 33:
"⁴⁻स यद्-"
Wait, look at the digit: '⁴'?
No, the '⁴' is before 'स': "⁴⁻स यद्घर्म्यन्वते"!
Wait, where is the '⁴'?
Look at line 33:
क्रियते⁻³ ॥६॥ ⁴⁻स यद्-
Wait, after 'यद्', is there a 'घ'?
No, it
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VI, 1, १-२, ३९ । कौषीतकिब्राह्मणे । 24
प्रजापतिः प्रजातिकामस्तपोऽतप्यत ।१। तस्मात् तप्तात् पञ्चाजायन्त ।२। अग्निर्वादुरा-
दित्यश्चन्द्रमा उषाः पञ्चमी ।३। तानब्रवीद् यूयमपि तप्यध्वमिति ।४। तेऽदीक्षन्त ।५।
तान् दीक्षितांस्तेपानानूषाः प्राजापत्याप्सरोरूपं कृत्वा पुरस्तात् प्रत्युदैत् ।६। तस्यामेषां
मनः समपतत् ।७। ते रेतोऽसिञ्चन्त ।८। ते प्रजापतिं पितरमेत्याब्रुवन् ।९। रेतो वा
$^{1-1}$असिचामहै तन्नो $^1$मामुया भूदिति ।१०। स प्रजापतिर्हिरण्मयं चमस मकरोद्विषुमात्र-
मूर्ध्वमेवं तिर्यञ्चम् ।११। तस्मिन्नेनत्$^2$ समसिञ्चत् ।१२। तत उदतिष्ठत् सहस्राक्षः सहस्र-
पात् ।१३। सहस्रेण प्रतिहिताभिः$^3$ ।१४। स प्रजापतिं पितरमभ्यायच्छत् ।१५। तमब्रवीत्
कथा नाभ्यायच्छसीति ।१६। नाम मे कुर्वित्यब्रवीत् ।१७। न वा इदमविहितेन नाम्नान्न-
मत्स्यामीति ।१८ ।।१।।
$^{1-1}$ L. P. असिचामहा इदं नो $^2$ P. BM$^1$. एतत् (for एनत्); L. तस्मिन् रेतः; (var.) तस्मिन्नेतत्
$^3$ L. P. Here ends Khaṇḍa 1
स वै त्वमित्यब्रवीद् भव एवेति ।१। यद् भव आपस्तेन ।२। न$^1$ ह वा एनं भवो हिनस्ति
।३। नास्य प्रजां नास्य पशून् नास्य ब्रुवाणं चन ।४। अथ य एनं द्वेष्टि ।५। स एव पापीयान्
भवति ।६। न स य एवं वेद ।७। तस्य व्रतमाद्र्मेव वासः परिदधीतापो वै न परिचक्षी-
तेति$^2$ ।८। तं द्वितीयमभ्यायच्छत् ।९। तमब्रवीत् कथा नाभ्यायच्छसीति ।१०। द्वितीय
कौषीतकिब्राह्मणम्
[पृष्ठम् २६]
VI, 4, १–५, ३० कौषीतकिब्राह्मणे २६
प्रजापतिस्तपोऽतप्यत। ।१। स तपस्तप्त्वा प्राणाद्देवेभँल्लोकं प्रावृहत् ।२। अपाना-
दन्तरिक्षलोकम् ।३। व्यानादमूंल्लोकम् ।४। स एताँस्त्रींल्लोकानभ्यतप्यत ।५। सोऽग्नि-
मेवास्माल्लोकादसृजत ।६। वायुमन्तरिक्षलोकादादित्यं दिवः ।७। स एतानि त्रीणि ज्यो-
तींष्यभ्यतप्यत ।८। सोऽग्नेरेवर्चोऽसृजत ।९। वायोर्यजूंष्यादित्यात् सामानि ।१०। स एतां
त्रयीं विद्यामभ्यतप्यत ।११। स यज्ञमतनुत ।१२। स ऋचैवाशंसत् ।१३। यजुषा प्राचरत्
साम्नोदगायत् ।१४। अथैतस्या एव त्रय्यै विद्यायै तेजोरसं प्रावृहत् ।१५। एतेषामेव
वेदानां भिषज्यायै ।१६। स भूरित्यृचां प्रावृहत् ।१७। भुव इति यजुषां स्वरिति साम्नाम्
।१८। तेन¹ दक्षिणतो ब्रह्माऽसीत् ।१९। तस्य² दक्षिणतो वर्षीयानुदीचीनप्रवणो यज्ञः
संतस्थे ।२०। तस्य ह वै दक्षिणतो वर्षीयानुदीचीनप्रवणो³ यज्ञः संतिष्ठते ।२१ ॥४॥
¹ L. केन; (var.) तेन
² L. कस्य; (var.) तस्य
³ L. (var.) P. ०चीनेवप्र०
यस्यैवं विद्वान् ब्रह्मा भवति¹ ।१। तदाहुर्यदृचा होता होता भवति यजुषाध्वर्युरध्वर्युः
साम्नोद्गातोद्गाता केन ब्रह्मा ब्रह्मा भवतीति ।२। यमेवामुं त्रय्यै विद्यायै तेजोरसं प्रावृहत्
।३। तेन ब्रह्मा ब्रह्मा भवति ।४। तदाहुः किंविदं खिंविदसं ब्रह्माणं वृणीतेति ।५। अध्वर्यु-
मित्येके ।६। स परिक्रमाणां क्षेत्रज्ञो भवतीति ।७। छन्दोगमित्येके ।८। तथा हास्य त्रिभिर्वे-
दैर्हविर्यज्ञाः संस्क्रियन्त इति ।९। बह्वृचमिति त्वेव स्थितम् ।१०। एतत्परिसरणावितरौ²
वेदौ ।११। अत्र च भूयिष्ठा होत्रा³ आयत्ता भवन्तीति ।१२। ऋग्भिर्ग्रहा गृह्यन्ते ।१३।
ऋक्षु सामानि गीयन्ते ।१४। तस्माद् बह्वृच एव स्यात् ।१५। तदाहुः कियद् ब्रह्मा
यज्ञस्य संस्करोति कियदन्य ऋत्विज इति ।१६। अर्धमिति ब्रूयात् ।१७। द्वे वै यज्ञस्य वर्तनी
।१८। वाचान्या संस्क्रियते ।१९। मनसान्या ।२०। सा या वाचा संस्क्रियते ।२१। तामन्य
ऋत्विजः संस्कुर्वन्ति ।२२। अथ या मनसा तां ब्रह्मा ।२३। तस्माद् यावदृचा यजुषा
साम्ना कुर्युः ।२४। तूष्णीं तावद् ब्रह्मासीत ।२५। अर्धं हि तद् यज्ञस्य संस्करोति⁴
।२६। अथ यत्रैनं ब्रूयुः ।२७। ⁵⁻ब्रह्मन् प्रचरिष्यामो ब्रह्मन् प्रणेष्यामो⁵⁻ब्रह्मन् प्रस्थास्यामो
ब्रह्मन्स्तोष्यन्त इति वा⁶ ।२८। ओमित्येतावता प्रसूयात् ।२९। एतद्व वा एकमक्षरं त्रयीं
विद्यां प्रति प्रति ।३० ॥५॥
¹ L. P. Here ends Khaṇḍa 10
² L. P. ०परिचरणा०
³ IO. omits
⁴ L. P. Here ends Khaṇḍa 11
⁵⁻⁵ L. ब्रह्मन् प्रणेष्यामो ब्रह्मन् प्रचरिष्यामो; P. ब्रह्मन् प्रणेष्यामो ब्रह्मन् प्रचरतरिष्यामो; L. (var.) प्रतरिष्यामो, प्रत्वरिष्यामो, प्रवरिष्यामो (for प्रचरिष्यामो)
⁶ L. P. omit
[पृष्ठम् २७]
२७ ब्रह्मत्वम् VI, 6, १–8, ९
तथा हास्य त्रय्या विद्यया प्रसूतं भवति ।१। ब्रह्मणि वै यज्ञः प्रतिष्ठितः ।२। यद् वै
यज्ञस्य स्खलितं वोल्बणं वा भवति ।३। ब्रह्मण एव तत् प्राहुः ।४। तत् स त्रय्या विद्यया
भिषज्यति ।५। अथ यद्यृच्युल्बणं स्यात् ।६। चतुर्गृहीतमाज्यं गृहीत्वा गार्हपत्ये प्रायश्चि-
त्ताहुतिं जुहुयाद् भूः स्वाहेति ।७। तदृचमृचि दधाति ।८। ¹⁻ऋच ऋचे¹ प्रायश्चित्तिं करोति
।९। अथ यदि यजुष्युल्बणं स्यात् ।१०। चतुर्गृहीतमाज्यं गृहीत्वान्वाहार्यपचने प्रायश्चित्ता-
हुतिं जुहुयाद्धविर्यज्ञ आप्रीध्रीये² सौम्येऽध्वरे भुवः स्वाहेति ।११। तद् यजुर्यजुषि दधाति
।१२। यजुषा यजुषे³ प्रायश्चित्तिं करोति ।१३। अथ यदि साम्न्युल्बणं स्यात् ।१४।
चतुर्गृहीतमाज्यं गृहीत्वाऽऽहवनीये प्रायश्चित्ताहुतिं जुहुयात् स्वः स्वाहेति ।१५। तत् साम
सामन्⁴ दधाति ।१६। साम्ना साम्ने⁴ प्रायश्चित्तिं करोति ।१७। अथ यद्यविज्ञातमुल्बणं
स्यात् ।१८। चतुर्गृहीतमाज्यं गृहीत्वाऽऽहवनीय एव प्रायश्चित्ताहुतिं जुहुयाद् भूर्भुवः स्वः
स्वाहेति ।१९ ॥६॥
¹⁻¹ L. P. ऋचर्वि
² L. P. आग्नीध्रीये
³ L. P. यजुषि
⁴ L. P. साम्नि
एष ह वै यज्ञस्य व्यृद्धिं¹ समर्धयति य एताभिर्व्याहृतिभिः प्रायश्चित्तिं करोति ।१।
न ह वा उपसृतो² ब्रूयाद्ब्राह्मेतद् वेदेत्येता व्याहृतीर्विद्वान्³।२। सर्वं ह वा उ स वेद य एता
व्याहृतीर्वेद ।३। तद् यथा ह वै दारुणः श्लेष्म संश्लेषणं स्यात् परिचर्मण्वं वा ।४। एवमे-
वैता व्याहृतयः सर्वस्यै⁴ त्रय्यै विद्यायै संश्लेषिण्यः⁵।५। अथ यद् ब्रह्मसदनात् तृणं निरस्यति
।६। शोधयत्येवैनत् तत् ।७। अथोपविशतीदमहमर्वावसोः सदसि सीदामीति ।८। अर्वा-
वसुर्ह वै देवानां ब्रह्मा ।९। तमेवैतत् पूर्वं⁶ सादयत्यरिष्टं यज्ञं तनुतादिति⁷ ।१०। अथोप-
विश्य जपति बृहस्पतिर्ब्रह्मेति ।११। बृहस्पतिर्ह वै देवानां ब्रह्मा ।१२ ॥७॥
¹ L. P. व्यृद्धं
² L. (var.) उपश्रुतो
³ IO. व्याहृतीमिविँ०
⁴ L. P. omit
⁵ IO. संश्लेषिणः; P. संश्लेष्ण्यः; L. P. Here ends Khaṇḍa 12
⁶ P. पूर्वं
⁷ L. (var.) तनुतादिति
तस्मिन्नेवैतदनुज्ञामिच्छते ।१। प्रणीतासु प्रणीयमानासु वाचं यच्छत्या हविष्कृत उद्वा-
दनात् ।२। एतद् वै यज्ञस्य द्वारम् ।३। तदेवैतदशून्यं⁴ करोति ।४। इष्टे च स्विष्टकृत्या-
नुयाजानां प्रसवात् ।५। एतद्व वै यज्ञस्य द्वितीयं द्वारम् ।६। तदेवैतदशून्यं करोति ।७।
अथ यत्र ह तद् देवा यज्ञमतन्वत ।८। तत् सवित्रे प्राशित्रं परिजह्रुः ।९। तस्य पाणी
VI, 8, १०–10, १६ कौषीतकिब्राह्मणे 28
प्रचिच्छेद ।१०। तस्मै हिरण्मयौ प्रतिदधुः२ ।११। तस्माद्धिरण्मयपाणिरिति स्तुतः ।१२।
तद् भगाय परिजह्रुः ।१३। तस्याक्षिणी निर्जघान ।१४। तस्मादाहुरन्धो भग इति
।१५। तत् पूष्णे परिजह्रुः ।१६। तस्य दन्तान् परोवाप ।१७। तस्मादाहुरदन्तकः पूषा
करम्भभाग इति ।१८। ते देवा ऊचुः३ ।१९ ॥८॥
¹ L. P. तदेतदशून्यं ² L. (var.) प्रतिददुः ³ L. P. Here ends Khaṇḍa 13
इन्द्रो वै देवानामोजिष्ठो बलिष्ठस्तस्मा एनत् परिहरतेति ।१। तत् तस्मै परिजह्रुः ।२।
तत् स ब्रह्मणा शमयांचकार ।३। तस्मादाहेन्द्रो ब्रह्मेति ।४। तत् प्रतीक्षते मित्रस्य त्वा
चक्षुषा प्रती
कौषीतकिब्राह्मणे — अध्याय ७
[पृष्ठ ३०]
VII, 1, १-३, १० कौषीतकिब्राह्मणे 30
वाग् दीक्षा ।१। वाचा हि दीक्षते ।२। प्राणो दीक्षितः ।३। वाचा वै दीक्षया देवाः
प्राणेन दीक्षितेन सर्वान् कामानुभयतः परिगृह्यात्मन्नदधत ।४। तथो एवैतद् यजमानो
वाचैव दीक्षया प्राणेन दीक्षितेन सर्वान् कामानुभयतः परिगृह्यात्मन् धत्ते ।५। आग्ना-
वैष्णवमेकादशकपालं पुरोडाशं निर्वपति¹ ।६। अग्निवै देवानामवराध्यो॑ विष्णुः परार्ध्यः
।७। तद् यन्नैवैव देवानामवराध्यो॑ यन्न परार्ध्यः ।८। ताभ्यामेवैतत् सर्वा देवताः परिगृह्य
सलोकतामाप्नोति ।९। तस्मात् कामं पूर्वो दीक्षित्वा संसुनुयात्² ।१०। पूर्वस्य ह्यस्य
देवताः परिगृही