कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)
Kaushitaki Brahmana Upanishad with Hindi Translation
स्वामी महेश्वरानन्द गिरि द्वारा
स्रोत: मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली · मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली (उद्गम)
३
।। शान्तिमन्त्रः ।।
ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता, मनो से वाचि प्रतिष्ठितम् ।
आवीरावीर्म एधि वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः ।।१।।
ॐ। मेरे वाणी और मन परस्पर एक-दूसरे में प्रतिष्ठित हों।
प्रकाशमान परमात्मतत्त्व मुझे साक्षात् हो। वाणी वेद को और मन वेदार्थ
को मुझ तक पहुँचाये। सुने हुए को मैं भूलूँ नहीं।।१।।
अनेनाधीतेन अहोरात्रान् सन्दधामि। ऋतं वदिष्यामि। सत्यं
वदिष्यामि। तन्मामवतु। तद्वक्तारमवतु। अवतु मामवतु वक्तारम्।
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः ।।२।।
इस पढ़े हुए से मैं दिन-रात एक कर दूँ। मैं ऋत और सत्य ही
बोलूँ। परमात्मा मेरी और वक्ता की रक्षा करे। त्रिविध ताप शांत
हों।।२।।
अथ प्रथमोध्यायः
चित्रो ह वै गार्ग्यायणिर्यक्ष्यमाण आरुणिं वव्रे स ह पुत्रं
श्वेतकेतुं प्रजिघाय याजयेति तं हासीनं पप्रच्छ गौतमस्य पुत्रास्ते
संवृतं लोके यस्मिन्माधस्यस्यन्यमहो बद्ध्वा तस्य लोके
धास्यसीति स होवाच नाहमेतद्वेद हन्ताचार्यं पृच्छानीति ।।३।।
गार्ग्य का पुत्र चित्र यज्ञ करने वाला था। उसने यज्ञ कराने के
लिए आरुणि को पसंद किया। आरुणि ने स्वयं न जाकर अपने बदले
में अपने पुत्र श्वेतकेतु को भेजा। जब वह चित्र के पास आया तब
चित्र ने पूछा "तू गौतम का पुत्र है, क्या इस लोक में कोई ऐसा गुप्त
स्थान है कि जहां तू यज्ञ करके मुझे स्थापित कर सकेगा? अथवा
अचिरादि मार्ग से जिस लोक में जाया जाता है उस लोक में क्या तू
४
मुझे स्थापित करेगा?” श्वेतकेतु ने कहा “यह मैं कुछ नहीं जानता,
इसके विषय में आचार्य से पूछूंगा। ।३।।
स ह पितरमासाद्य पप्रच्छेतीति मा प्राक्षत्कथं प्रतिब्रवाणीति
स होवाचाहमप्येतन्न वेद सदस्येव वयं स्वाध्यायमध्येत्य हरामहे ।।४।।
यह (श्वेतकेतु) अपने पिता के पास लौट गया और बोला “चित्र
ने मुझसे इस प्रकार पूछा है, मैं इसका क्या उत्तर दूं?” उसके पिता
ने कहा “मैं भी यह नहीं जानता, चल हम उसके घर पर चलें, वहां
वेदाध्ययन करके उससे ज्ञान प्राप्त करें। ।४।।
यन्नः परे ददत्येह्युभौ गमिष्याव इति ।। स ह समित्पाणिश्चित्रं
गार्ग्यायणिं प्रतिचक्रम उपायानीति तं होवाच ब्रह्मार्होऽसि गौतम
यो मामुपागा एहि त्वा ज्ञपयिष्यामीतिं । स होवाच ये वैके
चास्माल्लोकात्प्रयन्ति चन्द्रमसमेव ते सर्वे गच्छन्ति तेषां प्राणैः
पूर्वपक्ष आप्यायतेऽथापरपक्षे न प्रजनयत्येतद्वै स्वर्गस्य लोकस्य
द्वारं यश्चन्द्रमास्तं यत्प्रत्याह तमतिसृजते य एनं प्रत्याह तमिह
वृष्टिर्भूत्वा वर्षति ।।५।।
क्योंकि जब अन्य अपने को देता तो प्राप्ति के लिये दोनों चलें ।
(ज्ञानप्राप्ति में संकोच नहीं करना चाहिये।)” अनन्तर हाथ में
समिधा लेकर वह गार्ग्य के पुत्र चित्र के पास गया और कहा ‘मैं आप
से ज्ञान प्राप्त करने आया हूँ’ तब चित्र ने कहा “गौतम ! तू ब्रह्मविद्या
प्राप्त करने योग्य है (क्योंकि तुझमें अहंकार नहीं है) ‘तू मेरे पास आ,
मैं तुझे ब्रह्मविद्या का उपदेश करूंगा। चित्र बोला—“जो कोई इस लोक
में से जाते हैं वे सब चन्द्रलोक में जाते हैं। शुक्ल पक्ष में चन्द्र उन
लोगों के प्राणों से पुष्ट होता है परन्तु कृष्ण पक्ष में उनको फिर उत्पन्न
नहीं करता। सचमुच चन्द्र स्वर्ग का द्वार है, जिसको इस चन्द्रलोक
५
की इच्छा नहीं होती उसको वह ऊर्ध्व लोक में भेजता है, परंतु जिसको
चन्द्रलोक की इच्छा होती है उसको वह वृष्टि रूप से इस लोक में
भेजता है।।५।।
स इह कीटो वा पतंगो वा शकुनिर्वा शार्दूलो वा सिंहो वा
मत्स्यो वा परश्वा वा पुरुषो वान्ये वैतेषु स्थानेषु प्रत्यांजायते
यथाकर्म यथाविद्यं ।।६।।
वहां वह कीट, पतंग, पक्षी, वाघ, सिंह, मत्स्य, रीक्ष, मनुष्य अथवा
कोई अन्य स्थानों में प्राणी रूप से अपने कर्म और विद्या के अनुसार
धारण करता है।।६।।
तमागतं पृच्छति कोऽसीति तं प्रतिब्रूयाद्विचक्षणादृतवोरेत
आभृतं पञ्चदशात्प्रसूतात्पित्र्यावतः।।७।।
जब वह जन्म लेता है तब गुरु उसको पूछता है "तू कौन?" तब
इसका उत्तर नीचे के समान देना चाहिये "विचक्षण और ऋतु के
अधिष्ठाता ऐसे चन्द्र में से रेत् एकत्र हुआ था यह चन्द्र शुक्ल पक्ष
और कृष्ण पक्ष को उत्पन्न करता है, वह पितरों का स्थान रूप है।।७।।
तन्मा पुंसि कर्तर्येरयध्वं पुंसा कर्त्रा मातरि मासिसिक्तः स
जायमान उपजायमानो द्वादश त्रयोदश उपमासा।।८।।
उस चन्द्र की उत्पत्ति नित्य के हवि में से होती है। रेत रूप मुझको
देवताओं ने मनुष्य में रखा। मनुष्य को निमित्त करके देवताओं ने मुझे
स्त्री में रखा। उस में से मैं बारह अथवा तेरह मास रूप से अथवा
जीवित रूप ये मनुष्य जन्म को प्राप्त हुआ था।।८।।
द्वादशत्रयोदशेन पित्रा संतद्विदेहं प्रतितद्विदेहं तन्म ऋतवो
मर्त्यव आरभध्वं ।।६।।
सत्य असत्य का ज्ञान जानने के निमित्त बारह अथवा तेरह मास
६
रूप पिता के साथ जुड़ा था, हे देवताओं! मुझे जीवित योग्य समय
तक रहने दो कि जिससे अमृतता को प्राप्त होऊं।।६।।
तेन सत्येन : तपसर्तुरस्म्यार्तवोऽस्मि कोऽसि त्वमस्मीति
तमतिसृजते ।।१०।।
अपने सत्य से - मेहनत और सहनशीलता से मैं काल रूप हूँ, मैं
कालके अधीन हूँ, तुम कौन हो?" तब वह कहता “मैं भी तेरे समान
हूँ!” पश्चात् वह उसको आगे जाने देता है ।।१०।।
स एतं देवयानं पन्थानमासाद्याग्निलोकमागच्छति स वायुलोकं
स वरुणलोकं स आदित्यलोकं स इन्द्रलोकं स प्रजापतिलोकं स
ब्रह्मलोकं तस्य ह वा एतस्य ब्रह्मलोकस्यारोहदो मुहूर्ता येष्टिहा
विरजा नदी इल्यो वृक्षः सालुज्यं संस्थानमपराजितमानयतन-
मिन्द्रप्रजापती द्वारगोपौ विभुं प्रमितं विचक्षणासंध्यमितौजाः
पर्यङ्कः प्रिया च मानसी प्रतिरूपा च चाक्षुषी पुष्पाण्यादायावयतौ
वै च जगत्यम्बाश्चाप्सरसोऽम्बपा नद्यस्तमित्थंविदा गच्छति ।।११।।
देवयान मार्ग को प्राप्त होकर वह अग्निलोक की तरफ जाता है,
उस स्थान से वायु लोक में जाता है। वहाँ से वरुण लोक में, वहां
से आदित्य लोक में, वहां से इन्द्र लोक में, वहां से प्रजापतिलोक में
और वहां से ब्रह्मलोक में जाता है। ब्रह्मलोक में अर नामका सरोवर,
इष्टिह नाम का समय, विरजा नामकी नदी इल्य नामका वृक्ष, सालज्य
नामका नगर, अपराजित नामका प्रासाद, इन्द्र (वायु) और प्रजापति
(आकाश) द्वारपाल रूप से हैं। ब्रह्म का विभु नामक सुसज्जित कमरा
है, विचक्षणा (बुद्धि) उसकी गद्दी है। उत्कृष्ट तेज वाला उसका पलंग
है, मानसी नाम की प्रिया, चाक्षुषी नाम का प्रतिबिम्ब है जो पुष्पों के
समान जगत् को बुनता है सबकी माता (श्रुति) रूप और अक्षर (श्रुति
७
ज्ञान) रूप अप्सरायें और ब्रह्मज्ञान में वहन करने वाली नदियां होती
हैं।।११।।
तं ब्रह्माहाभिधावत मम यशसा विरजा वा अयं नदीं
प्रपन्नवानय जिगीष्यतीति ।।१२।।
ब्रह्म को जानने वाला आगे बढ़ता है, उस समय ब्रह्मा अपने सेवकों
से कहता है—मेरे यश से तुम दौड़कर उससे मिलो, वह विरजा नाम
की नदी को फलांग चुका है अब वह कभी भी जरा युक्त नहीं
होगा ।।१२।।
तं पञ्चशतान्यप्सरसां प्रतिधावन्ति शतं मालाहस्ताः
शतमान्जनहस्ताः शतं चूर्णहस्ताः शतं वासोहस्ताः शतं कणाहस्तास्तं
ब्रह्मालंकारेणालंकुर्वन्ति स ब्रह्मालंकारेणालंकृतो ब्रह्म विद्वान्
ब्रह्मैवाभिप्रैति ।।१३।।
पांच सौ अप्सरायें उसे मिलने को सामने जाती हैं। उनमें से सौ
अप्सराओं के हाथों में मालाएं होती हैं, एक सौ अप्सराओं के हाथों
में अंजन होता है, एक सौ अप्सराओं के हाथों में चूर्ण होता है, एक
सौ अप्सराओं के हाथों में वस्त्र होता है और एक सौ अप्सराओं के
हाथों में जवाहरात होते हैं। वे उसको ब्रह्म के अलंकार से सुशोभित
बनाती हैं। ब्रह्म के अलंकारों से अलंकृत और ब्रह्म को जानने वाला
ऐसा वह ब्रह्म के समीप जाने लगता है।।१३।।
स आगच्छत्यारं हदं तन्मनसात्येति तमृत्वा संप्रतिविदो
मज्जन्ति स आगच्छति मुहूर्तान्येष्टिहांस्ते ।।१४।।
प्रथम वह अर नाम के सरोवर के पास आता है, मन से इस सरोवर
का अतिक्रमण करता है। जो वर्तमान समय को जानते हैं वे इस सरोवर
के पास आते ही उसमें डूब जाते हैं। पश्चात् वह यज्ञ की इष्टि के
८
नाश करने वाले मुहूर्तों के पास आता है।।१४।।
अस्मादपद्रवन्ति स आगच्छति विरजां नदीं तां मनसैवात्येति
तत्सुकृतदुष्कृते धूनुते ।।१५।।
वे उसे देखते ही भाग जाते हैं, पीछे वह विरजा नाम की नदी के
पास आता है, इसे नदी के मन से अतिक्रमण करता है। इस स्थान
पर वह अपने सुकृत और दुष्कृतका त्याग करता है।।१५।।
तस्य प्रिया ज्ञातयः सुकृतमुपयन्त्यप्रिया दुष्कृतं तद्यथा रथेन
धावयन्नथचक्रे पर्यवेक्षत एवं । ।१६ ।।
उसके प्रिय कुटुम्बी-उपासना करने वाले उसके सुकृत को प्राप्त
करते हैं और उसका अप्रिय करने वाले, उसके दुष्कृत को लेते हैं।
जैसे रथ में बैठकर जल्दी से गमन करने वाला पुरुष रथ के चक्र की
तरफ दृष्टि करता है वैसे ही वह दिन और रात्रि को देखता है ।।१६ ।।
सुकृतदुष्कृते सर्वाणि च द्वन्द्वानि स एष विसुकृतो विदुष्कृतो
ब्रह्म विद्वान्ब्रह्मैवाभिप्रैति ।।१७।।
इसी प्रकार सुकृत और दुष्कृत तथा सर्व द्वन्द्व भावों को देखता
है इस प्रकार सुकृत और दुष्कृत. से रहित होकर ब्रह्मज्ञानी ब्रह्म के प्रति
जाता है।।१७।।
स आगच्छति इल्यं वृक्षं तं ब्रह्मगन्धः प्रविशति स आगच्छति
सालुज्यं संस्थानं तं ब्रह्म स प्रविशति आगच्छत्य-
पराजितमायतनं ।।१८ ।।
वह इल्य नाम के वृक्ष के पास आता है, उसको ब्रह्म की गंध आती
हैं पीछे सालज्य नाम के शहर के पास आता है, उसमें ब्रह्म तेज. का
प्रवेश होता है, पीछे वह अपराजित महल के पांस आता है ।।१८ ।।
६
तं ब्रह्मतेजः प्रविशति स आगच्छतीन्द्रप्रजापती द्वारगोपौ
तावस्मादपद्रवतः स आगच्छति विभुप्रमितं ब्रह्मयश प्रविशति । १९६. १ ।।
उसमें ब्रह्म तेज प्रवेश करता है। पीछे जिस स्थान पर इन्द्र और
प्रजापति द्वारपाल हैं वहां आता है। वे उसे देख कर भाग जाते हैं।
वह विभु नाम के कमरे में आता है तब उसमें ब्रह्म का यश प्रवेश करता
है ।।१९६।।
स आगच्छति विचक्षणामासन्दी बृहद्रथन्तरे सामनी पूर्वौ पादौ
श्यैत नौधसे चापरौ पादौ वैरूपवैराजे शाक्वररैवते तिरश्ची ।।२०।।
वह विलक्षण नाम की गद्दी के पास आता है। इस गद्दी के पूर्व
की तरफ के दो पाद बृहत् और रथंतर नाम के साम हैं। श्यैत और
नौधस उसकी पश्चिम तरफ के पाद हैं। विरूप और वैराज साम उसके
उत्तर और दक्षिण के कोण हैं और शाक्वर और रैवत साम पूर्व पश्चिम
की तरफ के कोण हैं ।।२०।।
सा प्रज्ञा प्रज्ञया हि विपश्यति स आगच्छत्यमितौजसं पर्यङ्कं
स प्राणस्तस्य भूतं च भविष्यच्च पूर्वौ पादौ श्रीश्चेरा चापरौ
बृहद्रथन्तरे अनूच्ये ।।२१।।
यह वेदी ज्ञान रूप है। प्रज्ञा से वह सबको देखता है। पीछे वह
उत्कृष्ट तेज वाले पलंग के पास आता है। यह पलंग प्राण रूप है,
भूत और भविष्य उसके पूर्व पाद हैं, श्री और पृथिवी उसके पश्चिम
पाद हैं ।।२१।।
भद्रयज्ञायज्ञीये शीर्षण्यमृतश्च सामानि च प्राचीनातानं यजूंषि
तिरश्चीनानि सोमांशव उपस्तरणमुद्गीथ उपश्रीः ।।२२।।
बृहत् और रथंतर नाम के साम उत्तर और दक्षिण तरफ की पाटी
हैं, भद्र और यज्ञायज्ञीय पूर्व और पश्चिम की तरफ की पाटी हैं। ऋक्
१०
तथा यजुष् पूर्व, पश्चिम तरफ की निवार है, यजुष् उत्तर दक्षिण तरफ
की निवार है। चन्द्र की किरणें गेंडुआ (कान के नीचे रखने का तकिया)
है उद्गीथ चद्दर है ।।२२।।
श्रीरुपबर्हणं तस्मिन्ब्रह्मास्ते तमित्यंवित्पादेनैवाग्र आरोहति तं
ब्रह्माह कोऽसीति तं प्रतिब्रूयात् ।।२३।।
अभ्युदय तकिया है, इस पलंग पर ब्रह्म विराजता हैं जब एक पैर
को ऊपर रख कर ब्रह्म का ज्ञाता ऊपर चढ़ने को जाता है, तब ब्रह्म
उससे पूछता है “तू कौन है?” तब उसे नीचे के समान कहना
चाहिये । २३ ।।
ऋतुरस्म्यार्तवोऽस्म्याकाशाद्योनेः संभूतो भाययै रेतः संवत्सरस्य
तेजोभूतस्य भूतस्यात्मभूतस्य त्वमात्मासि यस्त्वमसि सोऽहमस्मीति
तमाह कोऽहमस्मीति सत्यमिति ब्रूयात्किं तद्यत्सत्यमिति
यदन्यद्देवेभ्यश्च प्राणेभ्यश्च तत्सदथ ।।२४।।
“मैं काल रूप हूँ, ऋतुओं में जो होता है सो रूप मैं हूँ। मेरी उत्पत्ति
आकाश में से है, संवत्सर का रेत रूप, भूत और कारण का तेज रूप,
जड, चैतन्य सबका आत्मा रूप और पंच भूतात्मक शबल ब्रह्म के तेज
में से मेरा उद्भव है। तू यह आत्मा रूप है, जैसा तू है वैसा मैं हूँ।”
ब्रह्म उससे पूछता है “मैं कौन हूँ?” तब कहना चाहिये “तू सत्य रूप
है” “सत्य क्या है?” “जो सब (इन्द्रियों) के अधिष्ठाता देवों और
प्राणों से भिन्न है। यह ही सत् रूप से है ।।२४।।
पाणाश्च यद्देवाश्च तद्यं तदेतया वाचाभिव्याह्रियते
सत्यमित्येतावदिदं सर्वमिदं सर्वमसीत्येवैनं तदाह तदेतच्छ्-
लोकेनाप्युक्तम् ।।२५।।
जो देव और प्राण हैं सो ‘य’ रूप है। यह ‘सत्य’ इस शब्द से
११
सबसे पहिचाना जाता है। इस प्रकार का सब विश्व है। तू भी सर्व
रूप है, इस प्रकार के वेद के मंत्र से कहा जाता है॥२५॥
यजूंदरः सामशिरा असावृङ्मूर्तिरव्यः। स ब्रह्मेति हि विज्ञेय
ऋषिर्ब्रह्ममयो महानिति।। तमाह केन पौंसनानि नामान्याप्नोतीति
प्राणनेति।।२६।।
यजुष् उदर रूप हैं साम मस्तक रूप है। ऋक् उसकी मूर्ति रूप
है इस प्रकार अक्षर ब्रह्म है, उसको ऋषि ब्रह्ममय अथवा महान् रूप
से जाने। ब्रह्म उससे पूछता है "मेरे पुलिंग नाम तूने किस प्रकार प्राप्त
किये?" वह उत्तर देता है "प्राण से।" ॥२६॥
ब्रूयात्केन स्त्रीनामानीति वाचेति केन नपुंसकनामानीति
मनसेति केन गन्धानिति घ्राणेनेति ब्रूयात्केन रूपाणीति चक्षुषेति
केन शब्दानिति श्रोत्रेणेति केनान्नरसानिति ।।२७।।
"मेरे स्त्री लिंग कें नाम किस प्रकार प्राप्त किये?" तब कहता
है "वाणी से"। "मेरे नपुंसक नाम किस प्रकार प्राप्त किये" तब कहता
है "मन से"। गंध किससे? "घ्राणेन्द्रिय से"। "रूप किससे?" चक्षु
से"। "शब्द किससे?" "श्रोत्रेन्द्रिय से"। "अन्न का रस
किससे?" ।।२७।।
जिह्वयेति केन कर्माणीति हस्ताभ्यामिति केन सुखदुःखे इति
शरीरेणेति केनानन्दं रतिं प्रजातिमित्युपस्थेनेति केनेत्या इति
पादाभ्यामिति केन धियो विज्ञातव्यं कामानिति प्रज्ञयेति
प्रब्रूयात् ।।२८।।
"जिह्वा से"। "कर्म किससे"? "हाथों से"। "सुख दुख किससे?"
"शरीर से"। "आनन्द रति और प्रजा किससे?" "उपस्थेन्द्रिय से"।
"गति किससे?" "पग से"। "बुद्धि किससे पहिचानती है?" "प्रज्ञा
१२
से” इस प्रकार उससे कहना चाहिये ।।२८ ।।
तमाहापो वै खलु मे ह्यसावयं ते लोक इति सा या ब्रह्मणि
चितिर्या व्यष्टिस्तां चितिं जयति तां व्यष्टिं व्यश्नुते य एवं वेद
य एवं वेद ।।२६ ।।
पीछे ब्रह्म उससे कहता है “यह जल मेरा है, उस जल से बना
हुआ यह लोक तेरा है।” जिसको इस ब्रह्म ज्ञान होता है वह ब्रह्म में
जो सम्पत्ति है, उसको जीतता है और ब्रह्म में जो कुछ शक्ति है वह
उसको प्राप्त होती है।।२६।।
१३
द्वितीयोऽध्यायः
प्राणो ब्रह्मेति ह स्माह कौषीतकिस्तस्य ह वा एतस्य प्राणस्य
ब्रह्मणो मनो दूतं वाक्परिवेष्ट्री चक्षुर्गात्रं क्षोत्रं संश्रावयितृ ।।१।।
कौषीतकि कहने लगे :— प्राणं ब्रह्म रूप है, प्राण जो ब्रह्म रूप
है उसका दूत रूप मन है, वाणी परोसने वाली है। चक्षु शरीर का रक्षक
रूप है और श्रोत्र द्वारपाल है ।।१।।
यो हवा एतस्य प्राणस्य ब्रह्मणो मनो दूतं वेद दूतवान्भवति
यश्चक्षुर्गोप्तृ गोप्तृमान्भवति यः श्रोत्रं संश्रावयितृ
संश्रावयितृमान्भवति ।।२।।
प्राण रूप ब्रह्म का ,मन दूत है, ऐसे जो जानता है वह दूत वाला
होता है, चक्षु को रक्षक जानने वाला रक्षक वाला होता है। जो श्रोत्र
को द्वारपाल जानता है वह द्वारपाल से युक्त होता है ।।२।।
यो वाचं परिवेष्ट्रीं परिवेष्ट्रीमान्भवति तस्मै वा एतस्मै प्राणाय
ब्रह्मण एताः सर्वा देवता अयाचमाना बलिं हरन्ति तथा एवास्मै
सर्वाणि भूतान्ययाचनायैव बलिं हरन्ति ।।३।।
जो वाणी को परोसने वाली जानता है वह परोसने वाले से युक्त
होता है। इस प्राण रूप ब्रह्म के लिये सब देवता अर्थात् इन्द्रियां न
मांगने पर भी बलि लाते हैं इसी प्रकार उसकी उपासना करने वाला
नहीं मांगे तो भी सब प्राणी बलि लाते हैं ।।३।।
य एवं वेद तस्योपनिषन्न याचेदिति तद्यथा ग्रामं भिक्षित्वा
लब्ध्वोपविशेन्नाहमतो दत्तमश्नीयामिति य एवैनं पुरस्तात्प्रत्या-
चक्षीरंस्त एवैनमुपमन्त्रयन्ते ददाम त इत्येष धर्मो याचतो
भवत्यनन्तरस्त्वेवैनमुपमन्त्रयन्ते ददाम त इति ।।४।।
१४
जो इस प्रकार जानता है, उसका परम रहस्य व्रत यह है कि वह
किसी से कुछ न मांगे। जैसे एक मनुष्य ग्राम में भिक्षा मांगने जाता
है, तब उसको कुछ नही मिलता तब वह ऐसा कह कर बैठता है कि
अब मैं भिक्षा में मिला हुआ भक्षण न करूंगा, तब जो लोग भिक्षा देने
के लिये मना करते थे वे भी उसको बुलाकर कर देने लगते हैं। जो
याचना नहीं करता उसका इस प्रकार का धर्म हैं, परन्तु धन देने वाले
‘हम तुझको देंगे’ ऐसा कह कर बुलाते हैं ।।४।।
प्राणो ब्रह्मेति ह स्माह पैंग्यस्तस्य ह वा एतस्य प्राणस्य ब्रह्मणो
वाक्व परस्ताच्चक्षुरारुन्धे ।।५।।
पैंग्य बोला :- प्राण यह ही ब्रह्म है। प्राण रूप ब्रह्मको वाणी के
पीछे चक्षु आवरण करते हैं, चक्षु के पीछे श्रोत्र आवरण करते हैं। श्रोत्र
के पीछे मन आवरण करता है और मन के पीछे प्राण आवरण करते
हैं।।५।।
तस्मै वा एतस्मै प्राणाय ब्रह्मण एताः सर्वा देवता अयाचमानाय
बलिं हरन्ति तथा एवास्मै सर्वाणि भूतान्ययाचमानाय बलिं हरन्ति
य एवं वेद। यस्योपनिषन्न याचेदिति तद्यथा ग्रामं भिक्षित्वा
लब्ध्वोपविशेन्नाहमतो दत्तमश्नीयामिति य एवैनं पुरस्तात्प्रत्याचक्षीरंस्त
एवैनमुपमन्त्रयन्ते ददाम त इत्येष धर्मो याचितो भवत्यनन्तरस्त्वे
वैनमुपमन्त्रयन्ते ददाम त इति ।।६।।
देवता-इन्द्रियां न मांगने पर इस प्राण रूप ब्रह्म को बलि लाकर
देते हैं। इसी प्रकार प्राण की ब्रह्म रूप से उपासना करने वाले को नहीं
मांगने पर भी प्राणी बलि लाकर देते हैं। ऊपर के समान नहीं मांगने
वाले को सब देते हैं ।।६।।
अथात एकधनावरोधनं यदेकधनमभिध्यायात्पौर्णमास्यां
१५
वामावास्यां वा शुद्धपक्षे वा. पुण्ये नक्षत्रेऽग्निमुपसमाधाय
परिसमुह्य परिस्तीर्य पर्युक्ष्यतोत्पूय दक्षिण जान्वाच्य स्रुवेण वा
चमसेन वा कंसेन वैता आज्याहुतीर्जुहोति वाङ्नामदेवतावरोधिनी
सा मेऽमुष्मादिदमवरुन्द्धां तस्यै स्वाहा प्राणो नाम देवतावरोधिनी
सा मेऽमुष्मादिदमवरुन्द्धां तस्यै स्वाहा चक्षुर्नाम देवतावरोधिनी
सा मेऽमुष्मादिदमवरुन्द्धां तस्यै स्वाहा श्रोत्रं ना देवतावरोधिनी
सा मेऽमुष्मादिदमवरुन्द्धां तस्यै स्वाहा।।७।।
अब उत्तम धनकी प्राप्तिका उपाय कहते हैं उस उत्तम धनकी इच्छा
करने वाला मनुष्य पौर्णिमा या आमावस्या को अथवा शुक्ल पक्ष में
किसी शुभ नक्षत्र पर अग्नि सिद्ध करे। अग्नि के चारों ओर की भूमिको
झाड़ कर उसके चारों ओर दर्भ बिछावे, जल के छींटे लगावे और दाहिना
घोंटू झुका कर स्रुवा से अथवा चम्मच से अथवा कांसे के किसी पात्र
से आगे लिखे के अनुसार आहुति दे। “वाणी नाम का देवता
अवरोधी (प्राप्त कराने वाला) है, वह मुझको उससे मिला दे, उसके
लिये स्वाहा।” “प्राण नाम का देवता अवरोधी है, वह मुझको उससे
यह प्राप्त करादे, उसके लिये स्वाहा।” “नेत्र नाम का देवता
अवरोधी है, वह मुझको उससे यह प्राप्त करादे, उसके लिये स्वाहा”
“श्रोत्र नामका देवता अवरोधी है, वह मुझको उसके यह प्राप्त करादे,
उसके लिये स्वाहा।।७।।
मनो नाम देवतावरोधिनी सा मेऽमुष्मादिदमवरुन्द्धां तस्यै
स्वाहा प्रज्ञा नाम देवतावरोधिनी सा मेऽमुष्मादिदमवरुन्द्धां तस्यै
स्वाहेत्यथ धूमगन्धं प्रजिघ्रायाज्यलेपेनांगायनुविमृज्य वाचयमोऽभि-
प्रवृज्यार्थं ब्रूवीत दूतं वा प्रहिणुयाल्लभते हैव ।।८ ।।
“मन नामका देवता अवरोधी है, वह मुझको उससे यह प्राप्त
करादे, उसके लिये स्वाहा।” “प्रज्ञा नामका देवता अवरोधी है, वह
१६
मुझको उससे यह प्राप्त करादे उसके लिये स्वाहा"। (यह आहुतियां
देने के बाद) वह नाक से धुयें को सूंघे और सर्वांग में घृत का लेपन
करे, मौन धारण करते हुए (वह पदार्थ जिसके पास हो उसके पास)
चला जाय और अपनी इच्छा प्रकट करे अथवा किसी दूत को भेज
कर ऐसा करे। उसको अर्थ की प्राप्ति हो जायेगी ॥ ८ ॥
अथातो दैवःस्मरो यस्य प्रियो बुभूषेद् यस्यै वा एषां
वैतेषांमेवैतस्मिन्पर्वण्यग्निमुपसमाधायैतयैवावृत्तैता आज्याहुतीर्जु-
होति ।। ६ ।।
अब देवस्मर (देवंताओं से पूर्ण होने वाली कामना) कहते हैं। जिस
किसी एक पुरुष को वां स्त्री को अथवा अनेक पुरुषों को वा स्त्रियों
को हम प्रिय हों ऐसी किसी को इच्छा हो तो वह ऊपर लिखे हुए मुहूर्त
पर बराबर उसी रीति के अनुसार अग्नि में नीचे लिखे मन्त्रों से आहुतियां
दें॥ ६॥
वाचं ते मयि जुहोम्यसौ स्वाहा प्राणं ते मयि जुहोम्यसौ स्वाहा
चक्षुस्ते मयि जुहोम्यसौ स्वाहा श्रात्रं ते मयि जुहोम्यसौ स्वाहा
मनस्ते मयि जुहोम्यसौ स्वाहा ॥ १० ।।
तेरे वाणी का यह मैं अपने में हवन करता हूँ स्वाहा। तेरे श्रोत्र
का मैं अपने में हवन करता हूँ स्वाहा। तेरे मनका यह मैं अपने में
हवन करता हूँ स्वाहा ॥१०॥
प्रज्ञानं ते मयि जुहोम्यसौ स्वाहेत्यथ धूमगन्धं
प्रजिघ्रायाज्यलेपेनांगान्यनुविमृज्य वाचंमयोऽभिप्रवृज्य संस्पर्श
जिगमिषेदपि वाताद्वा संभाषमाणस्तिष्ठेत्प्रियो हैव भवति स्मरन्ति
हैवास्य ॥११॥
तेरे प्रज्ञान का यह मैं अपने में हवन करता हूँ स्वाहा! (ये आहुतियां
१७
देने के पश्चात्) वह नाक से धूयें को सूंघे और सब अंगों में घृत का
लेन करे, मौन धारण करते हुए उससे स्पर्श हो इस प्रकार उसके पास
जाने की इच्छा करे अथवा दूर से वैसा कहता हुआ खड़ा रहे। निश्चय
यह प्रिय हो जायेगा और वे उसको याद करेंगे ।।११।।
अथातः सांयमनं प्रतर्दनमान्तरमग्निहोत्रमित्याचक्षते यावद्वै
पुरुषो भासते न तावत्प्राणितुं शक्नोति प्राण तदा वाचि जुहोति
यावद्वै। ।१२ ।।
अब प्रतर्दन का अनुष्ठान किया हुआ संयमन (निरोधन) कहते
हैं—इसी को आन्तर अग्निहोत्र कहते हैं। मनुष्य जब तक बोलता रहता
है, तब तक वह श्वास-प्रश्वास नहीं ले सकता ।।१२ ।।
पुरुषः प्राणिति न तावद्भाषितुं शक्नोति वाचं तदा प्राणे
जुहोत्येतेऽनन्तेऽमृताहुतीर्जाग्रच्च स्वपंश्च संततमव्यवच्छिन्नं जुहोत्यथ
या अन्या ।।१३।।
इस समय वह अपने वाणी में प्राण का हवन करता है और जब
तक वह श्वास-प्रश्वास करता रहता है तब तक वह अपने प्राण का
वाणी में हवन करता है—वह जागता हो या निद्रित हो ।।१३।।
आहुतयोऽन्तवत्यस्ताः कर्ममय्यो भवन्त्येतद्ध वै पूर्वे
विद्वांसोऽग्निहोत्रं जुहवांचक्रुः ।।१४ ।।
यह कभी न समाप्त होने वाली अखण्ड आहुतियाँ बराबर हुआ
करती हैं। सामान्य आहुतियाँ अन्त वाली होती हैं क्योंकि वे कर्म रूप
हैं। प्राचीन काल के विद्वान् लोग इस अग्निहोत्र को करते थे ।।१४।।
उक्थं ब्रह्मेति ह स्माह शुष्कभृंगारस्तदृगित्युपासीत सर्वाणि
हास्मै भूतानि श्रैष्ठ्यायाभ्यर्च्चन्ते तद्यजुरित्युपासीत सर्वाणि हास्मै
भूतानि श्रैष्ठ्याय युज्यन्ते तत्सामेत्युपासीत ।।१५।।
१८
उक्थ ब्रह्म है, ऐसा शुष्क भृङ्गार ने कहा है। यह उक्थ और ऋक्
एक ही है ऐसा समझ कर उसका मनन करे। सब प्राणी उसी को
श्रेष्ठ मानकर उसकी ही अर्चना करते हैं। वह और यजुर्वेद एक ही
है ऐसा समझ कर उसका मनन करे ।।१५ ।।
सर्वाणि हास्मै भूतानि श्रेष्ठ्याय सन्नमन्ते तच्छ्रीरित्युपासीत
तद्यश इत्युपासीत त्त्तेज इत्युपासीत तद्यथैतच्छास्त्राणां श्रीमत्तमं
यशस्वितमं ।।१६ ।।
प्राणी उसी को श्रेष्ठ मान के उसका योग करते हैं (ध्यान करते
हैं)। वह और साम एक ही है ऐसा समझ कर उसका मनन करे। समस्त
प्राणी उसको श्रेष्ठ मानकर उसको नमस्कार करते हैं। यह और ऐश्वर्य
एक ही है, ऐसा ध्यान करे, यह और यश एक ही है ऐसा ध्यान करे।
यह और तेज एक ही है ऐसा ध्यान करे ।।१६ ।।
तेजस्वितमं भवति तथा एवैवं विद्वान्सर्वेषां भूतानां श्रीमत्तमो
यशस्वितमस्तेजस्वितमो भवति तमेतमैष्टकं कर्ममयमात्मान-
मध्वर्युः संस्करोति तस्मिन्यजुर्मयं प्रवयति यजुर्मयं ऋङ्मये
साममयमुद्गाता स एष सर्वस्यै त्रयीविद्याया आत्मैष उ
एवास्यात्मा एतदात्मा भवति य एवं वेद ।।१७ ।।
जिस प्रकार धनुष सब शस्त्रों में अत्यन्त श्रीयुक्त और अत्यन्त
तेजस्वी होता है उसी प्रकार यह जानने वाला मनुष्य समस्त प्राणियों
में अत्यन्त श्रीयुक्त, अत्यंत यशस्वी और अत्यंत तेजस्वी होता है। कर्म
का साधन रूप समिधां से प्रज्वलित अग्नि ही वह स्वयं है ऐसा
अध्वर्यु मानता है और वह यज्ञ का यजुर्भाग उसमें प्रवेश कराता है।
होता यजुर्भाग में ऋग् भाग का प्रवेश कराता है। उद्गाता ऋग् भाग
में साम भाग का प्रवेश कराता है, वही त्रयी विद्या का आत्मा है, सचमुच
वही उसका आत्मा है—यह जो जानता है वह वही हो जाता है ।।१७।।
१६
अथातः सर्वजितः कौषीतकेस्त्रीण्युपासनानि भवन्ति यज्ञोपवीतं
कृत्वाप आचम्य त्रिरुदपात्रं प्रसिच्योद्यन्तमादित्यमुपतिष्ठेत
वर्गोऽसिपाप्मानं में वृङ्ग्धीत्येतयैवावृता मध्ये सन्तमुद्वर्गोऽसि
पाप्मानं म उद्धृङ्ग्धीत्येतयैवावृतास्तं यन्तं संवर्गोऽसि पाप्मानं मे
संवृङ्ग्धीति यदहोरात्राभ्यां पापं करोति सं तद्वृङ्क्ते ।। १८ ।।
जब सर्वजित कौषीतकि (नामक प्रयोग) कहते हैं। इसके तीन
प्रकार होते हैं। यज्ञोपवीत पहन कर और आचमन करके जल के पात्र
का तीन बार सिंचन करके उदय होने वाले आदित्य की प्रार्थना
करे—"तू वर्ग (दुखों से मुक्त करने वाला) है, मुझे पातकों से मुक्त कर।"
इसी प्रकार सूर्य मध्याह्न होने पर वह प्रार्थना करे—"तू दुखों से मुक्त
करने वाले में श्रेष्ठ है, मुझे पातकों से मुक्त कर।" इसी प्रकार अस्त
समय में सूर्य की प्रार्थना करे—"तू सम्पूर्ण रीति से पातकों से मुक्त
करने वाला है मुझे समस्त पातकों से मुक्त कर। इस प्रकार दिन में
और रात में किये हुए, समस्त पापों का वह नाश करता है। इसी प्रकार
यह जानने वाला मनुष्य भी सूर्य की उपासना करता है और उससे
वह दिन और रात में किये हुए सब पातकों का नाश करता है।।१८।।
अथ मासि मास्यमावास्यायां पश्चाच्चन्द्रमसं दृश्यमानमुपतिष्ठे-
तैतयैवावृता हरिततृणाभ्यामथ वाक् प्रत्यस्यति यत्ते सुसीमं
हृदयमधिश्चन्द्रमसि श्रितम् ।। तेनामृतत्वस्येशानं माहं पौत्रमघं
रुदमिति न हास्मात्पूर्वाः प्रजाः प्रयन्तीति नु जातपुत्रस्याथाजात-
पुत्रस्याह ।। आप्यायस्व समेतु ते सन्ते पयांसि समुयन्तु वाजा
यमादित्या अंशुमाप्याययन्तीत्येतास्तिस्र ऋचो जपित्वा नास्माकं
प्राणेन प्रजया पशुभिराप्याययस्वेति दैवीमावृतमावर्त आदित्यस्यावृत-
मन्वावर्त इति दक्षिणं बाहुमन्वावर्तते ।। १९ ।।
अब प्रति मास अमावस्या के पश्चात पश्चिम में स्थित चन्द्र की
उपासना करे अथवा चन्द्र की ओर दो दूर्वांकुर फेंक कर कहे—"हे
मरण रहित आनन्दमय देव चन्द्र में रहे हुए तेरे कोमल हृदय से ऐसा
करो कि मुझे मेरे पुत्र के आपत्ति सम्बन्धी शोक करने का प्रसंग कभी
न आवे।" उसकी सन्तति उसके आगे कभी नहीं मरेगी जिसके पहिले
से पुत्र है उसके सम्बन्ध में यह समझना ।। जिसके अभी पुत्र नहीं
है उसके सम्बन्ध में कहते हैं—ऐसा मनुष्य आगे लिखी हुई ऋग्वेद की
तीन ऋचायें पठन करे—"आप्या यस्व समेतु ते" (ऋ० १-६१-१६) (हे
सोम तेरी समृद्धि हो और तेरे अंगों में सामर्थ्य प्राप्त हो), "सन्तेपयाँसि
समुयन्तु वाजा" (ऋ० १-३१-४) (दूध और अन्न तुझे प्राप्त हो),
"यमादित्या अंशुमाप्या ययन्ति" (ऋ० १-६१-१८) (जिस किरण को
सूर्य आनन्दमयं बनाता है)। इन तीन ऋचाओं का जप करके वह प्रार्थना
करे—"हमारे प्राण, सन्तति और हमारे पशु इनसे (हमारे शत्रुओं को)
समृद्ध न कर। जो हमारा द्वेष करते हैं और जिनका हम द्वेष करते
हैं उनका प्राण, उनकी सन्तति, उनके पशु इनसे हमारी समृद्धि करे।
इस प्रकार मैं दैवी आवृत्ति करता हूँ।" ऐसा कहकर चन्द्र की तरफ
दाहिना हाथ ऊंचा करके पुनः दूर्वांकुर प्रदान करे ।।१६।।
अथ पौर्णमास्यां पुरस्ताच्चन्द्रमसं दृश्यमानमुपतिष्ठेतैतयैवावृता
सोमो राजासि विचक्षणः पञ्चमुखोऽसि प्रजापतिर्ब्राह्मणस्त एकं
मुखं तेन मुखेन राज्ञोऽत्सि ।।२०।।
पौर्णमासी के दिन चन्द्र पूर्व की ओर दिखाई देता है। उसकी इसी
प्रकार पूजा करते समय यह प्रार्थना करे—"तू सोम है, राजा है, ज्ञानी
है, पंच मुख वाला है, प्रजापति है, ब्राह्मण मेरा एक मुख है उस एक
मुख से तू राजाओं को खाता है ।।२०।।
तेन मुखेन मामन्नादं कुरु ।। राजा त एकं मुखं तेन मुखेन
विशोऽत्सि तेनैव मुखेन मामन्नदं कुरु ।। श्येनस्त एकं मुखं तेन
२१
मुखेन पक्षिणोऽत्सि तेन मुखेन मामन्नादं कुरु ।।२१।।
उसी मुख से मुझे अन्न खाने वाला कर। क्षत्रिय तेरा एक मुख
है, उस मुख से तू वैश्यों को खाता है। उसी मुख में मुझे अन्न खाने
वाला कर। श्येन पक्षी तेरा एक मुख है, उस मुख से तू पक्षियों को
खाता है। उसी मुख से तू मुझे अन्न खाने वाला कर ।।२१।।
अग्निस्त एकं मुख तेन मुखेनेमं लोकमत्सि तेन मुखेन
मामन्नादं कुरु। त्वयि पञ्चमं मुखं तेन मुखेन सर्वाणि भूतान्यत्सि
तेन मुखेन मामन्नादं कुरु।। मास्माकं प्राणेन प्रजया
पशुभिरवक्षेष्ठा ।।२२।।
अग्नि तेरा एक मुख है, उस मुखसे तू इस लोक को खाता है।
उस मुख से तू मुझे अन्न खाने वाला कर। तुझमें पाँचवाँ मुख है उससे
तू सब भूतों को खाता है, उससे तू मुझे अन्न खाने वाला कर। हमारे
प्राण, हमारी सन्तति, हमारे पशु इनसे तेरा क्षय न हो ।।२१।।
योऽस्मान्द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मस्तस्य प्राणेन प्रजया
पशुभिरवक्षीयस्वेति स्थितिदैवीमावृतमावर्त आदित्यस्यावृतमन्वावर्त
इति दक्षिणं बाहुमन्वावर्तते ।।२२।।
जो हमारा द्वेष करता है और जिससे हम द्वेष करते हैं उसका प्राण,
उसकी सन्तति, उसके पशु इनसे तू क्षीण हो” । इस प्रकार मैं देवों
का संचार कराता हूँ, मैं आदित्य का संचार अनुसरता हूँ। ऐसा कह
कर दाहिना हाथ ऊंचा करके दूर्वांकुर प्रदार करे ।।२२।।
अथ संवेश्यञ्जायायै हृदयमभिमृशेत् ।। यत्ते सुसीमे हृदये
हितमन्तः प्रजापतौ ।। मन्येऽहं मां तद्विद्वांसं माहं पौत्रमघं
रुदमिति न हास्मात्पूर्वाः प्रजाः प्रैति ।।२३।।
अब अपनी स्त्री को पास बुलाकर, उसके हृदय को स्पर्श करके
२२
कहे-जो मुझमें तेरे कोमल हृदय में प्रजापति के अर्थ प्रविष्ट हुआ है,
उससे कभी नाश न होने वाले आनन्द को प्राप्त हुई, हे सुन्दरी, तुझे
पुत्र सम्बन्धी शोक करने का प्रसंग कभी न प्राप्त हो। उसकी सन्तति
उसके पहिले कभी नहीं मरेगी ।।२३।।
अथ प्रोष्यायन्पुत्रस्य मूर्धानमभिमृशति ं गादंगात् संभवसि
हृदयादधिजायसे । आत्मा वै पुत्रनामासि स जीव शरदः शतम् ।।
असाविति नामास्य गृह्णाति। अश्मा भव परशुर्भव हिरण्यमस्तृतं
भव ।।२४।।
प्रवास करके वापस आने पर पुत्र का मस्तक सूँघे कहे तू मेरे प्रत्येक
अवयव से उत्पन्न हुआ है, तू हृदय से उत्पन्न हुआ है, हे पुत्र सचमुख
तू मेरी आत्मा है, सो तू सौ वर्ष पर्यन्त जी।" वह उसका नाम लेकर
कहे "तू पत्थर हो, तू परशु हो, सोने का डेला हो ।।२४।।
तेजो वै पुत्रनामासि स जीव शरदः शतम् ।। असाविति
नामास्य गृह्णाति । येन प्रजापतिः प्रजाः पर्यगृह्णीतारिष्ट्यै तेन
त्वा परिगृह्णाम्यसावित्यथास्य दाक्षेणे कर्णे जपति अस्मै
प्रयन्धि मघवन्नृजीषिन्नितीन्द्र श्रेष्ठानि द्रविणानि धेहीति सव्ये
माच्छिथा मा व्यथिष्ठाः शतं शरद आयुषो जीव पुत्र। ते नाम्ना
मूर्धानमभिजिघ्राम्यसाविति त्रिरस्य मूर्धानमभिजिघ्रेद् गवां त्वा
हिंकारेणाभिहिंकरोमीति त्रिरस्य मूर्धानमभिहिंकुर्यात् ।।२५।।
हे पुत्र, तू सचमुच तेज है सो तू सौ वर्ष तक जी।" उसका नाम
लेकर आलिंगन करते हुए वह कहता है- प्रजापति ने प्राणी मात्र का
कल्याण के लिये आलिंगन किया, वैसे ही मैं तेरा आलिंगन करता हूँ।
पश्चात् पुत्र के दाहिने कान में यह मन्त्र कहे- "अस्मे प्रयन्धि
मघवन्नृजीषिन् (ऋ० ३-२६-१०) (हे चपल इन्द्र तू इसको दे)" और