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सर्वकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

पृष्ठ 76, कुल 259 में से

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पृष्ठ 76

द्वितीयांश—
चतुर्थ अध्याय
श्रुत्वा नृपाणा भक्ताना वचन पुरुषोत्तमः ।
ब्राह्मणक्षत्रविट्शूद्र-वर्णाना धर्ममाह यत् ॥१॥
प्रवृत्ताना निवृत्ताना कर्म यत्परिकीर्तितम् ।
सर्वं सश्रावयामास वेदानामनुशासनम् ॥२॥
इति कल्केर्वचः श्रुत्वा राजानो विशदाशयाः ।
प्रणिपत्य पुन प्राहु पूर्वान्तु गतिमात्मनः ॥३॥
स्त्रीत्व वाप्यथवा पुं स्त्व कस्य वा केन वा कृतम् ।
जरा-योवन-बाल्यादि सुखदुःखादिक च यत् ॥४॥
कस्मात्कृतो वा कस्मिन् वा किमेतदिति वा विभो ।
अनिर्णीतान्यविदितान्यपि कर्माणि वर्णय ॥५॥
सूतजी बोले—राजाओ के यह वचन सुन कर पुरुष श्रेष्ठ कल्कि-
जी ने उनके प्रति ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्णों के धर्म का
वर्णन किया ।१। ससार मे आसक्त एव संसार से विरक्त दोनो के ही
जो कर्म हैं, उनका वर्णन उन्होने किया ।२। कल्किजी का उपदेश सुनकर
राजाओ के हृदय पवित्र होगये । फिर उन्होने प्रणाम करके कल्किजी से
अपनी पूर्वावस्था के विषय मे पूछा ।३। हे प्रभो ! स्त्रीत्व और पुरुषत्व
भेद से मनुष्यो की निवृत्ति किस प्रकार होती है ? जरा, यौवन और
बाल्यावस्था एव सुख, दु खादि के कारण क्या हैं ? इनके अतिरिक्त भी
जिन विषयो से हम अनभिज्ञ हैं, उनका भी वर्णन कीजिये ।४-५।
( तदा तदाकर्ण्य कल्किकरनन्त मुनिमस्मरत् ) ।
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