कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
तृतीयांश -
सप्तम अध्याय
एव प्रवृत्ते सङ्ग्रामे धर्मं परमकोपन ।
कृतेन सहितो घोर युयुधे कलिना सह. ।१।
कलिर्दमित्रबाणौधैधर्मस्यापि कृतत्त्य च ।
पराभूत पुरी प्रायात्त्यक्त्वागर्दभवाहनम् ।२।
विच्छिन्नपेचकरथ स्रवद्रक्ताङ्गसञ्चय ।
च्छुद्भगन्ध करालास्य स्त्रीस्वामिकमगाद्गृहम् ।३।
दम्भ सम्भोगरहितनोद्धृतवाणगणाहत ।
व्याकुल स्वकुलागारो नि मार० प्राविशद्गृहम् ।४।
लोभ प्रसादाभिहतो गदया भिन्नमस्तकः ।
सारमेयरथ च्छिन्न त्यक्त्वागाद्रुधिर वमन् ।५।
श्रभयेन जित क्रोध कषायीकृतलोचन ।
गन्धाखुवाह विच्छिन्न त्यक्त्वा विशमन गत ।६।
सूत जी ने कहा—इस प्रकार भयकर युद्ध होता देख कर
मन्युग सहित धर्म ने अत्यन्त क्रोधपूर्वक कलि से युद्ध प्रारम्भ किया ।१।
तब धर्म और सत्युग की भीषण बाण वर्षा को न सह कर हारा हुआ
कलि अपने वाहन गधे को वही छोड़ कर भागता हुआ अपनी पुरी मे
घुस गया ।२। उल्लू की ध्वजा वाला उसका रथ चकनाचूर हो गया ।
उसके देह से रक्त बहने लगा, जिससे छछू दर की गन्ध निकल रही थी ।
मुख पर भयानकता आ गई थी । इस अवस्था को प्राप्त हुआ कलि
अपनी स्वामिनी नारी के भवन मे प्रविष्ट हुआ ।३। इस प्रकार बाण
वर्षा से आहत एव व्याकुल हुआ कलि दम्भ सम्भोगादि से रहित होकर
४१३
४१४ ] [ कल्कि पुराण
अपने कुल के अग र रूप से सार-हीन होता हुआ अपने गृह मे जा पहुंचा
।४। उधर प्रसाद द्वारा पदाघात को प्राप्त हुए लोभ का शिर कट गया ।
कुत्तो से युक्त उसका रथ छिन्न भिन्न हो गया । तब वह उसे छोड
कर रक्त वमन करता हुआ रण क्षेत्र से भाग खडा हुआ ।५। अभय से
युद्ध करता हुआ क्रोध भी हार गया । उसके छ नेत्रो मे लाली छाई थी ।
चूहो से युक्त दुर्गंध पूर्ण अपने छिन्न-भिन्न रथ को वही पडा छोड कर
वह भी विशमनपुरी मे जा घुसा ।६।
भय सुखतलाघाताद्गतासु र्यपतद्भुवि ।
निरयो मुदमुष्टिभ्या पीडितो यममाययौ ७।
आधिव्याध्यादय सर्वे त्यक्त्वा वाहमुपाद्रवन् ।
नानादेशान्भयोद्विग्न कृतवाणाप्रपीडिताः ।८।
धर्म. कृतेन सहितो गत्वा विशसन कलेः ।
नगर बाणदहनैर्ददाह कलिना सह ।६।
कलिर्विप्लुष्टसर्वाङ्गो मृतदारो मृतप्रज. ।
जगामेको रुदन्दीनो वर्षान्तरमलक्षित. ।१०।
मरुस्तु शककाम्बोजाञ्जघ्नेदिव्यास्त्रतेजसा ।
देवापि· शबरांश्चोलान्बर्बरास्तद्गणानपि ।११।
दिव्यास्त्रशस्त्रसम्पातैर्दयामास वीर्यवान् ।
विशाखयूपभूपालः पुलिन्दान्पुक्कसानपि ।१२।
सुख के तलाघात से आहत हुआ भय प्राण त्याग कर धराशायी
हुआ । प्रीति के मुष्टि प्रहार से पीडित हुआ निरय भी तुरन्त ही यमा-
लय को चला गया ।७। सत्युग के बाणो से आहत हुई आधि-व्याधि
अपने वाहनो का परित्याग करके इधर-उधर भाग गईं ।८। इसके
पश्चात् सत्युग को साथ लेकर धर्म कलि की राजधानी विनशन में
प्रविष्ट हुआ और उसने कलि के सहित सम्पूर्ण नगर को अपनी बाणा-
ग्नि से जला दिया ।६। कलि के सभी अग जल गये । उसकी संतति
और पत्नी भी मरण को प्राप्त हुई और वह स्वय रोता हुआ अप्रकट रूप
सप्तम अध्याय-३ ] [ ४१५
से अन्य वर्ष मे पलायन कर गया ।१०। अपने दिव्यास्त्रो के तेज से
राजा मरु ने भी शक और कम्बोजो का सहार कर दिया तथा राजा
देवापि ने चोल और बर्वरो को मृत्यु के घाट उतार दिया ।११। महा-
बली विशाखयूप नरेश ने अपने दिव्य शस्त्रास्त्रो के द्वारा पुलिन्द और
युक्कसो को नष्ट किया ।१२।
जघानविमलप्रज्ञ खड्गपातेन भूरिणा ।
नानास्त्रशस्त्रवर्षैस्ते योधा नेशुरनेकधा ।१३।
कल्कि कोकविकोकाभ्या गदापाणियुंधा पतिः ।
युयुधे विन्याराविज्ञो लोकाना जनयन्भयम् ।१४।
वृकासुरस्य पुत्रौ तौ नप्तारौ शकु नेर्हरेः ।
तयो. कल्कि स युयुधे मधुकैटभयोर्यथा ।१५।
तयोर्गंदा प्रहारेण चूर्णितागस्त तत्पते ।
कराच्च्युतापतद्भूभौ दृष्ट्वोचुर्विस्मयितो जना ।१६।
ततः पुन क्रुधा विष्णुर्र्जगालिष्णुरुर्महाभुज ।
भल्लकेन शिरस्तस्य विकोकस्याच्छिनत्प्रभु ।१७।
मृतो विकोकः कोकस्य दर्शनादुत्थितो बली ।
तद्दृष्ट्वा विस्मिता देवा, कल्किश्च परवीरहा ।१८।
उन श्रेष्ठ बुद्धि वाले विशाखयूप-नरेश ने निरन्तर अपने खड्ग
एव अनेकानेक शस्त्रास्त्रो के द्वारा शत्रुओ को विनष्ट किया । इस प्रकार
पर-पक्ष के बहुत सारे वीर मृत्यु को प्राप्त हुए ।१३। गदा-कुशल कल्कि
जी गदा लिये हुए ही कोक विकोक से सग्राम कर रहे थे, जिससे सब
लोक भयभीत हो रहे थे ।१४।
वे दोनो भाई शकुनि के पौत्र और वृकासुर के पुत्र थे । पुरा-
काल में जैसे विष्णु का मधु कैटभ से युद्ध हुआ था, वैसे ही इन दोनो
के साथ कल्कि जी घोर सग्राम कर रहे थे ।१५। तभी कोक-विकोक
के गदाघात से कल्किजी का देह चूर्ण जैसा हो गया । उनके हाथ
से गदा छूट गई । यह दृश्य सभी उपस्थित व्यक्ति आश्चर्य पूर्वक देख
सप्तम-अध्याय-३ ] [ ४१६
रहे थे ।१६। फिर संसार विजेता महाबाहु कल्कि जी ने क्रोध में भर
कर भल्लास्त्र के द्वारा विकोक का शिर छेदन कर दिया ।१७। महाबली
विकोक मृत्यु को प्राप्त हो गया था । परन्तु जैसे ही उसके भाई कोक
ने उसे देखा वैसे ही वह पुनर्जीवित हो गया । यह देखा कर सभी देव-
गण और स्वयं कल्कि जी भी आश्चर्य करने लगे ।१८।
प्रतिकर्तुर्गदापाणे कोकस्याप्यच्छिनच्छिरः ।
मृतं कोको विकोकस्य दृष्ट्वातारंसमुत्थित ।१९।
पुनस्तौ मिलितौ तेन युयुधाते महाबलौ ।
कामरूपधरौ वीरौ कालमृत्यू इवापरौ ।२०।
खड्गचर्मधरौ कल्कि प्रहरन्तौ पुनः पुनः ।
कल्किः क्रुधा तयोस्तद्वद्द्वाभ्यांशिरसी हृते ।२१।
पुनर्लग्ने समालोक्य हरिश्चिन्तापरोऽभवत् ।
विसत्त्वत्वमथालोक्य तुरगस्तावताडयत् ।२२।
कालकल्पौ दुराधर्षौ तुरगेणार्दितौ भृशम् ।
कल्केस्त जघ्नतुर्बाणैरमर्षताम्रलोचनौ ।२३।
तयोर्भुजान्तर सोऽश्व क्रुधा समदशद्भृशम् ।
तौ तु प्रभिन्नास्थिभुजौ विशस्ताङ्गदकार्मुकौ ०
पुच्छ जगृहतु सप्तेर्गोपुच्छ बालकाविव ॥२४।
फिर कल्कि जी ने विकोक को पुनर्जीवित करने वाले गदापाणि
कोक का ही रच्छेद कर दिया । इस प्रकार कोक मर गया, परन्तु
जैसे ही उसे विकोक ने देखा, वैसे ही वह भी पुनर्जीवित हो उठा ।१९।
तब इच्छानुसार रूप धारण मे समर्थ महाबली कोक-विकोक दोनो मिल
कर कल्किजी के साथ दूसरे काल के समान घोर युद्ध करने लगे ।२०।
वह खड्ग और ढाल धारण कर बारम्बार कल्किजी पर आघात करने
लगे । तब कल्किजी ने अत्यन्त क्रोधित होकर उन दोनो के ही अपने
बाणो से मस्तक उड़ा दिये ।२१। परन्तु, जब दोनो के ही मस्तक अपने-
अपने धड मे स्वय जुड गये, तब तो कल्कि जी को बडी चिन्ता हुई ।
फिर वे कोक-विकोक द्वारा अपने पर प्रहार होते देख कर स्वयं भी
सप्तम-अध्याय-३ ] [ ४१७
उन पर घोर प्रहार करने लगे। २२। युद्ध मे दुर्धर्ष कोक-विकोक
कल्कि जी के अश्व के द्वारा किये गये आघात से अत्यन्त आहत होकर
क्रोधित हो उठे और रक्त वर्ण नेत्र करके कल्कि जी पर भीषण बाण-
वर्षा मे तत्पर हुए ।२३। तब कल्कि जी के अश्व ने अत्यन्त क्रोध पूर्वक
कोक-विकोक के भुजमूल छिन्न कर दिये, उनकी भुजाओ की हड्डियों का
चूर्ण हो गया । धनुष भी बाहुओ के सहित कट कर गिर गये । तब जैसे
कोई शिशु गौ की पूँछ पकड़ लेता है, वैसे ही उन्होंने अश्व की पूँछ को
पकड़ लिया । २४।
धृतपुच्छौ तु तौ ज्ञात्वा सप्तिः परमकोपनः ।
पश्चात्पद्भ्यां दृढं जघ्ने तयोर्वक्षसि वज्रवत् । २५।
त्यक्तपुच्छौ मूच्छितौ तौ तत्क्षणात्पुनरुत्थितौ ।
पुरतः कल्किमालोक्य बभाषाते स्फुटाक्षरौ । २६।
ततो ब्रह्मा तमभ्येत्य कृताञ्जलिपुटः शनैः ।
प्रवाच कल्किं नैवामू शस्त्रास्त्रैर्वधमर्हतः । २७।
कराघातादेककाले उभयोर्निर्मितो वधः ।
उभयोर्दर्शनादेव नोभयोर्मरणं क्वचित् ।
विदित्वेति कुरुष्वात्मन्युभपञ्चानयोर्वधम् । २८।
इति ब्रह्मवचः श्रुत्वा त्यक्तशस्त्रास्त्रवाहनः ।
तयोः प्रहरतोः स्वैरं कल्किर्दानवयोः क्रुधा ।
मुष्टिभ्यां वज्रकल्पाभ्यां बभञ्ज शिरसी तयोः । २९।
तौ तत्र भग्नमस्तिष्कौ भग्नशृङ्गागाविव ।
पेततुर्दिवि देवानां भयदौ भुवि बाधकौ । ३०।
जैसे ही उन्होंने अश्व की पूँछ पकड़ी वैसे ही अश्व ने अत्यन्त
क्रोधित होकर अपने पिछले पैरो के द्वारा कोक-विकोक के वक्षस्थल मे
वज्र के समान प्रहार किये ।२५। जिससे वे दोनो राक्षस अश्व की पूँछ
को छोड कर पृथिवी पर गिरते हुए मूच्छित हो गए । परन्तु, उन्हे
तुरन्त ही चेत हो गया और वे कल्कि जी को सामने देख कर युद्ध के
४१८ ] कल्क-पुराण
निमित्त पुन, ललकारने लगे ।२६। तभी ब्रह्मा जी वहा आये और
कल्किजी से हाथ जोड कर बोले कि हे प्रभो ! यह कोक-विकोक शस्त्रा-
स्त्रो से मृत्यु को प्राप्त नही हो सकते ।२७। इन दोनो को एक समय मे
ही थप्पड मार कर इनका वध कर दीजिये । क्योकि जब तक यह दोनो
परस्पर एक दूसरे को देखेगे, तब तक इनकी मृत्यु सभव नही है । अत
आप इसी प्रकार इनको मारिये ।२८। ब्रह्माजीके वचन सुन कर कल्किजीने
शस्त्रास्त्र और वाहन का परित्याग कर दिया और दोनो दानवो के मध्य
पहुँच कर दोनो हाथो से एक साथ उन दोनो के वज्र के समान मुष्टिका-
प्रहार किया, जिससे उनका मस्तक चूर्ण हो गया ।२६। देवताओ के
लिए भयप्रद और सब जीवो का अनिष्ट करने मे तत्पर वे दोनो दानव
मस्तको के चूर्ण होने से टूट कर गिरते हुए पर्वत-शिखरो के समान
धरती पर आ गिरे ।३०।
तद्दृष्ट्वा महदाश्चर्य्यं गन्धर्वाप्सरसा गणा ।
ननृतुर्जगुस्तुष्टुबुश्च मुनय सिद्धचारणाः ।
देवाश्च कुसुमासारैर्ववर्षुर्हर्षमानसाः ।३१।
दिवि दुन्दुभयो नेदु प्रसन्नाश्चाभवन्दिश. ।
तयोर्वधप्रमुदितः कविद्दशसहस्रकान् ।
साश्वान्महारथान्साक्षाद्दहनद्दिव्यसायकै.
प्राज्ञः शतसहस्राणा योधना रणमूर्द्धनि ।
क्षय निन्ये सुमन्त्रस्तु रथिना पञ्चविंशतिः ।३३।
एवमन्ये गार्ग्यभर्ग्यविशालाद्या महारथान् ।
निजघ्नुः समरे क्रुद्धा निषादानम्लेच्छबर्बरान् ।३४।
एव विजित्य तान्सर्व्वान्कल्किर्भूपगणैः सह ।
शय्याकर्णेन भल्लाटनगरञ्जेतुमाययौ ।३५ः
नानावाद्यैर्लोकसङ्घैर्वरास्त्रैर्नानावस्त्रैर्भूषणैर्भूषिताङ्गः
नानावहेश्चामरैर्वीज्यमानैर्योतियोद्धु कल्किरत्युग्रसेन ३६
यह देख कर अत्यन्त आश्चर्य मे भरे गंधर्व और अप्सराएं
सप्तम अध्याय-३ ] [ ४१६
नृत्य-गान मे तत्पर हुए तथा देवता, मुनिगण, सिद्धगण और चारणादि
प्रसन्न हृदय मे पुष्प बरसाने लगे ।३१। कोक-विकोक का सहार हुआ
देख कर कवि ने उत्साह पूर्वक अपने दैत्य शत्रु-पक्ष के दस हजार महा-
रथियो को नष्ट कर दिया ।३२। प्राज्ञ के द्वारा एक लाख वीर सैनिको
और सुतन्त्रक के द्वारा पच्चीस रथी मृत्यु को प्राप्त हुए ।३३। इसी
प्रकार गर्ग्य, भर्ग्य और विशालादि ने भी निषाद, म्लेच्छ और बर्बरो का
क्रोध पूर्वक सहार कर दिया ।३४। इस प्रकार विजय को प्राप्त हुए
कल्किजी अपनी विशाल सेना के सहित युद्ध के निमित्त आगे बढ़े । उस
समय अनेक प्रकार के बाजे बजने लगे । श्रेष्ठ शस्त्रास्त्र धारी वीर उनके
साथ-साथ चल रहे थे । अनेक प्रकार के वाहन उस सेना मे आ गये थे ।
सब ओर से कल्किजी पर चमर ढोरे जा रहे थे ।३५-३६।
तृतीयांश —
अष्टम अध्याय
सेनागणै परिवृतः कल्किर्नारायण प्रभु ।
भल्लाटनगर प्रायात्खड्ग् धृक्सप्तिवाहन ।१।
स भल्लाटेश्वरो योगी ज्ञात्वा विष्णु जगत्पतिम् ।
निजसेनागणैः पूर्णो योद्धुकामो हरि ययौ ।२।
स हर्षोत्पुलक श्रीमान्दीर्घाङ्गः कृष्णभावन ।
शशिध्वजो महातेजा गजायुतबलः सुधी ।३।
तस्य पत्नी महादेवी विष्णुव्रतपरायणा ।
सुशान्ता स्वामिन प्राह कल्किना योद्धुमुद्ययम् ।४।
नाथ कान्त जगन्नाथ सर्वान्तर्यामिन प्रभुम् ।
कल्कि नारायण साक्षात्कथं त्वं प्रहरिष्यसि ।५।
सुशान्ते परमो धर्म्मः प्रजापतिविनिर्मित ।
युद्धे प्रहार (सर्वत्र गुरौ शिष्ये हरेरिव ।६।
सूत जी बोले — तदनन्तर अपने अश्व पर आरूढ हुए कल्कि जी
खडग धारण किये हुए, सेना के सहित भल्लाट नगर मे पहुँचे ।१।
योगिराज भल्लाट नरेश ने कल्कि जी को साक्षात् जगदीश्वर विष्णु
जाना और वह उनसे युद्ध करने के लिए सेना सहित नगर से बाहर
चले ।२। उस समय वह दीर्घाग, श्रीमान्, कृष्ण भक्त, महाबली एव
महा तेजस्वी राजा शशि ध्वज हर्ष से पुलकित हो रहे थे ।३। उन राजा
की पत्नी विष्णु व्रत-परायणा महादेवी सुशान्ता थी । उसने जब अपने
पति को कल्कि जी से युद्ध के लिए जाने को उद्यत देखा तब वह कहने
लगी ।४। हे नाथ ! हे स्वामिन् ! कल्कि जी तो साक्षात् जगन्नाथ विष्णु
४२०
अष्टम अध्याय-३ ] [ ४२१
और सर्वान्तर्यामी है। आप उन पर प्रहार कैसे कर सकेंगे ? ।५।
शशिध्वज बोले—हे सुशान्ते ! प्रजापति ब्रह्माजी ने जो धर्म निश्चित
किया है, उसके अनुसार युद्धेच्छुक गुरु, शिष्य अथवा नारायण ही
क्यो न हो, उन सब पर प्रहार करना चाहिए ।६।
जीवतो राजभोग स्यान्मृत स्वर्गे प्रमोद्ते ।
युद्धे जयो वा मृत्युर्वा क्षत्रियाणा सुखावह ।७।
देवत्व भूपतित्व वा विषयाविष्टकामिनाम् ।
उम्पदाना भवेदेव न हरे पादसेविनाम् ।८।
त्व सेवकः स चापीशस्त्व निष्काम स चाप्युद्म ।
युवयोर्युद्धमिलन कथ मोहाद्भविष्यति ।६।
द्वन्द्वा तीते यदि द्वन्द्वमोध्वरे सेवके तथा ।
देहावेशाल्लीलयैव सा सेवा स्यात्तथा मम ।१०।
देहावेशादीश्वरस्य कमान्या दंहिका गुण ।
मायाङ्ग यदि जायन्ते विषयाश्च न कि तथा ।११।
ब्रह्मात्रो ब्रह्मतेशस्य शरीरित्वे शरीरिता ।
सेवकस्याभेददृशस्तेवेव जन्मलयोदयाः ।१२।
यदि युद्ध भूमि से सकुशल लोट आवे तो वह अखण्ड राज्य का
भोगने वाला होता है और यदि मृत्यु हो जाय तो स्वग की प्राप्ति होती
है। इस प्रकार क्षत्रियो के लिये विजय और मरण दोनो मे ही सुख
की उपलब्धि है ।७। सुशान्ता ने कहा-हे नाथ ! कामी अथवा विषया-
सक्त पुरुषो के लिए ही युद्ध मे विजय अखण्ड राज्य के देने वाली
और मृत्यु देवत्व प्रदान करने वाली होती है। परन्तु हरि-चरणो के
सैदको को उससे क्या प्रयोजन है ? ।८। आप हरि-सेवक है। वह
ईश्वर आप निष्काम को फल प्रदान नही करेगे । तब आप दोनो मे
मोह पूर्वक युद्ध कैसे सभव है ? ।६। शशिध्वज बोले—परम पुरुष
परमात्मा तो सुख दुःख रूपी सब द्वन्दो से परे है। परन्तु उनके देह
धारण कर लेने पर उन ईश्वर और सेवक मे युद्ध होने लगे तो उसे
४२२ ] [ कल्कि पुराण
सेवा-स्वरूप विलाप लीला मात्र ही समझना चाहिये ॥१०। ईश्वर के
अवतार धारण करने पर कामादि माया अंश रूप दैहिक गुणों का
समन्वित होना भी अनिवार्य है । जब कामादि विषयों का आरोपित
होना देह-धर्म ही है, तो उनके शरीर मे भी वह क्यो नही व्याप्त होगे ?
।१। पूर्ण ब्रह्मभाव सम्पन्न ईश्वर ब्रह्म कहे जाते है और जब वह शरीर
धारण कर लेते हैं तब उन्हें शरीरिता कहते है । सेवक की भेद दृष्टि
के लय होने अर्थात् अभेद-ज्ञान की उपलब्धि होने पर उसका जन्म लय
और उदय भी उसी प्रकार सम्भव है ।१२ ।
सेव्यसेवकता विष्णोर्माया सेवेति कीर्त्तिता ।
द्वैताद्वैतस्य चेष्टैषा त्रिवर्गजनिका सताम् ॥१३।
अतोऽहं कल्किना योद्धुं यामि कान्ते स्वसेनया ।
त्वञ्च पूजय कान्तेऽद्य कमलारतिमीश्वरम् ॥१४।
कृतार्थोऽहं त्वया विष्णुसेवासम्मिलितात्मना ।
स्वामिन्निह परत्रापि वैष्णवी प्रथिता गति ॥१५।
इति तस्या वल्गुवाग्भिः प्रणतायाः शशिध्वजः ।
आत्मानं वैष्णवं मेने साश्रुनेत्रो हरिं स्मरन् ॥१६।
तामालिङ्ग्य प्रमुदितः शूरैर्बन्धुभिरावृतः ।
वहन्नाम स्मरन्नूरुं वैष्णवैर्योद्धुम ययौ ॥१७।
गत्वा तु कल्किसेनाया विद्राव्य महती चमूम् ।
शय्याकर्णाग्रणीर्वीरैः सन्नद्धै रुचितायुधैः ॥१८।
सेव्य-सेवक भाव ही सेवा है । यह कार्य विष्णु-माया का ही
है । इस द्वैताद्वैत चेष्टा के द्वारा ही सत्कर्मी पुरुष त्रिवर्ग को प्राप्त
कर लेते हैं ।१३। हे कान्ते ! यही कारण है कि मैं अपनी सेना के सहित
कल्किजी से युद्ध करने के लिए प्रस्थान कर रहा हूँ । हे प्रिये ! इधर
तुम कमलापति भगवान् विष्णु का पूजन करो ।१४। सुशान्ता ने कहा—
हे नाथ ! आप विष्णु सेवा द्वारा उन्हीं मे लीन हो गये, इससे मैं भी
धन्य हो गई हूँ । इहलोक और परलोक मे भगवान् विष्णु की सेवा के
यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ पंक्ति-दर-पंक्ति प्रस्तुत है:
अष्टम अध्याय ] [ ४२३
अतिरिक्त अन्य कोई गति नही ।१५। सुशान्ता के यह विनम्र वचन
सुन कर राजा के नेत्रो मे हर्षाश्रु छा गये और वे अपने को परम
वैष्णव मानते हुए भगवान् विष्णु का स्मरण करने लगे ।१६। उन्होने
अपनी प्रिय पत्नी को हृदय से लगो लिया और फिर अपने वीर वैष्णव
सैनिको के सहित विष्णु नाम का स्मरण करते हुए रण भूमि के लिये
चल दिये ।१७। उन्होने कलिक-सेना मे प्रविष्ट होकर उनकी विशाल-
सेना को द्रवित कर दिया । उस समय महाबली शय्या कर्णगण आयुधो
से सुसज्जित हुए उनसे युद्ध मे तत्पर हुए ।१८।
शशिध्वजसुतः श्रीमान्सूर्यकेतुर्महाबल ।
मरुभूपेन युयुधे वैष्णवो धन्विनां वरः ।१९।
तस्यानुजो वृहत्केतुः कान्तः कोकिलनिस्वनः ।
देवापिना स युयुधे गदायुद्ध विशारदः ।२०।
विशाखयूपस्तुभूपस्तु शशिध्वजनृपेण च ।
रुधिराश्वो धनुर्धारी लघुहस्त प्रतापवान् ।
रजस्यनेन युयुधे भर्ग्य शान्तेन धन्विना ।२२।
शूलै प्रासैर्गदाघातैर्बाणशक्त्यष्टितोमरै ।
भल्लै खड्गैर्भुशुण्डीभि कुन्तै समभवद्रणः ।२३।
पताकाभिर्ध्वजैश्चिष्टमैस्तोमरैश्छत्रचामरै
प्रौद्धूतधूलिपटलैरन्धकारो महानभूत ।२४।
मह बली, धनुर्धारी एव परम वैष्णव राज-पुत्र सूर्य केतु राजा
मरु से युद्ध करने लगा ।१९। सूर्यकेतु का छोटा भाई बृहत्केतु कोकिल
के समान मधुरवाणी वाला और अत्यन्त कमनीय होते हुए भी गदा
युद्ध मे पार गत था, वह राजा देवापि के साथ संग्राम मे तत्पर हुआ
।२०। हाथियो से सम्पन्न और विविध प्रकार के शस्त्रास्त्रो से सुसज्जित
विशाखयूप-नरेश राजा शशिध्वज से युद्ध करने लगे ।२१। लाल अश्व
पर आरोहण किये हुए हस्त लाघव सम्पन्न धनुर्धारी एवं प्रतापी भर्ग्य
धूलिमयो पृथिवी पर धनुर्धारी शान्त से युद्ध मे भिड गया ।२२। इस
४२४ ] [ कल्कि पुराण
प्रकार रणक्षेत्र मे सब ओर से शूल, प्रास, गदा, बाण, शक्ति, यष्टि,
तोमर, भाले, खड्ग, भुशु डी और कुन्त आदि अस्त्र-शस्त्र चलने लगे
।२३। उस समय छत्र, चमर, ध्वजा, पताका आदि की छाया और
बहुत धूल उडने से रणभूमि मे अन्धकार छा गया ।२४।
गगनेऽजुघना देवा केवा वास न चक्रिरे ।
गन्धर्वे साधुसन्दभैर्गायन्तैरमृतायनै. ।२५।
द्रष्टु समागता, सर्वे लोका, समरमद्भुतम् ।
शखदुन्दुभिसन्नादैरास्फोटैर्बृं हितैरपि ।।२६
ह्रेषितैर्योधनोत्कृष्टैर्लोकावमूका इभवन् ।
रथिनो रथिभि साक पदात्राश्च पदातिभि ।।२७।।
हया हयैरैभाश्चेभै समरोऽमरदानवै ।
यथामवत्स तु घनो यमराष्ट्रविवर्द्धन २८।।
शशिध्वजचमूनाथै कल्किसेनाधिप सह ।
निपेतु सैनिका भूमौ छिन्नबाह्वङ्घ्रिकन्धराः ।२६।।
धावन्तोऽतिब्रुवन्तश्च विकुर्वन्तोऽसृगुक्षिता ।
उपर्युपरि सच्छन्ना गजाश्वरथमर्दिताः ।।३०।।
गगन मण्डल मे स्थित हुए देवगण इस सग्राम को देख रहे थे ।
गधर्व भी अमृत-ध्वनि मे गाते हुए उस युद्ध को देखने के लिए आ गये
थे ।२५। सभी लोक उम अद्भुत सग्राम को देखने के उद्देश्य से वहाँ
आ गये थे । शख और नक्कारे बज रहे थे । परस्पर धौल मारने से,
हाथियो की चिघाड से, अश्वो के हिनहिनाने से तथा शस्त्रास्त्रो के टक-
राने से जो शब्द निकल रहे थे, उनके मिलने से रणभूमि गूँज रही थी ।
सभी लोक मूक जैसे लग रहे थे, क्योकि किसी को किसी की बात सुनाई
नही देती थी, रथी रथी से, पैदल पैदल से, घुडसवार घुडसवार से भिड
रहे थे । देवासुर-सग्राम के समान भीषण यह युद्ध यमराष्ट्र की वृद्धि
कर रहा था ।२६-२८ । कल्किजी के सेनापतियो से भिडे हुए शंशिध्वज
के सेनापति एवं वीरगण शिर कटा कर पृथिवी पर गिर रहे थे ।२६।
अष्टम अध्याय-३ ] [ ४२५
आहत होकर कोई भाग रहा है, कोई चीत्कार कर रहा है, कोई आर्त्त-
नाद कर रहा है, किसी पर रक्त की धार पड रही है, कोई एक-दूसरे से
गूँथे हुए ही पृथिवी पर गिर रहे हैं तथा कोई हाथी या अश्व के पावो
अथवा रथो के पहियो से ही कुचले जा रहे हैं ।३०।
निपेतु प्रधरे वीरा. कोटिकोटिसहस्रशः ।
भूते सानन्दसन्दोहा. स्रवन्तो रुधिरोदकम् ॥३१॥
उष्णीषहंसा सच्छिन्न गजरोघोरथप्लवा. ।
करोरुमीनाभरणमसिकाच्छानवालुका ३२
एव प्रवृत्ता सग्रामे नद्य सद्योऽतिदारुणा ।
सूर्यकेतुस्तु मरुणा सहिनो युयुधे बली ॥३३॥
कालकल्पो दुराधर्षा मरु बाणैरताडयत् ।
मरुस्तु तत्र दशभिर्मार्गणैर्दर्रदयद्भृशम् ॥३४॥
मरुबाणाहतो वीरा सूर्यकेतुरमर्षित ।
जघान तुरगान्कोत्पापदोद्धातेन तद्रथम् ॥३५॥
चूर्णयित्वाऽथ तेनापि तस्य वक्षस्यताडयत् ।
गदाघातेन तेनापि मरुमूर्च्छामवापह ॥३६॥
इस प्रकार, इस युद्ध मे हजारों करोड वीर नाश को प्राप्त हुए ।
रणक्षेत्र मे रक्त की नदी बह चली । इस नदी के प्रवाह को देख कर
भूत-पिशाचादि अत्यन्त आनन्दित हुए ।३१। इम लोहित नदी मे बहती
हुई पगडिया सरोबरो मे सुशोभित हस के समान प्रतीत होती थी ।
उसमें गिरे हुए हाथी ऐसे लगते थे जैसे टापू हो । रथ उसमे नावो के
समान तैरने लगे और कटे हुए हाथ-पांव मच्छ जैसे लगने लगे । उसमे
गिरे हुए खड्ग ऐसे लगते थे मानो स्वर्णिम रेती चमक रही हो ।३२। इस
प्रकार रणक्षेत्र मे यह अत्यन्त दारुण नदी बहने लगी । सूर्यकेतु मरु के
साथ युद्ध कर रहा था ।३३। काल के समान विकट सूर्यकेतु के बाणो से
मरु आहत हो गये तब मरु ने भी दश बाणो से सूर्यकेतु को आहत कर
दिया ।३४। मरु के बाणो से आहत हुए सूर्यकेतु ने मरु के सभी अश्व
४२६ ] कल्कि पुराण
मार डाले और पदाघात से रथ तोड डाला । फिर मरु के हृदय पर
भीषण गदाघात किया, जिससे वह मूच्छित होकर पृथिवी पर गिर
पडे ।३५-३६।
सारथिस्तमपोवाह रथेनान्येन धर्म्मवित् ।
बृहत्केतुश्च देवापि बाणै प्राच्छादयद्बली ॥३७॥
धनुर्विकृष्य तरसा नीहारेण यथा रविम् ।
स तु बाणमय वर्षं परिवार्य्य निजायुधै ॥३८॥
बृहत्केतुं दृढ जघ्ने कङ्क पत्रै शिलाशितै. ।
भिन्न शूलमथालोक्य धनुर्गृह्य पत्रिभि ॥३६॥
शितधारै स्वर्ण पुखैर्गाद्ध्र्पत्रैरयोमुखै ।
देवापिमाश्रुगैर्जघ्ने बृहत्केतु ससैनिकम् ॥४०॥
देवापिस्तद्धनुर्दिव्य चिच्छेद निशितै शरै ।
छिन्नधन्वा बृहत्केतु खड गपाणिजिघासया ॥४१॥
तब मरु का धर्मवित् सारथि उन्हे उठा कर अन्य रथमे ले गया ।
उधर महाबली बृहत्केतु ने देवापि पर बाण-वर्षा की ।३७। जैसे सूर्य
कुहरे से आच्छादित हो जाता है, वैसे ही बाणो से आच्छादित देवापि ने
तुरन्त धनुष लेकर शत्रु की बाण वर्षा को अपनी बाण वर्षा से काट
दिया ।३८। बृहत्केतु ने शान चढे हुए बाणो से अपने शूल को भी नष्ट
हुआ देख कर पुन; धनुष उठाया और उस पर स्वर्ण जटित, गृद्ध पख
के समान तथा लोह-मुख वाले तीक्ष्ण बाण चढा कर देवापि पर सैन्य
सहित भीषण प्रहार किये । ३६-४०। परन्तु बृहत्केतु के उस दिव्य धनुष
को देवापि ने अपने तीक्ष्ण बाणो से काट दिया । तब देवापि को मारने
के विचार से वृहत्केतु ने हाथ मे खड्ग ग्रहण किया ।४१।
देवापे: सारथि साश्व जघ्ने शूरो महामृधे ।
स देवापिर्धनुस्त्यक्त्वा तलेनाहत्य त रिपुम् ॥४२॥
भुजयोरन्तरानीय निष्पिपेष स निर्दय: ।
तं द्वयष्टवर्ण निष्क्रान्तं मूच्छितं शत्रुणुर्दितम् ॥४३॥
अष्टम अध्याय ] [ ४२७
अनुजं वीक्ष्य देवापिमूर्ध्नि सूर्यध्वजोऽवधीत् ।
मुष्टिना वज्रपातेन सोऽपतन्मूर्च्छितो भुवि ।
मूच्छितस्थं रिपुं क्रोधासेनागणमताडयत ॥४४॥
शशिध्वज सर्वजगन्निवास कल्कि पुरस्तादभिसूर्यवर्चसम्
श्याम पिशङ्गाम्बरमम्बुजेक्षणं ।
वृहद्भुजं चारुकिरीटभूषितम् ॥४५॥
नानामणिवातचिताङ्गशोभया निरस्तलोकेक्षणहृत्तमोमयम्
विशाखयू पादिभिरावृतं प्रभु ददर्श धर्मेण कृतेन पूजितम् ॥४६
फिर उस घोर युद्ध मे बृहत्केतु ने देवापि के घोड़ो और सारथि
को मार डाला । तब देवापि ने भी धनुष छोड कर शत्रु पर हथेली का
प्रहार किया ।४२। फिर उसे दोनो भुजाओ मे दबा कर मर्दन करने
लगा । उस समय अट्ठाईस वर्षीय वह राजपुत्र बृहत्केतु पीडित होता
हुआ मूच्छित हो गया ।४३। अपने छोटे भाई की ऐसी दशा देखकर
सूर्यकेतु ने देवापि के मस्तक पर वज्र के समान मुष्टिका-प्रहार किया,
इससे देवापि मूच्छित होकर गिर पडा । तब शत्रु को मूच्छित जान कर
सूर्यकेतु उसकी सेना पर प्रहार करने लगा ।४४। इधर राजा शशिध्वज
ने उस रणक्षेत्र में सूर्यके समान तेजोमय, विश्वाधार, कमलाक्ष, पीताम्बर
धारी, विशाल भुजा वाले और सुरम्य किरीट से सुशोभित कल्किजी को
अपने सामने देखा ।४५। अनेक मणियो से सुसज्जित अङ्ग वाले, प्राणियो
के नेत्रो और हृदयोँ के अन्धकार को नष्ट करने वाले कल्किजी के सब
ओर विशालयूप नरेश जैसे अनेक राजागण नत-मस्तक खडे हैं तथा
सत्य और धर्म उनका पूजन कर रहे हैं ।४६।
•••
तृतीयांश—
नवम अध्याय
हृदि ध्यानास्पद रूपं कल्केर्दृष्ट्वा शशिध्वजः ।
पूर्णं खड्गधरं चारुतुरगारूढमब्रवीत् ॥१॥
धनुर्बाणधरं चारु-विभूषणावरोङ्कतम् ।
पापतापविनाशार्थमुद्यतं जगतां परम् ॥२॥
प्राह तं परमात्मानं हृष्टरोमा शशिध्वजः ।
एह्येहि पुण्डरीकाक्ष ! प्रहारं कुरु मे हृदि ॥३॥
अथवात्मन् बाणभिया तमोऽन्धे हृदि मे विश ।
निर्गुणस्य गुणज्ञत्वमद्वैतस्यास्त्रताडनम् ॥४॥
निष्कामस्य जयोद्योगसहायं यस्य सैनिकम् ।
लोकाः पश्यन्तु युद्धे मे द्वैरथे परमात्मनः ॥५॥
परबुद्धिर्यदि दृढा प्रहर्त्ता विभवे त्वयि ।
शिवविष्णोर्भेदकृते लोकं यास्यामि सयुगे ॥६॥
सूतजी ने कहा—हे ऋषियो ! कल्किजी का हृदय में ध्यान के
योग्य, सुन्दर, खड्गधारी एवं तुरंगारूढ पूर्ण स्वरूप देख कर शशि-
ध्वज ने विचार किया।१। धनुर्बाणधारी सुन्दर आभूषणों से विभूषित
जगदीश्वर भगवान् कल्कि का अवतार संसार के पाप-ताप के निवारणार्थ
हुआ है ।२। राजा शशिध्वज ने पुलकित शरीर से परब्रह्म कल्किजी के
प्रति निवेदन किया—हे पुण्डरीकाक्ष ! आइये, मेरे हृदय पर प्रहार
कीजिये ।३। हे परमात्मन् ! मेरे बाणों की मार से बचने के लिए मेरे
तमाच्छादित हृदय में आकर छिप जाओ । जो निर्गुण होकर भी गुणों
के ज्ञाता हैं, जो अद्वैत होकर भी अस्त्र प्रहार में तत्पर हैं तथा जो
निष्काम होकर भी विजय की इच्छा से सैन्य-संहार कर रहे हैं मैं उन्हीं
नवम-अध्याय ] ४२६
भगवान् के साथ द्वैरथ युद्ध मे तत्पर हो रहा हूँ। सभी लोक इसका
अवलोकन करें। ४-५। मैं आप विभु पर प्रहार करूँगा। परन्तु प्रहार
करते समय भी यदि मैं आपको ब्रह्म से भिन्न समझने लगूँ तो शिव
और विष्णु मे भेद जानने वाले को जिस लोक की प्राप्ति होती है, मुझे
उसी लोक की प्राप्ति हो ।६।
इति राज्ञो वच श्रुत्वा अक्रोध. क्रुद्धवद्दिभुः ।
बाणैस्ताडयतस्तस्य धृतायुधमरिन्दमम् ॥७॥
शशिध्वजरतत्प्रहारमगणय्य वरायुधैः ।
तं जघ्ने बाणवर्षेण धाराभिरिव पर्वतम् ॥८॥
तद्बाणवर्षभिन्नान्तः कल्क परमकोपनः ।
दिव्यै शस्त्रास्त्रसघातैस्तयोर्युद्धमवर्त्तत ॥६॥
ब्रह्मास्त्रस्य च ब्रह्मास्त्रं वायव्यस्य च पार्वतै. ।
आग्नेयस्य च पार्जन्यै. पन्नगस्य च गारुडै ॥१०॥
एव नानाविधैरस्त्रै रन्योन्यमभिजघ्नतुः ।
लोका; सपाला सत्रस्ता युगान्तमिव मेनिरे ॥११॥
देवा बाणाग्निसत्रस्ता अगमन्खगमाः किल ।
ततोऽतिवितथोद्योगो वासुदेवशशिध्वजौ ॥१२॥
निरस्त्रौ बाहुयुद्धेन युयुधाते परस्परम् ।
पदाघातैस्तलाघातैर्मुष्टिप्रहर णैस्तथा ॥१३॥
राजा के इन वचनो को सुन कर क्रोध से परे कल्किजी क्रोधित
हो उठे । यह देख कर आयुधधारी एव अरिमर्दन राजा शशिध्वज न
उन पर बाण-प्रहार प्रारम्भ किया ।७। जब राजा ने अपने उस प्रहार
को निष्फल हुआ देखा तो वह पर्वत पर वर्षणशील मेघ के समान घोर
बाणो की वर्षा करने लगे ।८। उस बाण-वर्षा से कल्किजी का शरीर
आहत हो गया । तब वे अत्यन्त क्रोध करके आगे बढे । इस प्रकार
दोनो मे घोर युद्ध होने लगा ।६। ब्रह्मास्त्र के द्वारा ब्रह्मास्त्र काटने लगे ।
पार्वतास्त्र से वायव्यास्त्र, मेघास्त्र से आग्नेयास्त्र और गारुडास्त्र से
सर्पास्त्र नष्ट होने लगे ।१०। इस प्रकार विविध भाँति के दिव्यास्त्रो के
द्वारा वे दोनो भीषण प्रहारमे तन्मय थे । इसमे लोक और लोकपाल सभी
यह समझते हुए कि कही आज ही प्रलय न हो जाय, अत्यन्त भयभीत
हुए ।११। बाणाग्नि का देख कर युद्ध देखने के लिए गगन मण्डल मे
एकत्र हुए देवता भयभीत हो गये । दिव्यास्त्रो को व्यथ हुए देख कर
कल्किजी और राजा शशिध्वज दोनो बाहु युद्ध के निमित्त अस्त्र त्याग
कर उतर पडे । फिर पदाघात, करतलाघात और मुष्टिका-प्रहार से
युद्ध होने लगा ।१२-१३ ।
नियुद्धकुशलो वारौ मुमुदाते परस्परम् ।
वराहोद्धूनशब्देन त तलेनाहनद्धरिः ।१४।
स मूर्च्छितो नृपः कोपात्समुत्थाय च तत्क्षणात् ।
मुष्टिभ्या वज्रकल्पाभ्यामवध त्कल्कि मोजसा ।
स कल्किस्तत्प्रहारेण पपात भुवि मूर्च्छित ।।१५।।
धर्म्म. कृतञ्च तं दृष्ट्वा मूर्च्छित जगदीश्वरम् ।
समागतौ तमानेतु कक्षौ तौ जगृहे नृप ।।१३।।
कल्कि वक्षस्युपादाय लब्धार्त्त प्रययौ गृहम् ।
युद्धेन नृपाणामन्येषा पुत्रौ दृष्ट्व सुदुर्ज्जयौ ।।१७।।
दोनो ही रणविद्या मे अत्यन्त कुशल थे और परस्पर एक
दूसरे के कौशल को देखते हुए प्रसन्न हो रहे थे । सृष्टि के आरम्भ
मे पृथिवी का उद्धार करने के लिए वाराह भगवान् ने जैसा शब्द किया
था, कल्किजी द्वारा किये गये करतलाघात से वैसा ही भीषण शब्द
हुआ ।१। उस आघात से राजा शशिध्वज मूर्च्छा को प्राप्त हो गए ॰
फिर तुरन्त ही सचेत होकर उन्होने कल्किजी पर वज्र के समान मुष्टि
प्रहार किया, जिससे कल्किजी अचेत होकर पृथिवी पर लेट गये ।१५।
तब जगत्पति कल्किजी को मूर्च्छित देख कर धर्म और सत्युग, वहाँ आकर
उन्हे ले जाने लगे । परन्तु राजा शशिध्वज ने उन दोनो को कांख मे
दबा लिया ।१६। और कल्किजी को अङ्क मे उठा कर कृत कृत्य होते हुए
नवम अध्याय ] [ ४३१
उन्हे अपने घर ले गये और सोचने लगे कि मेरे दोनो पुत्रो को भी युद्ध
मे कोई राजा जीत नही सकता है ।१७।
कल्कि सुराधिपपति पृधने विजित्य धर्म्म कृतञ्च ।
निजकक्षयुगे निधाय । हर्षोल्लसद्धृदय उत्पुलक ।
प्रमाथी गत्वा गृह हरिगृहे ददृशे सुशान्ताम् ॥१८॥
दृष्ट्वा तस्या. सुललितमुख वैष्णवीनाञ्च मध्ये
गायन्तीना हरिगुणकथारतामथ प्राह राजा ।
देवानाना विनयवचसा शम्भले जन्मनावा ।
विद्यालाभ परिणयविधि म्लेच्छपाषण्डनाशम् ॥१६॥
कल्किः स्वय हृदि समायमिहागोऽद्धा मूर्च्छिच्छ-
लेन तव सेवनीक्षणार्थम् । धर्म्म कृतञ्च मम कक्षा-
युगे सुशान्ते ! कान्ते विलोकय समर्च्यय सविधेहि ॥२०॥
इति नृपवचसाविनोदपूर्णा हरिकृत धम्म युत प्रणम्य नाथम्
सह निजसखिभिनंनर्त्त रामा हरिगुणकीर्त्तनवर्त्तना विलज्जा।
इस प्रकार देवराज इन्द्र के भी स्वामी कल्किजी को हरा कर
और धर्म तथा सत्युग को काँख दवा कर राजा शशिध्वज प्रसन्न हृदय
से सेनाओ का मर्दन करता हुआ अपने घर को गया और वहाँ उसने
अपनी भार्या सुशान्ता को विष्णु मन्दिर मे स्थित पाया ।१८। उसके
चारो ओर वैष्णवी नारियां बैठ कर विष्णु-गुण-गान में तन्मय थी ।
राजा ने सुशान्ता का सुन्दर मुख देखते हुए कहा—हे सुशान्ते ! देवताओ
की प्रार्थना पर जो शम्बल ग्राम मे अवतीर्ण हुए हैं और जिन्होने विद्या
प्राप्त कर म्लेच्छो और पाखण्डियो को नष्ट कर दिया है, वही हृदयो मे
विहार करने वाले कल्कि भगवान अपनी माया द्वारा मूर्च्छा रूपी छल से
आवृत होकर तुम्हारी शक्ति की परीक्षा लेने के निमित्त यहाँ पधारे हैं ।
मेरी काँखो मे यह धर्म और सत्युग दोनो दबे हुए है, तुम इनका पूजन
करो ।१६-२०। राजा के यह विनोदपूर्ण वचन सुन कर रानी बडी
प्रसन्न हुई और धर्म तथा सत्युग के सहित कल्किजी को उसने प्रणाम
किया । फिर लज्जा को छोड कर सखियो के सहित हरि नाम संकीर्त्तन
और नृत्य करने मे तत्पर हुई ।२१।
तृतीयांश —
दशम अध्याय
जयहरेऽमराधीशसेवित तव पदाम्बुज । भूरिभूषणम्
कुरु ममाग्रतः साधुसत्कृत त्यज महामते । मोहमात्मनः ।।१।।
तव वपुर्जगद्रूपसम्पदा विरचितं सता मानसे स्थितम् ।
रतिपतेर्मनोमोहदायक कुरु विचेष्टित कामलम्पटम् ।।२।।
तव यशो जगच्छोकनाशन मृदुकथामृतप्रीतिदायकम् ।
स्मितसुधोक्षित चन्द्रवन्मुख तवकरोत्वल लोकमङ्गलम् ।।३।।
मम पतिस्त्वय सर्वदुर्जयो यदि तवाप्रिय कर्मणाचरेत् ।
जहि तदात्मनः शत्रुमुद्यत कुरु कृपा न चेदोटगीश्वर ।।४।।
महदहयुत पञ्चमात्रया प्रकृतिजायया निर्मिंत वपु ।
तव निरीक्षणल्लीलया जगत्स्थितिलयोदयं ब्रह्मकल्पितम् ।५।
सुशान्ता बोली—हे हरे ! आपकी जय हो । महामते ! अब
आप अपने इस महोच्छन्न भाव को त्याग कर इन्द्र से भी सेवित,
सुन्दर आभूषणों से विभूषित तथा साधुओ के द्वारा सत्कारित अपने
चरणारविन्द मेरे समक्ष कीजिये ।१। जगत् की श्रेष्ठ सम्पदा से विर-
चित तथा साधुओ के हृदय मे विद्यमान रहने वाला आपका यह देह
कामदेव को भी मोहित करने वाला है । अब आप हमारी कामना पूर्ण
कीजिये ।२। आपके यशगान से जगत् के शोक नष्ट होते हैं, आपके
मुस्कान सुधा सम्पन्न चन्द्र वदन से निकली हुई मधुर वाणी सब को
प्रसन्न करती है । हे प्रभो ! आपका यह मुख लोककल्याण के करने