करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
मेरा लक्ष्य (प्रस्तावना)
मेरा लक्ष्य
संतों की दुनिया सबसे निराली रही है। संतों ने उस परम - सत्य की बात समझाने
के लिए संसार को संसार ही की भाषा में समझाया है । कहीं-कहीं संतों ने राम,
हरि आदि शब्दों का इस्तेमाल भी किया है, पर 'राम' से उनका मतलब 'साहिब'
से ही रहा है। इसलिए भ्रमित न होना। चार राम की बात बताते हुए साहिब ने इसे
स्पष्ट भी किया है।
साकार राम दशरथ का बेटा । निराकार राम घट घट में लेटा ।
बिंदू राम जिन जगत पसारा । निरालंब राम सबही ते न्यारा ॥
यानी जिस राम को सारी दुनिया पूज रही है, कहीं संतों को भी उसी का उपासक बता रही है, वो तो साकार राम की कोटि में है । फिर कहीं-कहीं संतों को निराकार राम का उपासक बताया जा रहा है, पर वो दूसरी, निराकार राम की कोटि में है। तीसरा राम वीर्य है, जिससे सृष्टि का पसार है । लेकिन संतों का राम चौथा है, जो निरालंब है । वो जन्म-मरण में अवतार धारण करके नहीं आता । उसे ही सब संतों ने ‘साहिब' पुकारा है। कुछ सगुण-निर्गुण भक्ति के जो शब्द संतों की वाणी में मिलते है, वो इसलिए कि उन्होंने कबीर साहिब से नाम पाने से पहले निरंजन की भक्ति की थी । फिर कहीं-कहीं संतों ने योग आदि के रहस्यों की बात भी की है, अंदर में होने वाली धुनों की बात भी की है, 10वें द्वार की बात भी की है। तो लोग समझ लेते हैं कि संतों ने योग का महत्व बताया है । नहीं, संतों ने यह सब योग आदि की पहुँच बताने के लिए कहा है । यह सब बताते हुए उन्होंने ‘सार शब्द' का महत्व बताया है, जो अन्दर में होने वाला शब्द नहीं है, जो नि:शब्द शब्द कहा जाता है । इसलिए संतों की वाणी में आंतरिक धुनें और आंतरिक खेल के वर्णन से भी भ्रमित नहीं होना है। बस, इतनी-सी बात समझ लेना कि संतों ने इस तीन-लोक को काल का देश बताते हुए एक अमर लोक की बात की है, जिसकी राह आत्मा के भीतर सुरति से ही है, इसलिए बाहर भटकने की ज़रूरत नहीं है और उस रास्ते की कुंजी सार - शब्द (नाम) है, जो केवल संतों के पास है । मैं आपके पास शुद्ध आत्मज्ञान पहुँचाना चाहता हूँ । आज शुद्ध आत्मज्ञान की बात कोई नहीं कर रहा है । सब भटके हुए हैं। कुछ बाहर में भटके हुए हैं तो कुछ अन्दर में। कोई भी सच्चे आत्मज्ञान की बात नहीं कर रहा है।
इस संसार में सगुण-निर्गुण से संबंधित जितनी भी भक्यिाँ प्रचलित हैं, सब काल की हैं। उनमें किसी में भी पूर्ण आत्मज्ञान नहीं है। जब तक आत्मज्ञान नहीं हो जाता तब तक जीव सदा के लिए भवसागर से नहीं छूट सकता है। इस जीव को सत्य-भक्ति की राह दिखाने वाला भी कोई नहीं मिलता; अमर-लोक का संदेश देने वाला भी कोई नहीं मिलता । यदि हम संसार में देखें तो सभी सगुण, निर्गुण भक्ति अथवा पांच शब्द (पाँच मुद्राओं) का ही ज्ञान दे रहे हैं । जिनसे पाँच तत्व पैदा हुए मगर बोल निराकार सत्ता से आगे सत्य लोक, अमर लोक भी रहे हैं ऐसे में कुछ महात्माओं और महात्माओं की वाणीओं ने भी जीवों को उलझा दिया है।
वा घर की सुधि कोई न बतावे, जहँवा से हंसा आया है ॥
यदि मिलता भी है तो वो खुद वहाँ नहीं पहुँचा होता है, केवल साहिब की वाणियों की नक़ल करके ही बोलता है । इसी कारण फिर आ-जाकर निरंजन में ही उलझा देता है। इस तरह सत्य - भक्ति से रहित जीव आत्मज्ञान से बहुत दूर हो गया है। जब तक जीव अमर - लोक में नहीं पहुँच जाता, जब तक जीव सच्चे साहिब को नहीं पा लेता, तब तक सदा के लिए मुक्त नहीं हो सकता | अमर- लोक में पहुँचकर ही पूर्ण आत्मज्ञान होता है और उस लोक में पहुँचने के लिए सच्चे सद्गुरु के सच्चे नाम की ज़रूरत है । पर दुनिया इस रहस्य को नहीं समझ पाती है और पाखण्डियों के चंगुल में फँसकर बाहर भटक जाती है। वो प्रभु तो अन्दर में बैठा हुआ है, पर दुनिया उसे बाहर खोज कर रही है, क्योंकि स्वार्थियों ने उलझा दिया है। मनुष्य भटक रहा है; उसे पाने के लिए कमाई, योग, जप, तप, ध्यान आदि कर रहा है, पर इन चीज़ों से वो नहीं मिलने वाला । वो प्रभु तो सहज में ही मिलने वाला है। वो तो अन्दर में ही बैठा है। ज़रूरत है तो केवल सद्गुरु के द्वारा उसे प्रकट कर देने की । अन्यथा वो प्रभु आपसे कहीं दूर नहीं है।
घर में पड़ी वस्तु नहिं सूझे, बाहर खोजन जासी ॥
पानी में मीन पियासी । मोहि सुनि सुनि आवत हाँसी ॥
मृग की नाभि माहिं कस्तूरी, बन बन फिरत उदासी ॥
आत्म ज्ञान बिना सब सूना, का मथुरा का कासी ॥
कहत कबीर सुनो भाई साधो, सहज मिले अविनासी ॥