कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)
Kaushitaki Brahmana Upanishad with Hindi Translation
स्वामी महेश्वरानन्द गिरि द्वारा
स्रोत: मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली · मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली (उद्गम)
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अथातः सर्वजितः कौषीतकेस्त्रीण्युपासनानि भवन्ति यज्ञोपवीतं
कृत्वाप आचम्य त्रिरुदपात्रं प्रसिच्योद्यन्तमादित्यमुपतिष्ठेत
वर्गोऽसिपाप्मानं में वृङ्ग्धीत्येतयैवावृता मध्ये सन्तमुद्वर्गोऽसि
पाप्मानं म उद्धृङ्ग्धीत्येतयैवावृतास्तं यन्तं संवर्गोऽसि पाप्मानं मे
संवृङ्ग्धीति यदहोरात्राभ्यां पापं करोति सं तद्वृङ्क्ते ।। १८ ।।
जब सर्वजित कौषीतकि (नामक प्रयोग) कहते हैं। इसके तीन
प्रकार होते हैं। यज्ञोपवीत पहन कर और आचमन करके जल के पात्र
का तीन बार सिंचन करके उदय होने वाले आदित्य की प्रार्थना
करे—"तू वर्ग (दुखों से मुक्त करने वाला) है, मुझे पातकों से मुक्त कर।"
इसी प्रकार सूर्य मध्याह्न होने पर वह प्रार्थना करे—"तू दुखों से मुक्त
करने वाले में श्रेष्ठ है, मुझे पातकों से मुक्त कर।" इसी प्रकार अस्त
समय में सूर्य की प्रार्थना करे—"तू सम्पूर्ण रीति से पातकों से मुक्त
करने वाला है मुझे समस्त पातकों से मुक्त कर। इस प्रकार दिन में
और रात में किये हुए, समस्त पापों का वह नाश करता है। इसी प्रकार
यह जानने वाला मनुष्य भी सूर्य की उपासना करता है और उससे
वह दिन और रात में किये हुए सब पातकों का नाश करता है।।१८।।
अथ मासि मास्यमावास्यायां पश्चाच्चन्द्रमसं दृश्यमानमुपतिष्ठे-
तैतयैवावृता हरिततृणाभ्यामथ वाक् प्रत्यस्यति यत्ते सुसीमं
हृदयमधिश्चन्द्रमसि श्रितम् ।। तेनामृतत्वस्येशानं माहं पौत्रमघं
रुदमिति न हास्मात्पूर्वाः प्रजाः प्रयन्तीति नु जातपुत्रस्याथाजात-
पुत्रस्याह ।। आप्यायस्व समेतु ते सन्ते पयांसि समुयन्तु वाजा
यमादित्या अंशुमाप्याययन्तीत्येतास्तिस्र ऋचो जपित्वा नास्माकं
प्राणेन प्रजया पशुभिराप्याययस्वेति दैवीमावृतमावर्त आदित्यस्यावृत-
मन्वावर्त इति दक्षिणं बाहुमन्वावर्तते ।। १९ ।।
अब प्रति मास अमावस्या के पश्चात पश्चिम में स्थित चन्द्र की