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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

३२८ ௵ श्रीकालिका पुराण ௵
भगवान् पुरुषोत्तम की सन्निधि में हुआ करती है । उससे भी दुगुने फल
की देने विशेष रूप से द्वारका में कही है । समस्त क्षेत्रों में और तीर्थों
में की हुई पूजा द्वारावती की पूजा के ही समान हुआ करती है ।
विंध्याचल में की हुई पूजा सौगुनी फलदायिका होती है, ऐसा कहा
गया है और गंगा में भी की गई पूजा उसी के समान होती है ।
आर्यावर्त्त, मध्यदेश, ब्रह्मवर्त्त तथा पुष्कर में करतोया नाम की नदी के
जल में उससे भी चौगुनी फल देने वाली कही गई है । हे भैरव! उससे
भी चौगुने फल देने वाली पूजा नन्दि कुण्ड में होती है । उसमें भी
चौगुनी जाल्पिपेश्वर की सन्निधि में की हुई बतलायी हुई है । वहाँ पर
सिद्धेश्वरि की योनि में की गई पूजा उससे भी दुगुनी बताई गई है ।
उससे भी चौगुने फल को देने वाली लौहित्य नदी के जल में कही गई
है । उसी के समान कामरूप देश में सभी जगह जल और स्थल में मानी
गई है । जैसे सबसे श्रेष्ठ भगवान् विष्णु हैं तथा लक्ष्मी सबसे उत्तम है ।
कामरूप में सुरालय में देवी की पूजा प्रशस्त होती है । देवी का क्षेत्र
कामरूप देश है और अन्यत्र उसके समान है अन्य स्थल में देवी विरल
ही हुआ करती है और कामरूप में तो घर-घर में ही विद्यमान रहती है ।
इससे भी सौ गुने महत्व वाली पूजा नीलकूट पर्वत के शिखर पर
होती है ।
उससे भी दुगुने शिवलिंग में की गई पूजा फलदायिनी होती है ।
उससे भी दुगुनी फलदायिनी शैल पुत्र्यादि की योनियों में कही गई हैं ।
उससे भी सौ गुनी अधिक महत्व वाली पूजा कामाख्या देवी की योनि
मण्डल में बतलाई गई है । कामाख्या में महामाया की पूजा को एक
बार कर चुका है वह इस लोक में कामनाओं को प्राप्त करता है और
परलोक में भगवान् शिव की स्वरूपता का लाभ किया करता है । उस
पुरुष के समान अन्य कोई भी भाग्यशाली नहीं है और फिर उसका
कोई भी कृत्य शेष नहीं रह जाता है । वह पुरुष अपना मनोवांछित अर्थ
इस लोक में प्राप्त करके चिरायु हो जाता है । उसकी गति वायु के ही
समान हो जाती है जो अन्यों के द्वारा कभी भी बाधित नहीं हुआ करती

௰ श्रीकालिका पुराण ௰ ३२९
है । वह पुरुष संग्राम अथवा शास्त्रावाद में दुर्जय हो जाता है । वैष्णवी
तन्त्र के द्वारा कामाख्या के योनि मण्डल में एक बार अभ्यर्चन करके
उसका सौ गुना फल का लाभ किया करता है । मूलमूर्ति महामाया
योगनिद्रा जगन्मयी है उसका वैष्णवी तन्त्र पहले ही प्रतिपादित कर
दिया गया है । अन्य जो मूर्तियाँ कही गई है जो शैलपुत्री आदि दूसरी
हैं वे सब उसी के विभाग हैं और उसके ही शरीर से निर्गत हुई हैं ।
जिस रीति से नित्य ही सूर्य के बिम्ब से किरणें निःसकरण किया
करती हैं ठीक उसी भाँति देवी महामाया के शरीर से उग्रचण्डा आदि
निकला करती हैं । मेरे द्वारा आपको उन्हीं के अंगरूप कहने चाहिए
महामाया का स्वरूप तो एक ही है और कार्यों के सम्पादन करने के
लिए वही भिन्नता को प्राप्त हुई हैं । कामाख्या तो महामाया है और
मूलमूर्ति गान ही गाया जाया करता है । वह पीठों के द्वारा विभिन्न नामों
वाली होकर महामाया गायी जाया करती है । जिस प्रकार से एक ही
भगवान् विष्णु नित्य होने से सनातन हैं । जनों के पीड़ा को दूर करने
से वही प्रभु जनार्दन, इन नाम से कहे गए हैं । ठीक उसी भाँति
महामाया कामार्थ गिरि में संगत हुई थी उसी समय यह महादेवी के द्वारा
और नरों के द्वारा निरन्तर कामाख्या कही जाती है । जैसे कोई पुरुष
छत्र के ग्रहण करने से छत्री हो जाया करता है और स्नान काल में
स्नापक कहा जाता है ठीक उसी रीति से नाम से यह कामाख्या हो गई
है । महामाया का शरीर के लिए समुपस्थित हुआ था । लोहित, कुकर्मों
से पीत जो कामार्थ उपयोजित किए गए हैं । कामकाल में खंड का
परित्याग करके वह स्वयं ही स्त्रक् को ग्रहण किया करती है । जिस
समय वह काम को त्याग कर देने वाली होती है उस समय में वह
असिधारिणी होती है ।
लोहित पंकज को न्यस्त करने वाले शिव प्रेम कामकाल में सित
प्रेत के ऊपर संस्थित काम को परित्यक्त कर देने वाली रमण करती
है । उसी भाँति इधर-उधर गमन करके सिंह के ऊपर विराजमान होती
हुई कामदा हो जाती है । किसी समय तो वह सित प्रेत पर होती है और

३३० [ornament] श्रीकालिका पुराण [ornament]
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
किसी समय में रक्त पंकज पर स्थित होती हैं । किसी अवसर पर वह
केशरी के पीठ पर संस्थित होती हुई कामरूप वाली रमण किया करती
है । जिस अवसर पर वह लोहित पद्म पर संस्थित हुआ करती है तो
उस समय उसके आगे केशरी चरण किया करता है । जिस समय प्रेत
पर स्थित देवी होती है उस समय आगे अन्य का निरीक्षण किया करती
है । जिस समय वह महामाया के स्वरूप से वह वरदा होती है उस
समय पूजा के काल में प्रेत, पद्म और सिंह के ऊपर स्थित होती है ।
जिस अवसर पर रक्त पद्म में ध्यान करे तब आगे हरि का चिन्तन करना
चाहिए । जब हरि में ध्यान करे तब अन्य दो आगे चिन्तन करे । एक ही
स्थान तीनों के ध्यान करने पर प्रेत पद्म हरि में क्रम से करना चाहिए ।
उन पर कामदा देवी के स्थित होने पर कामदा हरि में क्रम से
करना चाहिए । एक-एक पर भी जैसे भी उसी भाँति शिवा का चिन्तन
करे । वह एक समस्त जगतों की प्रकृति जहाँ-तहाँ ब्रह्मा, विष्णु, देवों
के द्वारा वह जगन्मयी धारण की जाया करती है । सित प्रेत महादेव हैं,
ब्रह्मा लोहितपद्म हैं, हरि हरि हैं ऐसे ही महान् ओज वाले के वाहन
जानने चाहिए । क्योंकि अपनी मूर्ति से उनका वाहन होना युक्त नहीं
होता है । इसी कारण से अन्य मूर्ति करके तीनों वाहनता को प्राप्त हुए
हैं । जिस-जिस में महामाया शिव निरन्तर प्रसन्न होती हैं उसी-उसी रूप
से तीनों ही आसन हुए थे । सिंह के ऊपर रक्त पद्म स्थिति है, उसके
ऊर्ध्व में गत शिव हैं । उनके ऊपर वह वर देने वाली अभय दायिनी
महामाया है । इस प्रकार के स्वरूप से ध्यान करके निरन्तर शिव का
पूजन करना चाहिए । उससे ब्रह्मा, विष्णु और शिव बिना ही संशय
के पूजित हो जाते हैं । इस प्रकार से सदा कामाख्या एक रूप वाली
महामाया ध्यान से और रूप से भिन्न है इससे वहाँ पर उसका पूजन
करना चाहिए । इस प्रकार से दुर्गा के विशेष तन्त्रों को आप दोनों को
कह दिए हैं । हे परमश्रेष्ठों! अब उसके अंग मन्त्रों का आप श्रवण
करिए ।

३३२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
मृणाल के सदृश आयत स्पर्श वाली दश बाहुओं से युक्त है ।
दाहिने हाथ में त्रिशूल, देव, खड्ग, चक्र क्रम से नीचे की ओर हैं ।
बाहुओं के संघों में तीक्ष्ण बाण तथा शक्ति से संगत है । ऊपर की ओर
खेटक, पूर्ण, चाप, पाश और अंकुश धारण किए हुए हैं । नीचे की
ओर बिना शिर वाले महिष असुर को प्रदर्शित करना चाहिए । जिसका
शिर छिन्न हो गया है और जो दानव अपने हाथ में खण्ड लिए हुए हैं ।
जो हृदय में बल से विद्ध हो रहा है और जिसकी अँतड़ियाँ बाहर
निकल रही हैं । स्रवित होते हुए रक्त से जिसके अंग रुधिर प्लावित
हो रहे हैं और जो रक्त से विस्फुरित नेत्रों वाला हो रहा है । जो
नागपाश से वेष्टित है और जो क्रोधावेश के कारण कुटिल भौंहों से
समन्वित मुख वाला है । जो पाश के सहित बाँये हाथ से दुर्गा के द्वारा
मस्तक के केश पकड़ा हुआ है । जिसमें मुख से रुधिर प्रवाहित हो रहा
है ऐसी देवी के सिंह का भी प्रदर्शन करना चाहिए । देवी का दाहिना
चरण सिंह के ऊपर संस्थित है तथा कुछ ऊपर की ओर वाम चरण
का अंगुष्ठ महिषासुर पर स्थित है ।
इस प्रकार के ध्यान को करते हुए फिर देवी का ध्यान करे जो उग्र
चण्डा, प्रचण्डा, चण्डोग्रा, चण्डनायिका, चण्डा, चण्डवती, चामुण्डा
चण्डिका है । इन आठ शक्तियों से निरन्तर परिवेष्टित है । इसी रीति
से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्रदान करने वाली देवी का निरन्तर
चिन्तन करना चाहिए । इसका एक मन होकर श्रवण करो । यह धर्म
काम और अर्थ का साधन है । इसका अंग मन्त्र दुर्गा तन्त्र, यह श्रुत
किया गया है । सूर्य के मकर राशि पर स्थित होने पर जो शुक्ल पक्ष
की पंचमी होती है । उसमें इस तन्त्र के द्वारा विधि-विधान के साथ
शिवा का भली भाँति पूजन करके फिर शुक्ल पक्ष की अष्टमी में
यथाविधि देवी का पूजन करके नवमी तिथि में बहुत बलिदानों का
समाचरण करना चाहिए और सन्ध्या के समय में अपने शरीर से उक्षित
रुधिर की बलि करनी चाहिए । उस प्रकार से करने पर कल्याणों से
युक्त होता हुआ पुरुष नित्य ही प्रमुदित होता है ।

वह मनुष्य पुत्रों और प्रपौत्रों से समृद्ध और धन-धान्य समृद्धियों से
समन्वित होता है और वह दीर्घ आयु वाला, सर्व प्रकार के सुभग इस
लोक में होता है । शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि में चैत्र मास में उस
समय में होने वाले पुष्पों से और अशोकों से भी जो पुरुष इस मन्त्र के
द्वारा पूजन किया करता है उसे कभी शोक नहीं होता है अथवा कोई
रोग भी नहीं होता है और न दुर्गत ही होती है । ज्येष्ठ मास के शुक्ल
पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन मनुष्य भली भाँति उपवास करे और
नवमी तिथि में तिलों सहित अन्नों, यावकों, मोदकों से, क्षीर, घृत-शहद,
शर्करा के सहित पिष्टक से, अनेक पशुओं के रुधिर से और माँसों से
पूजन करे । इसके अनन्तर शुक्ल पक्ष की दशमी में तिलों से मिश्रित
जल से दुर्गा मन्त्र के द्वारा तीन अंजलियाँ देनी चाहिए । इस रीति से
करने पर दशमी तिथि में दस जन्मों में भी जो पाप किया है वह प्रलीन
हो जाता है और ऐसा करने वाला पुरुष दीर्घायु भी हो जाता है ।
आषाढ़ मास के शुक्ल की दशमी में तिलों से मिश्रित जल से दुर्गा मन्त्र
के द्वारा तीन अंजलियाँ देनी चाहिए । इस रीति से करने पर दशमी
तिथि में दस जन्मों में भी जो पाप किया है वह प्रलीन हो जाता है और
करने वाला पुरुष दीर्घायु भी हो जाता है । आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष
की जो अष्टमी है और श्रावण मास की अष्टमी है उसमें पवित्रा धारण
करावे ।
पवित्राओं का आरोपण देवी का परमाधिक प्रीति करने वाला
होता है । हे भैरव! दुर्गा तन्त्र से मन्त्र के द्वारा और दुर्गा बीज से, हे
भैरव! पवित्रारोपण का समाचरण करे । विशेष रूप से श्रवण को
प्राप्त करके देवी को पवित्रारोपण करना चाहिए । समस्त देवों का
पवित्रारोपण करना चाहिए । आषाढ़ में अथवा श्रावण में सम्वत्सर के
फल का प्रदायक होता है । द्वितीया तो देवी के श्री की है जो अन्य सब
तिथियों में उत्तम है, ऐसा कहा गया है । तृतीया तिथि भवभामिनी की
है और चतुर्थी उसके सुत की है, पंचमी सोमराज की है और षष्ठी गुही
की बतायी गयी है । सप्तमी भुवन भास्कर की कही गई है तथा अष्टमी

३३४ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
तिथि दुर्गा देवी की है । मातृगणों की नवमी तिथि कही है तथा दशमी
तिथि वासुकि की होती है । एकादशी ऋषियों की है और द्वादशी
भगवान् चक्रपाणि की होती है । त्रयोदशी कामदेव की है और मेरी
चतुर्दशी तिथि है ①
ब्रह्मा और दिक्पालों की पौर्णमासी तिथि मानी गयी है । जो पुरुष
देवों को पवित्राओं का आरोपण नहीं करता है उसकी साम्वत्सरी पूजा
के फल को भगवान् केशव हरण कर लिया करते हैं । इसीलिए
प्रयत्नपूर्वक पवित्रारोपण अवश्य करना चाहिए । ऐसा करने पर बहुत
फल की प्राप्ति होती है । पवित्रा जिस सूत्र से और जैसे भी करना
चाहिए उसका ज्ञान होना चाहिए तभी उसे पवित्रारोपण करना चाहिए ।
हे भैरव! सर्वप्रथम तो दर्भ सूत्र है उससे पर पद्म सूत्र होता है । इसके
पश्चात् क्षेम सुपुण्य होता है और इससे पर कपास का सूत्र हुआ करता
है । यत्नपूर्वक पवित्रा विचित्र करने चाहिए । अर्थात् कई रंगों से
समन्वित होने चाहिए । गन्धमाल्य सुरभियों से जैसा कहा गया है
विरचित होने चाहिए । उस सूत को कन्या कर ले अथवा पवित्रता
प्रमदा उसको करले । जो विधवा हो और साधुशीला हो वह उसको
करले किन्तु दुःशील या दुःख शील कभी भी इसको न करे ।
इस पवित्रा की रचना में ऐसे सूत्र का वर्णन कर देवे जो सुई से
भिन्न हो, दग्ध हो, भस्म और धूप से अविगुण्ठित हो । जिसका उपयोग
किया गया हो, जो चूहों के द्वारा कुतरा हुआ हो, मद्य एवं रक्त से
दूषित हो, मलिन, नील रक्त हो, ऐसे सूत्र का यत्नपूर्वक परिवर्जन कर
देना चाहिए । सूत्रों से कनिष्ठ, मध्यम और उत्तम पवित्रा की रचना
करे । कनिष्ठ जो पवित्रा है वह सत्ताईस तन्तुओं का होता है । यह
पवित्रा मर्त्यलोक में यश, कीर्ति, सुख और सौभाग्य का बढ़ाने वाला
होता है । चौवन तन्तुओं का पवित्रा मध्यम कहा गया है । परम दिव्य
भोगों का आवाहन करने वाला पुण्य, स्वर्ग और मोक्ष का प्रदान करने
वाला उत्तम होता है जो एक सौ आठ तन्तुओं के द्वारा निर्मित होता है
उसको महादेवी के लिए अर्पित करके मनुष्य भगवान् शिव के सायुज्य

ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३३५
की प्राप्ति किया करता है । यदि भगवान् वासुदेव के लिए उत्तम पवित्रा
को समर्पित करे तो वेदपुरुष सीधा हरि के लोक में गमन किया करता
है, इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है ।
महादेवी को अर्पित पवित्रा तो भुक्ति और मुक्ति के प्रदान करने
वाला होता है । जो पुरुष रत्न माला में महादेवी की सेवा में पवित्रा का
समर्पण किया करता है वह सहस्र करोड़ कल्पों तक स्वर्ग में निवास
करके शिव ही हो जाया करता है । यह तो नागहार नाम वाला भगवान्
शंकर का पवित्रा होता है । एक सहस्र आठ तन्तुओं के द्वारा परम
मनोहर पवित्रा बनाकर जो मेरे लिए अर्पित किया करता है वह उसमें
जितने ही तन्तुओं का संचय होता है उतने ही सहस्र कल्पों तक मेरे ही
लोक में आनन्द का उपभोग किया करता है । एक हजार आठ से
भगवान् हरि की वनमाला कही गई है । उनके तन्तुओं के दान से
भगवान् विष्णु के सायुज्य की प्राप्ति होती है । जो कनिष्ठ पवित्रा होता
है वह कल्पपर्यन्त रहने वाला होता है । बारह ग्रन्थियों से समन्वित
आत्ममान के द्वारा उसे योजित करे । ऊरुओं तक आने वाला मध्यम
पवित्रा होता है । वहाँ पर ग्रन्थियों को योजित कर लेना चाहिए ।
इसका चौबीस का मान आत्मा का है वह उत्तम कोटि का पवित्रा होता
है । है भैरव! वह जन्तु पर्यन्त कहा गया है ।
अपने मान से छत्तीस ग्रन्थियों को योजित करे । एक सौ आठ
ग्रन्थियों का सुविधान से करना चाहिए । नागहार नामक जो है उसी के
समान अन्यों में विद्यमान से पवित्र किया जाता है । जिस सूत्र के द्वारा
पुनः ग्रन्थियाँ होती हैं, उससे अन्यय वर्ग वाले सूत्र से लक्षण से
समन्वित पवित्रा की रचना करनी चाहिए । कनिष्ठ में सात वेष्ठनों के
द्वारा ग्रन्थि करे । मध्यम में दुगनी करे और उत्तम में तिगुनी करे । पूर्व
दिन में पवित्रताओं का अधिवासन करना चाहिए । फिर वहाँ दूसरे दिन
में मन्त्रा में मन्त्र करे । दुर्गा बीज मन्त्र लोक वैष्णवी तन्त्र के द्वारा करे ।
विचक्षण पुरुष को प्रत्येक ग्रन्थि में स्वयं मन्त्र का न्यास करना चाहिए ।
हे भैरव! यहाँ पर जितनी भी ग्रन्थियाँ हों उतनी ही भाँति न्यास करे ।

൘९ श्रीकालिका पुराण ൘९ ३३५
की प्राप्ति किया करता है। यदि भगवान् वासुदेव के लिए उत्तम पवित्रा
को समर्पित करे तो वेदपुरुष सीधा हरि के लोक में गमन किया करता
है, इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है।
महादेवी को अर्पित पवित्रा तो भुक्ति और मुक्ति के प्रदान करने
वाला होता है। जो पुरुष रत्न माला में महादेवी की सेवा में पवित्रा का
समर्पण किया करता है वह सहस्त्र करोड़ कल्पों तक स्वर्ग में निवास
करके शिव ही हो जाया करता है। यह तो नागहार नाम वाला भगवान्
शंकर का पवित्रा होता है। एक सहस्त्र आठ तन्तुओं के द्वारा परम
मनोहर पवित्रा बनाकर जो मेरे लिए अर्पित किया करता है वह उसमें
जितने ही तन्तुओं का संचय होता है उतने ही सहस्त्र कल्पों तक मेरे ही
लोक में आनन्द का उपभोग किया करता है। एक हजार आठ से
भगवान् हरि की वनमाला कही गई है। उनके तन्तुओं के दान से
भगवान् विष्णु के सायुज्य की प्राप्ति होती है। जो कनिष्ठ पवित्रा होता
है वह कल्पपर्यन्त रहने वाला होता है। बारह ग्रन्थियों से समन्वित
आत्ममान के द्वारा उसे योजित करे। ऊरुओं तक आने वाला मध्यम
पवित्रा होता है। वहाँ पर ग्रन्थियों को योजित कर लेना चाहिए।
इसका चौबीस का मान आत्मा का है वह उत्तम कोटि का पवित्रा होता
है। हे भैरव! वह जन्तु पर्यन्त कहा गया है।
अपने मान से छत्तीस ग्रन्थियों को योजित करे। एक सौ आठ
ग्रन्थियों का सुविधान से करना चाहिए। नागहार नामक जो है उसी के
समान अन्यों में विद्यमान से पवित्र किया जाता है। जिस सूत्र के द्वारा
पुनः ग्रन्थियाँ होती हैं, उससे अन्यय वर्ग वाले सूत्र से लक्षण से
समन्वित पवित्रा की रचना करनी चाहिए। कनिष्ठ में सात वेष्ठनों के
द्वारा ग्रन्थि करे। मध्यम में दुगनी करे और उत्तम में तिगुनी करे। पूर्व
दिन में पवित्रताओं का अधिवासन करना चाहिए। फिर वहाँ दूसरे दिन
में मन्त्रा में मन्त्र करे। दुर्गा बीज मन्त्र लोक वैष्णवी तन्त्र के द्वारा करे।
विचक्षण पुरुष को प्रत्येक ग्रन्थि में स्वयं मन्त्र का न्यास करना चाहिए।
हे भैरव! यहाँ पर जितनी भी ग्रन्थियाँ हों उतनी ही भाँति न्यास करे।

३३६ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
उसके मन्त्र उससे अंगोपयोजन होवें। दुर्गा तन्त्र के मन्त्र के द्वारा
सत्त्व न्यास करना चाहिए। एक स्थान में यज्ञपात्र में समस्त पवित्राओं
को रखकर उसमें गन्ध आदि और पुष्पों को रखकर परम शोभन, हे
भैरव! अँगुली के अग्रभाग से फिर तत्त्व न्यास करावे। द्विज का मन्त्र
न्यास 'इन्द्रविष्णुः' यह कहा गया है। शूद्रों के मन्त्र से मेरा तत्व न्यास
कहा गया है। इसके द्वारा इसके मन्त्र और इससे ही दान करावे।
कुंकुम, उशीर, कर्पूर और चंदन आदि विलेपनों से पवित्रताओं का
विलेपन करके तत्व न्यास को योजित करना चाहिए। मनुष्य विधिपूर्वक
मण्डल में देवी का अभ्यर्चन करे।
दुर्गा बीज द्वारा देवी के मस्तक में पवित्रा का समर्पण करना
चाहिए। जिस देव का जो कहा है उसका उसी से ही मण्डल होता है।
जिस-जिसका जो मन्त्र है जैसा भी ध्यान आदि पूजन है वह उसी मन्त्र
से ही यत्नपूर्वक पूजन करके उसके ही बीज और मन्त्र से मस्तक में
पवित्रा का अर्पण करे। जो भी मुझको पवित्रा का समर्पण करता है
और दोनों देवों के लिए देता है। हे भैरव! सभी देवों का सम्पूर्ण अर्थ
होता है। अग्नि, ब्रह्माभवानी, गज वक्त्र, महोरग, स्कन्द, भानु,
मातृगण, दिक्पाल, नवग्रह, इन सबको घटों में यथाविधि, प्रत्येक का
पूजन करके परम सावधान होते हुए इनके लिए एक-एक पवित्रा
मस्तक में समर्पित करे। पञ्चगव्य चरु को बना करके देवी के लिए तीन
आहुतियाँ देवे। उसी से भगवान् विष्णु और शम्भू के लिए यथाविधि
देवे। आज्य (घृत) तथा तिल संयुत घृत से अष्टोत्तर शत आहुतियाँ
देनी चाहिए।
साधन करने वाले को महादेवी के लिए एक सौ आठ आहुतियाँ
देनी चाहिए। इसी विधान से भगवान् विष्णु आदि को भी साधक द्वारा
आहुतियाँ देनी चाहिए। धर्म, काम और अर्थ की सिद्धि के लिए
पवित्रारोपण करना चाहिए। यह एक परमावश्यक कृत्य है। अनेक
प्रकार के नैवेद्य पेय पिष्टक मोदकों से, कूष्माण्ड, नारिकेल, खजूर,
आम्र, दाड़िम, कर्क, रुद्राक्ष आदि विविध भाँति के फलों के द्वारा,

[Page Header]
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३३७

[Main Text]
समस्त भक्ष्य भोज्य आदि से, माँस ओदन से, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप,
वस्त्र-भूषण से भवानी का साधक यजन करे । हे भैरव! नर और
नर्तकों के समुदाय तथा वेश्याओं के द्वारा देवी का मनोविनोद करे ।
नृत्य और गीतों से समुदित होकर रात्रि में जागरण करे । द्विजातियों के
साथ और ज्ञानियों को तथा ब्राह्मणों को भोजन करावे । पवित्रारोपण
के हो जाने पर दक्षिणा का उपदायन करे । दक्षिणा में सुवर्ण, गौ,
तिल, घृत, वस्त्र अथवा शाक ही देवे ।
इसके अनन्तर साधक इस मन्त्र का उच्चारण करे, हे परमेश्वरि!
मणि, विद्रुम की मालाओं से और मन्धर के कुसुम आदि के द्वारा
आपकी यह साम्वत्सरी पूजा सम्पन्न होवे । इसके उपरान्त पूजाओं से
और प्रतिपत्तियों के द्वारा देवी का विसर्जन करना चाहिए । इस रीति
से देवी को यथाविधि पवित्राओं के दान के हो जाने पर सम्वत्सर की
जो पूजा है वह वासर से सम्पूर्ण हो जाया करती है । वह मनुष्य सैंकड़ों
करोड़ कल्पों में देवी के ही घर में निवास किया करता है और वहाँ
पर भी उसको सुख, सौभाग्य की अतुल समृद्धि होती है ।

[Section Header]
महिषासुर उपाख्यान

श्री भगवान् ने कहा-दुर्गा तन्त्र से मन्त्र के द्वारा दुर्गा का महोत्सव
करना चाहिए । शरद् काल में महानवमी को राजास आदि का बलिदान
करना चाहिए । आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में जो अष्टमी तिथि होती
है, वह महाअष्टमी कही गई है जो देवी की परम प्रीति करने वाली
हुआ करती है । इसके पश्चात् जो नवमी तिथि होती है वह महानवमी
कही गई है । वह समस्त लोकों की पूजनीय और शिव की होती है ।
हे भैरव! हे वत्स! इन दोनों में जो पूजा होती है उसमें जो कुछ भी
विशेषता है उसका आप श्रवण करिए । मण्डल में विधि के साथ देवी
का प्रयत्त होकर मनुष्य भली भाँति पूजा करे । हे भैरव! वैष्णवी तन्त्र
से मन्त्र के द्वारा और दुर्गा के मन्त्र से मूर्ति भेद में जैसे देवी भूति के
लिए पूजा का ग्रहण किया करती है । कन्या राशि पर सूर्य के आ जाने

३३८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
पर, हे वत्स! शुक्ल पक्ष की नन्दिका अर्थात् प्रतिपदा तिथि से आरम्भ
करके रहे । अयाचित का अशन करने वाला, रात्रि में एक बार भोजन
करने वाला, अमद रहने वाला, प्रातःकाल में स्नान करने वाला,
शीतोष्ण आदि द्वन्दों का सहन करने वाला और दोनों वक्त में शिव का
पूजन करने वाला, जप और होम से समायुक्त होता है ।
विल्व वृक्ष की शाखाओं में बेध न करे और षष्ठी तिथि में देवी
पूजन फलों से करे । सप्तमी तिथि में उस विल्व की शाखा का आहरण
करके प्रति पूजन करना चाहिए । फिर अष्टमी में विशेष रूप से पूजा
का समाचरण करना चाहिए । स्वयं जागरण करे तथा महानिशा में
बलिदान करे । अधिक बलिदान तो विधि के सहित नवमी में करना
चाहिए । दश भुजाओं वाली देवी का ध्यान कर और दुर्गा तन्त्र से पूजा
करनी चाहिए । उस तिथि में रात्रि में विसर्जन करके समाचरण करे ।
जिस समय में सोलह भुजाओं वाली महामाया का पूजन करे, दुर्गा तन्त्र
से करे । उसकी विशेषता के विषय में अब श्रवण करो । कन्या राशि
की संक्रान्ति में कृष्ण पक्ष की एकादशी के उपवास किए हुए द्वादशी
में एक बार दूसरे दिन में करे । चतुर्दशी में विधान में महामाया का
बोधन करे जो गीत, वाद्य और निर्दोष के द्वारा और अनेक नैवेद्यों के
द्वारा वाधन करना चाहिए ।
बुद्ध पुरुष को दूसरे दिन में अयाचित उपवास करे । इस प्रकार
ही जब नवमी हो व्रत करे । ज्येष्ठा में भली भाँति अभ्यर्चन करना
चाहिए और मूल में प्रति पूजन करे । उत्तरा से अर्चन करके श्रवण के
अन्त में विसर्जन करना चाहिए । जिस समय में अठारह भुजाओं वाली
महामाया का पूजन करे । हे भैरव! दुर्गा मन्त्र के द्वारा वहाँ पर भी करे ।
हे भैरव! उसका आप श्रवण कीजिए । कन्या में कृष्ण पक्ष की आद्रा
नक्षत्र के दिन पूजन करे । नवमी तिथि में गीत वादित निर्घोषों के द्वारा
देवी का बोधन करे । शुक्ल पक्ष में चतुर्थी तिथि में देवी के केशों का
विमोचन करे । पञ्चमी में प्रातःकाल ही में शुभ जल से स्नपन करावे ।
सप्तमी में पत्रिका की पूजा करे और अष्टमी में भी उपोषण करे ।

൵७൲ श्रीकालिका पुराण ൵७൲ ३३९
नवमी में विधि के साथ पूजा जागरण और बलि करे । दशमी में क्रीड़ा,
कौतुक, मंगलों द्वारा सम्प्रेषण करे । दशमी में नीराजन करे जो महान्
बल और वृद्धि का करने वाला होता है ।
जिस समय जगन्मयी वैष्णवी देवी महामाया का पूजन करे वहाँ पर
उस अवसर पर जो विशेषता है उसका, हे भैरव! अब आप श्रवण
करिए । सूर्य के कन्या राशि पर संस्थित होने पर जो पूजा है वह शुक्ल
पक्ष की अष्टमी तिथि है उस तिथि में रात्रि से वैभव के सितारों से पूजा
करनी चाहिए । नवमी से यथाविधि बलिदान करना चाहिए । वहाँ पर
विशेष भूति के लिए जप, होम विधि के साथ ही करना चाहिए ।
मनुष्य को महादेवी का अष्ट पुष्पिका से भली-भाँति पूजन करना
चाहिए । पहले समय में श्रीराम के ऊपर अनुग्रह करने के लिए रावण
वध के लिए ब्रह्माजी के द्वारा महादेवी रात्रि में ही बोधित की गई थी ।
इसके अनन्तर वह निद्रा का त्याग करके नन्दा में आश्विन मास के
शुक्ल पक्ष में नन्दा तिथि में गमन करने वाली हुई थी । जहाँ पर पहले
श्री राघवेन्द्र थे वहाँ से लंका में गये थे । वहाँ पर महादेव जी ने गमन
करके उस समय में राम और रावण को युद्ध करने के लिए नियोजित
कर दिया था और अम्बिका देवी स्वयं अन्तर्धान हो गई थी । वहाँ
बानरों और राक्षसों के माँस और रुधिर का भक्षण किया था ।
उस देवी ने श्रीराम और रावण का युद्ध एक सप्ताह तक नियोजित
किया था । सातवीं रात्रि के समाप्त होने पर फिर नवमी में रावण को
श्रीराम ने मार दिया था । वह जगन्मयी महामाया देवी ने उन दोनों की
जब तक युद्ध की केलि हुई थी उसको स्वयं देखा था । तब तक सात
रात्रियों में वह ही देवों द्वारा सुपूजित हुई थी और रावण के निहित हो
जाने पर नवमी तिथि में समस्त देवगणों के द्वारा पूजा की गई थी ।
लोकों के पितामह श्री ब्रह्माजी ने दुर्गा देवी की विशेष पूजा की थी ।
इसके अनन्तर शार्वरोत्सवों के द्वारा देवी दशमी तिथि में देवी सम्प्रेषित
की गई थी । इन्द्रदेव ने देवसेना का नीराजन किया था । और वह
नीराजन देवसेना में शान्ति के लिए और देवों के राज्य की वृद्धि के

लिए ही किया था। राम और रावण से जो युद्ध हुआ था वह देखकर
भय देने वाला हुआ था। तृतीया से लंका से पूर्वोत्तर दिशा में स्थित
स्वाति नक्षत्र से युक्त में सुरों का बल बहुत अधिक भयभीत हो गया
था। देवेन्द्र ने हरि के वचन से शान्ति के लिए वारण किया था। इसके
अनन्तर श्रवण नक्षत्र से संयुत दशमी में शुभ चण्डिका को विदा करके
हरि ने शान्ति स्थापित करने के लिए बल का नीराजन (आरती) किया
था। जिसके बल का नीराजन किया था वह इन्द्रदेव वहाँ पर श्रीराम
रावण को संस्थापित करके देवों सहित अपने स्वर्ग लोक को चला
गया था। पहले कल्प में यह इति वृत्ति है जो कि स्वायम्भुव मन्वन्तर
में था। उस समय में दश भुजाओं वाली देवी देवों के हित का सम्पादन
करने के लिए प्रादुर्भूत हुई थी। त्रेता युग के आदि काल में हित का
सम्पादन करने के लिए प्रादुर्भूत हुई थी। त्रेता युग के आदि काल में
मनुष्यों के जगतों की जनता के हित की कामना से पहले काल में जो
हुआ था वैसा ही प्रत्येक कल्प में हुआ था। देवी स्वयं दैत्यों के विनाश
करने के लिए प्रवृत्त होती है। प्रत्येक काल में श्रीराम होते हैं और
राक्षसराज रावण भी हुआ करता है। उसी प्रकार युद्ध होता है और
उसी भाँति देवों का संगम भी होता है। इस प्रकार से सहस्त्रों ही श्रीराम
के अवतार हुआ करते हैं और रावण भी सहस्त्रों की संख्या में होते हैं।
प्राणी भी जो होने वाले हैं वे होते हैं और वैसे ही देवी भी प्रवृत्त हुआ
करती है। सभी सुरगण उस देवी का पूजन किया करते हैं तथा
नीराजन भी करते हैं।
उसी भाँति जैसा कल्प में करते थे सभी मनुष्य विधि विधान के
साथ पूजा किया करते हैं। राजा बल का नीराजन बल की वृद्धि के
लिए किया करता है। दिव्य अलंकारों से युक्त वारुणी से प्रवृत्तन होता
है। उस समय में क्रीड़ा कौतुकों के द्वारा मंगलमय नृत्य और गीत करने
के भक्ष्यों तथा भोज्यों से, कूष्माण्ड, नारिकेल, खर्जूर, पनस, हास,
आँवला, शांडिल, प्लीह, करुण, कशेरु, क्रमुक, मूल, जम्बू, तिन्दक
तथा गुड़, माँस, मद्य, मधुताल, प्रिय नैवेद्य लाजा (खील), अक्षत,

ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३४१
इक्षुदण्ड, सिता (मिश्री) लवली आदि नागरंजक, अजा, महिर्ष, मेष
अपने शोणित के सञ्चय, अक्षी आदि बलि के जाति वाले तथा अनेक
प्रकार के पशुगण के द्वारा तथा माँस और रुधिर के कर्दम के द्वारा
जगत् की धात्री का पूजन करना चाहिए ।
रात्रि में स्कन्द विशाख की पिष्ठ पुत्रिका बनाकर शत्रुओं के
विनाश के लिए दुर्गा की प्रीति के सम्पादन के वास्ते पूजन करे और
तिलों के सहित घृत से तथा माँस से ही होम करना चाहिए । उग्र
चण्डादिकं की पूजा करनी चाहिए तथा आठ शुभ योगिनियों की
अर्चना करे । योगिनियाँ चौंसठ हैं । देवी के सन्निहित परम शुभ नव
दुर्गाओं का यजन करे । जयन्ती आदि का गन्ध पुष्पों से पूजन करे
क्योंकि वे देवी की मूर्तियाँ हैं और देवियाँ हैं । देवी के समस्त अस्त्र
तथा सब भूषण जो देवी के अंग प्रत्यंग में युक्त हैं और देवी के वाहन
सिंह का पूजन करना चाहिए । महिषासुर के मर्दन करने वाली सब का
सदा भूति-वैभव के लिए यजन करे । पहले कल्प में स्वायम्भुव, मनु
के अन्तर में मनुष्यों के कृतयुग के आदि काल में महादेवी सदा देवगणों
के द्वारा स्तवन की गई थी । महिषासुर के विनाश के लिए तथा
जगन्मयी महामाया प्रसिद्ध थी ।
वह महामाया सोलह भुजाओं से संयुत थी और भद्रकाली, इस
नाम से लोकों में विश्रुत थी । क्षीर सागर के उत्तर पूर्वी तट पर अपने
विपुल तनु का धारण करती हुई थीं । उनका वर्ण अलसी के पुष्प की
आभा के ही समान था और उनके कुण्डल तपे हुए सुवर्ण के समान
देदीप्यमान थे । खण्ड चन्द्र से युक्त उनके मस्तक पर कुण्डल जटाजूट
थे तथा तीन मुकटों से यह शोभायमान था । उनके कण्ठों में नागों का
हार विराजमान था तथा सुवर्ण का भी हार पड़ा हुआ था जिससे वे
विभूषित हो रही थी । दाहिनी ओर की बाहुओं के द्वारा वे शूल, चक्र,
खंड, शंख, बाण, शक्ति, वज्रदण्ड नित्य ही निरन्तर धारण कर रही
थीं । देवी विकास संयुत दर्शनों की पंक्तियों से परम समुज्जवल थीं ।
बाँई ओर वाली भुजाओं के द्वारा वे खेटक, चर्म, चाप, पाश, अंकुश,

३४२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
घण्टा, परशु, मुद्गल को धारण कर रही थीं । सिंह वाहन पर
विराजमान थी और लाल वर्ण वाले नेत्रों से अतीव उज्जवल थीं ।
परमेश्वरी अपने शूल के द्वारा महिष असुर का भेदन करके संस्थित
थीं । वहाँ पर अपने बाँये चरण से आक्रमण करके जगन्मयी देवी
विराजमान थीं । उन देवी का दर्शन करके समस्त देवगण उनको प्रणाम
कर रहे थे । उस महिषासुर को निहित विलोकन करके वे देव कुछ भी
नहीं बोल रहे थे । इसके अनन्तर वह परमेश्वरि उन ब्रह्मादिक देवों से
बोली ।
देवी के मुख में मन्द हास था और परम प्रसन्न थी, शुभ दन्तपंक्ति
से वे उज्जवल थीं । उन्होंने देवों से कहा-हे सुरगणों! आप लोग अब
अन्य जम्बूद्वीप की ओर गमन कर जाओ । हिमवान् पर्वत के समीप में
परम श्रेष्ठ कात्यायन का आश्रम है । वहाँ पर ही आपका साध्य होगा
इसमें संशय नहीं है । इतना कहकर वह महादेवी वहाँ पर ही अन्तर्धान
हो गई थीं । उस अवसर में देवगण भी कात्यायन मुनि के पुर को चले
गए थे । देवी के द्वारा महिषासुर निहित हो गया था जो कि अर्थ से
हम सबने देखा था । और महा जगतों की धात्री, जगतों से परिपूर्ण देवी
का स्तवन किया गया था । उस महादेवी ने हमको यहाँ कात्यायन के
आश्रम में गमन करने को किस प्रयोजन के लिए कहा है । क्या कोई
अन्य कार्य हमारा वांछित होगा ? वे सब ही परस्पर में विचार करते हुए
चले गए थे ।
हिमवान् पर्वत के समीप में ही कात्यायन मुनि का आश्रम है । फिर
इन्द्र के सहित तथा दिक्पालों के समेत ब्रह्मा, विष्णु, शिव वहाँ गए
थे । वहाँ पर बहुत लम्बे समय तक वे बैठ गए और सभी दुर्गा देवी के
दर्शन की लालसा वाले हो रहे थे । इसके अनन्तर समस्त रुद्रगणों ने
महिषासुर के चेष्टित को आकर कहा था । उन्होंने देवलोक के पराभव
का कथन वहाँ आकर किया था । इसके अनन्तर वहाँ पर ब्रह्मा, शिव,
विष्णु प्रभृति ने महान् कोप किया था । वह महिषासुर तो देवी के द्वारा
हित कर दिया गया । वह कौन है जिसके द्वारा पुनः यहाँ पर जगतों

ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३४३
का अत्यन्त विध्वंस किया जा रहा है। इस प्रकार से प्रकोप करते हुए
उन शरीरों से पृथक्-पृथक् तेज निर्वात हुए जो उसी क्षण शक्ति के
स्वरूप वाले थे। उन देवों के शरीरों से निःसृत तेजों से देवी ने वपु
धारण किया था और निश्चय ही कात्यायन के द्वारा सन्धुक्षित एवं
पूजित हुई थी। इसी से वह कात्यायनी, इस नाम से कही गई है। इसके
अनन्तर उसी मन्त्र के द्वारा जो दश बाहुओं से समन्वित है उस जगतों
की धात्री और जगन्मयी देवी ने पश्चात् महिषासुर का वध कर दिया
था। जिस अवसर पर महादेवी का संस्तवन किया गया था और
शोधित की गई थी तो आश्विन मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तिथि
में वह जगन्मयी प्रत्यक्ष रूप में प्रकट हुई थी। वह देवों के तेजों की
मूर्ति परम शोभन शुक्लपक्ष में सप्तमी तिथि में उसने किया था और वह
देवी अष्टमी में उन्हीं के द्वारा पूजित थीं और उसने महिषासुर का हनन
किया था। दशमी में विदा की गई थी और शिवा अन्तर्धान हो गई थी।
मार्कण्डेय ने महर्षि से कहा-राजा सागर ने इस देवी की संगति का
श्रवण करके वह उसके स्वरूप में संशयालु होकर पुनः उसने और्व से
पूछा था। राजा सागर ने कहा-यदि महादेवी ने पीछे महिषासुर का
हनन किया था तो पूर्व में कैसे महिषासुर के लिए वह भद्रकाली के
रूप वाली हुई थी। उसी भाँति उसका दर्शन है कि उसके चरणों से
समाक्रांत किया गया था कि उस असुर के हृदय में शूल गड़ा हुआ है
और हृदय निर्भिन्न हो रहा है। हे मुनि श्रेष्ठ! मुझे यह बड़ा संशय हो
रहा है इसका छेदन कृपा कर करिए।
और्व मुनि ने कहा-हे नृप शार्दूल! आप श्रवण करिए, जिस तरह
पहले भद्रकाली प्रादुर्भूत हुई थी। वह महामाया महिषासुर के साथ ही
थी। यह महिषासुर ही है जो पर्वत में निद्रा में वर्तमान था। उस वीर
ने एक घोर दर्शन वाला स्वप्न देखा था। उसने यह स्वप्न देखा था कि
मुँह फैलाए हुए अत्यन्त भीषण महामाया भद्रकाली ने खंड से मेरे शिर
का छेदन करके उसके रुधिर का पान कर रही थी। उस समय
महिषासुर के द्वारा भली भाँति आराधना की हुई देवी भद्रकाली सोलह

भुजाओं से युक्त होकर प्रादुर्भूत हुई थी अर्थात् प्रत्यक्ष रूप में प्रकट हुई
थी । इसके अनन्तर महिषासुर ने जगन्मयी महामाया को प्रणाम किया
और अत्यन्त विनम्र मूर्ति वाला होकर भक्ति की भावना से परिपूर्ण होते
हुए उस असुर ने यह वचन कहा । महिष बोला-हे देवी! आपके खंड
से मेरे मस्तक को काटकर मेरे रुधिर को आपने पिया था और मैंने यह
स्वप्न देखा है । स्वप्न के द्वारा निश्चित रूप से मैंने अवलोकन किया
है । आपके द्वारा यह अवश्य ही करना है, यह मैंने ज्ञान प्राप्त कर
लिया है । यह मेरे रुधिर का पान आप अवश्य ही करेंगीं । अब उसमें
मुझे एक वरदान दीजिए ।
हे परमेश्वरि! मैं तुम्हारे द्वारा ही वध करने के योग्य हूँ । इसमें कुछ
भी संशय नहीं है । मुझे भी इस विषय में कोई दुःख नहीं है क्योंकि
जो नियत है वह किसी के भी द्वारा लंघित नहीं हुआ करता है अर्थात्
उसे कोई टाल नहीं सकता है । किन्तु पहले समय में आपके ही साथ
मैंने भगवान् शम्भु की आराधना की । मैंने भी शम्भु का समाराधना
किया था और उसी भाँति की चेष्टायें प्राप्त हुई थीं । जब तक तीन
मनवन्तर हैं, उत्तम असुर राज्य है । मैंने उस राज्य को अकण्टक रूप
से भोग किया है । मुझे इसका कुछ भी अनुमान नहीं है । शिष्य के
कारण से कात्यायन मुनि के द्वारा मुझे शाप दिया गया था । यह
सीमान्तिनी तेरा विनाश करेगी, इसमें संशय नहीं है । पुराने समय में
तपश्चर्या करते हुए परम श्रेष्ठ रौद्राशव नामक जो कात्यायन मुनि के
शिष्य को हिमवान् के समीप में एक अनुपम स्त्री का रूप धारण करके
मैंने कौतुक से मोहित किया था । विप्र ने उस अवसर पर तप का त्याग कर
दिया था । पाप में ही संस्थित कात्यायन के पुत्र ने मुझे शाप दिया ।
उस समय में माया का ज्ञान प्राप्त करके शिष्य के लिए क्रोध की
अग्नि के द्वारा मुझे शाप दिया गया था क्योंकि तुमने यह मेरा शिष्य
मोहित किया है जो तप से च्युत हो गया है । तूने स्त्री के स्वरूप के
द्वारा ऐसा किया है इसलिए तुझको स्त्री ही मारेगी । इस रीति से पूर्व
में कात्यायन मुनि ने स्वयं मुझको शाप दिया था । उस शाप का काल

अब आकर उपस्थित हो गया है । मैंने देवों के इन्द्र का पद प्राप्त किया
था और तीनों भुवनों का समान उपभोग किया था । मुझे कुछ भी
सोचने अर्थात् शोक और चिन्ता करने के योग्य नहीं है और न मुझे
शेष जो भी प्रार्थना करने योग्य है जो देवि! हे दुर्गे! मुझे दीजिए ।
आपकी सेवा में मेरा बारम्बार नमस्कार है ।
देवी ने कहा--हे महासुर! जो मुझे वरदान प्रार्थना करने के लायक
हैं उसके विषय में तुम अब श्रवण करो । तुम्हारा प्रार्थनीय जो वर है
उसको दे दूँगी, इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है । महर्षि ने कहा-मैं
आपकी प्रसन्नता से यज्ञ के भाग का उपभोग करना चाहता हूँ । जिस
रीति से सभी यज्ञों में पूज्य हो जाऊँ वैसा ही आप मुझ पर दीजिए ।
जब तक भी संसार में सूर्यदेव विद्यमान है मैं आपके चरणों की सेवा
का परित्याग नहीं करूँगा । यदि आपके द्वारा मुझे वरदान देना है तो
इस प्रकार से ये दो वर मुझे देने की कृपा कीजिए ।
देवी ने कहा-यज्ञों के भाग तो देवगणों के ही लिए पृथक्-पृथक्
कल्पित हैं । अन्य कोई भी भाग शेष नहीं है जो मैं इस समय तुझे
दूँगी । किन्तु हे महिषासुर! मेरे साथ युद्ध में तेरे निहित हो जाने पर तू
मेरे चरणों को कभी नहीं त्यागेगा और निरन्तर चरण से संपुष्ट ही
रहेगा । इसमें कुछ भी संशय नहीं है । हे दानव! जहाँ-जहाँ पर भी मेरी
पूजा प्रवृत्त होती है वहाँ पर यह तुम्हारा शरीर भी पूजा के और चिंतन
करने के योग्य होगा । प्रातःकाल में यह उस देवी का वचन सुनकर
महिषासुर वहाँ पर वर प्राप्त करके परम प्रसन्न हुआ ।
उसने कहा-हे उग्रचण्डे! हे दुर्गे! हे भद्रकाली! हे देवि! आपकी
सेवा में मेरा नमस्कार है । हे देवि! आपकी बहुत सी मूर्तियाँ हैं और
आपके द्वारा समस्त परिपूर्ण हैं । हे परमेश्वरि! मैं यज्ञ में किन मूर्तियों
के द्वारा पूज्य होऊँगा । यही आप मुझे बताइए यदि आपके द्वारा मेरे
ऊपर यहाँ पर कृपा की गई है ।
देवी ने कहा-हे महिषासुर! यहाँ पर आपने जो भी नाम कहे हैं उन
मूर्तियों में संस्पुष्ट होता हुआ लोक में तुम पूज्य होओगे । जो उग्रचण्डा

३४६  श्रीकालिका पुराण 

मूर्ति है फिर मैं भद्रकाली हूँ जिस मूर्ति के द्वारा मैं तेरा हनन करूँगी वह
दुर्गा कीर्त्तित की गयी है । इन मूर्तियों में सदा ही तुम मेरे चरणों के पूज्य
होओगे । प्राचीन काल में जब सृष्टि का आदि काल था उस समय
उग्रचण्डा मूर्ति के द्वारा तुम्हारा हनन किया गया था । दूसरी सृष्टि के
समय में आपको भद्र काली मेरे द्वारा निहित किया गया था । और इस
समय में दुर्गा के स्वरूप के द्वारा तुमको तुम्हारे अनुगामियों के सहित
हनन करूँगी किन्तु पूर्व में मेरे द्वारा चरण के तल में तुमको ग्रहण करने
वाले हो गए हो । अतएव पूर्व कालों में ग्रहण किए गए हो और पीछे
भी यज्ञ भाग की मुक्ति के लिए ग्रहण करने के योग्य हो गए हो ।
और्व मुनि ने कहा-इतना कहकर उस महामाया ने उग्रचण्डा नाम वाले
तनु को उस समय में महिषासुर को दिखा दिया था । जो मूर्ति सोलह
भुजाओं वाली थी और भद्रकाली, इस नाम से विश्रुति थी उसी भाँति
मूर्ति को अमर बाहुओं से धारण करने वाली थी ।
दक्षिण की ओर नीचे गदा रखे हुए बांये हाथ से पान पात्र को रखे
हुए थी जो सुरों से भरा हुआ था । शिर में नर मुण्डों की माला धारण
करने वाली थीं । भिन्न हुए अंजन के समान थी, प्रचण्ड स्वरूप वाली
और सिंह के वाहन वाली थी । लाल वर्ण वाले नेत्र थे, महती काया
थी और अठारह बाहुओं से युक्त थी । उग्रचण्डा और भद्रकाली ये दो
मूर्तियाँ थी । ऐसे स्वरूप का दर्शन करके शीघ्र ही महिषासुर ने उनको
प्रणिपात किया था और वह बहुत ही विस्मय को प्राप्त हो गया था ।
इसके अनन्तर जिस रीति से आक्रान्त करके महिषासुर को निहित
किया था ठीक उसी भाँति दोनों देवियों ने उसको चरण के तल से नीचे
ग्रहण कर लिया था । उसका हृदय शूल से विदीर्ण किया हुआ और
महिषासुर बिना शिर वाला था । देवी के द्वारा उसके केश ग्रहण किए
हुए थे और निकलती अँतड़ियों से भूषित हो रहा था । जिसके मुख से
रुधिर निकल रहा था, ऐसा जिसका शरीर था ऐसे अपने पूर्व शरीर
को उसने देखा था । वह असुर भय को प्राप्त करके बहुत चिन्ता एवं
शोक करने लगा था तथा मोह को प्राप्त हो गया था । इसके अनन्तर

≎ श्रीकालिका पुराण ≎ ३४७
एक ही क्षण में दानव ने अपने आपको संस्तम्भित किया था और उसने
देवी को प्रणाम किया था तथा गद्गद् होकर देवी से उसने यह वचन
कहा-महर्षि ने कहा-हे देवि! यदि आप मुझ पर परम प्रसन्न हैं और
आपने यज्ञ के भागों को मेरे लिए कल्पित किया है तब मेरा अन्य जन्म
प्राप्त न करूँ। देवी ने कहा-आपने मेरी आराधना की है अतएव मैंने
आपको वर दे दिया है। यहाँ पर तुम मेरे ही द्वारा वध्य होगे, इस
विषय में कुछ भी विचार तुमको नहीं करना चाहिए। जो भी तुमने
प्रार्थना की है कि मेरा विरोध सुरों के साथ न होवे, यह भी सब हो
जायेगा। हे दानव! मेरे चरण के तल के स्पर्श से तेरा शरीर यज्ञ भागों
से उपभोग करने के लिए विशीर्ण नहीं होगा। हे महासुर! तेरे
जीवात्माओं के साथ प्राण सब ही भगवान् हर के पाद के संयोग से
केवल चिरकाल पर्यन्त स्थित रहेंगे। हे महिषासुर! सहस्रों करोड़ कल्प
तक और चिरकाल पर्यन्त तेरे जन्म न होंगे।
इस प्रकार से यह वर देवी ने उस महिषासुर को देकर उस असुर
के द्वारा शिर से प्रणत होती हुई वहाँ पर ही अन्तर्धान हो गई थी। वह
महिष भी हे नृप! पुनः माया के द्वारा सम्मोहित होता हुआ पूर्व की भाँति
आसुरी भाव का आदान करके अपने स्थान को चला गया था। राजा
सगर ने कहा-माया के द्वारा अनेक दैत्य निहित किए गए थे जिनका
वध लोकों की विभूति के लिए ही हुआ था। उसको शुभ वरदान देकर
वे पुनः प्रगृहीत नहीं हुए थे। यह किस कारण से वर देकर कैसे पुनः
प्रगृहीत हुआ था? हे द्विजोत्तम! मुझे यह बतलाने की कृपा करें।
और्व मुनि ने कहा-सुरों के बैरी रम्भ के द्वारा वे भगवान् शंकर
परम प्रसन्न हो गए थे। इसके अनन्तर परम प्रसन्न महादेव जी प्रत्यक्ष
रूप में उपस्थित होकर उस रम्भ से बोले थे कि मैं तुम पर परम प्रसन्न
हो गया हूँ अब जो भी तेरा इच्छित हो मुझसे वरदान का वरण कर
लो। इस रीति से कहा हुआ रम्भ भगवान् चन्द्रशेखर से बोला था। हे
महादेवजी! मैं बिना पुत्र वाला हूँ। यदि आपका मुझ पर अनुग्रह हो
तो, हे शंकर! मेरे तीन जन्मों में आप ही मेरे पुत्र होकर जन्म ग्रहण