करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
3. सतगुरु क्या करेगा
सतगुरु क्या करेगा
जब आपने नाम-दान प्राप्त किया तो क्या होगा ? गुरु क्या काम करेगा ? वर्तमान में आपकी आत्मा मन-माया के जाल में पड़कर अपने स्वरूप भूल हुई है। नाम-दान के समय एक काम सद्गुरु यह करता है कि मन और आत्मा को अलग कर देता है। वैसे आत्मा पूरे शरीर में समाई हुई है। वो उसे उठाकर आज्ञाचक्र पर एकाग्र कर देता है । इसके बाद मन चाहकर भी इसे अपने में समा नहीं सकता है। अब धीरे-धीरे शिष्य आत्मा को समझने लगता है। सद्गुरु ने यह काम किया। उसने आत्मा को कोई ताक़त नहीं दी। आत्मा किसी ताक़त की ज़रूरत नहीं है । वो परम - पुरुष की अंश होने से बड़ी ताक़तवर है। उसे किसी अतिरिक्त ताक़त की ज़रूरत नहीं है । गुरु केवल उसके ऊपर से मन-माया के आवरण को हटा देता है, जिससे उसे अपने स्वरूप को समझने का अवसर मिल जाता है । साहिब ने बड़े सुंदर अलंकार से इस तथ्य की पुष्टि की है—
बिना सतगुरु नर फिरत भुलाना ।
खोजत फिरत न मिलत ठिकाना ॥
बड़े अच्छे अलंकार से साहिब ने आत्मतत्व विस्मृत कैसे हो गया, यह बताया है । अपनी ताक़त यह कैसे खो दिया है, यह बता रहे हैं । कह रहे हैं कि बिना सच्चे सद्गुरु के यह भूला हुआ है ।
के हर सुत इक आन गड़रिया ।
पाल पोस के कियो सयाना ॥
'केहर' शेर को कहते हैं । 'सुत' बच्चे को कहते हैं । एक बार एक शेर का बच्चा बक्करवाल की बकरियों में आ गया। वो अपनी माँ से बिछड़ गया । बक्करवाल उसे उठाकर ले गया ।
पाल पोस के कियो सयाना ॥
माँ से बिछड़ा हुआ था। माँ नहीं मिली। अब वो भेड़-बकरियों के साथ रहने लगा।
करत कलोल फिरत अंजियन संग |
आपन मरन उनहूँ न जाना॥
'अजा' बकरी को कहते हैं । 'कलौल' यानी खेलकूद। वो गड़रिये की बकरियों के साथ खेलता था। अपना भेद उसे मालूम नहीं था कि शेर हूँ । बड़ा हो गया। घास भी खाने लगा। घास क्यों खाने लगा ? आपके बच्चे भी कभी मिट्टी खाते हैं। बच्चों की जीभ इंद्री तेज़ होती है। मिट्टी में एक तत्व है। खाने की चीज़ नहीं थी । विषैले पदार्थ भी हैं। पर आदत पड़ गयी । मिट्टी खाना गंदी आदत है। आत्मा को इंद्रियों के साथ रहने की बड़ी गंदी आदत पड़ गयी है । मेरा भतीजा मिट्टी खाता था । उसकी माँ कहती थी कि यह मिट्टी खाता है । मैंने कहा कि घर में मिट्टी न रखा करो। बाद में वो कहने लगी कि यह बाहर जाकर मिट्टी खाता है। मैंने कहा कि बाहर न जाने दो। फिर एक दिन कहने लगी कि जूते के तलवे से मिट्टी निकालकर खाता है । देखा न, कितनी गंदी आदत थी ! मैंने कहा कि जूते ऊँची जगह पर रखा करो। फिर एक दिन कहने लगी कि अब दीवारों को चाटता है । अब दीवारें थोड़ा तोड़नी थीं । वाह ! ऐसा ही है मन।
तीन लोक में मनहिं विराजी । ताहिं न चीह्नत पंडित काजी ॥
तो उसे बाद में समझाया, भय दिया कि नहीं खाओ । मिट्टी खाने की चीज़ नहीं है । इस तरह शेर के लिए घास खाने की चीज़ नहीं है। एक भैंस का कट्टा है। भैंस को चारा देने जाऊँ तो वो मेरे पैर की टो पकड़कर नौचता है। उसने दोनों टो खा ली हैं। भूखा होता है तो कुछ खाना चाहता है। वो खाने की चीज़ नहीं है; पर भूखा था । संभवतः, शेर का बच्चा भी घास खाना इसलिए सीख गया होगा, क्योंकि उसे कुछ और न मिला होगा। उसने देखा होगा कि बाकी भी यही खा रहे हैं। वो भी खाने लग गया। वो लड़ाई भी भेड़ की तरह ही करने लग गया। बोलने भी भेड़ की तरह ही लगा । गरजने की जगह मिनमिनाने लगा। कुत्ता भौंकता है, हाथी चिंगाड़ता है, शेर गरजता है, बकरी मिनमिनाती है । वो मिनमिनाने लगा। शेर को मिनमिनाना नहीं है । पर वो भेड़ों को मिनमिनाते देखता था। पूरे काम बकरियों वाले करने लगा । चलना भी बकरियों की तरह
हो गया। वो बकरियों के साथ रह-रहकर बकरी बन गया। शेर कैसे बकरी बन सकता है ? बकरियों की संगत में रहने से सुभाव से बकरी बन गया ।
मृगपति और जंगल से आयो ।
ताहि देख वो बहु डराना॥
अब जो बक्करवाल था, वो जब भी बकरियों को डंडा मारता था तो शेर को भी मारता था। जैसे सभी उसके काबू में थे, वो भी था। जब कहीं खो जाता तो बक्करवाल उसे पकड़ लाता था । क्या आदमी शेर को पकड़ सकता है? नहीं, बकरियों के संग में उसका यह हाल हो गया। वो पूरी-पूरी बकरी बन गया। अपने को नहीं जानता था । तो—
मृगपति और जंगल से आयो, पाल पोस कर कियो सयाना ॥
'मृगपति' शेर को कहते हैं । मृगा 27 फीट छलाँग लगाता है। शेर 28 फीट मारता है। शेर का स्वभाव है कि अपना शिकार एक्टिव करके मारता है । जैसे आप भोजन लचीला करके खाते हैं। शेर पहले दौड़ाता है । आप फुलका ठीक से बनाकर खा रहे हैं। शेर भी ऐसे ही करता है । वो पीछे से वार नहीं करता है। पहले भयभीत करता है। भागने का मौका देता है। दौड़ा-दौड़ाकर फिर मारता है। यह उसका स्वभाव है । उसे मृगा से चुनौती मिलती है। वो शेर को चैलिंज देता है। मृगा को शेर बड़े शौक से मारकर खाता है। पर जो शेर इंसान का माँस एक बार खा ले, वो फिर नरभक्षी हो जाता है, फिर दूसरे जानवर का शिकार करना उसे अच्छा नहीं लगता है। वो इंसान को ही खाता है। क्योंकि इंसान की चमड़ी ही माँस है । भालू को खायेगा तो पहले बाल हैं; वो नौचता है । जिस शेर के मुँह पर इंसान का खून एक बार लग जाए तो वो दूसरे जानवर का शिकार नहीं करता है। तो दूसरे जंगल का मृगपति आया । उसे देखकर वो बकरी बना हुआ शेर का बच्चा डर गया ।
ताहि देख वो बहु डराना ॥
शेर ने देखा कि यह शेर का बच्चा है और घास खा रहा है, बकरियों के साथ में है और डंडे भी पड़ रहे हैं । यह तो बकरी बना हुआ है। यह तो शेर के धर्म के ख़िलाफ़ है। वो उसके पास पहुँचा । उसे देख बच्चा डर गया। एक बार लंगूरों के टोले में इंसान भी था । वो क्या कर रहा था ? जैसे
लंगूर छलाँग मार रहे थे, वो भी मार रहा था । इतना तेज़ कोई आदमी पेड़ों में नहीं जा सकता है। वो लंगूरों के साथ लंगूर हो गया था। जहाँ लँगूर जाएँ, वो भी चला जाता था । अव सवाल उठा कि वो कैसे लंगूर बन गया ? था वो आदमी। 2-3 चीजें हैं। पहली बात है कि 90 प्रतिशत मेलजोल है। आदमी की 90 प्रतिशत आदतें मिलती हैं। पर टेक्निकॅल् कारण कुछ और है। वो क्यों छलाँगें मार रहा था? क्योंकि फल खाने और दूध पीने से उसका शरीर लचीला हुआ। छोटेपन ही लंगूरन उठाकर ले गयी होगी और उसे ममता दे दी होगी, अपना दूध पिला दिया होगा । मैंने अखबार में पढ़ा कि एक कुत्तिया कूड़े के ढेर पर पड़े हुए छोटे- से बच्चे को रोज़ दूध पिलाने जाती थी । किसी ने बच्चे को कूड़े के ढेर पर फेंक दिया था। कुतिया ने सोचा होगा कि कचरे में पड़ा है। वो रोज़ दूध पिलाने जाती थी। उसका टॉइटल भी था - कुतिया की ममता । संभवता लंगूरनी ले गयी होगी और प्यार दे दिया होगा। बच्चे ने भी उसे ही अपनी माँ समझ लिया होगा । जैसे कोई बच्चा अपनाते हैं तो वो तो उन्हें ही अपने माता-पिता समझता है न! ऐसा ही हुआ होगा। अब धीरे-धीरे उसे सब सिखा दिया होगा । पर उसके शरीर का ढाँचा आदमी की तरह था । दूध पीने और फल खाने से आदमी तेज़ होगा । पर यह नहीं कह रहा हूँ कि अनाज नहीं खाना। क्योंकि लोग मेरी बात को उलट-पुलट कर देते हैं। एक दिन मुझे किसी ने कहा कि गाय माता है तो भैंस क्या है? लोग सवाल पूछते हैं। भैंस की दो चीज़ें उसे थोड़ा किनारा कर रही हैं। भैंस पहले अपना शरीर बनाती है, पर गाय जितना खिलाओ, वापिस कर देती है । पर ईमानदारी से देखें तो-
जिसका पीजिए दूध, तिसको कहिये माय ॥
इसलिए सभी की रक्षा करनी है । तो वो बच्चा लंगूर हो गया। वो इंसान से किनारा करता गया । लंगूर बन गया। छलाँगें इसलिए मार रहा था कि दूध वही पिया, जीनस् आ गये। लंगूरों के टोले में भाषा भी सीख गया। बच्चों की याददाश्त भी बड़ी तेज़ होती है।
एक बार गुरुदेव के पास कुछ लोग आए, कहा कि यह कैसा कलयुग आ गया है, इंसान का बच्चा लंगूर बन गया है। तो गुरुदेव ने यह बात बताई थी । वो लंगूरों की तरह ही काट भी रहा था, लंगूरों की तरह आदमी से चिढ़ रहा था, सब काम कर रहा था, उलटे लटक रहा था। संभवतः वो शेर का बच्चा भी वैसे ही हो गया। एक गाय ने बच्चा दिया तो दूसरे दिन मर गयी । अब दूसरी गाय उसे दूध पिलाने लगी। वो समझ रही थी कि इसकी माँ मर गयी है। कभी-कभी वो दूध पिला देती थी। फिर उसे निप्पल से दूध पिलाने लगे। पहले विरोध हुआ । पर बाद में वो समझ गया कि उसकी जीविका का कोई और साधन नहीं है। संभवत: इसी तरह हमारी आत्मा मन और इंद्रियों के संग में बिगड़ी है। तो जंगल के शेर ने देख लिया कि घास खा रहा है । फिर आश्चर्य हुआ। वो वहाँ गया तो उसे देख बच्चा डरने लगा। शेर ने कहा कि डरो नहीं। उसने कहा कि तुम मुझे खा जाओगे। शेर ने कहा कि तू भी शेर है । उसने कहा कि मैं तो बकरी हूँ। वो डरने लगा।
पकड़ भेद ताहि समझाना ॥
वो बच्चे को चश्मे के पास ले गया और उसे दिखाया कि देख, मैं और तू एक जैसे ही हैं। उसने कहा कि क्या सच में मैं शेर हूँ ? शेर ने कहा कि तू शेर है। उसने उसे सब कुछ सिखा दिया। पंजा चलाना भी सिखा दिया । दहाड़ना भी सिखा दिया। उसकी वो ताक़त तो थी ही । इस तरह आत्मा की ताक़त कम नहीं हुई है, केवल मन के संग में कुंद हो गयी है ।
सबकी गठरी लाल है, कोई नहीं कंगाल ॥
...तो मृगपति और जंगल से आयो......
तो जब जंगल का शेर आया तो सब सिखा दिया ।
पकड़े भेद ताहि समझाना ॥
पानी के चश्मे में दिखाया कि तू क्या है। कहा कि तू अपनी माँ से बिछड़ गया था । उसे सब कुछ सिखाया, कहा कि अब जा ! सभी सिखाते हैं। चिड़िया उड़ना सिखाती है । कुत्तिया भी अपने बच्चे को सिखाती है । तो जब वो बकरियों के बीच में गया तो जैसे गडरिया पहले सबकी तरह उसे भी डंडा
मारता था, अब भी मारने लगा तो वो दहाड़ा। सारी भेड़ें भाग गयीं; गडरिया भी भाग गया। रूपांतर यह है कि परमात्म रूपी शेर का बच्चा इंद्रिय रूपी भेड़ों के साथ विषय रूपी घास खा रहा है । मन रूपी गडरिया उसे डंडे मार रहा है। जंगल के शेर रूपी संतजन मिलते हैं तो आज्ञाचक्र रूपी चश्मे के पास ले जाते हैं, कहते हैं कि देख, तू आत्मा है। उसकी ताक़त कहीं कम नहीं हुई थी। पर कहाँ थी ताक़त ? ताक़त भेड़ों जैसी बन गयी क्या ? नहीं, भेड़ों के साथ रहकर भी शेर जैसी ही ताक़त थी। ताक़त नहीं बदली। वही थी। स्वभाव बदल गया । भेड़ों की संगत में रह- रहकर भेड़ों की तरह ही हो गया । शेर मिला तो उसे उसका स्वरूप दिखा दिया । इस तरह संतजन मिलते हैं तो आत्मा को जगा देते हैं । इंद्रिय रूपी भेड़ें भी डरने लगती हैं। मन कहीं भटकाता है तो आत्मा कहती है कि यह नहीं करना है । मन की ताक़त नहीं रह जाती है । इस तरह आपको बदल दिया । यह बदलाव कैसे आया? आत्मदेव अपनी ताक़त समझ चुका कि मेरी इच्छा के बिना कुछ नहीं हो सकता है। इसलिए आप स्थिर हो गये और इच्छाएँ ख़त्म हो गयीं । आप अनूठे हो गये । आप निराले हो गये। अब आत्मदेव भ्रमित नहीं हो रहा है । जगत के पदार्थों का आकर्षण ख़त्म हो गया। कैसे ख़त्म हो गया ? जैसे भ्रमवश रस्सी को साँप मानने के भ्रम से भयभीत थे। अगले पल यथार्थ ज्ञान हो गया तो भ्रम ख़त्म हो गया। फिर चाहें कि डरें तो भी उस रस्सी से भय नहीं लगता है । इस तरह चाहने पर भी अब दुनिया के कामों में मज़ा नहीं मिलने वाला है।
सतगुरु मोर शूरमा, कसकर मारा बाण ।
नाम अकेला रह गया, पाया पद निर्वाण ॥
सद्गुरु ने बड़ा ही अनूठा काम किया।
पकड़े भेद ताहि समझायो ॥
इस तरह मन का बड़ा ज़ोर है । आत्मा को भ्रमित करता है । गुरु आत्मरूप दिखाकर इस मन से पार कर देता है ।
कोटि जन्म का पंथ था, गुरु पल में दिया पहुँचाय ॥
यह काम गुरु नाम-दान के समय एक पल में कर देता है । साहिब ने
एक भी बात झूठी नहीं बोली है, एक भी बात बेकार नहीं कही है। वो कह रहे है गुरु समाना शिष्य में, शिष्य लिया कर नेह । लगा बिलगे नहीं,
एक रूप दो देह ॥
क्या यथार्थ में गुरु शिष्य में समा जाता है। जब मैं था तो गुरु नहीं, अब गुरु हैं मैं नाहिं ।
प्रेम गली अति साँकरी, जामें दो ना समाहिं ॥
एक बात ज़ाहिर हो रही है, एक बात का अनुभव मिल रहा है, इन शब्दों से एक बात साफ़ हुई कि यर्थाथ में गुरु शिष्य में समा सकता है। वाणी में साहिब पुकार कर कह रहे हैं - अब गुरु हैं मैं नाहिं.... । एक बात पता चल रही है, दो तथ्यों से सामने आ रही है। इसका मतलब है, कुछ बात है कि गुरु शिष्य में समा सकता है। और 'बिलगाए बिलगे नहीं।' यानी एक दूसरे के तद्रूप भी हो सकते हैं। इसका मतलब है कि तथ्यों से पता चल रहा है कि संभव है । फिर साहिब कह रहे हैं—
पारस में अरु संत में, तू बड़ो अन्तरो जान ।
वह लोहा कंचन करे, वह करले आप समान ॥
ये दोहे यथार्थ में एक बिंदू की तरफ ले चल रहे हैं । कुछ ऐसा आध्यात्मिक जेनिसिस्म है । कुछ ऐसा आध्यात्मिक खेल है कि जीव उस महान स्थिति तक पहुँच सकता है। यह काम पल भर में हो जाता है। एक बड़ी असमंजस आई। यह तो ठीक है - गुरु करले आप समान । एक डॉ० किसी को भी डॉ० बना सकता है । एक इंजीनियर किसी को भी इंजीनियर बना सकता है । पर एक इंजीनियर अपने अंदर का इंजीनियर निकालने में बड़ा समय लगा देता है। वो अपने अंदर का इंजीनियर निकालने में 4-5 साल लगा देता है। एक डॉ० अपने अंदर का डॉ० निकालने में बड़ा समय लगा देता है। पर यह काम गुरु पल भर में कर देता है। गुरु अपना ज्ञान, अपने गुण, अपनी आदतें, अपनी शक्तियाँ सभी चीजें पल-भर में स्थानांतरित कर देता है। यह बड़ा कौतुकमय विषय है । इशारा मिल रहा है।
गुरु को कीजे दण्डवत, कोटि कोटि प्रणाम ।
कीट न जाने भृंग को, गुरु करले आप समान ॥
कभी-कभी आप सब एक दूसरे को समझाते हैं, अपना रंग चढ़ाने की कोशिश करते हैं, पर पूरा रंग नहीं चढ़ा पाते हैं। बच्चों को समझाते हैं कि अच्छे काम करो, झूठ नहीं बोलो, पर उसपर इस समझ की पूरी रंगत नहीं चढ़ पाती है, लेकिन साहिब कह रहे हैं गुरु अपने समान बना लेता है। ऐसा क्या फार्मूला है पूर्ण गुरु के पास कि अपनी तरह कर देता है। यह बहुत बड़ी बात हुई । वो अपनी तरह कर देता है। अभी तक विज्ञान इसको समझ नहीं पा रहा है। यह क्या चीज़ है ? किस तरह बदल देता है ? इसमें सत्य कितना है, इसमें वास्तिविकता कितनी है, वज़न कितना है ? इसके प्रमाण मिल रहे हैं कि यह चीज़ हो सकती है। आदमी परमात्मा के दर्शन क्यों करना चाहता है ? क्योंकि उसमें गुण है कि जो भी उसे देखता है, उसकी तरह हो जाता है । अब ध्यान क्यों कर रहे हैं? बड़ी खास चीज़ है यह। जाने-अनजाने यह मानव जानता है कि ध्यान से परमात्मा मिल जाते हैं। यानी ध्यान में परमात्मा तक पहुँचने की, उनसे बात करने की ताक़त है। दिव्य शक्तियाँ हैं ध्यान में कहीं। कभी-कभी महात्मा को कहते हैं कि ध्यान करके देखो कि हमारा काम सफल होगा या नहीं। इसका मतलब है कि गुरु जो शक्तियाँ स्थानांतरित करता है, ध्यान से करता है। माता-पिता नहीं कर पाते हैं यह काम | वो केवल ढाँचा ही बदल पाते हैं, पर व्यक्तित्व को नहीं । हमें अपनी तरह नहीं बना पाते हैं । साहिब एक जगह और कह हैं-
पारस में अरु संत में, तू बड़ो अंतरो जान ।
वह लोहा कंचन करे, गुरु करले आप समान ॥
उदाहरण देता हूँ । जबसे आप मेरे संपर्क में आए, पहले वाला व्यक्तित्व ख़त्म कर दिया। मैंने पहले वाले को मार दिया और उसे मधुमय बना दिया। अब आपकी विचारधारा, आपका स्वभाव सब मिलेगा मुझसे। माँ - बाप से नहीं मिलता है। आप कहते भी हैं कि बेटा अच्छा नहीं है, पता नहीं किस पर गया है, पर गुरु यह कला करता है। इस बात में वज़न है । भृंगा को भण्डारिन भी कहते हैं । वो बड़ा अजीब जीव है। सभी स्त्री-पुरुष हैं, पर वो केवल पुरुष
है, उसकी मादा नहीं है । फिर वो बड़े प्यारे तरीके से अपनी पीढ़ी चलाता है। वो कीड़े को पकड़ अपनी आवाज़ सुनाता है और अपनी तरह कर लेता है। साहिब कह रहे हैं कि इस तरह गुरु भी अपनी तरह कर लेता है । प्रमाण मिल रहे हैं। जब भी आप अपने व्यक्तित्व को देख रहे हैं तो बहुत बड़ा बदलाव मिल रहा है। कभी अपने में बदलाव देख अचरज होता होगा आपको । एक दिन अवतार सिंह ने कहा कि मुझे लगता था कि मुझसे बुरा कोई नहीं है दुनिया में, सभी गलत काम कर लेता था मैं, पर अब लगता है कि मुझसे अच्छा कोई नहीं है। मैं बदल गया हूँ । कहा- अगर मैं कई जन्म तपस्या भी करता तो भी शायद इतना नहीं बदल सकता था । साहिब सच ही तो कह रहे हैं- सतगुरु मोर रंगरेज, चुनरि मोरि रंग डारी....... आपको बदल दिया। फिर वाणी में आ रहा है-
जब मैं था तो गुरु नहीं, अब गुरु हैं मैं नाहिं ।
प्रेम गलि अति साँकरी, तामें दो ना समाहिं ॥
आख़िर क्या करते हैं गुरुदेव ? आप हम सब वैज्ञानिक युग में जी रहे हैं। क्लोन्स बन रहे हैं। बकरी के क्लोन्स, इंसान के क्लोन्स, पर वो हमारे बाहरी रूप को बदल रहे हैं, स्वभाव को नहीं बदल पा रहे हैं । यह वैज्ञानिकों की पकड़ से बाहर है। फिर क्या है संत के पास, जो वो बदलने में सक्षम है। पारस सुरति संत के पास ........ उनकी सुरति में एक ताक़त है । जैसे सीपी में स्वाति की बूँद को मोती में बदलने की ताक़त है। उसके पेट में यह सिस्टम है। पर पानी की बूँद को मोती बनाना वैज्ञानिकों के बस की बात नहीं है। किसी ने आज तक यह काम नहीं किया है। यह काम एक वैज्ञानिक नहीं कर सकता है । उसके बस की बात नहीं है। मृगा की नाभि में सिस्टम है कि वो कस्तूरी का सृजन करता है । कस्तूरी मृगा का वीर्य है। वो कस्तूरी में बदल जाता है। पर अभी तक कोई केमिकल्स से कस्तूरी नहीं बना पाया है। इस तरह एक महापुरुष की सुरति के अंदर ताक़त है कि आपको बदल सकता है । क्या है ध्यान ? यह ध्यान ही आत्मा है। जब वहाँ पहुँचती है तो बाकी सब कुछ छूट जाता है, कुछ बचता है तो ध्यान, सुरति बचती है। वो परमात्मा के सम्मुख पहुँचती है, भौतिक शरीर छूट जाता है। वो उसका विषय नहीं है, उसमें वहाँ पहुँचने की ताक़त नहीं है।
जैसे नासिका में सूँघने की ताक़त है, पर यह काम कानों से नहीं हो सकता है। ऐसे ही वो परमात्मा केवल आत्मा से जाना जा सकता है। इसका मतलब है कि आत्मा में ताक़त है। तो वो परम चेतन हो जाती है । यही चीज़ महापुरुषों के सान्निध्य में मिलती है । उनकी हाज़िरी में बड़ा अंतर है, बड़ी अनुभूतियाँ होती हैं। उनकी सुरति से हो जाता है । कभी आप कहते हैं कि गुरु जी, हमपर | ध्यान रखना, सुरति देना, कृपा करना । ऐसा क्यों कहा गया ? जैसे बरसात में छाता रख देते हैं तो धूप नहीं लगती है । इस तरह उनकी छत्रछाया में कुछ अजीब मिलेगा, ठंडक मिलेगी । यह तय है कि मिलेगा। इस तरह उनका ध्यान सक्षम है। तभी तो साहिब कह रहे हैं— सुरति में रच्यो ससारा, सुरति का है खेल सारा । आपके व्यक्तित्व में सबसे अलग सुरति ही है। सुरति संभाले काज है, तू मत भरम भुलाय। अगर दुनिया में आपका कुछ भटक रहा है तो वो है—ध्यान, अगर उत्थान - पतन हो रहा है हैन । वो हमारी सुरति को भ्रमित कर रहा है। गुरुजनों से पास जाकर कहते हैं कि हृदय में प्रकाश कर दो। क्या किया जा सकता है? हाँ ! कौन-सा प्रकाश ? क्या बल्ब जगाना है कोई ? यह हृदय प्रकाश से क्या मतलब है? कैसा प्रकाश चाहते हैं हम ? 'शून्य महल में घोर अँधेरा, करो नाम उजियारा ।' भाइयो, यह प्रकाश यानी सुरति से गुरु आपकी आत्मा को चेतन करता है । तब हृदय के विकार दिखते हैं। कमरे में अँधकार है तो कुछ नहीं देख पाते हैं। रोशनी होती है तो सब चीज़ दिखने लग जाती है। जब गुरुजन हृदय में प्रकाश करते हैं तो मन के सब खेल नज़र आने लग जाते हैं, काम, क्रोध आदि दिखने लग जाते हैं । कोई बल्ब, कोई दिया नहीं जलाना है। क्या प्रकाश होता है ? बिलकुल । साहिब वाणी में कह रहे हैं—
नाम बिन हृदय शुद्ध न होई । कोटिन भांति करे जो कोई ॥
तो नाम दान की क्रिया हृदय को प्रकाशित करती है । अब आप बहुत बदल गये। पहले मन जहाँ चाहता था, वहाँ बरबस खींच ले जाता था, पर अब उसका ज़ोर नहीं चल रहा है, लगता है कि हृदय प्रकाशित हो गया । स्वभाव बदल गया। अब आप चाहकर भी पाप नहीं कर पा रहे हैं। जब आप अपनी पहली ज़िदगी से अपने को तौलते हैं तो पाते हैं कि बहुत बदलाव आ गया। हर
नामी यह बदलाव अनुभव कर सकता है। जो मैं कह रहा हूँ कि जो वस्तु मेरे पास है ब्रह्मांड में कही नहीं है । इस वस्तु के साथ तीन चीजें आ जाती हैं । पहला तो मन और आत्मा अलग हो जाते हैं । दूसरा संसार का आकर्षण समाप्त हो जाता है । हृदय में रोशनी हो गयी, प्रकाशित कर दिया। सुकरात ने कहा कि अँधा वो नहीं है जिसकी आँखें फूटी हैं; अँधा वो है जिसे अंदर के दोष नहीं दिखते। अक़्ल दे दी। जिसका नाम ग़लत है, जब वो करने जायेंगे तो दिमाग़ समझायेगा कि यह ग़लत है । बड़ा तगड़ा दिमाग़ कर दिया। देखो, ब्रह्माण्ड में विस्फोट हो रहे हैं । सूर्य से भी बड़ा ग्रह हैं, जहाँ इस समय मई 2007 से आतिशबाजी हो रही है। वो खरबों मील दूर है, उसके टुकड़े यहाँ नहीं आयेंगे। बड़े-बड़े धूमकेतु यहाँ पहुँचे हैं, बड़े-2 खड्डे किये हैं । 150 कि. मी. खड्डा किया था, पूरी धरती को हिलाकर रख दिया था। आज भी चल रहे हैं। वैज्ञानिक यहाँ से बड़ी-बड़ी दूरबीनों से देख रहे हैं । आम आदमी नहीं देख पा रहा है। आपके शरीर में बड़ी लूट हो रही है । चश्म दिल से देख तू, क्या क्या तमाशे हो रहे ।..... आप नहीं देख पा रहे हैं वो ब्लास्टिंग । नासा केंद्र से वैज्ञानिक देख रहे हैं । आप आकाश की तरफ देखें, पर नहीं दिखाई देगा। ऐसे ही आपको वो चश्मा दिया है कि अंदर के शत्रु दिख रहे हैं, विकारों को आप देख पा रहे हैं। यह मामूली काम नहीं है। आम आदमी नहीं देख पा रहा है। फिर तीसरा एक पूर्ण सुरक्षा मिल जाती है। आपमें ईश्वरीय सत्ता पैदा की। बच्चे को चिंता नहीं है कि खाना कब है, सोना कहाँ है । जानता है कि माँ की चिंता है। वो निश्चिंत है। उसने आजमाया है, वो दिल से मानता है कि माँ सरंक्षक है। ऐसे ही आप जानते हैं कि गुरु सरंक्षक है । आप अपने को संसार के लोगों में अलग पाते होंगे । उनका मन पर कोई नियंत्रण नहीं है। पर आपका मन पर होल्ड हो गया है। एक महात्मा के अंदर यह होता है कि बदल देगा। दुनिया खालमखाली है, हम बदल देंगे आपको । नाम देते समय आख़िर संत - सतगुरु क्या करते हैं, संक्षेप में इस बात को इस तरह समझें।
पहले सेवक की सुरति को मसलते हैं। जिन सात स्थानों पर मन ने सुरति को अपने में उलझा रखा था वहाँ से छुड़ा लेते हैं । इस तरह आत्मा को मन से अलग कर देते हैं और अपनी सुरति के साथ मिला लेते हैं । 2. सुरति को चेतन कर देते हैं, जिससे हृदय प्रकाशित हो जाता है। इस तरह मन के सारे विकार समझ आने लगते हैं । 3. नाम के समय उस सुपर पॉवर को ही साथ कर देते हैं, जो शिष्य की सोते और जागते हुए पक्के तौर पर सुरक्षा करती है । मन को संसार में कोई भी जीत नहीं सकता । " मनहिं निरंजन सबै नचावै। नाम होय तो माथ नमावै ॥" नाम क्या चीज़ है ? सतगुरु की सुरति में सिस्टम हैं। नामदान के समय- (1) मन और आत्मा अलग करना (2) हृदय प्रकाशित करना (3) सुरक्षा (कम्पलीट सिक्योरिटी) ।
पारस में अरु संत में, तू बड़ो अंतरो जान।
वह लोहा कंचन करे, गुरु करले आप समान ॥
सतगुरु मोर शूरमा, कसकर मारा बाण। नाम अकेला
रह गया, पाया पद निर्वाण ॥
इस तरह सद्गुरु नाम देकर मन-माया के सारे जाल काट हंस को छुड़ाकर ले जाता है। तहाँ अनहद की घोर शब्द झनकार है । लागि रहे सिद्धि साधु न पावत पार है।
सन्तो सो सतगुरु मोहि भावे, जो आवागमन मिटावै ।
द्वार ना मूदे पवन न रोके, न अनहन उरझावे ॥
- साहिब कबीर