सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

पृष्ठ 173, कुल 259 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 173

४२६ ] कल्कि पुराण
मार डाले और पदाघात से रथ तोड डाला । फिर मरु के हृदय पर
भीषण गदाघात किया, जिससे वह मूच्छित होकर पृथिवी पर गिर
पडे ।३५-३६।
सारथिस्तमपोवाह रथेनान्येन धर्म्मवित् ।
बृहत्केतुश्च देवापि बाणै प्राच्छादयद्बली ॥३७॥
धनुर्विकृष्य तरसा नीहारेण यथा रविम् ।
स तु बाणमय वर्षं परिवार्य्य निजायुधै ॥३८॥
बृहत्केतुं दृढ जघ्ने कङ्क पत्रै शिलाशितै. ।
भिन्न शूलमथालोक्य धनुर्गृह्य पत्रिभि ॥३६॥
शितधारै स्वर्ण पुखैर्गाद्ध्र्पत्रैरयोमुखै ।
देवापिमाश्रुगैर्जघ्ने बृहत्केतु ससैनिकम् ॥४०॥
देवापिस्तद्धनुर्दिव्य चिच्छेद निशितै शरै ।
छिन्नधन्वा बृहत्केतु खड गपाणिजिघासया ॥४१॥
तब मरु का धर्मवित् सारथि उन्हे उठा कर अन्य रथमे ले गया ।
उधर महाबली बृहत्केतु ने देवापि पर बाण-वर्षा की ।३७। जैसे सूर्य
कुहरे से आच्छादित हो जाता है, वैसे ही बाणो से आच्छादित देवापि ने
तुरन्त धनुष लेकर शत्रु की बाण वर्षा को अपनी बाण वर्षा से काट
दिया ।३८। बृहत्केतु ने शान चढे हुए बाणो से अपने शूल को भी नष्ट
हुआ देख कर पुन; धनुष उठाया और उस पर स्वर्ण जटित, गृद्ध पख
के समान तथा लोह-मुख वाले तीक्ष्ण बाण चढा कर देवापि पर सैन्य
सहित भीषण प्रहार किये । ३६-४०। परन्तु बृहत्केतु के उस दिव्य धनुष
को देवापि ने अपने तीक्ष्ण बाणो से काट दिया । तब देवापि को मारने
के विचार से वृहत्केतु ने हाथ मे खड्ग ग्रहण किया ।४१।
देवापे: सारथि साश्व जघ्ने शूरो महामृधे ।
स देवापिर्धनुस्त्यक्त्वा तलेनाहत्य त रिपुम् ॥४२॥
भुजयोरन्तरानीय निष्पिपेष स निर्दय: ।
तं द्वयष्टवर्ण निष्क्रान्तं मूच्छितं शत्रुणुर्दितम् ॥४३॥