कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)
Kaushitaki Brahmana Upanishad with Hindi Translation
स्वामी महेश्वरानन्द गिरि द्वारा
स्रोत: मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली · मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली (उद्गम)
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है।।३०।।
स यदा प्रतिबुध्यते यथाग्नेर्ज्वलतो विस्फुलिंगा
विप्रतिष्ठेरन्नेवमेवैतस्मादात्मनः प्राणा यथायतनं विप्रतिष्ठन्ते ।।३१।।
जब यह जाग उठता है तब जैसे जलती हुई अग्नि से चारों तरफ
चिनगारियां उठती हैं वैसे ही उस आत्मा से प्राप्त (वाणी इत्यादि) बाहर
निकल कर अपने अपने स्थान पर जाते हैं।।३१।।
प्राणेभ्यो देवा देवेभ्यो लोकस्तद्यथा क्षुरः क्षुरधाने हितः
स्याद्विश्वंभरो वा विश्वंभरकुलाय एवमेवैष प्राज्ञ आत्मेदं
शरीरमनुप्रविष्ट आ लोमभ्य आ नखेभ्यः ।।३२ ।।
प्राण से देवता और देवताओं से लोक बाहर निकलते हैं और जिस
प्रकार छुरी के घर में छुरी रहती है अथवा अग्नि कुण्ड में अग्नि रहती
है इसी प्रकार यह प्राज्ञ आत्मा चोटी से पैर के नख तक शरीर में प्रवेश
करता है ।।३२ ।।
तमेतमात्मानमेताआत्मानोऽन्ववस्यन्ति यथा श्रेष्ठिनं स्वास्तद्यथा
श्रेष्ठीः स्वैर्भुक्ते तथा वा श्रेष्ठिनं स्वा भुञ्जन्ति एवमेवैष प्राज्ञ
आत्मैतैरात्मभिर्भुङ्क्ते। यथा श्रेष्ठी स्वैरेवं वैतमात्मानमेत
आत्मानोऽन्ववस्यन्ति यथा श्रेष्ठिनं स्वाः स यावद्ध वा इन्द्र
एतमात्मानं न विजज्ञौ तावदेनमसुरा अभिबभूवुः स यदा
विजज्ञावथ हत्वाऽसुरान्विजित्य सर्वेषां भूतानां श्रैष्ठ्यं स्वाराज्यमा-
धिपत्यं पर्येति तथा एवैवं विद्वान्सर्वेषां भूतानां श्रैष्ठ्यं पर्येति य
एवं वेद य एवं वेद ।।३३।।
। इति चतुर्थोऽध्यायः ।।४।।
ॐ वाङ्मे मनसीति शान्तिः ।।