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सर्वकोश
कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

Kaushitaki Brahmana Upanishad with Hindi Translation

स्वामी महेश्वरानन्द गिरि द्वारा

स्रोत: मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली · मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished56 पृष्ठ

पृष्ठ 12, कुल 56 में से

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तथा यजुष् पूर्व, पश्चिम तरफ की निवार है, यजुष् उत्तर दक्षिण तरफ
की निवार है। चन्द्र की किरणें गेंडुआ (कान के नीचे रखने का तकिया)
है उद्गीथ चद्दर है ।।२२।।
श्रीरुपबर्हणं तस्मिन्ब्रह्मास्ते तमित्यंवित्पादेनैवाग्र आरोहति तं
ब्रह्माह कोऽसीति तं प्रतिब्रूयात् ।।२३।।
अभ्युदय तकिया है, इस पलंग पर ब्रह्म विराजता हैं जब एक पैर
को ऊपर रख कर ब्रह्म का ज्ञाता ऊपर चढ़ने को जाता है, तब ब्रह्म
उससे पूछता है “तू कौन है?” तब उसे नीचे के समान कहना
चाहिये । २३ ।।
ऋतुरस्म्यार्तवोऽस्म्याकाशाद्योनेः संभूतो भाययै रेतः संवत्सरस्य
तेजोभूतस्य भूतस्यात्मभूतस्य त्वमात्मासि यस्त्वमसि सोऽहमस्मीति
तमाह कोऽहमस्मीति सत्यमिति ब्रूयात्किं तद्यत्सत्यमिति
यदन्यद्देवेभ्यश्च प्राणेभ्यश्च तत्सदथ ।।२४।।
“मैं काल रूप हूँ, ऋतुओं में जो होता है सो रूप मैं हूँ। मेरी उत्पत्ति
आकाश में से है, संवत्सर का रेत रूप, भूत और कारण का तेज रूप,
जड, चैतन्य सबका आत्मा रूप और पंच भूतात्मक शबल ब्रह्म के तेज
में से मेरा उद्भव है। तू यह आत्मा रूप है, जैसा तू है वैसा मैं हूँ।”
ब्रह्म उससे पूछता है “मैं कौन हूँ?” तब कहना चाहिये “तू सत्य रूप
है” “सत्य क्या है?” “जो सब (इन्द्रियों) के अधिष्ठाता देवों और
प्राणों से भिन्न है। यह ही सत् रूप से है ।।२४।।
पाणाश्च यद्देवाश्च तद्यं तदेतया वाचाभिव्याह्रियते
सत्यमित्येतावदिदं सर्वमिदं सर्वमसीत्येवैनं तदाह तदेतच्छ्-
लोकेनाप्युक्तम् ।।२५।।
जो देव और प्राण हैं सो ‘य’ रूप है। यह ‘सत्य’ इस शब्द से