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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

द्वितीय अध्याय-२ [ ३२५
अपनी प्रिय पत्नी को प्राप्त कर साधुजनो से सत्कृत हुए कल्किजी
सिंहल द्वीप को श्रेष्ठ स्थान देख कर कुछ दिनो तक वहाँ रहे ।१६। जो
राजा स्त्रीत्व को प्राप्त होकर पद्मा की सखी बन गये थे, वे सभी भगवान्
कल्कि के दर्शनार्थ वहाँ उपस्थित हुए ।१७। वे सभी स्त्रीत्व को प्राप्त हुए
राजागण भगवान् के दर्शन प्राप्त कर उनके चरण स्पर्श करते हुए उनकी
आज्ञा से रेवा नदी पर पहुँचे और स्नान करते ही पुरुषत्व को प्राप्त हो
गये।१८। पद्मा और कल्कि गौर तथा कृष्ण वर्ण वाले हैं । दोनो विपरीत
वर्णों के सम्मिलन से पद्मा के नीलाम्बर और कल्कि के पीताम्बर द्वारा
एक बाह्य वर्ण प्रकाशित हुआ और परस्पर समन्वित दिखाई देने लगा
।१६। कल्किजी का अत्यन्त अद्भुत पराक्रम देख कर सभी राजागण
उनकी शरण को प्राप्त होकर भक्तिपूर्वक प्रणाम और स्तुति करने
लगे ।२०।
जय जय निजमायया कल्पिताशेषकल्पनापरिणाम ।
जलाप्लुतलोकत्रयोपकरणमाकलय्य मनुमनिशम्य पूरितावि-
जनाविजनाविर्भूत महामीनशरीर ! त्वं निजकृतधर्म्मसेतुसर-
क्षणकृतावतारः ।२१।
पुनरिहदितिज-बल-परिलाङ्घत-वासव-सूदनादृत-जितत्रिभुवन
पराक्रम-हिरण्याक्षनिधन पृथिव्युद्धरणसकल्प-भिनिवेशेन धृत-
कोलावतारः पाहि नः ।२२।
पुनरिह जलधि मथनादृत-देवदानवगण मन्दराचलानयनव्या-
कुलिताना साहाय्येनादृतचित्त. पर्व्वतोद्धरणामृतप्रासनरचना
वतारः कूम्माकारः प्रसीद परेश । त्वं दाननृपाणाम् ।२३।
हे प्रभो ! आपकी जय हो । आपकी ही कल्पना-शक्ति से संसार
विविध प्रकार से कल्पित हुआ है । जब तीनो लोग प्रलय मे लीन हो गये,
तब आपने जनशून्य स्थल मे प्रकट हुए थे । आपने ही धर्म-सेतु के सर-
क्षण हेतु महामीन (मत्स्य) देह धारण किया था ।२१। जब दनुज-सैन्य

[३२६ ] कल्कि पुराण

से इन्द्र पराजित होने लगे और त्रैलोक्य-विजयी हिरण्याक्ष इन्द्र को
म रने मे तत्पर हुआ, तब आपने ही वाराह रूप धारण कर उसका
सहार कर डाला। ऐमे आप हमारी रक्षा कीजिये ।२२। जब देवता
और दैत्य दोनो ही मिल कर समुद्र-मन्थन मे तत्पर हुए, तब नदगचल
पर्वत को टिकाने की समस्या उत्पन्न हुई । उस समय आपने कूर्मावतार
धारण कर अपनी पीठ पर मन्दराचल को टिका लिया । आपका वह
कूर्मावतार देवताओ को सुधा-पान कराने के लिये ही हुआ था। हे परेश !
आप ही हम दीन राजाओ की रक्षा कीजिये ।२३।
पुनरिह त्रिभुवनजयिनो महाबलपराक्रमस्य हिरण्यकशिपोर-
र्द्दिताना देववराणा भयभीताना कल्याणाय दितिसुतवधप्रे-
प्सुर्ब्रह्मणो वरदानादवध्यस्य न शस्त्रास्त्ररात्रि दिवास्वर्गम-
र्त्यपातालतले देवगन्धर्वकिन्नरनरनागैरिति विचिन्त्य नर-
हरिरूपेण नाखाग्रभिन्नोरु दष्टवन्तच्छद त्यक्तासु कृत
वानसि ।२४।
पुनरिह त्रिजगज्जयिनो बले, सत्र शकानुजो वटुवामनोदैत्यस
माहनाय त्रिपदभूमियाञ्चाच्छलेन विश्वकायस्तदुत्सृष्ट-जल-
सस्पर्श-विवृद्धमनोऽभिलाषस्तव भू र्ले बलेर्दोवारिकत्वमङ्गी-
कृतमुचित दानफलम् ।२५।
पुनरिह हैहयादिनृपाणाममितबलपराक्रमाणा नाना मदोल्ल-
ङ्घितमर्यादावर्त्मना निधनाय भृगुवंशजो जामदग्न्य पितृहो-
मधेनुहरणप्रवृद्धमन्युवशात्रिसप्तकृत्वो निःक्षत्रिया पृथिवी कृ-
तवानसि परशुरामावतारः ।२६।
फिर जब त्रैलोक्य विजयी, महाबली और पराक्रमी हिरण्यक-
कशिपु देवताओ का उत्पीडन करने लगा, तब आपने भयभीत देवताओ के
रक्षार्थ उस दैत्यराज का सहार करन का निश्चय किया । ब्रह्माजी के
वरू से दैत्य, देवता गन्धर्व, किन्नर, नाग, शस्त्रास्त्र, दिवस, रात्रि, स्वर्ग,

कल्कि पुराण [ ३२७
मर्त्यलोक या पाताल लोक मे कही भी, किसी के द्वारा भी मरने वाला
नही था । इन सब बातो पर विचार करके आपने नृसिंहावतार धारण
किया और जब आपके उग्र रूप को देख क्रोधित हुआ दैत्य आपसे युद्ध
करने लगा, तब आपने अपने नखाग्रो से उसका देह विदीर्ण कर डाला
।२४। फिर त्रैलोक्य विजयी राजा बलि के यज्ञ मे आपने इन्द्र के लघु
भ्राता बन कर वामनावतार धारण कर दानवराज के समोहनार्थ तीन
पद पृथिवी माँग ली । उत्सर्ग के लिये जल छोडते ही आपने छलपूर्वक
विराट् स्वरूप धारण किया । फिर आप त्रैलोक्यदान के फलस्वरूप
राजा बलि के द्वारपाल बन गये ।२५। फिर जब महाबल-पराक्रम वाले
हैहय आदि राजाओ ने धर्म की मर्यादा को लाँघा, तब आपने उनके
विनाशार्थ भृगुवंश मे परशुराम का अवतार लिया और अपने पिता की
होमधेनु के हर लिये जाने पर आपने इक्कीस बार इस पृथिवी को क्षत्रियो
से रहित कर दिया ।२६।
पुनरिह पुलस्त्यवंशावत सस्य विश्रवस पुत्रस्य निशाचरस्य
रावणस्य लोकत्रयतापनस्य निधनमुररीकृत्य रविकुलजातद-
शरथात्मजो ऽथस्वामित्रादस्त्राण्युपलभ्य वने सीताहरणाश्रा
त्प्रवृद्धमन्युना अम्बुधिं वानरैर्निबध्य सगणं दशकन्धरं हतवा-
नसि रामावतारः ।२७।
पुनरिह यदुकुल-जलधिकलानिधि सकलसुरगणसेवितपादार-
विन्दद्वन्द्वः विविधदानवदैत्यदलनलोकत्रयदुरिततापनो वसुदे-
वात्मजो रामावतारो बलभद्रस्त्वमसि ।२८।
पुनरिह विधिकृत-वेदधर्मानुष्ठान-विहित-नानादर्शनसघृण
ससारकर्मत्यागविधिना ब्रह्माभासविलासचातुरी प्रकृतिवि-
माननामसम्पादयन् बुद्धावतारस्त्वमसि ।२६।
फिर पुलस्त्यवंशावतंस विश्रवापुत्र रावण ने अपने बल से तीनो
लोको को भय-सतप्त कर दिया, तब आपने उसका विनाश करने के लिये
सूर्यवंशी राजा दशरथ के यहाँ अवतार लिया और विश्वामित्र से अस्त्र-

३२८ ] द्वितीय अध्याय-२
विद्या प्राप्त कर वन-गमन करने और रावण द्वारा सीता का हरण करने
पर आपने वानर सेना को साथ लेकर कुल सहित रावण को मार डाला
।२७। फिर आप यदुकुल जनयि-मयङ्क वसुदेव जी के पुत्र रूप श्रीकृष्ण
हुए और अनेक दैत्य-दानवो को मार कर तीनो लोको को पाप-मुक्त
किया । इसलिये सभी देवता आपके उस श्रीकृष्ण रूप के चरण कमलो
की सेवा मे तत्पर हुए । उसी काल मे आपने ही बलभद्रजी का भी अव-
तार धारण किया था ।२८। फिर आपने ब्रह्मा द्वारा निश्चित वेद-धर्म
मे अनेक बाधाएँ देख कर मिथ्या प्रपञ्च को नष्ट करने के निमित्त एव
प्राकृतिक विषय की अवमानना न करने के उद्देश्य से बुद्ध का अवतार
लिया ।२६।
अधुना कलिकुलनाशावतारो बौद्धाखण्डम्लेच्छादीनाञ्चवे-
दधर्मसेतुपरिपालनाय कृतावतारः कलिकरूपेणास्मान् स्त्री-
स्वनिरयादुद्धृतवानसि तवानुकम्पा किमिह कथयामः ।३०।
क्व ते ब्रह्मादीनामविदितविलासावतरण
क्व नः कामा वामाकुलतममृगतृष्णार्तमनसाम् ।
सुदुष्प्राप्य युष्मच्चरण जलजालोकनमिद
कृपापारावार' प्रमुदितदृशाश्वामय निजान् ।३१।
अब आप कलिकुल को नष्ट करने तथा बौद्ध पाखण्डियो और
म्लेच्छों पर शासन करने के लिये कल्कि अवतार लेकर वेद धर्म रूपी
सेतु की रक्षा कर रहे हैं । आपने ही स्त्रीत्व रूपी नरक से हमारा
उद्धार किया है । हम आपकी इस कृपा का वर्णन किस प्रकार करे ?
।३०। ब्रह्मादि देवता भी आपकी लीला को जानने मे समर्थ नही हैं ।
आपकी अवतार विषयक कोई कामना नही रहती । हम स्त्री के देखते ही
काम-बाण के द्वारा जर्जर एव मृगतृष्णा से सतप्त हृदय वाले विषयी
प्राणियो के लिये आपके पदाम्बुजो का दर्शन दुष्प्राप्य था । हे अपार कृपा
वाले प्रभो ! हम अनुगामियो की ओर आप एक बार अपना कृपा कटाक्ष
करके: हमे आश्वासन दीजिये ।३१।

द्वितीयांश—
चतुर्थ अध्याय
श्रुत्वा नृपाणा भक्ताना वचन पुरुषोत्तमः ।
ब्राह्मणक्षत्रविट्शूद्र-वर्णाना धर्ममाह यत् ॥१॥
प्रवृत्ताना निवृत्ताना कर्म यत्परिकीर्तितम् ।
सर्वं सश्रावयामास वेदानामनुशासनम् ॥२॥
इति कल्केर्वचः श्रुत्वा राजानो विशदाशयाः ।
प्रणिपत्य पुन प्राहु पूर्वान्तु गतिमात्मनः ॥३॥
स्त्रीत्व वाप्यथवा पुं स्त्व कस्य वा केन वा कृतम् ।
जरा-योवन-बाल्यादि सुखदुःखादिक च यत् ॥४॥
कस्मात्कृतो वा कस्मिन् वा किमेतदिति वा विभो ।
अनिर्णीतान्यविदितान्यपि कर्माणि वर्णय ॥५॥
सूतजी बोले—राजाओ के यह वचन सुन कर पुरुष श्रेष्ठ कल्कि-
जी ने उनके प्रति ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्णों के धर्म का
वर्णन किया ।१। ससार मे आसक्त एव संसार से विरक्त दोनो के ही
जो कर्म हैं, उनका वर्णन उन्होने किया ।२। कल्किजी का उपदेश सुनकर
राजाओ के हृदय पवित्र होगये । फिर उन्होने प्रणाम करके कल्किजी से
अपनी पूर्वावस्था के विषय मे पूछा ।३। हे प्रभो ! स्त्रीत्व और पुरुषत्व
भेद से मनुष्यो की निवृत्ति किस प्रकार होती है ? जरा, यौवन और
बाल्यावस्था एव सुख, दु खादि के कारण क्या हैं ? इनके अतिरिक्त भी
जिन विषयो से हम अनभिज्ञ हैं, उनका भी वर्णन कीजिये ।४-५।
( तदा तदाकर्ण्य कल्किकरनन्त मुनिमस्मरत् ) ।
३२६ ३

३३० ] [ कल्कि पुराण
सोऽप्यनन्तो मुनिवरस्तीर्थपादो बृहद्व्रत ॥६॥
कल्केर्दर्शनतो मुक्तिमाकलय्यागतस्त्वरन् ।
समागत्य पुन' प्राह कि करिष्यामि कुत्र वा ।
यास्यामीति वचः श्रुत्वा कल्किः प्राह हसन्मुनिम् ॥७॥
कृत दृष्ट त्वया ज्ञात सर्व याह्यनिवर्तकम् ।
अदृष्टमकृतञ्चेति श्रुत्वा हृष्टमना मुनि ।८।
गमनायोद्यत त तु दृष्ट्वा नृपगणास्ततः ।
कल्किं कमलपत्राक्ष प्रोचुर्विस्मितचेतस ।६।
( यह सुन कर कल्कि जी ने अनन्त मुनि का स्मरण किया ) यह
जान कर महानव्रती एव दीर्घ काल से तीर्थ मे निवास करने वाले मुनि-
वर अनन्त, कल्किजी के दर्शन से अपनी मुक्ति सभव समझ कर शीघ्र ही
वहाँ आ उपस्थित हुए । उन्होने भगवान् कल्कि के पास आकर पूछा—
मुझे क्या करना है ? कहां जाना है ? यह सुन कर कल्कि जी हँस कर
मुनि से बोले ।६। हे मुने ! आपने मेरे सब किये हुए कर्म देखे हैं । अदृष्ट
को कोई काट नही सकता और कर्म के बिना फल भी नही मिल सकता ।
यह सुन कर मुनि को प्रसन्नता हुई ।८। और फिर जब मुनि वहाँ से
जाने लगे, तब उन्हे देख कर आश्चर्य चकित हुए राजागण कल्किजी से
बोले ।६।
किमनेनापि कथितंत्वया वा किमुताम्युत ।
सर्वं तच्छ्रोतुमिच्छाम. कथोपकथनं द्वयोः ॥१०।
नृपाणां तद्वच' श्रुत्वा तानाह मधुसूदनः ।
पृच्छतामु मुनिं शान्तं कथोपकथनादृताः ॥११।
इतिकल्केर्वचो भूयः श्रुत्वा ते नृपसत्तमाः ।
अनन्तमाशु' प्रणताः प्रश्नपारतितीर्षवः ॥१२।
मुने ! किमत्र कथन कल्किना धर्मवर्मणा ।
दुर्बोध. केन वा जातस्तत्त्व वर्णय न प्रभो । १३

चतुर्थ अध्याय-२ ] [ ३३१
पुरिकाया पुरि पुरा पिता मे वेदपारग. ।
विद्रु मो नाम धर्म्मज्ञः ख्यात. परहिते रतः ।१४।
सोमा मम विभो ! माता पतिधर्म्मपरायणा ।
तयोर्वयः परिणतौ काले षण्डाकृतिस्त्वहम् ।१५।
राजाओ ने कहा—हे प्रभो ! मुनि ने आपसे क्या कहा और
आपने क्या उत्तर दिया ? आपका कथोपकथन किम विषय मे हुआ था ?
यह सुनने की हमे इच्छा है ।१०। राजाओ की जिज्ञासा सुनकर भगवान्
कल्कि ने कहा—हमारे कथोपकथन के विषय मे इन शान्त हृदय वाले
मुनि से ही प्रश्न करो ।११। कल्किजी के वचन सुनकर वे सब श्रेष्ठ
राजागण प्रश्न का भेद जानने के लिए मुनि को प्रणाम करके पूछने
लगे ।१२। राजाओ ने कहा—हे मुने ! भगवान् कल्कि से आपका कथोप-
कथन गूढरूप से क्यो हुआ ? हे प्रभो ! इसका रहस्य हमे बताइये ।१३।
मुनि बोले—पूर्वकाल की बात है—पुरिका नाम पुरी मे वेदो मे पारगत
विद्रुम नामक एक धर्मज्ञ मुनि रहते थे, वही मेरे पिता थे ।१४। हे
विभो ! मेरी माता का नाम सोमा था, उसी पतीव्रता से मेरा जन्म हुआ,
परन्तु मैं पुंस्त्वहीन था ।१५।
सजात. शोकदो पित्रोलोकाना निन्दिताकृति ।
मामालोक्य पिता क्लीबदुःखशोक भयाकलः ।१६।
त्यक्त्वा गृह शिववन गत्वा तुष्टाव शङ्करम् ।
सपूज्येश विधानेन धूपदीपानुलेपनैः ।१७।
शिवं शान्त सर्वलोकैकनाथ भूता-वासं वासुकीकण्ठभूषम् ।
जटाजूटाबद्धगङ्गा तरंगवन्दे सान्द्रानन्दसन्दोहदक्षम् ।१८।
इत्यादि बहुभिः स्तोत्रैः स्तुतः स शिवदः शिव. ।
वृषारूढः प्रसन्नह्र्त्मा पितर प्राह मे वृणु ।१६।
विद्रु मो मे पिता प्राह मत्यु स्त्वं तापतापित ।
हसञ्छिवो ददौ पुंस्त्व पार्वीया पृतिमोदितः ।२०।

[३३२ ] [ कल्कि पुराण

मुझे इस प्रकार का उत्पन्न हुआ देख कर मेरे माता-पिता को
बडा दुःख हुआ। मेरी आकृति निन्दा योग्य थी। यह देख कर दुःख, शोक
और भय से व्याकुल हुए पिताजी शिव वन मे जाकर धूप, दीप, गध
आदि से विधिवत् पूजन करके शिवजी की स्तुति करने लगे ।१६ १७।
उन्होने कहा-हे शिव ! हे शान्त स्वरूप ! आप सब लोको के नाथ
और भूतो को आश्रय स्थान हैं। आपके कठ मे वासुकी नाग और जट
जाल मे गंग-तरग सुशोभित हैं। आप आनन्द भडार के दाता शिव को मै
प्रणाम करता हूँ ।१८। कल्याण के दाता भगवान् शकर इस स्तोत्र से
प्रसन्न होकर वृषभारूढ होकर प्रकट हुए और उन्होने मेरे पिता को वर
मागने की आज्ञा दी ।१६। तब मेरे पिता विद्रुम मुनि ने उनसे कहा-हे
नाथ ! मेरा पुत्र पुंसत्वहीन है, इसमे मैं अत्यन्त दुःखी हूँ। तब शिवजी ने
हँस कर मेरे पुरुषत्व युक्त होने का वर दिया और पार्वतीजी ने भी उनकी
बात का अनुमोदन किया ।२०।
मम पुंस्व वरं लब्ध्वा पितायातं पुनर्गृहम् ।
पुरुषं मा समालोक्य सहर्षः प्रियया सह ।२१।
ततः पूवयसौ तौ तु पितरौ द्वादशाब्दके ।
विवाहं मे कारयित्वा बन्धुभिर्मुदमापतुः ।२२।
यज्ञरातसुतां पत्नीं मानिनीं रूपशालिनीम् ।
प्राप्याहं परितुष्टात्मा गृहस्थः स्त्रीवशोऽभवम् । २३।
ततः कतिपये काले पितरौ मे मृतौ नृपा ।
पारलौकिककार्याणि सुहृद्भिर्ब्राह्मणैर्वृतः ।२४।
तयोः कृत्वा विधानेन भोजयित्वा द्विजान्बहून् ।
पित्रोर्वियोगतप्तोऽहं विष्णुसेवापरोऽभवम् ।२५।
मेरे पुरुष होने का वर प्राप्त कर पिताजी घर लौट आये और
तब मुझे पुरुषाकार हुआ देख कर माता के सहित वे बडे प्रसन्न हुए ।२१।
फिर जब मैं बारह बर्ष का होगया, तब उन्होने बन्धु-बान्धवो सहित
मोद मनाते हुए मेरा विवाह कर दिया ।२२। यज्ञरात की पुत्री को

चतुर्थे अध्याय २ ] [ ३३३
अपनी भार्या के रूप मे प्राप्त करके मैं बडा सन्तुष्ट हुआ और गृहस्थाश्रम
मे प्रवेश करके उस अत्यन्त रूपवती एव माननी स्त्री के वशीभूत हो
गया ।२३। फिर कुछ काल बीतने पर मेरे माता-पिता मर गये तब
मैंने अपने सुहृदो और ब्राह्मणो के साथ उनका परलोक सस्कार
किया।२४। माता-पिता का मृतक सस्कार करके मैंने अनेक ब्राह्मणो को
भोजन कराया । फिर उनके विरह से दुःखी होकर मैंने भगवान् विष्णु
की आराधना की ।२५।
तुष्टो हरिर्मे भगवाञ्जप पूजादिकर्मभि ।
स्वप्ने मामाह मायेय स्नेहमोहविनिर्मिता ।२६।
अय पितेय मातेति ममताकुलचेतसाम् ।
शोकदु खभयोद्व गजरामृत्युविधायिका ।२७।
श्रुत्वैति वचन विष्णोः प्रतिवादार्थमुद्यतम् ।
मामालक्ष्यन्तर्हित, स विनिद्रोऽहवम् ।२८।
सविस्मयः सभार्योऽह त्यक्त्वा ता युरिको पुरोम्
पुरुषोत्तमाख्य श्रीविष्णोरालवञ्चागम नृपाः ! ।२६।
तत्रैव दक्षिणे पार्श्वे निर्मायाश्रममुत्तमम् ।
सभार्य्यः सानुगामात्यः करोमि हरिसेवनम् ।३०।
मेरे जप, पूजन आदि कर्म से प्रसन्न हुए भगवान् विष्णु ने एक
दिन स्वप्न मे मुझसे कहा कि स्नेह, मोह आदि सब मेरी ही माया है ।२६।
यह मेरे पिता हैं, यह मेरी माता है' ऐसी ममता जिनके चित्त को व्याकुल
करती हो तो समझ लो कि इस शोक, दुख, भय, उद्वेग, वृद्धावस्था और
मृत्यु आदि के क्लेश रूप का कारण मेरी माया ही है ।२७। भगवान् की
वाणी सुन कर मैं जैसे ही प्रतिवाद करने को हुआ, वैसे ही वे अन्तर्धान
होगये और मेरी नीद टूट गई ।२८। हे राजाओ ! फिर मैं विस्मय मे
भर कर पुरिका नामक उस पुरी को छोड कर अपनी पत्नी के सहित
पुरुषोत्तम सज्ञक विष्णुधाम में जा पहुँचा ।२६। उस पुरुषोत्तम धाम के

३३४ ] [ कल्कि पुराण
दक्षिण भाग में श्रेष्ठ आश्रम बनाकर मैं अपनी पत्नी और अनुगामियो के
सहित हरि-सेवा मे तत्पर हो गया ।३०।
मायासंदर्शनाकाङ्क्षी हरिसद्मनि संस्थितः ।
गायन्नृत्यञ्जपन्नाम चिन्तयञ्छमनापहम् ।।३१।
एवं वृत्ते द्वादशाब्दे द्वादश्या पारणादिने ।
स्नातुकाम समुद्रेऽह बन्धुभि, सहितो गत ।३२।
तत्र मग्न जलनिधौ लहरीलोलसङ्कुले ।
समुत्थातुमशक्त मा प्रतुदन्ति जलेचराः ।३३।
निमज्जनो मज्जनेन व्याकुलो कृतचेतसम् ।
जलहिल्लोलमिलनदलिताङ्गमचेतनम् ।३४।
जलधेदक्षिणे कूले पतित पवनेरितम् ।
मा तत्र पतित दृष्ट्वा वृद्धशर्मा द्विजोत्तम ।।३५।।
सन्ध्यामुपास्य सघृण स्वपुर मा समानयत् ।
स वृद्धशर्मा धर्मात्मा पुत्रदारधनान्वितः ।
कृतवारुग्णान्तु मा तत्र पुत्रवत्पर्यपालयत् ।३६।
भगवान् के उस धाम मे रहता हुआ प्रभु माया का दर्शन करने
की कामना से मैं नृत्य, गायन तथा जप पूर्वक यम का भय दूर करने
वाले भगवान् विष्णु का ध्यान करने लगा ।।३१।। इस प्रकार बारह वर्ष
व्यतीत होगए । एक दिन द्वादशी का पारण था, तब मैं स्नान करने के
विचार से अपने बन्धुओ सहित समुद्र के तट पर पहुँचा ।।३२।। जैसे ही
गोता लगाया, वैसे ही मैं समुद्र की भयंकर तरंगराशि से व्याकुल हो
गया। मुझमे उठने की शक्ति नही रही । तभी जलचर जीव मुझे व्यथित
करने लगे ।३३। मैं कभी उछलता था, कभी डूबता, इससेमेरा चित्त बडा
व्याकुल हुआ । जल की तरगो के थपेडो से शिथिल अ ग हुआ मैं अचेत
हो गया ।।३४।। फिर मैं वायु की हिलोर से बहता हुआ समुद्र के दक्षिण
किनारे पर लग गया । मुझे अचेतावस्था में पड़ा देख कर वृद्ध शर्मा

[header]
चतुर्थ अध्याय-२ ] [ ३३५

नामक एक ब्राह्मण सध्योपासन से निवृत्त हो कर मुझे अपने घर ले
गये । स्त्री पुत्रादि से युक्त, धनवान् एव धर्मात्मा वृद्ध शर्मा मुझे स्वस्थ
करके पुत्र के समान पालने लगे ॥३५-३६॥
अहन्तु तत्र दीनात्मा दिग्देशाभिज्ञ एव न ।
दम्पती तौ स्वपितरौ मत्वा तत्रावस नृपाः ।३७।
स मा विज्ञाय बहुधा वेदधर्मेष्वनुष्ठितम् ।
प्रददौस्वा दुहितर विवाहे विनयान्वित ।३८।
लब्ध्वा चामीकराकारा रूपशीलगुणान्विता ।
नाम्ना चारुमती तत्र मानिनी विस्मितोऽभवम् ।३६।
तयाह परितुष्टात्मा नानाभोगसुखान्वित. ।
जनयित्व पञ्चपुत्रान्समदेनावृतोऽभवम् ॥४०॥
हे राजाओ ! उस स्थान पर रहते हुए मुझे दिशा और देश का
भी ज्ञान न रहा, इसलिए दुःखित हृदय से उन ब्राह्मण दम्पत्ति को ही
अपना माता-पिता मानता हुआ, वही रहने लगा ।३७। उन ब्राह्मण ने
मुझे सब प्रकार से वेद-धर्म का अनुष्ठाता जान कर विनय पूर्वक अपनी
कन्या का दान कर दिया ।३८। उस तप्त स्वर्गा जैसे वर्ण वाली, रूप, शील
और गुण से युक्त कन्या का नाम चारुमती था। उस मानिनी को भार्या
रूप मे प्राप्त का मैं विस्मय मे पड गया ।३६। च रुमती ने मुझे सेवा
द्वारा सदा सतुष्ट रखा और मैं उसके साथ विभिन्न प्रकार के सुखो का
उपभोग करने लगा । उससे मेरे पाँच पुत्र उत्पन्न हुए और निरन्तर मेरे
सुख की वृद्धि होने लगो ।४०।
जयश्च विजयश्चैव कमलो विमलस्तथा ।
बुध इत्यादय. पच विदितास्तनया मम ।४१।
न्स्वजनेर्बन्धुभिः पुत्रैर्धनैर्नानाविधैरहम् ।
विदितः पूजितो लोके देवैरिन्द्रो यथा दिवि ।४२।
बुधस्य ज्येष्ठपुत्रस्य विवाहार्थ समुद्यतम्।

३३६ ] [ कल्कि पुराण
दृष्ट्वा द्विजवरस्तुष्टो धर्मसारो निजा सुताम् ।४३।
दित्सु. कर्माणि वेदज्ञश्चकाराभ्युदयान्द्यपि ।
वाद्यैर्गीतैश्च नृत्यैश्च स्त्रीगणै. स्वर्णभूषतै. ।४४।
अह च पुत्राभ्युदये पितृदेवर्षितर्पणम् ।
कत्तुं स मुद्रवेलाया प्रविष्ट परमादरात् ।४५।
मेरे पाँच पुत्र जय, विजय, कमल, विमल, और बुध इत्यादि नामो
से जाने गये ।४१। मैं स्वजनो और पुत्रो से युक्त तथा विविध प्रकार के
धनो का स्वामी होकर इन्द्र के समान पूजनीय तथा प्रसिद्ध होगया ।४२।
जब मैने अपने ज्येष्ठ पुत्र बुध का विवाह करने ना विचार किया तब
धर्मसार नामक एक ब्राह्मण ने अपनी कन्या देने की इच्छा प्रकट की ।
फिर उसने अपनी कन्या का वैवाहिक सस्कार करने के लिए वेदज्ञ ब्रा-
ह्मणो को बुला कर आभ्युदयादि कर्म को पूर्ण कराया । उस समय
स्वर्णाभूषणो से विभूषित स्त्रियाँ वाद्य, गीत और नृत्य कर रही थी-
।४३-४४। तब मैं भी पुत्र के अभ्युदय की अभिलाषा करके पितर, देवता
और ऋषियो का तर्पण करने के लिए समुद्र के किनारे गया ।४५।
वेलालोलायिततनुर्जलादुत्थाय सत्वरः ।
तीरे सखीन्स्नानसन्ध्या-परान्वीक्ष्याहमुन्मना. ।४६।
सद्यः समभव भूपा ! द्वादश्या पारणाहतान् ।
पुरुषोत्तमसवासान्विष्णो सेवार्थमुद्यतान् ।४७।।
तेऽपि मामग्रत, कृत्वा तद्रूपवयसा निधिम् ।
विस्मयाविष्टमनस दृष्ट्वा मामब्रु वञ्जनाः ।४८।
अनन्त ! विष्णो भक्तोऽसि जले कि दृष्टवानिह ।
स्थले वा व्यग्रमनसं लक्षयाम. कथ तव ।४६।
पारणं कुरु तद्ब्रू हि त्यक्त्वा विस्मयमात्मम. ।
तानब्रुवमह नैव किञ्चिद्ददृष्ट श्रुत जनाः ।५०।
कामात्मा तत्कृपाधीर्मया सन्दर्शनादृतः ।

चतुर्थ अध्याय-२ ] [ ३३७
तया हरेर्माययाह मूढो व्याकुलितेन्द्रियः ।५१।
जब मैं स्नान — तर्पणादि से निवृत्त होकर जल से निकल कर तट
की ओर चला, तभी देखता हूँ कि मेरे पहिले के सभी बंधु बांधव सन्ध्यादि
कर्म कर रहे हैं। यह देख कर मेरा मन उद्विग्न हो उठा ।४६।
हे राजाओ ! पुरुषोत्तम धाम मे रहने वाले उन ब्राह्मणो को भगवान्
विष्णु की सेवा एव द्वादशी के पारण मे तत्पर देख कर मैं चकित हुआ
।४७। मेरे रूप और वय मे पहिले से कुछ भी परिवर्तन न हुआ देख कर
और मुझे विस्मयपूर्वक अपने को देखता देख कर उन्होने कहा ।४८। हे
अनन्त ! तुम विष्णु भक्त हो । क्या तुमने जल अथवा स्थल मे कही कुछ
ऐसा दृश्य देखा है, जिससे इतने व्यग्रचित्त दिखाई दे रहे हो ! ।४६।
यदि कुछ देखा हो तो बताओ और विस्मय को छोड कर पारण करो।
यह सुन कर मैंने कहा— मैंने कही कुछ भी नही देखा-सुना । परन्तु मैं
काम से मोहित होकर दुर्बल हृदय हो गया हूँ। मैं भगवान् श्रीहरि
की माया से ही विमूढ और व्याकुल इन्द्रिय वाला हो रहा हूँ ।५०-५१।
न शर्मं वेद्मि कुत्रापि स्नेहमोहवशं गतः ।
आत्मनो विस्मृतिरिय को वेद विदिता तु ताम् ।५२।
इति भार्या धनागार-पुत्रोद्वाहानुरक्तधी. ।
अनन्तोऽह दीनमना न जाने स्वापसम्मितम् ।।५३।।
मां वीक्ष्य मानिनो भार्या विवशं मूढवस्थितम् ।
क्रन्दन्ती किमहोऽकस्मादालपन्ती ममान्तिके । ५४।
इह ता वीक्ष्य तास्तत्र स्मृत्वा कातरमानसम् ।
हंसोऽप्येको बोधयितुमागतो मां सदुक्तिभिः ।५५।
घोरो विदितसर्वार्थः पूर्णः परमधर्म्मवित् ।५६।
सूर्य्यकार तत्त्वसार प्रशान्त दान्त शुद्ध लोकशोकक्षयि-
ष्णा म् । ममाग्रे त पूजयित्वा मदङ्गाः पप्रच्छुस्ते मच्छुभष्या-
नकामाः ।५७।

३३८ ] [ कल्कि पुराण
मैं स्नेह और मोह के वशीभूत होकर आत्मविस्मृति को प्राप्त
हुआ हूँ, परन्तु इस बात को कौन जानता है ? ।५२। इस प्रकार मैं
भार्या, धन के भंडार और पुत्र के विवाहादि मे अत्यन्त अनुरक्त शोक
और दुख मे युक्त हो गया। मै सोचने लगा कि मैं अनन्त कौन हूँ ?
परतु कुछ भी नही समझ पाया । सभी विषय स्वप्न के समान लगने लगे
।५३। तभी मेरी मानिनी पत्नी मुझे उस विवश और मूढ के समान
अवस्था मे देख कर मेरे पास आकर रोती हुई चिल्लाने लगी कि हा, यह
क्या हुआ ! ।५४। वहाँ अपनी पूर्व भार्या को इस प्रकार देख कर और
फिर उन स्त्री-पुरुषो का स्मरण करके अत्यन्त कातर हृदय तथा सन्तप्त
हो उठा । तभी एक वीर, सर्वज्ञानी, पूर्ण धर्मज्ञ, सूर्य के समान तेजस्वी,
सतोगुणी , शान्त, शुद्ध तथा ससार-शोक का नाश करने मे समर्थ
परमहस मुझे ज्ञान देने के निमित्त वहाँ पधारे। तभी मेरे बाधवो ने
उनका पूजन किया और मेरे कल्याण का उपाय पूछने लगे ।५५-५७।

द्वितीय अंश: अध्याय १-३ (कीकट देश प्रस्थान व म्लेच्छ युद्ध)

द्वितीयांश—
पंचम अध्याय
उपविष्टे तदा हंसे भिक्षां कृत्वा यथोचिताम् ।
तत प्राहुरनन्तस्य शरीररोगकाम्यया ।१।
हंसस्तेषां मतं ज्ञात्वा प्राह मां पुरतः स्थितम् ।
तव चारुमती भार्या पुत्रः पञ्च बुधादयः ।२।
धनरत्नन्वितं सद्मा सम्बाधं सौवस्रकुलम् ।
त्यक्त्वा कदागतोऽसीह पुत्रोद्वाहदिने न तु ।३।
समुद्रतीरसञ्चारः पुराद्धर्म्यजनादृतः ।
निमन्त्र्य मामिहायातः शोकसंविग्नमानसः ।४।
त्वञ्च सप्ततिवर्षीयस्तत्र दृष्टो मया प्रभो ! ।
त्रिंशद्वर्षीयवत्कस्मादिति मे संभ्रमो महान् ।।५।।
सूतजी बोले — यथोचित भिक्षा प्राप्त करके परमहंस जब
विराजमान हुए, तब पुरुषोत्तम तीर्थ के निवासियो ने उनसे पूछा कि
अनन्त का शरीर रोग-रहित कब होगा ? ।१। परमहंस उनके प्रश्न का
तात्पर्य जान कर और मुझे अपने समक्ष स्थित देख कर बोले — हे
अनन्त ! तुम अपनी पत्नी चारुमती, बुधादि पाँचो पुत्र धन रत्नादि से
युक्त भवन आदि को त्याग कर यहाँ कब आये ? क्या आज तुम्हारे
पुत्र का विवाह-दिवस है ? ।२-३। मैं आज भी तुम्हे इस समुद्र तट पर
घूमते देखता हूँ । वहाँ के सभी धार्मिक व्यक्ति तुम्हारा आदर करते हैं ।
मैं भी आज निमंत्रित हूँ । परन्तु तुम यहाँ आकर शोक से सन्तप्त होरहे
दिखाई देते हो ।४। हे प्रभो ! वहाँ तो तुम सत्तर वर्ष के वृद्ध थे, परन्तु
२२९

३४० ] [ कल्कि पुराण
यहाँ तीस वर्ष के युवक कैसे दिखाई दे रहे हो ? ।५।
इय भार्या सहाया ते न तत्रालोकिता क्वचित् ।
अह वा क्व कुतस्तस्मात्क्व वा काशित् ।६।
स एव वा न वापि त्व नाह वा भिक्षुरेव स. ।
आवयोरिह सयोगश्चेन्द्रजाल इवाभवत् ।७।
त्व गृहस्थ. स्वधर्म्मज्ञो भिक्षुकोऽह परात्मक. ।
आवयोरिह सवादो बालकोन्मत्तयोरिव '८।
तस्मादीशम्य मायेय त्रिजन्मोहकारिणी ।
ज्ञानाप्राप्याद्वैतलभ्या मन्येहमिति भा द्विज । ।६।
तुम्हारी इस सहायिका भार्या को मैंने वहाँ कभी भी नही देखा ।
मैं भी यह नही जानता कि मैं इस स्थान पर कहाँ से और किस प्रकार
आ गया ? तथा मुझे यहाँ कौन लाया है ? ।६। क्या तुम वही अनन्त हो
या और कोई हो ? मैं भी वही भिक्षुक हूँ या कोई अन्य हूँ ? यहाँ मेरा
तुम्हारा मिलन भी इन्द्रजाल के समान ही प्रतीत होता है ।७। तुम अपना
धर्म का पालन करने वाले गृहस्थ हो और मैं परमार्थ चिन्तक भिक्षुक ।
यहाँ हम-तुम दोनो का पारस्परिक सवाद एक बालक और उन्मत्त के
सवाद के समान निरर्थक है ।८। हे द्विज ! इससे मैं समझता हूँ कि यह
भगवान् की त्रैलोक्य-मोहिनी माया है । इस माया का रहस्य साधारण
ज्ञान से नही, अद्वैत बुद्धि से ही समझा जा सकता है ।६।
इति भिक्षुः समाश्राव्य यदन्यत्प्राह विस्मित. ।
मार्कण्डेय ! महाभाग ! भविष्य कथयामि ते ।१०।
प्रलये या त्वया दृष्टा पुरुषस्योदराम्भसि ।
सा माया मोहजनिका पन्थानं गणिका यथा ।११।
तमोह्ययननसन्तापा नोदनोद्यतमक्षरी
ययेदमखिलं लोकमवृत्या वस्थयास्स्थितम् ।१२।
लये लीने त्रिजगति ब्रह्मातन्मात्रतां गतः ।
निरुपाधौ निरालोके सिसृक्षुरभवत् परः ।१३।

पञ्चम अध्याय - २ ] [ ३४१
ब्रह्मण्यपि द्विधाभूते पुरुष प्रकृती स्वयं ।
भासा सजनयामास महान्तं कालयोगतः ।१०।
कालस्वभावकर्मात्मा सोऽहङ्कारस्ततोऽभवत्
त्रिवृद्विष्णु-शिव-ब्रह्म-मयः ससारकारणम् ॥१५॥
विस्मयान्वित हृदय से भिक्षुक परमहंस ने मुझसे इतना ही कहा।
फिर उन्होंने मार्कण्डेय से कहा - हे मार्कण्डेय ! हे महाभाग ! मैं अब
तुम्हें भविष्य की बात सुनाता हूँ ।१०। प्रलयकाल मे उस परम पुरुष के
उदर में स्थित जल मे, पथ मे बैठने वाली गणिका के समान, सब मे
मोह उत्पन्न करने वाली माया निवास करती है ।११। तमोगुण रूप हुई
यही माया अनन्त सन्ताप उत्पन्न करने वाली और इस मिथ्या जगत में
सब की गति करने वाली है। यही माया तीनो लोको मे व्याप्त होकर
उन्हें स्थित करती है । इस मायाका नाश संभव नही है ।१२।
प्रलयकाल मे तीनो लोको के लीन होजाने पर सर्वत्र अंधकार छा जाता
है, तब दिशा देश और काल आदि का भी कोई चिह्न नही रहता।
उस समय ब्रह्म ही सृष्टि करने की इच्छा से, अपनी हीं महिमा द्वारा
प्रकृति और पुरुष इन दो रूपो मे विभक्त हो जाते हैं। तब काल के सह-
योग से प्रकृति और पुरुष, का सयोग होने पर महत्तत्व उत्पन्न होता है
।१३-१४। प्रकृति से काल और स्वभाव उत्पन्न हुए । महत्तत्व से अह-
कार हुआ। वही अहंकार तीनो गुणो मे विभक्त होकर ब्रह्मा, विष्णु
और शिव को उत्पन्न करने वाला हुआ। यही ब्रह्मा, विष्णु और शिव
सम्पूर्ण विश्व के कारण हैं ।१५।
तन्मात्राणि ततः पञ्च जज्ञिरे गुणवन्ति च ।
महाभूतान्यपि ततः प्रकृतौ ब्रह्मसंश्रयात् ।१६।
जाता देवासुरनरा ये चान्ये जीवजातयः ।
ब्रह्माण्डभाण्डसम्भार-जन्मनाशक्रियात्मिकाः ।१७
मायया मायया जीव-पुरुष परमात्मनः ।
ससारशरणाव्यग्रो न वेदात्मगति क्वचित् ।१८
अहो बलवती माया ब्रह्माद्या यद्वशे स्थितः ।

३४२ ] [ कल्कि पुराण
गावो यथा नसि प्रोता गुणाबद्धा. खगा इव ।१६।
तां मायां गुणमय्या ये तितीर्षन्ति मुनीवरा ।
स्त्रवन्ती वासनानक्रां त एवार्थविदो भुवि ॥२०॥
अहङ्कार से प्रथम त्रिगुणात्मक पञ्चतन्मात्र प्रकट हुआ। पञ्चतन्मात्र
से पञ्चमहाभूत हुए। इस प्रकार प्रकृति में पुरुष के अधिष्ठान करने से ही
सृष्टि का उदय होता है ।१६। फिर देवता, दानव, मनुष्य तथा अन्यान्य
जीव अर्थात् जितने भी जन्म लेने वाले और मरणधर्मी प्राणी हैं, वे सब
उत्पन्न होते हैं ।१७। ईश्वर की माया के वश में पड़े रहने से सभी जीव
सांसारिक कार्यों में लिप्त रहे आते हैं तथा अपने उद्धार का प्रयत्न नहीं
कर पाते ।१८। अहो, यह माया कैसी बलवती है, जिसके वश में ब्रह्मादि
देवता भी नाथे हुए बैल और डोरी से बाँधे हुए पक्षी के समान नाचते
करते हैं ।१६। जो मुनिवर इस प्रकार के वासना रूपी नक्र की उत्पत्ति-
त्री गुणमयी माया से मुक्त होने का उपाय करते हैं, उन्ही ज्ञानियों का
जन्म सार्थक समझो ।२०।
मार्कण्डेयो वसिष्ठश्च वामदेवादयोऽपरे ।
श्रुत्वा गुरुवचो भूय. किमाहु श्रवणादृताः ।२१।
राजानोऽनन्तवचनमिति श्रुत्वा सुधोपमम् ।
किं वा प्राहुरहो सूत ! भविष्यमिह वर्णय ।२२।
इति तद्वच आश्रुत्य सूतः सत्कृत्य तं पुनः ।
कथयामास कात्स्न्र्येन शोकमोहविघातकम् ।२३।
तत्रानन्तो भूपगणै. पृष्ट प्राह कृतादर ।
तपसा मोहनिधनमिन्द्रियाणाञ्च निग्रहम् ।२४।
अतोऽहवनमासाद्य तप्तं कृत्वा विब्रानत. ।
नेन्द्रियाणा न मनसो निग्रहोऽभूत्कदाचन ।२५।
शौनक बोले — हे ब्रह्मन् ! मार्कण्डेय, वसिष्ठ, वामदेव तथा
अन्यान्य मुनियो ने परमहंस के वचन सुन-कर क्या कहा था ? तथा अनन्त
के इस उपाख्यान को सुनने वाले राजाओ ने अनन्त के सुधा के समान

पञ्चम अध्याय-२ ] [ ३४३
वचन सुन कर क्या कहा ? यह सभी भविष्य-वार्ता हमे सुनाइये ।२१-
२२। यह सुन कर सूतजी शोक-मोह का नाश करने वाली एव तत्व-
ज्ञानमयी उस वार्ता का वर्णन पुनः करने लगे ।२३। सूतजी ने कहा—
फिर उन राजागण के जिज्ञासा करने पर अनन्त ने तपस्या के द्वारा
माया का निवारण और इन्द्रियो के निग्रह का प्रसग कहा ।२४। II
बोला—मैं वन मे पुन जाकर विधिवत् तप करने लगा, तो भी अपनी
इन्द्रियो और मन का निग्रह नही कर पाया ।२५।
वने ब्रह्म ध्यायतो मे भार्यापुत्रधनादिकम् ।
विषयान्तरा शश्वत्स्मारयति मे मनः ।२६।
तेषा स्मरणमात्रेण दुःखशोकभयादयः ।
प्रतुदन्ति मम प्राणान्धारणा-ध्याननाशका ।२७।
ततोऽह निश्चितमतिरिन्द्रियाणांच घातने ।
मनसो निग्रहस्तेन भविष्यति न सशय ।।२८।।
अतो मामिन्द्रियाणाञ्च निग्रहव्यग्रचेतसम् ।
तदधिष्ठातृदेवाश्च दृष्ट्वा मामीयुरञ्जसा।२६।
रूपिणो मामथोचुस्ते भोऽनन्त ! इति ते दश ।
दिग्व तार्कप्रचेतोऽश्वि-वह्नीन्द्रोपेन्द्रमित्रकाः ।।३०।।
मैं जब-जब ब्रह्म का ध्यान करने में तत्पर होता, तब-तब ही
मुझे स्त्री, पुत्र, धनादि की बातें स्मरण हो आती और मेरा ध्यान भग हो
जाता २६। इस प्रकार स्त्री, पुत्र तथा धनादि का स्मरण होते ही मेरा
अन्तरात्मा दुख, शोक और भय आदि से व्याकुल हो जाता । इस प्रकार
ध्यान में बाधा उपस्थित हो गई ।२७। मैंने पुनः यह विचार करके कि
इन्द्रिय-निग्रह से मन भी वश मे हो जायगा, इन्द्रियो के निग्रह का ही
संकल्प किया ।२८। ऐसा संकल्प करके जब मैं इन्द्रियों के दमन मे तत्पर
हुआ, तब इन्द्रियो के अधिष्ठातृ देवता मेरी ओर ताकने लगे ।२६। तब
दशो इन्द्रियो के अधिष्ठातृ देवताओ ने साक्षात् प्रकट होकर मुझसे कहा--

३४४ ] [ कल्कि पुराण
हे अनन्त ! हम दिशा, वात, प्रचेता, अश्विद्वय, अग्नि, इन्द्र, उपेन्द्र और
मित्र देवता हैं । ३०।
इन्द्रियाणां वयं देवास्तव देहे प्रतिष्ठिताः ।
नखाग्रकाण्डसभिन्नान्नास्मान्कर्तु मिहार्हसि । ३१
न श्रयो हि तवानन्त ! मनोनिग्रहकर्मणि ।
छेदने भेदनेऽस्माकं भिन्नमर्मा मरिष्यसि । ३२।
अन्धानां बधिराणाञ्च विकलेन्द्रियजीविनाम् ।
वनेऽपि विषयव्यग्र मानस लक्षयामहे । ३३।
जीवस्यापि गृहस्थस्य देहो गेह मनोज्ञनुग ।
बुद्धिर्भार्या तदनुगा वयमित्यवधारय । ३४।
कर्मायत्तस्य जीवस्य मनो बन्धविमुक्तिकृत् ।
संसारयति लुब्धस्य ब्रह्मणो यस्य मायया । ३५।
हम दश इन्द्रियो के अधिष्ठातृ देवगण तुम्हारे देह मे स्थित हैं।
हमको नखाग्र से छिन्न-भिन्न करना सर्वथा अनुचित है । ३१। इस प्रकार
मन को वश करने के प्रयत्न मे तुम्हारा कल्याण नही होगा । इन्द्रियो
के छेदन-भेदन से मर्मस्थल आहत हो जायगा तो तुम्हारी मृत्यु हो जायगी
। ३२। अन्धे, बहरे अथवा विकल इन्द्रियो वाले जीव भी निर्जन वन मे
वास करते हुए विषयासक्त दिखाई देते हैं । ३३। जीव रूपी गृहस्थ का घर
यह देह ही है तथा मन की अनुगता बुद्धि ही इसकी भार्या है। इस
प्रकार हम सभी उस बुद्धि रूपी भार्या के ही अनुगत रहते हैं । ३४।
सभी जीव अपने कर्म के वश मे हैं । मोक्ष और बन्धन का कारण मन है।
प्रभु-माया का अनुगत हुआ मन ही इस लोलुप प्राणी को भवचक्र मे
डालता रहता है । ३५।
तस्मान्मनोनिग्रहार्थं विष्णुभक्ति समाचर ।
सुखमोक्षप्रदा नित्य दाहिका सर्वकर्मणाम् ॥३६॥
द्वैताद्वैतप्रदान्दन्दस् न्दोहा हरिभक्तिका ।
हरिभक्त्या जीवकोष-विनाशान्ते महामते । । ३७।