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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(११३)

मोहि सना ॥ ८० ॥ मूये ब्रह्मा विष्णु महेशा । पार्वती सुत भये
गनेशा ॥ मूये चन्द्र मुखे रवि केता । मुखे हनुमत जिन बांधी
सेता ॥ मूये कृष्ण मुखे करतारा । यक न मुआ जो सिरजन हारा ॥
कहैं कवीर मुआ नहीं सोई । जाको आवागमन न होई ॥ ४५ ॥
शब्द ४३४-पंडित अचरज यक बड़ होई । यक मरमुखे अन्न नहीं
खाई यक मर सीझ रसोई ॥ ८० ॥ करि अस्नान तिलक करि बैठे
नौ गुण कांध जनेऊ । हांडी हाड हाड थारी मुख अब षट करम
बनेऊ ॥ धरम कथे जहं जीव बचे तहं अकरम कर मेरे भाई ।
जो तोहरेको ब्राह्मन कहिय तो केहि कहिय कसाई ॥ कह कवीर
सुनो हो संतो भरम भूलि दुनियाई । अपरम पार पार पुरुषोत्तम
यह गति विरलै पाई ॥ ४६ ॥

शब्द ४३५-पंडित बूझ पियो तुम पानी । जा माटीके घरमें
बैठे तामें सुछि समानी ॥ छप्पन कोटि जादव जहं विनशे सुनि जन
सहस अठासी । परग परग पैगम्बर गाडे ते सरि माटी मासी ॥
मच्छ कच्छ घरियार वियाने रुधिर नीर जल भरिया । नदिया
नीर नरक बहि आवै पशु मानुष सब सरिया ॥ हाड झरो झरि
गूद गली गलि दूध कहातै आयो । सो तुम पांडे जेवन बैठे
मटिअहि छूत लगायो ॥ बेद किताब छोड दिहु पांडे ई सब
मनके करमा । कहैं कवीर सुनो हो पांडे ई सब तुम्हरे धरमा ॥ ४७ ॥

शब्द ४३६-पंडित देखौ हृदय विचारी । कौन पुरुष को है
नारी ॥ ८० ॥ सहज समाना घट घट बोले वाको चरित अनूपा ।
वाको नाम का कहि लीजे ना बहि वरन न रूपा ॥ तैं मैं क्या
कोर नर बौरै क्या तेरा क्या मेरा । राम खुदाय सकति शिव एकै
कहु धौ काहि निवेरा ॥ बेद पुरान कुरान कितेबा नाना भांति
बखानी । हिन्दू तुरुक जैन ओ जोगी एकल काहु न जानी ॥