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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

८

[काली की महिमा]

• देवी वरदान देने में बहुत चतुर हैं इसलिए उन्हें दक्षिणा कहा
जाता है।
• जिस प्रकार कार्य की समाप्ति पर दक्षिणा फल देने वाली होती है
उसी प्रकार देवी भी सभी फलों की सिद्धि को देती हैं।
• दक्षिणामूर्ति भैरव ने उनकी सर्वप्रथम पूजा की इस कारण भी
भगवती का नाम दक्षिणाकाली है।
• पुरुष को दक्षिण और शक्ति को 'वामा' कहा जाता है। वही वामा
दक्षिण पर विजय पाकर महामोक्ष देने वाली बनी।
• भगवती काली अनादिरूपा आद्या विद्या हैं। हे ब्रह्मस्वरुपिणी एवं
कैवल्यदात्री हैं।
• पाँचों तत्वों तक शक्ति तारा की स्थिति है और सबके अन्त में काली
ही स्थित हैं। अर्थात् जब महाप्रलय में आकाश का भी लय हो
जाता है। तब यही भगवती काली चित्तशक्ति के रूप में विद्यमान
रहती हैं।
• इन्हीं भगवती की वेद में भद्रकाली के रूप में स्तुति की गई हैं।
• ये अजन्मा और निराकार स्वरूपा हैं। भावुक आराधक अपनी
भावनाओं तथा देवी के गुण कर्मों के अनुरूप उनके काल्पनिक
साकार रूप की स्तुति करते हैं। अपने ऐसे भक्तों को भगवती काली
मुक्ति प्रदान करती हैं।
• भगवती काली अपने उपासकों पर स्नेह रखने वाली तथा उनका
कल्याण करने वाली हैं।
• इस प्रकार भगवती की दक्षिणाकाली के नाम से अनेकानेक उपलब्धियाँ
हैं। जिस भक्त को जो भी उपलब्धि हो, या जो भी सिद्धि चाहे उसे
उसी रूप में महाकाली को स्वीकार करना चाहिए।

कालिका अवतरण वर्णन

९
ॐ
॥ कालिकायै विद्महे श्मशानवासिन्यै धीमहि तन्नो घोरे प्रचोदयात् ॥
श्रीकालिका पुराण
कालिका अवतरण वर्णन
पूर्ण रूप से एक ही निष्ठा में रहने वाले हृदय से समन्वित योगियों
के द्वारा सांसारिक भय और पीड़ा के विनाश करने के अनेकों उपाय
किए गये हैं। ऐसे भगवान् हरि के दोनों चरण कमल सर्वदा आप
सबकी रक्षा करें जो समस्त योगीजनो के चित्त में अविद्या के अन्धकार
को दूर हटाने के लिए सूर्य के समान हैं तथा यतिगणों की मुक्ति का
कारण स्वरूप हैं। विभु के जन्म में शुद्धि-कुबुद्धि के हनन करने वाली
है और इन जन्तुओं के समुदाय को विमोहित कर देने वाली है; वह
माया आपकी रक्षा करे। समस्त जगती के आदिकाल में विराजमान
पुरुषोत्तम ईश्वर को (जो नित्य ही ज्ञान से परिपूर्ण हैं उनको) प्रणाम
करके मैं कालिका पुराण का कथन करूँगा।
हिमालय के समीप में विराजमान मुनियों ने परमाधिक श्रेष्ठ
मार्कण्डेय मुनि के चरणों में प्रणिपात करके उनसे कर्मठ प्रभृति
मुनिगण ने पूछा था कि हे भगवान् ! आपने तात्विक रूप से समस्त
शास्त्रों और अंगों के सहित सभी वेदों को सब भली-भाँति मन्थन
करके जो कुछ भी साररूप था वह सभी भाँति से वर्णन कर दिया है।
हे ब्रह्मन् ! समस्त वेदों में और सभी शास्त्रों में जो-जो हमको संशय
हुआ था वही आपने ज्ञानसूर्य के द्वारा अन्धकार के ही समान विनिष्ट
कर दिया है। हे द्विजों में सर्वश्रेष्ठ ! आपके प्रसाद अर्थात् अनुग्रह से हम
सब प्रकार से वेदों और शास्त्रों में संशय से रहित हो गये हैं अर्थात् अब
हमको किसी में कुछ भी संशय नहीं रहा है।

१० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
হে হে হে হে হে হে হে হে হে হে হে হে হে হে হে হে হে হে হে হে হে হে হে হে হে হে হে হে হে হে হে হে হে হে হে হে
हे ब्राह्मण ! जो ब्रह्माजी ने कहा था वह रहस्य के सहित धर्मशास्त्र
आपसे सब ओर से अध्ययन करके हम सब कृतकृत्य अर्थात् सफल
हो गए हैं। अब हम लोग पुनः यह श्रवण करने की इच्छा करते हैं कि
पुराने समय में काली देवी ने हरि प्रभु का जो परमयति और ईश्वर थे,
उन्हें किस प्रकार से सती के स्वरूप से मोहित कर दिया था। जो
भगवान् हरि सदा ही ध्यान में मग्न रहा करते थे, यम वाले और यतियों
में परम श्रेष्ठ थे तथा संसार से पूर्णतया विमुख रहा करते थे, उनको
संक्षोभित कर दिया था अथवा प्रजापति दक्ष की पत्नियों में परम
शोभना सती किस रीति से समुत्पन्न थीं तथा पत्नी के पाणिग्रहण करने
में भगवान शम्भु ने कैसे अपना मन बना लिया था ? प्राचीन समय में
किस कारण से तथा किस रीति से दक्ष प्रजापति के कोप से सती ने
अपनी देह का त्याग किया था अथवा फिर वही सती गिरिवर हिमवान्
की पुत्री के रूप में कैसे समुत्पन्न हुईं ? फिर उस देवी ने भगवान्
कामदेव के शत्रु श्री शिव का आधा शरीर कैसे आहत कर लिया था ?
हे द्विजश्रेष्ठ! यह सभी कथा आप हमारे समक्ष विस्तार के साथ वर्णित
कीजिए । हे विप्रेन्द्र ! हम यह जानते हैं कि आपके समान अन्य कोई
भी संशयों का छेदन करने वाला नहीं है और भविष्य में भी न होगा
सो अब आप यह समस्त वृतान्त बताने की कृपा कीजिए ।
मार्कण्डेय जी कहा-आप समस्त मुनिगण अब श्रवण वह करिये
जो कि मेरा गोपनीय से भी अधिक गोपनीय है तथा परम पुण्य-शुभ
करने वाला, अच्छा ज्ञान प्रदान करने वाला तथा परम कामनाओं को
पूर्ण करने वाला है। इसे प्राचीन समय में ब्रह्माजी ने महान् आत्मा वाले
नारद जी से कहा था। इसके पश्चात् नारद जी ने भी बालखिल्यों के
लिए बताया था। उन महात्मा बालखिल्यों ने यवक्रीत मुनि से कहा था
और यवक्रीत मुनि ने असित नामक मुनि को यही बताया था। हे
द्विजगणों ! उन असित मुनि ने विस्तारपूर्वक मुझको बताया था और मैं
अब पुरातन कथा को आप सब लोगों को श्रवण कराऊँगा । इसके पूर्व
मैं इस जगत् के प्रति परमात्मा चक्रपाणि प्रभु को प्रणिपात करता हूँ।

ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ११
वे परमात्मा व्यक्त और अव्यक्त सत् स्वरूप वाले हैं-वहीं व्यक्ति के
रूप से समन्वित हैं। उनका स्वरूप स्थूल है और सूक्ष्म रूप वाला भी
है, वे विश्व के स्वरूप वाले वेधा हैं, वे परमेश नित्य हैं और उनका
स्वरूप नित्य है तथा उनका ज्ञान भी नित्य है। उनका तेज निर्विकार है।
वे विद्या और अविद्या के स्वरूप वाले हैं, ऐसे कालरूप उन परमात्मा
के लिए नमस्कार है। परमेश्वर निर्मल हैं, विरागी हैं, व्यापी और
विश्वरूप वाले हैं तथा सृष्टि (सृजन) स्थिति (पालन) और अन्त
(संहार) के करने वाले हैं, उनके लिए प्रणाम है।
जिसका योगियों के द्वारा चिन्तन किया जाता है, योगीजन वेदान्त
पर्यन्त चिन्तन करने वाले हैं, जो अन्तर में परम ज्योति के स्वरूप हैं
उन परमेश प्रभु के लिए प्रणाम करता हूँ। लोकों के पितामह भगवान्
ब्रह्माजी ने उनकी आराधना करके समस्त सुर-असुर और नर आदि की
प्रजा का सृजन किया था। उन ब्रह्माजी से दक्ष जिनमें प्रमुख थे ऐसे
प्रजापतियों का सृजन करके मरीचि, अत्रि, पुलह, अंगिरस, ऋतु,
पुलस्त्य, वशिष्ठ, नारद, प्रचेतस, भृगु-इन सब दश मानस पुत्रों का
उन्होंने सृजन किया था। उसी समय में उनके मानस से सुन्दर रूप वाली
वरांगनाओं की समुत्पत्ति हुई थी। वह नाम से सन्ध्या विख्यात हुई थी,
उसका सायं-सन्ध्या का यजन किया करते हैं। उस जैसी अन्य कोई भी
दूसरी वरांगना देवलोक, मर्त्यलोक और रसातल में भी नहीं हुई थी।
ऐसी समस्त गुण-गणों की शोभा से सम्पन्न तीनों कालों में भी नहीं हुई
है और न होगी। वह स्वाभाविक सुन्दर और नीले केशों के भार से
शोभित होती है। हे द्विज श्रेष्ठों! वह वर्षा ऋतु में मोरनी की भाँति
विचित्र केशों के भार से शोभाशालिनी थी। आरक्त और मलिक तथा
कर्णों पर्यन्त अलकों से इन्द्र के धनुष और बाल चन्द्र के सदृश
शोभायमान थी। विकसित नीलकमल के समान श्याम वर्ण से संयुक्त
दोनों नेत्र चकित हिरनी के समान चंचल और शोभित हो रहे थे। हे
द्विज श्रेष्ठों ! कानों तक फैली हुई स्वाभाविक चंचलता से संयुक्त परम
सुन्दर दोनों भौहें थीं जो कामदेव के धनुष के सदृश नील थीं। दोनों

१२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
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भौंहों के मध्य भाग से नीचे और निम्न भाग से विस्तृत और उन्नत
नासिका थी जो मानों ललाट से तिल के पुण्य के ही समान लावण्य
को द्रवित कर रही थी। उनका मुख रक्तकमल की आभा वाला और
पूर्ण चन्द्र के तुल्य प्रभा से समन्वित था जो बिम्ब फल के सदृश अधरों
की अरुणिमाओं और मनोहर शोभित हो रहा था। सौ सूर्य के समान
और लावण्य के गुणों से परिपूर्ण मुख था। दोनों ओर से चिबुक
(थोड़ी) के समीप पहुँचने के लिए उसके दोनों कुच मानों समुद्यत हो
रहे थे। हे विप्रगणों ! उस सन्ध्या देवी के दोनों स्तवन राजीव (कमल)
की कालिका के समान आकार वाले थे, पीन और उत्तुङ्ग निरन्तर रहने
वाले थे। उन कुचों के मुख श्याम वर्ण के थे जो कि मुनियों के हृदय
को भी मोहित करने वाले थे। सभी लोगों ने कामदेव की शक्ति के
तुल्य ही उस सन्ध्या के मध्यभाग को देखा था जिसमें वलियाँ पड़ रही
थीं तथा मध्य भाग ऐसा क्षीण था जैसे मुट्ठी में ग्रहण करने के योग्य
रेशमी वस्त्र था।
उनके दोनों ऊरुओं का जोड़ा ऐसा शोभायमान हो रहा था जो
ऊर्ध्वभाग में स्थूल था और करभ के सदृश विस्तृत था और थोड़ा
झुका हुआ हाथी की सूँड़ के समान था। जो अँगुलियों के दल से
संकुल कुसुमायुध अर्थात् कामदेव के तुल्य ही दिखलाई दे रहा था।
उस सुन्दर दर्शन वाली, शरीर की रोमावली से आवृत मुख पर, जिसके
पसीने की बूँदें झलक रही थीं, जो दीर्घ नयनों वाली, चारुहास से
समन्वित, तन्वी अर्थात् कृश मध्य भाग वाली जिसके दोनों कान परम
सुन्दर थे, तीन स्थलों में गम्भीरता से युक्त तथा छः स्थानों से उन्नत
उसको देखकर विधाता उठकर हृद्गत को चिन्तन करने लगे थे। वे
सृजन करने वाले दक्ष प्रजापति मानस पुत्र मरीचि आदि सब उस
परवर्णिनी को देखकर समत्सुक होकर चिन्तन करने लगे थे। इस सृष्टि
में इसका क्या कर्म होगा अथवा यह किसकी वर-वर्णिनी होगी। यही
वे सभी बड़ी ही उत्सुकता से सोचने लगे थे। हे मुनि सत्तमो ! इस तरह
से चिन्तन करते हुए उन ब्रह्माजी के मन से वल्गु पुरुष आविर्भूत होकर

௵ श्रीकालिका पुराण ௵ १३
विनिःसृत हो गया था।
वह पुरुष सुवर्ण के चूर्ण के समान पीली आभा से संयुक्त था,
परिपुष्ट उसका वक्ष स्थल था, सुन्दर नासिका थी, सुन्दर सुडौल ऊरु
जंघाओं वाला था, नील वेष्टित केशर वाला था, उसकी दोनों भौंहें
जुड़ी हुई थीं, चंचल और पूर्ण चन्द्र के सदृश मुख से समन्वित था।
कपाट के तुल्य विशाल हृदय पर रोमावली से शोभित था शुभ्र मातंग
की सूँड़ के समान पीन तथा विस्तृत बाहुओं से संयुक्त था, रक्त हाथ,
लोचन, मुख, पाद और करों से उपद्रव वाला था। उस पुरुष का मध्य
भाग क्षीण अर्थात् कृश था, सुन्दर दन्तावली थी वह हाथी के सदृश
कन्धरा से समन्वित था। विकसित कमल के दलों के समान उनके नेत्र
थे तथा केशर घ्राण से तर्पण था, कम्बु के समान ग्रीवा से युक्त, मीन
के केतु वाला प्राँश और मकर वाहन था। पाँच पुरुषों के आयुधों
वाला, वेगयुक्त और पुष्पों के धनुष से विभूषित था। कटाक्षों के पात
के द्वारा दोनों नेत्रों को भ्रमित करता हुआ परम कान्त था। सुगन्धित
वायु से भ्रान्त और शृंगार रस से सेवित इस प्रकार के उस पुरुष को
देखकर वे सब मानस पुत्र जिनमें दक्ष प्रजापति प्रमुख थे, विस्मय से
आविष्ट मन वाले होते हुए अत्यधिक उत्सुकता को प्राप्त हुए थे और
मन विकार को प्राप्त हो गया था। वह पुरुष भी जगतों के प्रति और
सृष्टि की रचना करने वाले ब्रह्माजी का अवलोकन करने को विनम्रता
से नीचे की ओर अपनी कन्धरा को झुकाकर प्रणिपात करते हुए
बोला।
पुरुष ने कहा-हे ब्रह्मन् ! मैं अब क्या करूँ ? जो भी आप कराना
चाहते हो उसी कर्म से मुझे नियोजित कीजिए। हे विधे ! वह कर्म
न्यायोचित होवे जिसके करने से शोभा होती है। हे लोकों के ईश!
क्योंकि आप तो जगतों के सृजन करने वाले हैं। अतएव जो भी योग्य
अभिधाम हो, स्थान हो और जो मेरी स्त्री हो, वही मेरे लिए दीजिए।
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-उस महान् आत्मा वाले पुरुष के इस रीति
वाले वचन का श्रवण करके अपनी ही सृष्टि से अत्यन्त विस्मित होकर

एक क्षण तक कुछ भी ब्रह्माजी ने नहीं कहा था। इसके अनन्तर
ब्रह्माजी ने अपने मन को सुसंयमित करके और विस्मय का परित्याग
करके उसके कर्म के उद्देश्य को आवाहन करते हुए उस पुरुष से कहा
था। ब्रह्माजी ने कहा-इस सुन्दर रूप और पाँच पुष्पों के बाणों द्वारा
पुरुषों तथा स्त्रियों को मोहित करते हुए तुम सनातनी सृष्टि का सृजन
करो। न तो देव, न गन्धर्व, न किन्नर और महोरग, न असुर, न दैत्य,
न विद्याधर और न राक्षस, न यक्ष, न पिशाच, न भूत, न विनायक,
न गुह्यक अथवा न सिद्ध, न मनुष्य तथा पक्षीगण ये सब तेरे शर के
लक्ष्य नहीं होंगे। जो भी पशु, मृग, कीट, पतंग और जल में उत्पन्न होने
वाले जीव हैं वे सभी जो कि तेरे शर के लक्ष्य होते हैं वे लक्ष्य नहीं
होंगे। मैं अथवा वासुदेव स्थाणु अथवा पुरुषोत्तम ये सभी तेरे वश में
हो जायेंगे। अन्य प्राणीधारियों की तो बात ही क्या है। तुम प्रच्छन्न रूप
वाला होकर सदा जन्तुओं के हृदय में प्रवेश करते हुए स्वयं सुख को
हेतु बनकर सनातनी सृष्टि की रचना करो। सदा ही तेरे पुष्पों के बाण
का वह मन मुख्य लक्ष्य होगा। आप सभी प्राणियों के लिए नित्य ही
मद और मोद के करने वाले बनो। यही तुम्हारे लिए कर्म मैंने कर दिया
है जो कि पुनः सृष्टि करने का प्रवर्तक है। अब मैं आपका नाम भी
बतलाऊँगा जो कि आपके योग्य ही होगा। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इसके
अनन्तर यही कहकर सुरश्रेष्ठ मानसों के मुखों का अवलोकन करके
क्षण भर में ही अपने पद्मासन पर उपविष्ट हो गये।
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इसके अनन्तर उनके अभिप्राय के ज्ञान
रखने वाले सब मुनिगण उस समय में उचित मरीच अत्रि प्रमुखों में नाम
रखा था। सृष्टि के सृजन करने वाले दक्ष प्रभृति ने मुख के अवलोकन
से ही अन्य सारे वृत्तान्त का ज्ञान प्राप्त करके उन्होंने स्थान और पत्नियों
को दे दिया था। ऋषियों ने कहा-तुम हमारे विधाता के चित्त का
प्रमथन करके समुत्पन्न हुए हो अतएव तुम मन्थन नाम से ही लोक में
विख्यात होओगे। जगती में तुम कामरूप हो और ऐसा तुम्हारे समान
अन्य कोई भी नहीं है। अतएव हे मनोभव ! तुम काम नाम से भी जाने

ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ १५
जाओ। मदन करने से तुम मदन नाम वाले भी हो और दर्प से शम्भू
भगवान् के कंदर्प हो इसलिए तुम लोक में कन्दर्प नाम से भी प्रसिद्ध
होओगे। तुम्हारे बाणों का जो पराक्रम है, ब्रह्मास्त्रों का भी उस प्रकार
का नहीं होगा।
स्वर्ग में, मृत्युलोक में, पाताल में और सनातन ब्रह्मलोक में तुम्हारे
सभी स्थान हैं क्योंकि आप सर्वव्यापी हैं। यह दक्ष आपको पत्नी को
स्वयं ही देगा जो कि परम शोभना है। हे पुरुषोत्तम! जो यह आदि में
होने वाला यथेष्ट प्रजापति है और यह कन्या ब्रह्माजी के मन से
समुत्पन्न शमरूपा है जो सन्ध्या नाम से सभी लोक में विख्यात होगी।
क्योंकि ध्यान करते हुए ब्रह्मा जी से भली-भाँति यह वरांगना समुत्पन्न
हुई है इसलिए इस लोक में 'सन्ध्या' इस नाम से इसकी ख्याति होगी।
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-हे द्विजोत्तमो ! यह कहकर सब मुनिगण चुप
होकर संस्थित हो गये थे। उन्होंने ब्रह्माजी के मुख का अवेक्षण किया
और उनके ही समक्ष में विनय से अवनत होकर स्थित हो गए थे।
इसके अनन्तर कामदेव भी कुसुमों से उद्भूत अपने दण्ड (धनुष) को
ग्रहण करके कान्ता के भुवों के सदृश वेल्लित वह धनुष था तथा वह
उन्मादन, इस नाम से विख्यात हो गया था।
हे द्विजोत्तमो ! उसने उसी भाँति पाँचों कुसुमों से विनिर्मित अस्त्रों
को ग्रहण किया था जिनके निम्नांकित नाम हैं-हर्षण, रोचन, मोहन,
शोषण और मरण। इन संज्ञा वाले वे बाण या अस्त्र हैं जो मुनियों के
भी मन में मोह उत्पन्न कर देने वाले हैं। उस कामदेव ने जो कि प्रच्छन्न
स्वरूप से संयुत था वहीं पर निश्चय के विषय में सोचने लगा था।
यहां पर मुनिगण संस्थित हैं तथा स्वयं प्रजापति भी हैं। वे सब आज
मेरे शरव्य भूत होंगे, यह निश्चित है। मैं भगवान् विष्णु और योगिराज
भगवान् शम्भु भी तुम्हारे अस्त्रों के वशवर्ती होंगे। अन्य साधारण
जन्तुओं की तो बात ही क्या है, ऐसा जो कहा था मैं सार्थक करूँ।
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-कामदेव ने यह मन से सोचकर और
निश्चय करके पुष्पों के धनुष की पुष्पों की ज्या (धनुष की डोरी)

१६ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
कर्णों के द्वारा योजित किया था। उस समय में आलीढ़ स्थान को प्राप्त
करके तथा अपने धनुष को खींचकर धनुषधारियों में परमनिपुण
कामदेव ने यत्नपूर्वक उसे वलय के आकार वाला कर लिया था। हे
मुनि श्रेष्ठों! उस कामदेव के द्वारा कोदण्ड (धनुष को) सहित करने पर
भली-भाँति आह्लाद के उत्पन्न करने वाली सुगन्धित वायु बहने लगी
थी। इसके अनन्तर मोह कर देने वाले कामदेव ने उन घात आदि को
और सभी मनुष्यों को पृथक्-पृथक् पुष्पों के शरों से मोहित हो गए थे
और मन के द्वारा कुछ विकार को प्राप्त हो गए थे। सभी सन्ध्या को
निरीक्षण करते हुए बारम्बार विकारयुक्त मन वाले हो गये थे क्योंकि
स्त्री तो मद के वर्द्धन करने वाली होती ही है अतः सब बढ़े हुए मदन
वाले अर्थात् अधिक सकाम हो गए थे। फिर उस मदन अर्थात् कामदेव
ने पुनः सबको मोहित कराके तथा उन सबको ऐसा कर दिया था कि
वे सब इन्द्रियों के विकारों को प्राप्त हो गए थे। जिस समय में उदीरित
इन्द्रियों वाले विधाता ने उसको दीक्षा दी थी उसी समय में उनचास
भाव शरीर से समुत्पन्न हो गए थे।
हे द्विजो ! विव्वोक आदि हाव-भाव तथा चौंसठ कलायें कन्दर्प
(कामदेव) के शिरों से विंधी हुई सन्ध्या के हो गये थे। उन सबके
द्वारा देखी गई वह भी कन्दर्प के शरों के पात से समुत्पन्न कटाक्ष
आवरण आदि भावों को बारम्बार करने लगी थी। स्वाभाविक रूप से
परम सौन्दर्यशालिनी सन्ध्या मदन के द्वारा उद्भूत उन भावों को करती
हुई तनु ऊर्मियों के द्वारा स्वर्ग की नदी (गंगा) की भाँति अत्यधिक
शोभायमान हो रही थी। इसके अनन्तर भावों में समन्वित उस सन्ध्या
को देखते हुई प्रजापति धर्माम्म अर्थात् पसीने से परिपूर्ण शरीर वाले
होकर उन्होंने भी अभिलाषा की थी। तात्पर्य यह है उनके शरीर में
पसीना आ गया और उनकी भी इच्छा हुई थी। ईश्वर ने कहा-हे
ब्राह्मण ! बड़े आश्चर्य की बात है आपको यह कामभाव कैसे उत्पन्न
हो गया जो कि अपनी पुत्री को ही देखकर काम के वशीभूत हो गये
हैं। यह तो वेदों के अनुसरण करने वालों के लिए योग्य नहीं है।

൵ श्रीकालिका पुराण ൵ १७
आपके ही मुख से कहा हुआ वेदों के मार्ग का निश्चय है कि जैसी
माता होती है वैसी ही जामि होती है और जैसी जामि होती है वैसी ही
सुता हुआ करती है। हे विधे ! हे ब्राह्मण ! हे चतुरानन ! यह समस्त
जगत् धर्म में ही है और कैसे इस क्षुद्रकाम के द्वारा यह सब विघटित
कर दिया है ?
एकान्त योगी सर्वदा दिव्य दर्शन वाले, किस कारण से और कैसे
दक्ष मरीचि आदि मानस पुत्र स्त्रियों में लोलुप हो गये थे ? मन्द आत्मा
वाला और अभी कर्म को प्राप्त करने को उद्यत हुआ कामदेव भी कैसा
अल्प बुद्धि वाला है और समय को नहीं जानता है कि उसने आप
लोगों को ही अपने शरों का लक्ष्य बना डाला है। हे मुनिश्रेष्ठ ! उसके
लिए धिक्कार है जिसकी कान्तागण हठपूर्वक धैर्य का आकर्षण करके
चंचलताओं में उसके मन को मज्जित कर दिया करती है। मार्कण्डेय
मुनि ने कहा- उन गिरीश भगवान् के इस वचन को श्रवण करके
लोकों के ईश लज्जा से एक ही क्षण में दुगुने पसीने से भीगे हुए हो
गए थे। इसके उपरान्त चतुरानन ब्रह्माजी ने इन्द्रियसम्बन्धी विकार को
निगृहीत करके ग्रहण करने की इच्छा समन्वित होते हुए भी उस
कामरूप वाली सन्ध्या का परित्याग कर दिया था। हे द्विजश्रेष्ठो !
उसके शरीर से जो पसीना गिरा था उससे अग्निष्वात वर्हिषद पितृगण
समुत्पन्न हुए थे। ये सब भिन्न हुए अंजन के सदृश थे और विकसित
कमल के समान इनके नेत्र थे। ये अत्यन्त अधिक यति, परमपवित्र
तथा संसार से परमाधिक विमुख हुए थे। अग्निष्वात चौसठ सहस्र
कीर्त्तित किए गए हैं। हे द्विजगणों ! छियासी हजार वर्हिषद बताए गए
हैं। दक्ष के शरीर से जो पसीना भूमि पर गिरा था उससे सम्पूर्ण गुणों
से सुसम्पन्न वरांगनायें उत्पन्न हुई थीं। वे वरांगनायें तन्वंगी, क्षीण
मध्यभाग वाली और परम शुभ शरीर की रोमावली संयुत थीं जिनका
अंग अत्यधिक कोमल था तथा परम सुन्दर दर्शन पंक्तियाँ थीं और तपे
हुए सुवर्ण के ही तुल्य उनके शरीर की रोमावली संयुत थीं और तपे हुए
स्वर्ण के ही तुल्य ही उनके शरीर की कान्ति थी। मरीचि उनमें प्रधान

थे ऐसे छः मुनियों ने अपनी इन्द्रियों की क्रिया को निगृहीत कर लिया
था । उस समय ऋतु, वशिष्ठ, पुलस्त्य और अंगिरस के आदि चारों का
जो प्रस्वेद भूमि पर गिरा था उससे हे द्विजश्रेष्ठो ! दूसरे पितृगण
समुत्पन्न हुए थे । वह सीमय, आज्यय नाम से तथा अन्य सुकाती थी ।
वे सभी हविर्भुक् थे जो कव्य वाह प्रकीर्त्तित हुए थे । सोमष जो थे वे
ऋतु के पुत्र थे, सुकालिन वशिष्ठ मुनि के पुत्र हुए थे । जो आडयप
नामक थे, वे पुलस्त्य मुनि के पुत्र थे और हविष्मन्त अंगिरा मुनि के सुत
हुए थे ।
हे विप्रेन्द्रों ! उन अग्निष्वातादिक के उत्पन्न हो जाने पर इसके
अनन्तर लोकों के पितृ वर्गों में सब ओर कव्यवाह थे । समस्त प्राणियों
के ब्रह्माजी ही पितामह हुए थे और सन्ध्या ही पितृ प्रसूता हुई थी
क्योंकि सब उसके ही उद्देश्य से हुआ था । इसके अनन्तर भगवान्
शंकर के वचन से वह पितामह बहुत लज्जित हुए थे और शीघ्र ही
कुंठित किए हुए मुख से संयुत ब्रह्माजी कामदेव के ऊपर अत्यन्त
कुपित हो गए थे । वह कामदेव भी पहले ही उनके अभिप्राय का ज्ञान
प्राप्त करके उसने पशुपति विधि से डरे हुए ने शीघ्र ही अपने बाण को
समेट लिया था । हे द्विजेन्द्रो ! इसके अनन्तर लोगों के पितामह ब्रह्माजी
ने अत्यन्त क्रोध में आविष्ट होकर जो कुछ भी किया था उसका आप
लोग परम सावधान होकर अब श्रवण कीजिए ।
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा- इसके उपरान्त समस्त जगतों के पति
पद्मयोनि ब्रह्माजी अत्यन्त बलवान् दाह करने वाले पावक (अग्नि)
के ही समान कोष्ठ में समाविष्ट होकर प्रज्जवलित हो गये थे और
उन्होंने ईश्वर से कहा था कि जिस कारण से आपके ही समझ कामदेव
ने पुष्यों के बाणों से मुझे सेवित किया है अर्थात् मुझे अपने कुसुम
बाणों का लक्ष्य बनाया है अतः हे हर! उसका फल अब आप प्राप्त
करिए । यह दर्प से विमोहित कामदेव आपके नेत्रों की अग्नि से निर्दग्ध
होगा । हे महादेव ! क्योंकि इसने अत्यन्त दुष्कर कर्म किया था । हे
द्विजों में परम श्रेष्ठों ! इस रीति से ब्रह्माजी ने भगवान् व्योमकेश

൵ श्रीकालिका पुराण ൵ १९
(शम्भू) के और महात्मा मुनियों के समक्ष में स्वयं ही कामदेव को
शाप दिया था। इसके अनन्तर डरे हुए रति के पति कामदेव ने उसी
क्षण में अपने बाणों को छोड़ना परित्यक्त कर दिया था और इस परम
दारुण शाप का श्रवण करके प्रत्यक्ष ही प्रादुर्भूत अर्थात् प्रकट हो गया
था वह कामदेव डर से अति गद्गद होकर तथ्य वचन कहने लगा था।
कामदेव ने कहा-हे ब्रह्माजी ! आपने किसलिए मुझे अत्यन्त
दारुण शाप दिया है। मैंने आपका कोई भी अपराध नहीं किया है। हे
लोकों के स्वामिन् ! आप तो न्याय मार्ग का अनुसरण करने वाले हैं।
हे विभो ! मैं जो करता हूँ वह सभी आपके ही द्वारा कहा हुआ करता
हूँ। यहाँ पर मुझे शाप देना उचित नहीं है क्योंकि मैंने अन्य कुछ करता
हूँ। यहाँ पर मुझे शाप देना उचित नहीं है क्योंकि मैंने अन्य कुछ भी
कार्य नहीं किया है। आपने स्वयं ही मुझ से कहा था कि मैं तथा
भगवान् विष्णु और भगवान् शम्भू ये सभी तेरे शरों के गोचर हैं अर्थात्
तेरे बाणों के लक्ष्य होंगे। यह जो कुछ भी आपने ही मुझ से कहा था
उसी आपके कथन की परीक्षा मैंने की थी अर्थात् मैंने जाँच की थी कि
आपका वचन कहाँ तक सत्य है। हे ब्रह्माजी इसमें मेरा कोई भी
अपराध नहीं है। हे जगत् के स्वामिन् ! निरपराध मुझको जो यह परम
दारुण शाप दे दिया है अब इस शाप का आप शमन कीजिए।
मार्कण्डेय मुनि ने कहा- समस्त जगतों के पति ब्रह्माजी ने उस कामदेव
के इस वचन को सुनकर उस हुतात्मा कामदेव से पुनः दया से युक्त
होकर यह प्रत्युत्तर दिया था। ब्रह्माजी ने कहा-यह सन्ध्या तो मेरी बेटी
है क्योंकि इसके प्रकाश से ही तुमने मुझको अपने बाणों का लक्ष्य बना
लिया था। इसी कारण से मैंने तुमको शाप दिया था। इस समय में
अब मेरा क्रोध शान्त हो गया है। हे मनोभव अर्थात् कामदेव ! अब मैं
तुझसे कहता हूँ कि आपको जो मैंने दिया था वह किसी भी तरह से
शमन हो जायेगा। तू भगवान् शंकर के तीसरे नेत्र की अग्नि से
भस्मीभूत होकर भी फिर उनकी ही कृपा से पुनः अपने शरीर की
प्राप्ति कर लेगा। जिस समय भगवान् हर कामदेव अपनी पत्नी का

२० श्रीकालिका पुराण
परिग्रह करेंगे उस समय में वे ही स्वयं तुम्हारे शरीर को प्राप्त करा देंगे ।
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-लोकों के पितामह ब्रह्माजी ने कामदेव से
इतने ही वचन कहकर मानस पुत्र समस्त मुनीन्द्रों के देखते हुए वे
अन्तर्हित हो गए थे । सबके विधाता उन ब्रह्माजी के अन्तर्धान हो जाने
पर भगवान् शम्भु भी वायु के समान वेग से अपने अभीष्ट देश को
चले गए थे । उन ब्रह्माजी के अन्तर्हित हो जाने पर भगवान् शम्भु के
भी अपने स्थान पर चले जाने के पश्चात् प्रजापति दक्ष उसकी पत्नी
को निदर्शित करते हुए कामदेव से बोले-हे कामदेव! यह मेरे देह से
समुत्पन्न हुई मेरे ही रूप और गुणों से समन्वित है यह आपके ही सदृश
गुणों से युक्त है सो अब तुम इसको अपनी भार्या बनाने के लिए ग्रहण
कर लो । यह महान् तेज से युक्त सर्वदा आपके ही साथ चरण चलने
वाली और इच्छानुसार धर्म से वश में वर्त्तन करने वाली होगी ।
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-दक्ष प्रजापति ने यह कहकर अपनी देह
के पसीने से उत्पन्न हुई पुत्री को कामदेव के लिए उसके आगे करके
दे दिया था और उसका नाम 'रति' यह कहकर ही प्रदान किया था ।
कामदेव भी उस परम सुन्दरी रति नाम वाली वराँगना को देखकर उस
रति में अत्यधिक अनुरक्त होकर अपने ही बाण के द्वारा विद्ध होकर
मोह को प्राप्त हो गया था । क्षणमात्र में होने वाली प्रभा के ही समान
वह एकान्त गौरी और मृगी के समान लोचनों वाली तथा चंचल उपांगों
से समन्वित मृगी की भाँति उसके ही तुल्य परम शोभित हुई थी । उस
रति की दोनों भौंहों को देखकर कामदेव ने संशय किया था कि क्या
विधाता ने मुझे उन्माद वाला बनाने के लिए यह कोदण्ड (धनुष)
निवेशित किया है । हे द्विजोत्तमो ! उस रति के कटाक्षों की शीघ्र गमन
करने वाली गति को देखकर अर्थात् शीघ्र ही हृदय को बिद्ध कर देने
वाली चाल को देखते हुए उसे अपने अस्त्रों की शीघ्रगामिता और
सुन्दरता पर श्रद्धा नहीं रह गयी थी । तात्पर्य यही है कि उसके (रति
के) कटाक्षों की गति के सामने अपने बाणों की गति कामदेव को तुच्छ
प्रतीत होने लग गयी थी । उस रति की स्वाभाविक रूप से सुगन्धित

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§००२ श्रीकालिका पुराण १००३ २१
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धीर श्वासों की वायु का आघ्राण करके कामदेव ने मलय पर्वत की
गन्ध को लाने वाली वायु में श्रद्धा का त्याग कर दिया था । कथन का
अभिप्राय यह है कि मलय मारुत भी उसके श्वासानिल के समाने हेय
प्रतीत हो रही थी । पूर्णचन्द्र के समान भौंहों के चिह्न से लक्षित उसके
मुख को देखकर कामदेव ने उसके मुख और चन्द्र में किसी प्रकार के
भेद का निश्चय नहीं किया था । उस रति के दोनों स्तनों का जोड़ा
सुनहरी कमल की कलिका के जोड़े के ही समान था । उन स्तनों के
ऊपर जो कृष्ण वर्ण से युक्त चूचक थे (काली घुंडियाँ) वे ऐसी प्रतीत
हो रही थीं मानों कमल की कलिकाओं पर भ्रमर बैठे हुए रसपान कर
रहे हों ।
अत्यन्त दृढ़ (कठोर) पीन (स्थूल) और उन्नत स्तनों के मध्य भाग
से नीचे की ओर जाती हुई नाभि पर्यन्त रहने वाली, तन्वी सुन्दर,
आयत और शुभ रोमों की पंक्ति को कामदेव ने भ्रमरों की पंक्ति से
संम्भृत (संयुत) पुष्प धनुष की ज्या (डोरी) को भी विस्मृत कर दिया
था क्योंकि उसका ग्रहण करके इसको ही देखता है । पुनः उसके ही
सुन्दर स्वरूप का वर्णन करते हुए कहते हैं कि उसकी गम्भीर नाभि के
रन्ध्र (छिद्र) के अन्दर चारों ओर त्वचा से वह आवृत थी । उसके मुख
कमल पर जो दो नेत्रों को जोड़ा था वह ऐसी प्रतीत होता था मानों
थोड़ी लालिमा से युक्त कमल हों । हे द्विज श्रेष्ठों ! जिसका मध्य भाग
क्षीण था ऐसे शरीर से वह रति निसर्ग अष्टपद की प्रभा वाली थी ।
उसको कामदेव ने रत्नों द्वारा विरचित वेदी के ही समान देखा था ।
उसके ऊरुओं का युगल अत्यन्त कोमल और कदली के स्तम्भ के समान
आयत एवं स्निग्ध (चिकना) था । कामदेव ने उसको अपनी शक्ति के
ही तुल्य मनोहर देखा था । थोड़ी रक्तिमा से युक्त पार्ष्णि पादाग्र प्रान्त
भाग से संयुक्त दोनों पदों के जोड़े को कामदेव ने उसमें स्थित अनुराग
से परिपूर्ण चित्र देखा था । उस रति के दोनों हाथों को जो ढाक के
पुष्पों के समान लाल नाखूनों से युक्त थे और परम सूक्ष्म सुवृत्त
अंगुलियों को परम मनोहर देखा था ।

२२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
हे द्विज सत्तमो ! यह देखकर कामदेव ने यह मान लिया था कि
मेरे अस्त्रों से द्विगुणित हुए अस्त्रों के द्वारा क्या यह मुझको मोहित करने
के लिए उद्यत हो रही है ? उसकी दोनों बाहुओं का जोड़ा मृणाल के
जोड़े के समान अधिक सुन्दर था। वह अत्यन्त कान्ति संयुत जल के
प्रवाह के समान मृदु और स्निग्ध शोभित हो रहा था। उसका केशों का
पाश अत्यधिक मनोहर नील वर्ण वाले मेघ के सदृश था और कामदेव
का प्रिय वह चमरी गौ के पूँछ के बालों के भार के समान प्रतीत होता
है। उस अत्यधिक मनोहर रति देवी का काम अवलोकन करके
विकसित लोचनों वाला हो गया था। उसी रति की विशेष स्वरूप
शोभा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि वह रति देवी उपकी कान्ति
रूपी जल ओघ (समूह) से सम्पूर्ण थी, वह अपने कुचों के मुख
कमल की कालिका वाली थी, पद्म के सदृश मुख से समन्वित थी,
सुन्दर बाहुरूपी मृगालीश (चन्द्र) की कला से संयुत थी, यह रति देवी
दोनों भौंहों के युग्म के विभ्रमों के समूह से तनूर्मियों से परिराजित थी,
वह कटाक्ष पातरूपी भ्रमरों को समुदाय वाली थी, वह नेत्ररूपी नील
कमलों से समन्वित थी, वह शरीर की रोमावलि के शैवाल से युक्त
थी, वह मनरूपी द्रुमों के विशातन करने वाली थी, वह रति गम्भीर
नाभिरूपी हृद से युक्त थी, वह दक्षरूपी हिमालय गिरि से सुमुत्पन्न हुई
गंगा की भाँति महादेव की तरह उत्फुल्ल लोचन थी। उस समय में मोद
के भार से युत आनन वाले कामदेव ने विधाता के द्वारा दिए हुए
सुदारुण शाप को भूलकर प्रजापति दक्ष से कहा था।
कामदेव ने कहा- हे विभो ! भली-भाँति परमाधिक स्वरूप लावण्य
से समन्वित इस सहचारणी के द्वारा मैं भगवान् शम्भु को मोहित करने
की क्रिया में समर्थ हो सकूँगा फिर अन्य जन्तुओं से क्या प्रयोजन है।
हे अनघ अर्थात् पिष्पाप ! जहाँ-जहाँ पर मेरे द्वारा धनुष का लक्ष्य
किया जाता है वहीं-वहीं पर इसके द्वारा भी रमण नामक माया से
चेष्टा की जायेगी। जिस समय में मैं देवों के आलय अर्थात् स्वर्ग में
जाता हूँ अथवा पृथ्वी या रसातल में गमन किया करता हूँ उसी समय

६०८२ श्रीकालिका पुराण ६०८२ २३

में यह भी सर्वदा चारुहास वाली हो जाया करेगी। जिस प्रकार लक्ष्मी
साथ गमन करने वाली होती है और मेघों के साथ विद्युत रहा करती
है उसी भाँति मेरी प्रजाध्यक्ष सहायिनी होगी। मार्कण्डेय मुनि ने
कहा-कामदेव ने इस रीति से यह कहकर रति देवी को बहुत ही
उत्सुकता के सहित होकर ग्रहण किया था जिस प्रकार से सागर से
समुत्थित उत्तमा लक्ष्मी को भगवान् हृषीकेश ने ग्रहण कर लिया था।
भिन्न पीतप्रभा वाला कामदेव उस रति के साथ शोभित हुआ था जिस
प्रकार से सन्ध्या के समय में मनोहर सौदामिनी के साथ मेघ की शोभा
हुआ करती है। इस रीति से बहुत ही अधिक मोद से युक्त रति के पति
कामदेव ने उस रति को अपने हृदय में विद्या को योगदर्शी के ही समान
परिग्रहण किया था। रति ने भी परम श्रेष्ठ पति को प्राप्त करके
परमाधिक सन्तोष को प्राप्त किया था अर्थात् अत्यन्त सन्तुष्ट हो गई
थी। जैसे कमल से समुत्पन्ना पूर्ण चन्द्र के समान मुख वाली लक्ष्मी
भगवान् हरि को प्राप्त करके सन्तुष्ट हो गयी थी।
बसन्त आगमन वर्णन
महर्षि मार्कण्डेय ने कहा-तभी से लेकर ब्रह्माजी भी समय-समय
में ही परिपीडित होकर चिन्तन किया करते थे कि भगवान् शम्भु ने मेरी
केवल कान्ता के प्रति अभिलाषा को ही देखकर मुझे बुरा कह दिया
था वही शम्भु अब मुनिगणों के ही समक्ष में दाराओं को किस तरह से
ग्रहण करेंगे अथवा कौन सी नारी उन शम्भु की पत्नी होगी और कौन
सी नारी है जो उनके मन में स्थान बनाकर अवस्थित हो रही है, जो
योग के मार्ग से भ्रष्ट करके उनको मोहित करेगी। उनका मोह न करने
में कामदेव भी समर्थ नहीं हो सकेगा। वे तो नितान्त योगी हैं, वे
वीरांगनाओं के नाम को भी सहन नहीं किया करते हैं। मध्य और अन्त
में सृष्टि होती है उनका वध अन्य कारित नहीं है अर्थात् अन्य किसी
के भी द्वारा नहीं किया जा सकता है। इस भूमण्डल में कोई ऐसे होंगे
जो महान् बलवान् मेरे द्वारा बाध्य होंवे। कुछ भगवान् विष्णु के

२४ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
वारणीय हैं और उपाय से कुछ शम्भु के हैं। उस सांसारिक भोगों के
सुखों से विमुख तथा एकांत विरागी भगवान् शम्भु के विषय में इससे
अन्य कोई भी कर्म नहीं करेगा, इसमें संशय नहीं है।
लोकों के पितामह लोकेश ब्रह्माजी यही चिन्तन् करते हुए ने
आकाश में स्थित होते हुए उन्होंने भूमि में स्थित दक्ष आदि को देखा
था। रति के साथ मोह से समन्वित कामदेव को देखकर ब्रह्माजी फिर
वहाँ पर गए और कामदेव को सान्त्वना देते हुए उससे बोले-हे मनोभव
अर्थात् कामदेव ! आप इस अपनी सहचारिणी पत्नी रति के साथ में
शोभायमान हो रहे हैं और यह भी आपके साथ संयुक्त होकर
अत्यधिक शोभित हो रही है। जिस रीति से लक्ष्मी देवी से भगवान्
होती है। जैसे चन्द्रमा से रात्रि और निशा से चन्द्र शोभायमान होता है
ठीक उसी भाँति आप दोनों की शोभा होती है और आपका दाम्पत्य
पुरस्कृत होता है। अतएव आप जगत् के केतु हैं और विश्वकेतु हो
जायेंगे। हे वत्स ! अब तुम इस समस्त जगत् के हित सम्पादित करने
के लिए पिनाकधारी भगवान् शम्भु को मोहित कर दो जिससे सुख के
मन वाले भगवान् शम्भु द्वारा का परिग्रह कर लेवें। किसी भी विजन
देश में, स्निग्ध प्रदेश में, पर्वतों पर और सरिताओं में जहाँ-जहाँ पर
ईश गमन करें वहाँ-वहाँ पर ही इसके साथ उनको मोहयुक्त कर दो।
इस वनिता से विमुख भगवान् हर को जो कि पूर्णतया संयत
आत्मा वाले हैं मोहित कर दो। तुम्हारे बिना अर्थात् वाला त्रिभुवन में
नहीं है। हे मनोभव ! भगवान् हर के सानुराग हो जाने पर अर्थात्
दाम्पत्य जीवन के सुखभोगों के अभिलाषी होने पर आपके शाप की
भी उपशान्ति हो जायेगी। इस कारण आप इस समय अपना ही हित
करो। हे कामदेव ! अनुराग से युक्त होकर जब शम्भु वरारोह की
इच्छा करें तो उस अवसर पर तुम्हारे उपभोग के लिए ये तुमको
सम्भावित अवश्य ही करेंगे। इसलिए जगत् की भलाई करने के लिए
तुम भगवान् हर के मोहन करने के कर्म में पूर्ण यत्न करो। महेश्वर को
मोहित करके आप शिव के केतु हो जाओ। ब्रह्माजी के इस वचन का

श्रवण करके कामदेव ने ब्रह्माजी से जगत् का हितकारी जो तथ्य था
वह कहा था। कामदेव ने कहा- हे विभो ! मैं आपकी आज्ञा से अवश्य
ही शम्भु का मोहन करूंगा किन्तु हे प्रभो ! पोषित रूपी महान् अस्त्र जो
हैं उस कान्ता को मेरे लिए आप सृजित कर दीजिए। मेरे द्वारा शम्भु
के सम्मोहित करने पर जिसके द्वारा उसका अनुमोहन करना चाहिए, हे
लोकभृत् ! उस परम रमणीय रामा का आप निदेशन कीजिए। उस
प्रकार की रामा को मैं नहीं देख रहा हूँ जिसके द्वारा उनका अनुमोहन होवे।
अब हे धाता ! कर्तव्य यही है कि अब कुछ उसी तरह का उपाय करें।
मार्कण्डेय मुनि ने कहा- कामदेव के इस प्रकार से कहने पर
लोकों के पितामह ब्रह्माजी ने यही चिन्ता की थी कि मुझे ऐसी
सम्मोहनी पोषा (नारी) उत्पन्न करनी चाहिए। इस चिन्ता में समाविष्ट
उन ब्रह्माजी को जो इसके अनन्तर निःश्वास विनिःसृत हुआ था उसी
से बसन्त ने जन्म धारण किया था जो कि पुष्पों के समुदाय से विभूषित
था। भ्रमरों की संहति (समूह) को धारण करने वाले मुकुलित आम्र
के अंकुरों को सरस किंशुक (ढाक के पुष्प) को साथ लिए हुए
प्रफुल्लित पादप (वृक्ष) की भाँति शोभित हुआ था। उसी बसन्त की
स्वरूप शोभा का वर्णन करते हुए कहा जाता है कि वह रक्त कमल
के सदृश था तथा विकसित तामरस के समान उसके नेत्र थे, सन्ध्या की
बेला में उदीयमान अखण्ड चन्द्रमा के समान उसका मुख था और
उसकी पर सुन्दर नासिका थी। शंख के सदृश श्रवणों के आवर्त्त वाला
था तथा श्याम वर्ण के कुञ्चित (घुंघराले) केशों से शोभित था, सन्ध्या
के समय में अंशुमाली के तुल्य दोनों कुण्डलों से विभूषित था। उसकी
गति मदमस्त हाथी के समान थी और उसका वक्षःस्थल विस्तीर्ण था
तथा पानी स्थूल और आयत भुजाओं से संयुत था एवं उसके दोनों करों
का जोड़ा अतीव कठोर था।
उसके उरु, कटि और जंघायें सुवृत्त अर्थात् सुडौल थे, उसकी
ग्रीवा कम्बु के तुल्य थी एवं उसकी नासिका उन्नत थी, वह गूढ़ शत्रुओं
वाला, स्थूल वक्षःस्थल से युक्त था। इस रीति से समस्त लक्षणों से

२६ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
वह सर्वाङ्ग सम्पूर्ण था। उसके अनन्तर उस प्रकार के सम्पूर्ण कुसुमाकर
(बसन्त) के समुत्पन्न हो जाने पर सुगन्ध से संयुत वायु वहन करने
लगी और सभी वृक्ष पुष्पित हो गये थे। कोयलें मधुर स्वरों से समन्वित
होती हुई सैकड़ों बार पञ्चम स्वर में बोलने लगी थीं, विकसित कमलों
वाली सरोवरें पुष्करों से युक्त हो गयी थीं। इसके अनन्तर हिरण्यगर्भ
अर्थात् ब्रह्माजी उस प्रकार के अतीव उत्तम उसको समुत्पन्न हुआ
देखकर कामदेव से मधुर वचन बोले-हे कामदेव ! यह आपका मित्र
उत्पन्न होकर समुपस्थित है जो कि सर्वदा ही अनुकूलता का व्यवहार
करेगा। जिस रीति से अग्नि का मित्र वायु है जो उसका सभी जगह
पर उपकार किया करता है उसी भाँति यह आपका मित्र है जो सदा
ही आपका ही अनुगमन करेगा। वसति के अन्त का हेतु होने से ही यह
बसन्त नाम वाला होवेगा। इसका कर्म यही है कि सदा आपका
अनुगमन करे तथा लोकों का अनुरञ्जन किया करे।
यह बसन्त शृंगार है और बसन्त में मलयानिल वहन किया करता
है। आपके वश में ही कीर्तन करने वाले भाव सदा सुहृद होवें।
विव्वोक आदि हाथ तथा चौंसठ कलायें जिस प्रकार से आपके सुहृद
हैं वैसे ही रति देवी के भी सौहार्द भाव को करेंगे। हे कामदेव ! अब
आप इन सहचरों के साथ जिनमें बसन्त प्रधान है और तुम्हारे ही
उपयुक्त परिवार स्वरूपा इस सहचारिणी रति के साथ मिलकर अब
महादेव को मोहित करो और सनातनी सृष्टि की रचना कर डालो। इन
समस्त सहचरों के साथ जो भी इष्ट हो उसी देश में चले जाओ मैं
उसको भावित करूँगा जो हरि को मोहित कर देगी। इस रीति से सुरों
में सबसे बड़े ब्रह्माजी के द्वारा कहे गए वचनों से कामदेव परम हर्षित
होकर अपने गणों के सहित तथा पत्नी और अनुचरों के साथ उस समय
में वहाँ पर चला गया था। प्रजापति दक्ष को साथ समस्त मानस पुत्रों
को अभिवादन करके उस समय कामदेव वहीं पर चला गया था जहाँ
हर भगवान् शम्भु हैं। उस अनुचरों के सहित कामदेव के चले जाने पर
जो कि शृंगार भाव आदि से संयुत था, हे द्विजोत्तमो ! पितामह ने दक्ष
प्रजापति से मरीचि, अत्री प्रमुख मुनीश्वरों के साथ में कहा था।

[काली स्तुति वर्णन]

ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २७
[काली स्तुति वर्णन]
मार्कण्डेय मुनि ने कहा- इसके अनन्तर उस समय ब्रह्माजी ने
महान् आत्मा वाले दक्ष के लिए और मरीचि प्रमुख मुनियों से यह
वचन कहा था। ब्रह्माजी ने कहा- भगवान् शम्भु की पत्नी होने वाली
कौन है जो उनको मोहित कर देगी? इसी का ध्यान करते हुए उन्होंने
शिव की कान्ता के विषय में मन स्थिर करने का उत्साह नहीं किया
था। हे दक्ष ! जगन्मयी, महामाया, विष्णु की माया के बिना तथा
सन्ध्या, सावित्री और उमा के अतिरिक्त अन्य कोई भी उनका सम्मोहन
कर देनेवाली नहीं है। इसी कारण मैं इस जगत् को प्रसूत करने वाली
भगवान् विष्णु की माया योगनिद्रा का स्तवन करता हूँ क्योंकि वही
अपने सुन्दरतम स्वरूप से भगवान् शंकर को मोहित करेगी। हे दक्ष!
आप तो उसी विश्व के स्वरूप वाली का यजन करो जिसके करने से
वह आपकी पुत्री होकर भगवान् की पत्नी होगी। मार्कण्डेय मुनि ने
कहा-इस प्रकार के ब्रह्माजी के वचन का श्रवण करके मरीचि आदि
के द्वारा पूजित दक्ष ने सृजन करने वाले ब्रह्माजी से कहा था। दक्ष
प्रजापति ने कहा-हे लोकों के ईश! हे भगवान् ! जो परमतथ्या और
जगत् का हित करने को अपने कहा है वह मैं भली-भाँति करूँगा
जिससे उसके मन को हरण करने वाली समुत्पन्न हो जावे। मैं ठीक
उसी भाँति का हो जाऊँगा जिस प्रकार से मेरी पुत्री स्वयं ही महात्मा
शम्भु की पत्नी होकर विष्णु की माया हो जावे।
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-उस वेला में मरीचि जिनमें प्रमुख थे उन
सभी ऋषियों ने इसी प्रकार होवे यही कहा था। फिर प्रजापति दक्ष ने
जगत् से परिपूर्ण महामाया का अभ्यंजन करना आरम्भ कर दिया था।
क्षीरोद के उत्तर में नीर में स्थित होकर उस देवी को अपने हृदय में
विराजमान करके अर्थात् उसका अपने मन में पूर्णतया ध्यान करके
प्रत्यक्ष रूप से अम्बिका के अवलोकन करने के लिए तपस्या का
समाचरण करने के लिए आरम्भ कर दिया था। नियत होकर संयत
आत्मा वाले और सुदृढ़ व्रत से संयुत होते हुए तप किया था। उस तप