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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

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पृष्ठ 161

४१४ ] [ कल्कि पुराण
अपने कुल के अग र रूप से सार-हीन होता हुआ अपने गृह मे जा पहुंचा
।४। उधर प्रसाद द्वारा पदाघात को प्राप्त हुए लोभ का शिर कट गया ।
कुत्तो से युक्त उसका रथ छिन्न भिन्न हो गया । तब वह उसे छोड
कर रक्त वमन करता हुआ रण क्षेत्र से भाग खडा हुआ ।५। अभय से
युद्ध करता हुआ क्रोध भी हार गया । उसके छ नेत्रो मे लाली छाई थी ।
चूहो से युक्त दुर्गंध पूर्ण अपने छिन्न-भिन्न रथ को वही पडा छोड कर
वह भी विशमनपुरी मे जा घुसा ।६।
भय सुखतलाघाताद्गतासु र्यपतद्भुवि ।
निरयो मुदमुष्टिभ्या पीडितो यममाययौ ७।
आधिव्याध्यादय सर्वे त्यक्त्वा वाहमुपाद्रवन् ।
नानादेशान्भयोद्विग्न कृतवाणाप्रपीडिताः ।८।
धर्म. कृतेन सहितो गत्वा विशसन कलेः ।
नगर बाणदहनैर्ददाह कलिना सह ।६।
कलिर्विप्लुष्टसर्वाङ्गो मृतदारो मृतप्रज. ।
जगामेको रुदन्दीनो वर्षान्तरमलक्षित. ।१०।
मरुस्तु शककाम्बोजाञ्जघ्नेदिव्यास्त्रतेजसा ।
देवापि· शबरांश्चोलान्बर्बरास्तद्गणानपि ।११।
दिव्यास्त्रशस्त्रसम्पातैर्दयामास वीर्यवान् ।
विशाखयूपभूपालः पुलिन्दान्पुक्कसानपि ।१२।
सुख के तलाघात से आहत हुआ भय प्राण त्याग कर धराशायी
हुआ । प्रीति के मुष्टि प्रहार से पीडित हुआ निरय भी तुरन्त ही यमा-
लय को चला गया ।७। सत्युग के बाणो से आहत हुई आधि-व्याधि
अपने वाहनो का परित्याग करके इधर-उधर भाग गईं ।८। इसके
पश्चात् सत्युग को साथ लेकर धर्म कलि की राजधानी विनशन में
प्रविष्ट हुआ और उसने कलि के सहित सम्पूर्ण नगर को अपनी बाणा-
ग्नि से जला दिया ।६। कलि के सभी अग जल गये । उसकी संतति
और पत्नी भी मरण को प्राप्त हुई और वह स्वय रोता हुआ अप्रकट रूप