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कामन्दकीय नीतिसार (आचार्य कामन्दक - प्राचीन भारतीय राजनीति शास्त्र)

कामन्दकीय नीतिसार (आचार्य कामन्दक - प्राचीन भारतीय राजनीति शास्त्र)

Kamandakiya Nitisara with Hindi Commentary

आचार्य कामन्दक / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished164 पृष्ठ

पृष्ठ 42, कुल 164 में से

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पृष्ठ 42

५म सर्ग ] अनुजीवीगणेर वृत्ति। ३१
एइ जगते प्रशंसनीय हन एवং लोक-समाजे हीन हन ना ॥९॥ स्थिर,
पुण्यदायक, विख्यात, सिद्धगणेर सेवित, प्रशंसनीय विन्ध्यगिरि येमन
सिद्धिकामी व्यक्तिर अभिलषित सेइरूप [ अनुजीवी ] निजेर अभीष्टसिद्धि
कामनाय वाञ्छनीय स्थिर पवित्र विख्यात स्वजनसेवित प्रशंसनीय भूपतिर
सेवा करिबे ॥१०॥ एइ जगते लोके ये ये दुर्लभ वस्तु पाइबार इच्छा
करिया थाके, मेधावी ( बुद्धिमान् उद्योगी ) व्यक्ति सेइ सेइ वस्तु पाइया
थाके, अतएव उद्यम करा कर्त्तव्य ॥११॥ यथाविधि राजार सेवा करिते
इच्छु एमन अनुजीवी-व्यक्ति, विद्या विनय ओ शिल्प प्रभृति द्वारा आपनार
योग्यता प्रतिपादन करिबे ॥१२॥
कुल शील विद्या शास्त्रार्थव्यवहार-पारदर्शी उदारता पराक्रम धैर्य्य
सुगठित-शरीर सत्त्व बल आरोग्य स्थिरता शुचिता ओ दयालुता युक्त, पैशुन्य
द्रोह भेद शठता लोभ ओ मिथ्या वर्ज्जित एवং स्तब्ध चपलता विहीन—एइ-
रूप व्यक्ति राजसेवार उपयुक्त ॥१३।१४॥ कार्य्यदक्षता भद्रता दृढ़ता क्षमा
क्लेशसहिष्णुता सन्तोष सुस्वभाव एवং उत्साह—एइ सकल गुणगुलि
अनुजीवी व्यक्तिके अलङ्कृत करिया थाके ॥१५॥ अर्थोपधाशुद्ध पूर्व्वोक्त
गुण समुदाये सतत विभूषित अनुजीवी व्यक्ति अर्थलाभेर निमित्त ऐश्वर्य्यशाली
भूपतिर उत्तमरूपे विश्वास उत्पादने समर्थ हय ॥१६॥
राजसंसारे प्रवेश करिया उपयुक्त वेशभूषाय सज्जित हइया
नियुक्त-स्थाने अवस्थान पूर्व्वक विनय सहकारे यथाकाले राजसेवा
करिबे ॥१७॥ परकीय स्थान ओ आसन, क्रूरता, औद्धत्य ओ मात्सर्य्य त्याग
करिबे एवং वयोवृद्धेर सहित चड़ाभावे कथावार्त्ता बलिबे ना ॥१८॥
विसंवाद वञ्चना दम्भ ओ चौर्य्य परित्याग करिबे। राजार पुत्रदिगके
एवং प्रियपात्रदिगके नमस्कार करिबे ॥१९॥ राजार नर्म्म-सचिवगणेर
सहित अल्पमात्रओ अप्रिय कथा बलिबे ना ; कारण ताहारा सभास्थले
उच्चहास्य करियाओ मर्म्मभेद करिया थाके ॥२०॥ राजार उपवेशनेर परे