कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)
Kaushitaki Brahmana Upanishad with Hindi Translation
स्वामी महेश्वरानन्द गिरि द्वारा
स्रोत: मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली · मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली (उद्गम)
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द्वितीयोऽध्यायः
प्राणो ब्रह्मेति ह स्माह कौषीतकिस्तस्य ह वा एतस्य प्राणस्य
ब्रह्मणो मनो दूतं वाक्परिवेष्ट्री चक्षुर्गात्रं क्षोत्रं संश्रावयितृ ।।१।।
कौषीतकि कहने लगे :— प्राणं ब्रह्म रूप है, प्राण जो ब्रह्म रूप
है उसका दूत रूप मन है, वाणी परोसने वाली है। चक्षु शरीर का रक्षक
रूप है और श्रोत्र द्वारपाल है ।।१।।
यो हवा एतस्य प्राणस्य ब्रह्मणो मनो दूतं वेद दूतवान्भवति
यश्चक्षुर्गोप्तृ गोप्तृमान्भवति यः श्रोत्रं संश्रावयितृ
संश्रावयितृमान्भवति ।।२।।
प्राण रूप ब्रह्म का ,मन दूत है, ऐसे जो जानता है वह दूत वाला
होता है, चक्षु को रक्षक जानने वाला रक्षक वाला होता है। जो श्रोत्र
को द्वारपाल जानता है वह द्वारपाल से युक्त होता है ।।२।।
यो वाचं परिवेष्ट्रीं परिवेष्ट्रीमान्भवति तस्मै वा एतस्मै प्राणाय
ब्रह्मण एताः सर्वा देवता अयाचमाना बलिं हरन्ति तथा एवास्मै
सर्वाणि भूतान्ययाचनायैव बलिं हरन्ति ।।३।।
जो वाणी को परोसने वाली जानता है वह परोसने वाले से युक्त
होता है। इस प्राण रूप ब्रह्म के लिये सब देवता अर्थात् इन्द्रियां न
मांगने पर भी बलि लाते हैं इसी प्रकार उसकी उपासना करने वाला
नहीं मांगे तो भी सब प्राणी बलि लाते हैं ।।३।।
य एवं वेद तस्योपनिषन्न याचेदिति तद्यथा ग्रामं भिक्षित्वा
लब्ध्वोपविशेन्नाहमतो दत्तमश्नीयामिति य एवैनं पुरस्तात्प्रत्या-
चक्षीरंस्त एवैनमुपमन्त्रयन्ते ददाम त इत्येष धर्मो याचतो
भवत्यनन्तरस्त्वेवैनमुपमन्त्रयन्ते ददाम त इति ।।४।।