कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
छः दरशनमें जे परवाना तासु नाम मन माना । कहै कवीर
हमहीं हैं बौरै ई सब खलक स्याना ॥ ४८ ॥
शब्द ४३७-बुझ बुझ पंडित पद निर्बाना । सांझ परे कहंवा
बस भाना ॥ ८० ॥ नीच ऊंच पर्वत ढेल न भीत । विन गायन
तहवां उठ गीत ॥ ओस न प्यास मन्दिर नहिं जहंवां । सहसौ
घेनु दुहावै तहवां ॥ नितै अमावस नित संकांती । नित नित नव
ग्रह बैठे पांती ॥ मैं तोहि पूछौ पंडित जना । हृदया ग्रह न लागु
केहि खना ॥ कह कवीर इतनो नहिं जान । कौन शब्द गुरु
लागा कान ॥ ४९ ॥
शब्द ४३८-बुझ बुझ पंडित विरवा न होई । अध बस पुरुष
अधा बस जोई ॥ ८० ॥ विरवा एक सकल संसारा । सरग शीश
जर गेल पतारा ॥ बारह पखुरी चौबिस पाता । घन बरोह लागी
चहुं घाता ॥ फलै न फूलै वाकि है बानी । रैन दिवस विकार
जुव पानी ॥ कह कवीर कछु अच्छलो न जहिया । हरि विरवा
प्रतिपालत तहिया ॥ ५० ॥
शब्द ४३९-बुझ बुझ पंडित मन चितलाय । कबहिं भरल वहे
कबहि सुखाय ॥ ८० ॥ खन ऊबे खन डूबे खन अवगाह । रतन
न मिले पाव नहिं थाह ॥ नदिया नाहिं सरस बहे नीर । मच्छ
न मरे केवट रहे तीर ॥ पोहकर नहीं बांधल तहं घाट । पुरइनि
नहीं कमल महि बाट ॥ कहै कवीर यह मनका धोखा । बैठारहै
चला चह चोखा ॥ ५१ ॥
शब्द ४४०-बूझ लीजे ब्रह्म ज्ञानी । घुरि घुरि बरषा बरषावै
परिया बुंद न पानी ॥ ८० ॥ चीटीके पग हस्ती बांधे छेरी बीगै
खायो । उदधि मांहते निकसि छांछरी चौड़े गेह करायो ॥ मेढुक
सर्प रहै इक संगे बिछी स्वान बियाही । नितउठि सिंह सियार सों