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सर्वकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 339, कुल 442 में से

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पृष्ठ 339

३४२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
घण्टा, परशु, मुद्गल को धारण कर रही थीं । सिंह वाहन पर
विराजमान थी और लाल वर्ण वाले नेत्रों से अतीव उज्जवल थीं ।
परमेश्वरी अपने शूल के द्वारा महिष असुर का भेदन करके संस्थित
थीं । वहाँ पर अपने बाँये चरण से आक्रमण करके जगन्मयी देवी
विराजमान थीं । उन देवी का दर्शन करके समस्त देवगण उनको प्रणाम
कर रहे थे । उस महिषासुर को निहित विलोकन करके वे देव कुछ भी
नहीं बोल रहे थे । इसके अनन्तर वह परमेश्वरि उन ब्रह्मादिक देवों से
बोली ।
देवी के मुख में मन्द हास था और परम प्रसन्न थी, शुभ दन्तपंक्ति
से वे उज्जवल थीं । उन्होंने देवों से कहा-हे सुरगणों! आप लोग अब
अन्य जम्बूद्वीप की ओर गमन कर जाओ । हिमवान् पर्वत के समीप में
परम श्रेष्ठ कात्यायन का आश्रम है । वहाँ पर ही आपका साध्य होगा
इसमें संशय नहीं है । इतना कहकर वह महादेवी वहाँ पर ही अन्तर्धान
हो गई थीं । उस अवसर में देवगण भी कात्यायन मुनि के पुर को चले
गए थे । देवी के द्वारा महिषासुर निहित हो गया था जो कि अर्थ से
हम सबने देखा था । और महा जगतों की धात्री, जगतों से परिपूर्ण देवी
का स्तवन किया गया था । उस महादेवी ने हमको यहाँ कात्यायन के
आश्रम में गमन करने को किस प्रयोजन के लिए कहा है । क्या कोई
अन्य कार्य हमारा वांछित होगा ? वे सब ही परस्पर में विचार करते हुए
चले गए थे ।
हिमवान् पर्वत के समीप में ही कात्यायन मुनि का आश्रम है । फिर
इन्द्र के सहित तथा दिक्पालों के समेत ब्रह्मा, विष्णु, शिव वहाँ गए
थे । वहाँ पर बहुत लम्बे समय तक वे बैठ गए और सभी दुर्गा देवी के
दर्शन की लालसा वाले हो रहे थे । इसके अनन्तर समस्त रुद्रगणों ने
महिषासुर के चेष्टित को आकर कहा था । उन्होंने देवलोक के पराभव
का कथन वहाँ आकर किया था । इसके अनन्तर वहाँ पर ब्रह्मा, शिव,
विष्णु प्रभृति ने महान् कोप किया था । वह महिषासुर तो देवी के द्वारा
हित कर दिया गया । वह कौन है जिसके द्वारा पुनः यहाँ पर जगतों