करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
13. कुछ शंकाओं का निराकरण
अंकुरी जीव कौन हैं? कौन से जीव भटकते हैं ? जो भी हमसे दीक्षा लेगा, भटकेगा तो भी लाइन पर आ जायेगा । पर आपकी कोशिश होनी चाहिए कि अगला जन्म न लें। कहीं भी कुछ गड़बड़ होगी तो आपको संकेत मिलेंगे । आपको सुरक्षा भी पूरी-पूरी मिल रही है, फिर भटकना क्यों है ? माँ छोटे बच्चे का कितना ध्यान रखती है, खिलाने का, नहलाने का, दूध पिलाने का, सर्वांगीण सुरक्षा करती है। वो बड़ा ध्यान रखती है, पर वो कहीं पर चूक भी जाती है। लेकिन आपकी सुरक्षा करने वाली ताक़त चूकती नहीं है। चुपचाप आप अपने अंदर बदलाव देख लेना । अगर आप गलती करें, साहिब ने छोड़ दिया तो फिर निरंजन जीत गया। साहिब आपको छोड़ेगा नहीं, सुधारकर छोड़ेगा। यह नहीं कि मरो जाकर। फिर तो निरंजन की जीत ही हुई। जितना आप गुरु के सान्निध्य में रहेंगे, उतनी भूलें कम करोगे । क्या प्रभु तक हमारी पुकार जाती है ? एक ने मुझसे कहा कि पीड़ा होने पर जब हम प्रभु को पुकारते हैं तो क्या परमात्मा तक हमारी पुकार जाती है या फिर हम ऐसे ही अँधकार में भटक रहे हैं ? उसने कहा कि आपकी बातों को सुनकर अजीब-सा लग रहा है। मैंने कहा कि जो भी संसार के लोग पुकार करते हैं, वो निरंजन तक जाती है। शरीर के कष्ट छुटकारा पाने के लिए ही तो पुकार कर रहे हैं न। वो निरंजन से संबंधित है। आत्मा का शरीर से कोई सरोकार नहीं है। वो निरंजन सब चीजें दे देता है ताकि लगे कि प्रभु ने पुकार सुनी। पर वो आत्मा का ज्ञान नहीं देने वाला। भौतिक पदार्थ दे देगा। नचिकेता का वृत्तांत सुना होगा । उसका पिता राजा था। वो बूढ़ी गाय दान में दे रहा था। नचिकेता को ठीक नहीं लगा। उसने सोचा कि यह तो जाकर इनकी सेवा ही करेगा । दान में तो अच्छी चीज़ होनी चाहिए। उसने पिता से पूछा कि मुझे किसको दान में दोगे ? पिता ने उसकी बात अनसुनी कर दी। नचिकेता ने 2-3 बार पूछा, पर उसके पिता ने ध्यान नहीं दिया। पर जब वो बार-बार पूछने लगा कि मुझे किसे दान में दोगे तो उसके पिता ने कहा कि
जा! तुझे मृत्यु को दान में दिया । वो चित्रगुप्त के पास पहुँचा । यमराज ने कहा कि तुम न्यायप्रिय हो, गलती से यहाँ आ गये हो, मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ, माँगो क्या चाहते हो ? उसने कहा कि मुझे आत्मा का ज्ञान चाहिए । यमराज ने कहा कि यह मत माँगो। और जो कुछ तुम्हें चाहिए, मैं दे सकता हूँ, पर यह नहीं माँगो, यह नहीं दे पाऊँगा । कहने का मतलब है कि तीन लोक का राजा आत्मा का ज्ञान नहीं देना चाहता है। बाकी जो भी दिया, वो तो छूटेगा ही। जो हम चाह रहे हैं, वो सद्गुरु देना नहीं चाहता है, पर जो वो देना चाहता है, हम लेना नहीं चाहते हैं। दुनिया के लोग तो सांसारिक पदार्थ ही चाह रहे हैं। मैं तो कह रहा हूँ कि लोग वंशवाद के लिए, धन के लिए काम कर रहे हैं। उन्हें पहचानो । ब्रह्मनन्द ने बड़ी प्यारी बात कही- कोई हमसे पूछे यूँ आकर, दुनिया में तुमने क्या देखा ।
हम बतला देंगे यूँ उसको, सब मतलब का मेला देखा॥
हम मतलब के तुम मतलब के, ये मतलब के वो मतलब के।
गुलिस्तान में फूल खिला था, हमने देखा मतलब का ।
योगी देखे जंगम देखे, पीले कपड़े वाले देखे।
पर गले में उनके हार पड़ा था, हमने देखा मतलब का...॥
G
कुछ कहते हैं कि नाम लेंगे तो पहले जिसकी भक्ति करते थे, वो तंग तो नहीं करेगा ? एक ने कहा कि नाम लूँगा तो पहले वाला गुरु तंग तो नहीं करेगा। मैंने कहा कि नहीं करेगा। जंगल में बकरी गुम हो गयी। उसके बड़े शिकारी हैं। वो सीधा शेर के पास पहुँची, कहा कि तुम्हारी शरण में हूँ । शेर ने कहा कि ठीक है, चिंता मत करना, तेरा कोई बाल भी बाँका नहीं कर सकता है। शेर ने भालू आदि मंत्रियों को बुलाया और कहा कि जंगल में ऐलान कर दो कि यह बकरी हमारी है, इसे कोई हाथ न लगाए । अब बकरी मज़े से जंगल में चरने लगी। वो मस्त घूमती थी। तो एक परम-पुरुष की भक्ति करने से बाकी कोई कुछ नहीं कर सकता
है। कभी किसी ने नहीं कहा कि महाराज, पहले हनुमान जी की भक्ति करते थे, अब वो गदा लेकर हमें मार रहा है। इसलिए यक़ीन करना पहले। हम कोई शास्त्रों के ख़िलाफ़ नहीं हैं । हम कह रहे हैं-
देवी देवल जगत में, कोटिक पूजे कोय।
सतगुरु की पूजा किये, सबकी पूजा होय ॥
एक सद्गुरु की उपासना से सबकी भक्ति हो जाती है। कुछ कहते हैं कि आदमी को मान रहे हैं, देवी-देवते छोड़ दिये। पहले देखते हैं कि शास्त्र किसका ध्यान कह रहे हैं । हमने किसी की निंदा नहीं की। हमने इतना कहा है कि ये निरंजन का संदेश दे रहे हैं । आखिर किसकी पूजा के लिए कहा । वेद भी कह रहा है—
ध्यान मूलम् गुरु रूपम्, पूजा मूलम् गुरु पादकम् ।
मंत्र मूलम् गुरु वाक्यम्, मोक्ष मूलम् गुरु कृपा॥
एक ने कहा कि जो नाम आप दे रहे हैं, आपने कहा है कि वाणी का विषय नहीं है, बोल नहीं सकते हैं। पर वो तो हम बोल भी सकते हैं । मैंने कहा कि तुम ठीक से समझे नहीं । अब तार है, उसपर बिजली चलती है। बस, ऐसे ही है। वो तार है । पर तार पर विदेह नाम आपके अन्दर दिया है। G कुछ कहते हैं कि स्त्री का गुरु उसका बंदा होता है । उसे गुरु करने की क्या ज़रूरत है ? एक माई आई; कहा कि बंदा नहीं आने देता है । मैंने पूछा कि क्या कहता है ? कहा कि पहले हत्या का नुक्स था। अब आपके पास आकर ठीक हूँ। वो खाता-पीता भी है। जब आती हूँ तो कहता है कि जनानी का कोई गुरु नहीं होता है, जनानी का गुरु होता है - उसका बंदा । मैंने कहा कि उसे लाना। कहा— आता नहीं है। मैं फिर उसे कहता कि भजन करना । वो कहती थी कि भजन नहीं करने देता। मैंने कहा कि वो कोई तेरी साँस में थोड़ा बैठा है कि भजन नहीं करने देता है । है।
तो एक बार कहीं राँजड़ी में शादी थी। उनकी रिश्तेदारी थी तो वो आ गये। माई ने कहा कि दो मिनट चलो। वो बोला कि नहीं, वो जादू - जड़ी वाला है, फँसा लेता है । माई ने कहा कि नाम नहीं लेना, चलो तो सही । कहा- अच्छा बाद में चलूँगा। इतने में माई आई, कहा कि बंदा आया है, थोड़ी देर में लाती हूँ। वो आया तो मैंने बात उठाई कि गुरु ज़रूरी है। क्योंकि माई ने पहले इशारा दे दिया था कि वो आ रहा है। मैंने कहा कि शास्त्र कह रहे हैं कि गुरु कि बिना गति नहीं है । वो बोले कि गुरु होता नहीं है जनानी (स्त्री) का। मैंने कहा कि बात सुन, किस ग्रंथ में यह बात लिखी है ? कहा कि उसका बंदा ही होता है। वो तो बस अपनी ही रट पकड़े हुए था । मैं जान गया कि आज निपट शठ और जिद्दी से पाला पड़ा है। मैंने कहा- एक बात बताओ, शिवजी का नाम सुना है? कहा—हाँ । मैंने कहा कि उनकी जनानी का नाम जानते हो ? कहा— पार्वती। मैंने कहा कि पार्वती का गुरु कौन है ? कहा- नहीं । मैंने बताया कि नारद जी हैं। शिवजी जैसी की जनानी को नारद जैसा गुरु करना पड़ा था तो आम आदमी क्या सोच रहा है ! फिर मैंने कहा कि राम जी का नाम सुना है ? कहा—हाँ । मैंने कहा कि उनकी जनानी का नाम जानते हो ? कहा- सीता जी । मैंने कहा कि सीता जी का गुरु कौन था, पता है ? कहा- नहीं। मैंने कहा कि सीता जी के गुरु थे- वशिष्ठ मुनि । राम जी ने नहीं कहा कि मैं ही हूँ तुम्हारा गुरु। वो आखिर में कह रहा है क जनानी का गुरु होता नहीं है । मैंने कहा कि तेरी बात तो वैसी ही है जैसे दिल्ली में एक बेकार बंदा था। उसकी स्त्री ने गाय रखी थी । दूध बेचकर अपने बच्चों को पालती थी। एक दिन बंदे ने ऐलान किया कि जो मुझे गीता का 18 अध्याय समझा देगा, उसे मैं यह गाय दान में दे दूँगा । माई ने कहा कि यह क्या जुल्म कर रहे हो; हम रोटी कहाँ से खायेंगे ? वो बोला कि मुझे कोई गीता का 18 अध्याय समझा नहीं सकता है, तू चिंता मत कर। वो बोली कि काशी जी के बड़े-बड़े विद्वान हैं; तुम ऐसा मत कहो; हमारे पास एक ही गाय हैं। वो बोला- अरे पगली ! परेशान क्यों हो रही है ! जब भी कोई समझायेगा तो मैं एक ही बात कहूँगा कि समझा ही नहीं। तो मैंने उस बंदे से कहा कि तेरी बात भी वैसी ही है। शास्त्र तो कह रहे हैं—
ध्यान मूलम् गुरू रूपम् ॥
इसलिए जो ऐसी बात कह रहे हैं, वो शास्त्रों का ज्ञान नहीं रखते हैं। कल्पांतर तक साधना करते रहने पर भी गुरु के बिना परमात्मा को नहीं पाया जा सकता है। रामायण में तो गुरु के लिए बोला । कितना बढ़कर बोल दिया ।
गुरु बिन भव निधि तरई न कोई । हरि विरंचि शंकर सम होई ॥
शिवजी ने वृहस्पति को गुरु किया । ब्रह्मा जी ने अग्नि को गुरु किया।
राम कृष्ण से कौ बड़ा, तिन भी तो गुरु कीन ।
तीन लोक के नायका, गुरु आगे आधीन ॥
शास्त्रों को पढ़ने के बाद पता चलता है कि गुरु की ज़रूरत है । पर पाखण्डी गुरुवाद की तरफ नहीं जाने देता है।
गुरु को तजे भजे जो आना । ता मानुष को फोटक ज्ञाना ॥
जा गुरु ते भ्रम न मिटे, भ्रांति न जिव की जाय ।
सो गुरु झूठा जानिये, त्यागत देर लाय ।।