कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)
Kaushitaki Brahmana Upanishad with Hindi Translation
स्वामी महेश्वरानन्द गिरि द्वारा
स्रोत: मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली · मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली (उद्गम)
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सका ।।२४ ।।
प्रजातिं कांचन प्रज्ञायपयेदन्यत्र में मनोऽभूदित्याह नाहमेतामानन्दं
रतिं प्रजातिं प्राज्ञासिषमिति नहि प्रज्ञापेतौ पादावित्यां कांचन ।।२५ ।।
प्रज्ञा से रहित उपस्थ रति, आनन्द और प्रजोत्पत्ति को नहीं जना
सकता। वह कहता है कि मेरा मन अन्यत्र था जिससे मैं आनन्द, रति
और प्रजोत्पत्ति को जान न सका ।।२५ ।।
प्रज्ञपयेतामन्यत्र मे मनोऽभूदित्याह नाहमेतामित्यां
प्राज्ञासिषमिति नहि प्रज्ञापेता धीः काचन सिध्येन्न प्रज्ञातव्य
प्रज्ञायेत ।।२६ ।।
प्रज्ञा से रहित पाद किसी गति को नहीं जना सकते वह कहता
है कि मेरा मन अन्य ठिकाने था इसलिये मैं गति को जान न सका।
प्रज्ञा से रहित बुद्धि किसी को नहीं जना सकती और जानने योग्य
जाना नहीं जा सकता ।।२६ ।।
न वाचं विजिज्ञासीत वक्तारं विद्यान्न गन्धं विजिज्ञासीत घ्रातारं
विद्यान्न रूपं विजिज्ञासीत रूपविदं विद्यान्न शब्दं विजिज्ञासीत
श्रोतारं विद्यान्नान्नरसं विजिज्ञासीतान्नरसविज्ञातारं विद्यान्न कर्म
विजिज्ञासीत कर्तारं विद्यान्न सुखदुःखे विजिज्ञासीत
सुखदुःखयोर्विज्ञातारं विद्यान्नानन्दं रतिं प्रजातिं ।।२७ ।।
मनुष्य वाणी को जानने की इच्छा न करे, वक्ता को जानना चाहिये।
मनुष्य गंध जानने की इच्छा न करे गंध के ज्ञाता को जानना चाहिये।
शब्द जानने की इच्छा न करे, श्रोता को जानना चाहिये। रस जानने
की इच्छा न करे, रस के ज्ञाता को जानना चाहिये। मनुष्य कर्म जानने
की इच्छा न करे, उसके कर्ता को जानना चाहिये। मनुष्य सुख दुःख
जानने की इच्छा न करे सुख दुःख के ज्ञाता को जानना चाहिये। मनुष्य
४०
को आनन्द, रति और प्रजोत्पत्ति के ज्ञाता को जानना चाहिये ।।२७ ।।
विजिज्ञासीतानन्दस्य रतेः प्रजातेर्विज्ञातारं विद्यान्नेत्यां
विजिज्ञासीतैतारं विद्यान्न मनो विजिज्ञासीत मन्तारं विद्यात्ता वा
एता दशैव भूतमात्रा ।।२८ ।।
मनुष्य गति को जानने की इच्छा न करे, गमन करने वाले को
जानना चाहिये । मनुष्य को मन को न जानना चाहिये, मनने करने
वाले को जानना चाहिये । सच ही ये दश भूत मात्रायें प्रज्ञा की
अधिष्ठित हैं ।।२८ ।।
अधिप्रज्ञं दश प्रज्ञामात्रा अधिभूतं यद्धि भूतमात्रा न स्युर्न
प्रज्ञामात्राः स्युर्यद्वा प्रज्ञामात्रा न स्युर्न भूतमात्राः स्युः ।।२६ ।।
और प्रज्ञा की दश मात्रायें भूतों के अधिष्ठित हैं। जो भूत मात्रायें
न हों तो प्रज्ञा मात्रायें न होनी चाहिये और जहां प्रज्ञा तन्मात्रायें न
हों वहां भूत मात्रायें भी न चाहिये ।।२६ ।।
न ह्यन्यतरतो रूपं किंचन सिद्ध्येन्नो एतन्नाना तद्यथा
रथस्यारेषु नेमिरर्पिता नाभावरा अर्पिता एवमेवैता भूतमात्राः
प्रज्ञामात्रास्वर्पिताः प्रज्ञामात्राः प्राणे अर्पिता एष प्राण एव
प्रज्ञात्मानन्दोऽजरोऽमृतो न साधुना कर्मणा भूयान्नो एवासाधुना
कर्मणा कनीयानेष ह्येवैनं साधु कर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य
उन्निनीषत एष उ एवैनमसाधु कर्म कारयति तं यमधो निनीषते ।
एष लोकपाल एष लोकाधिपतिरेष सर्वेश्वरः स म आत्मति
विद्यात्स म आत्मेति विद्यात् ।।३० ।।
इन दोनों में से एक करके किसी रूप की भी सिद्धि नहीं होती ।
इस एकता का कभी विभाग नहीं होता । जैसे रथ के चक्र के आरे
में नेमि रहती है और नेमि में आरे रहते हैं इसी प्रकार भूत मात्रायें
४१
प्रज्ञा मात्रायें प्राणों में अर्पित हैं। यह प्राण ठीक प्रज्ञा रूप है, व आनन्द
रूप है, वह अजर और अमृत रूप हैं वह शुभ कर्मों से महान् नहीं
होता और अशुभ कर्मों से छोटा नहीं होता। यह प्रज्ञा ठीक-ठीक जिस
मनुष्य को इस लोक में से उच्च से उच्च गति को पहुंचाने की इच्छा
करती है उससे शुभ कर्म कराती है। और इस लोक से जिस मनुष्य
को नीच गति में पहुँचाने की इच्छा करती है उससे अशुभ कर्म कराती
है। वह लोकों का पति रूप है, वह लोकों का अधिपति रूप है। यह
प्रज्ञा सर्वेश्वर रूप हैं वह मेरा आत्मरूप है ऐसा जाने, मेरा आत्म रूप
है ऐसा जाने।।३०।।
४२
चतुर्थोऽध्यायः
अथ गार्ग्यो ह वै बालकिरनूचानः संस्पष्ट आस सोऽयमुशीनरेषु
संवसन्मत्स्येषु कुरुपञ्चालेषु काशीविदेहेष्विति स हाजातशत्रुं ।।१।।
गार्ग्य गोत्र में बालाकि नामक एक प्रसिद्ध विद्वान् हुआ। वह
उशीनर में, मत्स्य देश में, कुरुपांचाल तथा काशी विदेह देश में रहा
हुआ था। वह काशी के राजा अजातशत्रु के पास जाकर उससे बोला,
“मैं तुझे ब्रह्म का वर्णन करता हूँ।” ।।१।।
काश्यमेत्योवाच ब्रह्म ते ब्रवाणीति तं होवाचाजातशत्रुः सहस्रं
दद्मस्त एतस्यां वाचि जनको जनक इति वा उ जना
धावन्तीति ।। २ ।।
अजात शत्रु उससे बोला “इस बात के लिये मैं तुझे एक सहस्र
(गायें) देता हूँ, क्योंकि लोग जनक ही को ब्रह्म विद्या का श्रोता समझते
हैं इसलिये उसी के पास लोग (ब्रह्मविद्या के वक्ता) जाया करते हैं। ।२ ।।
स होवाच बालाकिर्य एवैष आदित्ये पुरुषस्तमेवाहमुपास इति
तं होवाचाजातशत्रुर्मामैतस्मिन्सम्वादयिष्ठा बृहन्पाण्डरवासा
अतिष्ठाः ।। ३ ।।
बालाकि बोला, “आदित्य में जो पुरुष है, उसीकी मैं (ब्रह्मरूप से)
उपासना करता हूँ।” आजतशत्रु ने कहा, “इस विषय में तू मुझसे
संवाद मत कर। जो बड़ा है, शुभ्र वस्त्र परिधान करता है ।।३।।
सर्वेषां भूतानां मूर्धेति वा अहमेतमुपास इति स यो
हैतमेवमुपास्तेऽतिष्ठाः सर्वेषां भूतानां मूर्धा भवति ।।४ ।।
तथा जो सब भूतों में श्रेष्ठ और उसका राजा है, उसकी मैं उपासना
४३
करता हूँ। जो इस प्रकार उपासना करता है वह सब भूतों का राजा
होता है' ।।४।।
स होवाच बालाक्यि एवैष चन्द्रमसि पुरुषस्तमेवाहं ब्रह्मोपास
इति तं होवाचाजातशत्रुर्मामैतस्मिन्सम्वादयिष्ठाः सोमो
राजाऽन्नस्यात्मेति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्तेऽन्नस्यात्मा
भवति ।।५।।
बालाकि बोला, “चन्द्र में जो पुरुष है उसकी मैं उपासना करता
हूँ।” अजातशत्रु ने कहा, “इस विषय में तू मुझसे संवाद मत कर।
वह सोम राजा है तथा अन्न का आत्मा (जीवन) है ऐसा मान कर मैं
उनकी उपासना करता हूँ इस प्रकार उपासना करने वाला मनुष्य अन्न
का आत्मा होता है; यानी उसे अन्न की कमी नहीं होती” ।।५।।
स होवाच बालाकिर्य एवैष विद्युति पुरुष एतेवाहं ब्रह्मोपास
इति तं होवाचाजातशत्रुर्मामैतस्मिन्सम्वादयिष्ठास्तेजस्यात्मेति वा
अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते तेजस आत्मा भवति ।।६।।
बालाकि बोला, “जो विद्युत् में पुरुष है उसी की मैं ब्रह्मरूप से
उपासना करता हूँ।” तब अजातशत्रु ने कहा, “इस विषय में तू मुझसे
संवाद मत कर। वह तेज का आत्मा है ऐसा मानकर मैं उसकी उपासना
करता हूँ। जो इस प्रकार उपासना करता है वह तेज का आत्मा होता
है” ।।६।।
स होवाच बालाकिर्य एवैष स्तनयित्नौ पुरुष एतमेवाहं
ब्रह्मोपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मामैतस्मिन्सम्वादयिष्ठाः
शब्दस्यात्मेतिवा अहमेतमु पास इति स यो हैतमेवमुपास्ते
शब्दस्यात्मा भवति ।।७।।
बालाकि बोला, “मेघ गर्जना में जो पुरुष है उसकी मैं ब्रह्मरूप
४४
से उपासना करता हूँ।" उससे अजातशत्रु ने कहा, "इस विषय में
तू मुझमें संवाद मत कर। वह शब्द का आत्मा है ऐसा जान कर मैं
उसकी उपासना करता हूँ। जो इस प्रकार इसकी उपासना करता है
वह शब्द का आत्मा होता है" ॥७॥
स होवाच बालाकिर्य एवैष आकाशे पुरुषस्तमेवाहमुपास इति
तं होवाचाजातशत्रुर्मामैतस्मिन्समवादयिष्ठाः पूर्णमप्रवर्ति ब्रह्मेति
वा अहमेतमुपास । । ८ । ।
बालाकि बोला, "आकाश में जो पुरुष है उसकी मैं उपासना करता
हूँ।" अजातशत्रु ने कहा, "इस विषय में तू मुझसे संवाद मत कर।
वह पूर्ण और प्रवृत्ति रहित ब्रह्म है ऐसा जानकर मैं उसकी उपासना
करता हूँ।।८।।
इति स यो हैतमेवमुपास्ते पूर्यते प्रजया पशुभिर्नो एव स्वयं
नास्य प्रजा पुरा कालात्प्रवर्तते । । ६ । ।
इस प्रकार जो उसकी उपासना करता है वह प्रजा और पशुओं
से पूर्ण (संपन्न) होता है। वह स्वयं अथवा उसकी प्रजा योग्य काल
के पूर्व मरण को प्राप्त नहीं होती" ।।६।।
स होवाच बालाकिर्य एवैष वायौ पुरुषस्त मेवाहमूपास इति
तं होवाचाजातशत्रुर्मामैतस्मिन्समवादयिष्ठा इन्द्रो ।।१० ।।
बालाकि ने कहा, "वायु में जो पुरुष है उसकी मैं उपासना करता
हूँ" उससे अजातशत्रु ने कहा, "इस विषय में तू मुझसे संवाद मत
कर। वह वैकुण्ठ (महा पराक्रमी) इन्द्र है तथा पराजय न होने वाली
सेना है।।१०।।
वैकुण्ठोऽपराजिता सेनेति वा अहमेतमुपास इति स यो
हैतमेवमुपास्ते जिष्णुर्ह वा पराजिष्णुरन्यतस्त्य जायी भवति ।।११।।
४५
ऐसा समझ कर मैं उसकी उपासना करता हूँ। इस प्रकार इसकी
उपासना करने वाला विजयी दुर्जय तथा शत्रुओं को जीतने वाला होता
है” ।।११।।
स होवाचबालाकिर्य एवैषोऽग्नौ पुरुषस्तमेवाहमुपास इति तं
होवाचाजातशत्रुर्मामैतस्मिन्सम्वादयिष्ठ विषासहिरिति वा
अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते विषसहिर्वा एष
भवति ।।१२।।
बालाकि बोला, “अग्नि में जो पुरुष है उसकी मैं उपासना करता
हूँ।” अजातशत्रु ने कहा, ‘इस संबंध में तू मुझसे संवाद मत कर।
वह प्रबल है ऐसा समझ कर मैं उसकी उपासना करता हूँ। इस प्रकार
जो इसकी उपासना करता है वह प्रबल होता है” ।।१२।।
स होवाच बालाकिर्य एवैषोऽप्सु पुरुषस्त मेवाहमुपास इति
तं होवाचाजातशत्रुर्मामैतस्मिन्सम्वादयिष्ठा नाम्न आत्मेति वा
अहमेतमुपास इति स यो हैतेवमुपास्ते नाम्न आत्मा भवतीत्य-
धिदैवतमथाध्यात्मम् ।।१३।।
बालाकि बोला, “जल में जो पुरुष है उसकी मैं उपासना करता
हूँ।” अजातशत्रु ने कहा, इस विषय में तू मुझसे संवाद मत कर यह
नाम स्वरूप (अथवा तेज स्वरूप) है ऐसा समझ कर मैं इसकी उपासना
करता हूँ। जो इसकी इस प्रकार उपासना करता है वह नाम स्वरूप
(अथवा तेज स्वरूप) होता है ।” इतना देवता सम्बन्धी हुआ, अब शरीर
सम्बन्धी कहते हैं ।।१३।।
स होवाच बालाकिर्य एवैष आदर्शे पुरुषस्तमेवाहमुपास इति
तं होवाचाजातशत्रुर्मामैतस्मिन्सम्वादयिष्ठा प्रतिरूप इति वा
अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते प्रतिरूपो हैवास्य
४६
प्रजायामाजायते नाप्रतिरूपः ।।१४।।
बालाकि बोला, "आदर्श (आईना) में दीखने वाला जो पुरुष है
उसकी मैं उपासना करता हूँ।" अजातशत्रु ने कहा, इस विषय में तू
मुझसे संवाद मत कर। इसको प्रतिरूप समझ कर मैं इसकी उपासना
करता हूँ, इस प्रकार जो इसकी उपासना करता है उसके घर में उसी
के समान रूपवाला पुत्र उत्पन्न होता है उसके समन रूप न हो ऐसा
पुत्र नहीं उत्पन्न होता ।।१४।।
स होवाच बालाकिर्य एवैष प्रतिश्रुत्कायाः पुरुषस्तमेवाहमुपास
इति तं होवाचाजातशत्रुर्मामैतस्मिन्स संवादिष्ठा द्वितीयोऽनपग
इति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते विन्दते
द्वितीयाद्द्वितीयवान्भवति ।।१५।।
बालाकि बोला, "प्रतिध्वनि में जो पुरुष होता है उसकी मैं उपासना
करता हूँ।" अजातशत्रु बोला, इस विषय में तू मुझसे संवाद मत कर।
मैं इसको द्वितीय तथा कभी अलग न होने वाला ऐसा जानकर इसकी
उपासना करता हूँ। जो इस प्रकार इसकी उपासना करता है। उसको
द्वितीय से (पत्नी से) द्वितीय पुत्र प्राप्त होता है" ।।१५।।
स होवाच बालाकिर्य एवैष शब्दः पुरुषमन्वेति तमेवाहमुपास
इति तं होवाचाजात शत्रुर्मामैतस्मिन्सम्वादयिष्ठा असुरिति वा
अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते नो एव स्वयं नास्य प्रजा
पुराकालात्संमोहमेति ।।१६।।
बालाकि बोला, मनुष्य के चलने में जो शब्द होता है, उसकी मैं
उपासना करता हूँ। अजातशत्रु ने कहा इस विषय में तू मुझसे संवाद
मत कर। मैं उसकी प्राण समझ कर उपासना करता हूँ—जो इस प्रकार
इसकी उपासना करता है वह अथवा उसकी प्रजा योग्य समय के पहिले
४७
नहीं मरती ।।१६।।
स होवाच बालाकिर्य एवैषछायायां पुरुषस्तमेवाह मुपास इति
तं होवाचाजातशत्रुर्मामैतस्मिन्सम्वादयिष्ठामृत्युरिति वा अहमेतुपास
इति स यो हैतमेवमुपास्ते नो एव स्वयं नास्य प्रजा पुरा
कालात्प्रमीयते ।। १७ ।।
बालाकि बोला, “छाया में जो पुरुष है उसकी मैं उपासना करता
हूँ।” अजातशत्रु ने कहा, इस विषय में तू मुझसे संवाद मत कर। उसको
मृत्यु समझकर मैं उसकी उपासना करता हूँ। इस प्रकार जो इसकी
उपासना करता है वह अथवा उसकी प्रजा योग्य समय से पहले मृत्यु
को प्राप्त नहीं होती ।। १७ ।।
स होवाच बालाकिर्य एवैष शारीरः पुरुषस्तमेवाहमुपास इति
तं होवाचाजातशत्रुर्मामैतस्मिन्सम्वादयिष्ठाः प्रजापतिरिति वा
अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते प्रजायते प्रजया
पशुभिः ।। १८ ।।
बालाकि बोला, “शरीर में जो पुरुष है उसकी मैं उपासना करता
हूँ” अजातशत्रु ने कहा, “इस विषय में तू मुझसे संवाद न कर। उसको
प्रजापति समझकर मैं उसकी उपासना करता हूँ। इस प्रकार जो उसकी
उपासना करता है उसकी प्रजा और पशु वृद्धि को प्राप्त होते हैं ।। १८ ।।
स होवाच बालाकिर्य एवैष प्राज्ञ आत्मा येनैतत्पुरुषप्तः
स्वप्नमाचरति तमेवाहमुपास इति ।। १६ ।।
बालाकि बोला, “जो प्राज्ञ आत्मा है और जिससे सोया हुआ पुरुष
स्वप्न में भ्रमण करता है उस आत्मा की मैं उपासना करता हूँ”।
अजातशत्रु ने कहा, “इस विषय में तू मुझसे संवाद मत कर ।। १६ ।।
तं होवाचाजातशत्रुर्मामैतस्मिन्सम्वादयिष्ठा यमो राजेति वा
४८
अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते सर्वं हास्मा इदं श्रैष्ठ्याय
गम्यते ।।२०।।
वह राजा यम है ऐसा समझकर मैं उसकी उपासना करता हूँ।
इस प्रकार जो उसकी उपासना करता है उसकी श्रेष्ठता को सब कोई
स्वीकार करते हैं" ।।२०।।
स होवाच बालाकिर्य एवैष दक्षिणेऽक्षन्पुरुषस्तमेवाहमुपास
इति तं होवाचाजातशत्रुर्मामैतस्मिन्सम्वादयिष्ठा नाम्न ।।२१।।
बालाकि बोला-दाहिने नेत्र में जो पुरुष है उसकी मैं उपासना
करता हूँ। अजातशत्रु ने कहा—"इस विषय में तू मुझसे संवाद मत
कर ।।२१।।
आत्माग्नेरात्मा ज्योतिष आत्मैति वा अहमेतमुपास इति स
यो हैतमेवमुपास्त एतेषं सर्वेषामात्मा भवति ।।२२ ।।
यह पुरुष नाम का आत्मा, अग्नि का आत्मा तथा तेज का आत्मा
है ऐसा समझ कर मैं इसकी उपासना करता हूँ। इस प्रकार जो इसकी
उपासना करता है वह इन सबका आत्मा होता है" ।।२२।।
सहोवाच बालाकिर्य एवैष सव्येक्षन्पुरुषस्तमेवाहमुपास इति
तं होवचाजातशत्रर्मामैतस्मिन्समवादयिष्ठाः सत्यस्यात्मा विद्युत
आत्मा तेजस आत्मैति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपासस्त
एतेषा सर्वेषामात्मा भवतीति ।।२३।।
बालाकि बोला—"बाएं नेत्र में जो पुरुष है उसकी मैं उपासना
करता हूँ"। अजात शत्रु ने कहा—"इस विषय में तू मुझमे संवाद मत
कर। यह पुरुष सत्य का आत्मा, विद्युत का आत्मा तथा तेज का आत्मा
है, ऐसा समझ कर मैं उसकी उपासना करता हूँ। इस प्रकार इसकी
उपासना करने वाला पुरुष इन सबका आत्मा होता है ।।२३।।
४६
तत उ ह बालाकिस्तूष्णीमास तं होवाचाजातशत्रुरेतावन्नु
बालाकीति एतावद्धीति होवाच बालाकिस्तं होवाचाजातशत्रुर्मृषा
वै किल मा समवादयि । । २४ । ।
इस पर बालाकि चुप हो गया । तब अजातशत्रु ने कहा—"क्या
इतना ही तू जानता है"? गार्ग्य ने कहा—"इतना ही जाना है" ।
अजातशत्रु बोला—"मैं तुझसे ब्रह्म का वर्णन करता हूँ ।।२४ ।।
ब्रह्म ते ब्रवाणीति होवाच स यो वै बालाक एतेषां पुरुषाणां
कर्त्ता यस्य वैतत्कर्म स वेदितव्य इति । । २५ । ।
ऐसा कह कर वृथा ही तू मुझसे संवाद करने को आया है। हे
बालाकि, इन सब पुरुषों का जो कर्त्ता है, उसी ने यह विश्व उत्पन्न
किया है और वही एक जानने के योग्य है ।।२५ ।।
तत उ ह बालाकिः समित्पाणिः प्रतिचक्रामोपयानीति तं
होवाचाजातशत्रुः प्रतिलोमरूपमेव स्याद्यत्क्षत्रियो ब्राह्मणमुपन-
यीतैह्येव त्वा ज्ञपयिष्यामीति तं ह पाणावभिपद्य प्रवव्राज । । २६ । ।
तदनन्तर हाथ में समिधा ग्रहण करके बालाकि उसके पास जाकर
बोला—"मैं तेरे पास (शिष्य भाव से) आया हूँ"। अजातशत्रु ने
कहा—"क्षत्रिय ब्राह्मण को उपदेश दे यह अयोग्य होगा। चल मैं तुझे
समझाता हूँ"। "पश्चात् उसका हाथ पकड़ कर वह चलने
लगा ।।२६ ।।
तौ ह सुप्तं पुरुषमीयतुस्तं हाजातशत्रुरामन्त्रयांचक्रे
बृहन्पाण्डरवासः सोमराजन्निति स उ ह तूष्णीमेव शिश्ये तत उ
हैनं यष्ट्या विचिक्षेप स तत एव समुत्तस्थौ तं । । २७ । ।
वे दोनों एक सोये हुए पुरुष के पास गये। अजातशत्रु ने
पुकारा—"हे ब्रह्मन् शुद्ध वस्त्र वाले! हे सोम राजन्! परन्तु वह चुप
रहा। पश्चात् उसने उसको हिला के जगाया-तब वह उठ कर खड़ा
हुआ ।।२७।।
होवाचाजातशत्रुः क्वै एतद् बालाः लोके पुरुषोऽशयिष्ट
क्वैदभूत्कुत एतदागादिति तदु ह बालाकिर्न विजज्ञौ तं
होवाचाजातशत्रुर्यत्रैष एतद्बालाके पुरुषोऽशयिष्ट यत्रैतदभूद्यत
एतदागाद्धिता नाम हृदयस्य नाड्यो हृदयात्पुरीततमभिप्रतन्वन्ति
तद् ।।२८।।
तब अजातशत्रु बोला—"यह पुरुष कहां सोया थ, वह कहां था
और इस प्रकार से वह कहां से आया? बालाकि यह नहीं जानता था।
इस पर अजात शत्रु "बोला वह पुरुष कहां था और कहां से इस प्रकार
आया-इसका उत्तर यह है-हृदय में हिता नाम की नाड़ियां उस पुरुष
के हृदय से पुरीतत तक फैली हुई है।।२८।।
यथा सहस्रधा केशा विपाटितस्तावदण्व्यः पिंगलस्याणिम्ना
तिष्ठन्ते शुक्लस्य कृष्णस्य पीतस्य लोहितस्येति तासु तदा भवति
यदा सुप्तः स्वप्नं न कंचन पश्यत्यस्मिन्प्राण एवैकधा भवति ।।२६।।
एक बाल के सहस्र भाग के समान ये नाड़ियां सूक्ष्म हैं। इनमें शुभ्र,
काला, पीला और लाल इस प्रकार के अनेक रंग का रस भरा रहता
है। मनुष्य सोने पर स्वप्न नहीं देखता तब वह इन नाड़ियों में होता
है। इस समय वह प्राण के साथ एक रूप होता है।।२६।।
-तदैनं वाक्सर्वैर्नामभिः सहाप्येति चक्षुः सर्वै रूपैः सहाप्येति
श्रोत्रं सर्वैः शब्दैः साहाप्येति मनः सर्वैर्ध्यातैः सहाप्येति ।। ३० ।।
वाणी सब नामों को लेकर इस समय उसको प्राप्त होती है। फिर
चक्षु सम्पूर्ण आकार लेकर उसको प्राप्त होता है। कर्ण सब शब्द लेकर
उसको प्राप्त होता है। मन सम्पूर्ण विचार लेकर उसको प्राप्त होता
५१
है।।३०।।
स यदा प्रतिबुध्यते यथाग्नेर्ज्वलतो विस्फुलिंगा
विप्रतिष्ठेरन्नेवमेवैतस्मादात्मनः प्राणा यथायतनं विप्रतिष्ठन्ते ।।३१।।
जब यह जाग उठता है तब जैसे जलती हुई अग्नि से चारों तरफ
चिनगारियां उठती हैं वैसे ही उस आत्मा से प्राप्त (वाणी इत्यादि) बाहर
निकल कर अपने अपने स्थान पर जाते हैं।।३१।।
प्राणेभ्यो देवा देवेभ्यो लोकस्तद्यथा क्षुरः क्षुरधाने हितः
स्याद्विश्वंभरो वा विश्वंभरकुलाय एवमेवैष प्राज्ञ आत्मेदं
शरीरमनुप्रविष्ट आ लोमभ्य आ नखेभ्यः ।।३२ ।।
प्राण से देवता और देवताओं से लोक बाहर निकलते हैं और जिस
प्रकार छुरी के घर में छुरी रहती है अथवा अग्नि कुण्ड में अग्नि रहती
है इसी प्रकार यह प्राज्ञ आत्मा चोटी से पैर के नख तक शरीर में प्रवेश
करता है ।।३२ ।।
तमेतमात्मानमेताआत्मानोऽन्ववस्यन्ति यथा श्रेष्ठिनं स्वास्तद्यथा
श्रेष्ठीः स्वैर्भुक्ते तथा वा श्रेष्ठिनं स्वा भुञ्जन्ति एवमेवैष प्राज्ञ
आत्मैतैरात्मभिर्भुङ्क्ते। यथा श्रेष्ठी स्वैरेवं वैतमात्मानमेत
आत्मानोऽन्ववस्यन्ति यथा श्रेष्ठिनं स्वाः स यावद्ध वा इन्द्र
एतमात्मानं न विजज्ञौ तावदेनमसुरा अभिबभूवुः स यदा
विजज्ञावथ हत्वाऽसुरान्विजित्य सर्वेषां भूतानां श्रैष्ठ्यं स्वाराज्यमा-
धिपत्यं पर्येति तथा एवैवं विद्वान्सर्वेषां भूतानां श्रैष्ठ्यं पर्येति य
एवं वेद य एवं वेद ।।३३।।
। इति चतुर्थोऽध्यायः ।।४।।
ॐ वाङ्मे मनसीति शान्तिः ।।
। कौषीतकिब्राह्मणोपनिषत्समाप्ता ।।
५२
। कौषीतकिब्राह्मणोपनिषत्समाप्ता ।।
जैसे किसी सेठजी के पीछे उसके सेवक जाते हैं वैसे ही (वाणी
आदि) सब आत्मा के पीछे जाते हैं। जिस प्रकार-प्रधान पुरुष अपने
स्वजनों के साथ भोजन करता है वैसे ही यह प्राज्ञ आत्मा इन आत्माओं
के साथ भोजन करता है। तथा लोक धनी का अनुसरण करते हैं वैसे
ही यह इतर आत्मा इस आत्मा का अनुकरण करते हैं। जब तक इन्द्र
को इस आत्मा का ज्ञान नहीं था तब तक वह असुरों से जीता
गया-परन्तु जब उसको इसका ज्ञान हुआ तब उसने असुरों को जीत
लिया तथा उसको समस्त देवताओं में श्रेष्ठता, स्वराज्य और
आधिपत्य की प्राप्ति हुई। वह सम्पूर्ण प्राणियों में श्रेष्ठता, स्वाराज्य
और आधिपत्य को प्राप्त होता है-जो इस प्रकार जानता है, जो इस
प्रकार जानता है।।३३।।
।। इति कौषीतकिब्राह्मणोपनिषत् समाप्ता ।।
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