कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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काहीं । जो तुम्हरे कछु उद्यम नाहीं, भीख मांग किन खाहीं ॥
मूल सजीवन जानत नाहीं, मत परबोधा काहीं । नाव तुम्हरी
करिया नाहीं, लहर उठे विकरारा । गुरु सहित सब चेला बूड़े,
कौन उतारे पारा ॥ सूखे काटे जो घुन लागे, लोहे लागे काई ।
बिन परतीत गुरु का कीजे, काल घसीटे जाई ॥ अमृतकुंड
सदाकी चौकी, बेली बेला राखे । नेवर देखे विषहर कंपे, चपल
अमीरस चाखे ॥ माया आय चौकमें बैठी, नवल विवाहन आहीं ।
दये कपाट महलमें पौड़े, अब कछु संशय नाहीं ॥ समझ न होय
तो समझो गुरुजी, नातर होत बिगारा । कहैं कवीर सुनो रामानंद,
यह सिख लेउ हमारा ॥
शब्द १८८—नगरीया वौरी कोई चतुर न पावे पार ॥ टे० ॥
साकट सूकर कूकरा, तीनोंका मत एक ॥ कोट जतन परबोधिये,
तऊ न छाड़े टेक ॥ तास नाम बेगमपुरा, बसे सो बेगम होय ॥
या नगरी जो घर करे, बहुरि न आवन होय ॥ जात बरन यहाँ
है नहीं, दरस दिवाना देश ॥ जतन जतनसों पाइये, बहुरि नहीं
धरे भेश ॥ पांच तत्त्व तत्त्वहि मिले, पढ़ि समाने ग्रान ॥ ज्ञान
ध्यान पैड़े थके, ततका ना गलतान ॥
शब्द १८९—जिनकी गगन घटा घहरानी ॥ चमको बीज भयो
उजियारो, मिट गई तिमिर निशानी ॥ टे० ॥ ज्ञान ध्यानके बैल
चराये, खेत जोत निरबानी ॥ दुबिधा दूब खोद किन डारो, फिर
बोवो नामकी धानी ॥ अपनी अपनी बंधिया बांधो, बहि न जाय
कहुं पानी ॥ चित चेतन रखवारे राखो, चरि न जाय मिरगानी ॥
उपजे खेत नाज घर आवे, आनंद मगन किसानि ॥ कहैं कवीर
सुनो भाई साधो, तृष्णा तपन बुझानी ॥
कवीरपंथी शब्दावली २७