सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 21, कुल 442 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 21

२२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
हे द्विज सत्तमो ! यह देखकर कामदेव ने यह मान लिया था कि
मेरे अस्त्रों से द्विगुणित हुए अस्त्रों के द्वारा क्या यह मुझको मोहित करने
के लिए उद्यत हो रही है ? उसकी दोनों बाहुओं का जोड़ा मृणाल के
जोड़े के समान अधिक सुन्दर था। वह अत्यन्त कान्ति संयुत जल के
प्रवाह के समान मृदु और स्निग्ध शोभित हो रहा था। उसका केशों का
पाश अत्यधिक मनोहर नील वर्ण वाले मेघ के सदृश था और कामदेव
का प्रिय वह चमरी गौ के पूँछ के बालों के भार के समान प्रतीत होता
है। उस अत्यधिक मनोहर रति देवी का काम अवलोकन करके
विकसित लोचनों वाला हो गया था। उसी रति की विशेष स्वरूप
शोभा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि वह रति देवी उपकी कान्ति
रूपी जल ओघ (समूह) से सम्पूर्ण थी, वह अपने कुचों के मुख
कमल की कालिका वाली थी, पद्म के सदृश मुख से समन्वित थी,
सुन्दर बाहुरूपी मृगालीश (चन्द्र) की कला से संयुत थी, यह रति देवी
दोनों भौंहों के युग्म के विभ्रमों के समूह से तनूर्मियों से परिराजित थी,
वह कटाक्ष पातरूपी भ्रमरों को समुदाय वाली थी, वह नेत्ररूपी नील
कमलों से समन्वित थी, वह शरीर की रोमावलि के शैवाल से युक्त
थी, वह मनरूपी द्रुमों के विशातन करने वाली थी, वह रति गम्भीर
नाभिरूपी हृद से युक्त थी, वह दक्षरूपी हिमालय गिरि से सुमुत्पन्न हुई
गंगा की भाँति महादेव की तरह उत्फुल्ल लोचन थी। उस समय में मोद
के भार से युत आनन वाले कामदेव ने विधाता के द्वारा दिए हुए
सुदारुण शाप को भूलकर प्रजापति दक्ष से कहा था।
कामदेव ने कहा- हे विभो ! भली-भाँति परमाधिक स्वरूप लावण्य
से समन्वित इस सहचारणी के द्वारा मैं भगवान् शम्भु को मोहित करने
की क्रिया में समर्थ हो सकूँगा फिर अन्य जन्तुओं से क्या प्रयोजन है।
हे अनघ अर्थात् पिष्पाप ! जहाँ-जहाँ पर मेरे द्वारा धनुष का लक्ष्य
किया जाता है वहीं-वहीं पर इसके द्वारा भी रमण नामक माया से
चेष्टा की जायेगी। जिस समय में मैं देवों के आलय अर्थात् स्वर्ग में
जाता हूँ अथवा पृथ्वी या रसातल में गमन किया करता हूँ उसी समय