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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

पृष्ठ 164, कुल 259 में से

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पृष्ठ 164

सप्तम-अध्याय-३ ] [ ४१७
उन पर घोर प्रहार करने लगे। २२। युद्ध मे दुर्धर्ष कोक-विकोक
कल्कि जी के अश्व के द्वारा किये गये आघात से अत्यन्त आहत होकर
क्रोधित हो उठे और रक्त वर्ण नेत्र करके कल्कि जी पर भीषण बाण-
वर्षा मे तत्पर हुए ।२३। तब कल्कि जी के अश्व ने अत्यन्त क्रोध पूर्वक
कोक-विकोक के भुजमूल छिन्न कर दिये, उनकी भुजाओ की हड्डियों का
चूर्ण हो गया । धनुष भी बाहुओ के सहित कट कर गिर गये । तब जैसे
कोई शिशु गौ की पूँछ पकड़ लेता है, वैसे ही उन्होंने अश्व की पूँछ को
पकड़ लिया । २४।
धृतपुच्छौ तु तौ ज्ञात्वा सप्तिः परमकोपनः ।
पश्चात्पद्भ्यां दृढं जघ्ने तयोर्वक्षसि वज्रवत् । २५।
त्यक्तपुच्छौ मूच्छितौ तौ तत्क्षणात्पुनरुत्थितौ ।
पुरतः कल्किमालोक्य बभाषाते स्फुटाक्षरौ । २६।
ततो ब्रह्मा तमभ्येत्य कृताञ्जलिपुटः शनैः ।
प्रवाच कल्किं नैवामू शस्त्रास्त्रैर्वधमर्हतः । २७।
कराघातादेककाले उभयोर्निर्मितो वधः ।
उभयोर्दर्शनादेव नोभयोर्मरणं क्वचित् ।
विदित्वेति कुरुष्वात्मन्युभपञ्चानयोर्वधम् । २८।
इति ब्रह्मवचः श्रुत्वा त्यक्तशस्त्रास्त्रवाहनः ।
तयोः प्रहरतोः स्वैरं कल्किर्दानवयोः क्रुधा ।
मुष्टिभ्यां वज्रकल्पाभ्यां बभञ्ज शिरसी तयोः । २९।
तौ तत्र भग्नमस्तिष्कौ भग्नशृङ्गागाविव ।
पेततुर्दिवि देवानां भयदौ भुवि बाधकौ । ३०।
जैसे ही उन्होंने अश्व की पूँछ पकड़ी वैसे ही अश्व ने अत्यन्त
क्रोधित होकर अपने पिछले पैरो के द्वारा कोक-विकोक के वक्षस्थल मे
वज्र के समान प्रहार किये ।२५। जिससे वे दोनो राक्षस अश्व की पूँछ
को छोड कर पृथिवी पर गिरते हुए मूच्छित हो गए । परन्तु, उन्हे
तुरन्त ही चेत हो गया और वे कल्कि जी को सामने देख कर युद्ध के