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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(९१२)

कवीरपंथी—

अचवन छूतिहि जग उपजाया । कह कवीर ते छूति बिर्वाजित
जाके संग न माया ॥ ४१ ॥

शब्द ४३०—पंडित सोधि कहहु समुझाई । जाते आवागमन
नशाई ॥ अर्थ धर्म औ काम मोक्ष फल कौन दिशा बस भाई
॥ टेक ॥ उत्तर दछिन पूरब पच्छिम सरग पतालके माही । विन
गोपाल ठौर नहिं कतहुं नरक जात धौं काही ॥ अनजानेको नरक
सरग है हरि जानेको नाहीं । जेहि डरको सब लोक डरतु है सो
डर हमरे नाहीं ॥ पापपुन्यकी शंका नाहीं सरग नरक नहिं जाहीं ।
कहैं कवीर सुनो हो संतो जहैं पद तहां समाहीं ॥ ४२ ॥

शब्द ४३१—पंडित मिथ्या करो विचारा । ना ह्लां सृष्टि न
सिरजनहारा ॥ टेक ॥ थूल स्थूल पवन नहिं पावक रवि शशि
धरनि न नीरा । ज्योति स्वरूपी काल न उहवां बचन न आहि
शरीरा ॥ धरम करम कछुवो नहिं उहवां ना कछु मंत्र न
पूजा । संजम सहित भाव नहिं एको सो तो एक न दूजा ॥
गोरख राम एको नहिं उहवां ना वर्हिं भेद विचारा । हरि हर ब्रह्म
नहीं शिव सकती तिरथौं नहीं अचारा ॥ माय बाप गुरु जाके
नाहीं सो दूजा कि अकेला । कह कवीर जो अबकी समझैं सोइ
गुरु हम चैला ॥ ४३ ॥

शब्द ४३२—बूझहु पंडित करहु विचारी, पुरुष अहे कि नारी
॥ टेक ॥ ब्राह्मन केरे ब्रह्मनी होती जोगी के घर चेली । कलमां
पठि पठि भई तुरकिनी कलिमें रहै अकेली ॥ वर नहिं वरै व्याह
नहिं करई पुत्र जनम होनिहारी । कारे मूडे एक नहिं छाडे अबहुं
आदि कुवारी । मायिक न रहै जाइ न ससुरे साईं संग न सोवे ॥
कह कवीर वे जुग जुग जीवे जाति पांति कुल खोवे ॥ ४४ ॥

शब्द ४३३—कौन सुआ कह पंडित जना । सो समुझाय कहौ